लेखक परिचय

सुवर्णा सुषमेश्वरी

सुवर्णा सुषमेश्वरी

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zakir%20naikसुवर्णा सुषमेश्वरी
भारत के विवादास्पद मुस्लिम धर्म प्रचारक जाकिर नाइक के उपदेशों पर भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में शुरू हुआ बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है । इस विषय पर पक्ष और विपक्ष के वक्तव्यों से माहौल निरन्तर गर्म होता जा रहा है । उल्लेखनीय है कि इस विषय पर बहस तब शुरू हुई, जब यह तथ्य प्रकाश में आया कि ढाका में 20 लोगों की ह्त्या करने वाले आतंकियों का मुख्य प्रेरणास्त्रोत इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक था । इस तथ्य के प्रकाश में आने के बाद भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में बसने वाले मुसलमानों के लिए यह अत्यावश्यक हो गया है कि वे ऐसे तत्वों का न केवल बहिष्कार करें, बल्कि अपने धर्म से प्रेरित आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट स्टैंड लेना शुरू करें। अब यह कहने भर से काम नहीं चलने वाला कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता या आतंक और इस्लाम का कोई सम्बन्ध नहीं है । बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजिद ने ढाका में 20 लोगों की ह्त्या पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि रमजान के पवित्र महीने में बेगुनाह मेहमानों पर हमला करने वाले इस्लाम को मानने वाले नहीं हो सकते। लेखिका तस्लीमा नसरीन का कहना था कि आतंकियों ने लोगों को कलमा पढ़वाया और जिन्हें कलमा याद था उन्हें बख्श दिया और दूसरों की गर्दन रेत दी। उनके अनुसार ऐसे कट‌्टरपंथ और क्रूरता की शिक्षा धर्म से ही आती है। किंतु ऐसी सोच रखने वाले उन तमाम लोगों को क्रूर साबित कर देते हैं जो इस्लाम को मानते हुए भी कट्‌टपंथियों के शिकार हो रहे हैं। शिवसेना ने जिस समय नाइक पर पाबंदी लगाने की मांग की उसी समय मक्का से नाइक का संदेश आया कि ढाका में जो कुछ हुआ वह गैर-इस्लामी था। उनकी दलील है कि फेसबुक पर उनके डेढ़ करोड़ फॉलोअर हैं और पीस टीवी पर उनके उपदेशों को बीस करोड़ लोग सुनते हैं। जरूरी नहीं कि उनमें से सारे लोग महज उन्हीं की बातें सुनते हों। वे किसी और को सुनकर भी प्रभावित हो सकते हैं और हिंसा कर सकते हैं।
इस मामले के सामने आने के बाद नाइक के समर्थकों का तर्क है कि उसने आतंकवाद की वकालत कभी नहीं की, लेकिन उसका सर्वाधिक कुख्यात भाषण कुछ और कहानी कहता है, जिसमें उसने कहा कि – अगर मुसलमानों को आतंकित किया जाता है तो सभी मुसलमानों को आतंकवादी हो जाना चाहिए । जो मुसलमान भारत या अमेरिका या यूरोप जैसे धर्मनिरपेक्ष देशों में रह रहे हैं, उनके सामने आगे चलकर देर सबेर एक ही रास्ता शेष रहेगा और वह है इस्लामी आतंक के खिलाफ अधिकतमवादी और स्पष्ट रीति, नीति और स्थिति । इसका सीधा सा कारण है, इस्लामी विचार से होने वाला आतंक का पोषण । एक अन्य वक्तव्य में आतंकवाद का पृष्ठपोषण करते हुए नाइक ने कहा था कि अगर ओसामा बिन लादेन इस्लाम के दुश्मनों से लड़ रहां है, तो मैं उसके साथ हूँ। अगर वह अमेरिका जैसे सबसे बड़े आतंकवादी को आतंकित कर रहा है तो मैं उसके साथ हूं। इसी संदर्भ में उसने कहा कि सभी मुसलमानों को आतंकवादी होना चाहिए । इस खुल्लमखुल्ला अभिव्यक्ति के बाद भी किसी मुसलमान ने उससे नहीं पूछा कि उसने कैसे फैसला कर लिया कि अमेरिका एक आतंकवादी और इस्लाम के खिलाफ है ? यहाँ यह भी स्मरणीय है कि नाइक ने मक्का और मदीना में गैर मुसलमानों पर लगे प्रतिबंध का किस प्रकार बचाव किया था – ये इस्लाम के गढ़ हैं, अत: यहाँ अन्यों का प्रवेश वर्जित है। नाइक के इस प्रकार के वक्तव्यों से गैरमुस्लिमों में भारी रोष व्याप्त है और वे नाइक की गिरफ्तारी की मांग तक करने लगे हैं लेकिन नाइक है कि विदेश में मजे कर रहा है ।
