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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-सुधीर तालियान-

Communal Politics1

लोकतंत्र शासन का उच्चतम मानदंड कहा जाता है। यह पद्धति विश्व में अत्यंत स्वीकार्य पद्धति के रूप में विकसित हुई है। भारत एक सामाजिक विविधता वाला देश है। इस देश में लोकतान्त्रिक राजनीति ही उत्तम है। लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति के दो आयाम होते है। जहाँ ये अधिकतम लोगो की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करती है वहीँ कुछ स्वार्थी और सत्ता लोलुप लोगों को भी तंत्र में शामिल होने का आसान रास्ता उपलब्ध करा देती है। लोकतंत्र को इस्तेमाल करने वाले कुछ तिकड़मों को सहारा लेते है। भारत में तीन प्रकार की तिकड़मी राजनीति प्रचलित है।

1 – सौदेबाजी की राजनीति।
2 – पहचान की राजनीति।
3 – सांप्रदायिक राजनीति।
इन तिकड़मो से सत्ता हासिल करने वाले ये भी भूल जाते है कि राजनीति का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को भय और शोषण मुक्त परिवेश उपलब्ध कराना होता है। तिकड़मी राजनीति से उत्पन्न संतानो में स्वार्थ की अधिकता होती है। भ्रष्ट और समझोता परस्त मानसिकता के धनी ये लोग सत्ता में बने रहने के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाते है। जनता को वोट बैंक की नजर से देखते है। एकजुटता का प्रदर्शन करने वाले समूह को गलत करने का लाइसेंस मिल जाता है। ऐसे राजनीतिक माहौल में स्वहित सर्वोपरि होता है। ये राजनेता राष्ट्रीय हित के प्रति उदासीन होते है और सारा जोर स्वम् को सत्ता में बनाये रखने पर होता है। सत्ता में रहने के लिए समझौतावादिता और तुष्टिकरण को प्रमुख हथियार के रूप में प्रयोग करते है। जनता को भौतिक सविधाओं के सपने दिखा कर सम्मोहित कर देते है जिससे जनता इस अंधी दौड़ में शामिल हो जाती है।
फिर आरम्भ होता है शोषण का अंतहीन प्रक्रिया। भ्रष्टाचार नेताओं से चल कर नौकरशाही से होता हुआ जनता तक पहुँचने लगता है। व्यापार और सत्ता का गठजोड़ माहौल को दूषित करने लगता है। जिसका नाजायज लाभ उठाते हुए कुछ भ्रष्ट लोग एक बड़े मगर असंगठित समूह का शोषण करने लगते है। जनता इस शोषक गठजोड़ के सामने खुद को असहाय पाती है। और अब आरम्भ होता हताशा और निराशा का दौर।

जनता समझने लगती है कि जनतंत्र एक भ्रान्ति है। जनता इस भ्रम से निकलने के लिए छटपटाने लगती है। यही छटपटाहट जनता को निराशा के गहरे गर्त में ढकेल देती है। हताशा की ये चरम सीमा ही अवतारवाद की जननी होती है। निराशा के वातावरण में तर्क के लिये कोई स्थान नहीं होता है इसलिए सबसे पहले तर्क बुद्धि मैदान छोड़कर भाग जाती है। ऐसे में भय, गरीबी, असुरक्षा की भावना और अत्यधिक अमीर लोगों के प्रति ईर्ष्या, आग में घी का काम करती है। अब जनता त्राहिमाम के उद्घोष के साथ किसी अवतार की प्रतीक्षा करने लगती है। ऐसे माहौल में कोई पराक्रमी व्यक्ति हमारी आशा का केंद्र बनकर उभरता है। यही व्यक्ति हमारे कष्टों का निवारण करेगा ऐसी धारणा मन में रख कर जनता खुद को उसके हवाले कर देती है। यह कथित पराक्रमी पुरुष जो कुछ विशेष लोगो द्वारा निर्मित होता है, जनता को ये विश्वास दिलाने में सफल हो जाता है कि वही वो अवतार है जो आपके भाग्य को पल भर में बदल सकने की कुदरती शक्ति रखता है। जनता भी मानवीय प्रकृति के
अनुरूप, उस कथित अवतार को अपना सर्वस्व अर्पित कर देती है। और उसे पालनहार का दर्जा दे देती है। अब होता है अवतार युग का आरम्भ। क्योंकि यह नवीन अवतार भ्रष्ट आर्थिक व्यवस्था एवं गलत राजनीति और कमजोर सामाजिक व्यवस्था की तंग गलियों का शोषित व्यक्ति होता है और अधिकांश जनता का वरदहस्त भी उसके सर पर होता है इसलिए उसकी नीतिया थोड़ी निरंकुश होने लगती है। शोषक वर्ग का दमन कठोरता से करता है। ऐसा शासक खुद को ,अपनी जनता को ,और देश को विश्व स्तर पर सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए अत्यधिक परिश्रम करने लगता है। देश के लिये कुछ भी करने गुजरने की ये ललक उसको जनता की नजर में ईश्वरीय अवतार के रूप में स्थापित कर देती है। और अब अनजाने में ही बढ़ने लगते है निरंकुशता की रह पर कदम।

देश और जनता को गरीबी के चक्रव्यूह से निकालने के लिये वो अवतार शासक कुछ कठोर नीतियों का अनुसरण करने लगता है। प्रत्येक प्रकार की नीतियों को अपने हित में प्रयोग करने में माहिर पूंजीवादी वर्ग पूरी व्यवस्था को को धीरे-धीरे अपने कब्जे में करने लगता है। देश को उन्नति के शिखर पर बैठाने के चक्कर में ये अवतार महोदय उस ही भ्रष्ट पूंजीवादी वर्ग के हाथों का खिलौना बन जाता है, जिससे जनता पहले ही त्रस्त थी। एक बार फिर वही सत्ता और व्यापार का गठजोड़, एक बार फिर वही शोषण, एक बार फिर वही ताकतवर का भय, फिर वही निराशा लकिन इस बार माहौल थोडा जुदा, सारी शक्तियां व्यक्ति विशेष के हाथों में। उस अवतार की महत्वाकांक्षा ,उसकी कुंठा ,उसकी वो दमनकारी मानसिकता जिसको एक समय इस ही जनता ने बल दिया था ,खुद की सर्व श्रेष्ठता का अन्धविश्वास ,इस कथित अवतार पर कब्ज़ा कर लेता है। जनता के इस अवतार में जन्म लेने लगती है निरंकुश शासक की प्रवृत्ति। और जनता के भाग्य में लिखा जाता है निरंकुश तानाशाही का दंश…

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