उधर नाइक ने एक वीडियो जारी कर फिर से अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। नाइक ने भारतीय मीडिया को तथ्यों की जांच को लेकर चैलेंज किया है। साथ ही कहा कि बांग्लादेश सरकार ने उन्हें घटना के लिए दोषी नहीं माना। उसने कहा कि वह यह नहीं मानते कि आतंकियों को मुझसे प्रेरणा मिली। यह एक अलग बात हो सकती है कि आतंकी मेरे फैन हों, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि निर्दोष लोगों की हत्या करने के लिए मैंने उन्हें प्रेरित किया। इस बीच बांग्लादेश के उद्योग मंत्री आमीर हुसैन अमू की अध्यक्षता में संपन्न एक बैठक में ये फैसला लेकर भारत के विवादास्पद इस्लामिक उपदेशक ज़ाकिर नाइक के टीवी चैनल पीस टीवी पर बांग्लादेश ने प्रतिबंध लगा दिया है ।पीस टीवी पर बैन का फैसला इन ख़बरों के लिया गया है कि ढाका में पिछले दिनों होली आर्टिसन बेकरी नामक एक कैफे में हुए हमले में 28 लोगों की मौत की घटना को अंजाम देने वालों में कुछ जाकिर नाइक से प्रेरित थे । जनता की भारी मांग और बढ़ते बवाल के बीच भारत सरकार ने भी शनिवार को सभी राज्यों से ये सुनिश्चित करने को कहा है कि जिन टीवी चैनलों को भारत में प्रसारण की मंज़ूरी नहीं दी गई है उन्हें केबल ऑपरेटर न दिखाएं । सूचना प्रसारण मंत्रालय ने कहा है कि टीवी पर सुरक्षा के लिए ख़तरनाक सामग्री प्रसारित किए जाने की रिपोर्टें हैं, जिनसे सांप्रदायिक तनाव और चरमपंथी हिंसा भड़क सकती है । केंद्र सरकार के परामर्श में कहा गया है, कई निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों जैसे कि पीस टीवी पर इस तरह की सामग्री प्रसारित किए जाने की रिपोर्ट हैं जिसे मंत्रालय डाउनलिंक करने की इजाज़त नहीं देता । राज्यों की ज़िम्मेदारी है कि केबल ऑपरेटरों को ऐसे चैनल दिखाने से रोकें । आठ जुलाई की शाम सूचना एवं प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू के द्वारा इस संदर्भ में बुलाई गई बैठक के समाप्ति के बाद केंद्रीय मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ ने कहा कि गृह मंत्रालय से भी कहा गया है कि सोशल मीडिया पर अगर कुछ दिखे तो उसे रिपोर्ट किया जाए, ताकि तत्काल कार्रवाई हो सके। कनाडा, यूके और मलेशिया में जाकिर नाइक को बैन किए जाने के प्रक्रिया के सम्बन्ध में विदेश मंत्रालय को जानकारी जुटाने के लिए कहा गया । मॉनिटरिंग के बाद जिला अधिकारियों के द्वारा केबल ऑपरेटरों के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सकती है। सरकार का इरादा यूट्यूब पर पीस टीवी के यूआरएल को भी ब्लॉक करने का भी है । इसके लिए यूट्यूब जैसी वेबसाइट्स से बात की जाएगी, क्योंकि पीस टीवी बहुत चालाकी से काम करता है। वह एक साथ सैकड़ों क्लिप यूट्यूब पर डाल देता है।
चैनलों और सोशल मीडिया की आक्रामक खबरों और धार्मिक असहिष्णुता की सोच के प्रभाव में हमें धार्मिक विमर्श की आजादी और आतंक के फर्क को नहीं भूलना चाहिए। जो लोग पीस टीवी पर धार्मिक उपदेश देने वाले डॉ. जाकिर नाइक को इसलिए प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे हैं कि ढाका के आतंकी उनके इस्लामी संदेशों से बहुत प्रभावित थे, वे उसी फर्क को भूल रहे हैं। खैर कुछ भी हो नाइक पर प्रतिबंध समस्या का तात्कालिक समाधान भले ही दीख पड़ता हो , लेकिन प्रतिबंध इस समस्या का अंतिम समाधान नहीं है। वास्तविकता यह है कि उस पर प्रतिबन्ध लगाने से वह अन्य मुसलमानों के लिए एक नायक बन जाएगा। यह मुसलमानों को तय करना है कि वे उसके बताये इस्लाम की ओर जाना पसंद करते हैं, या धर्मनिरपेक्ष भारत द्वारा दिए गए अधिकारों की कद्र करते हैं । इस समय भारतीय मुसलमानों को विचार करना चाहिए और इस बात की चिंता करनी चाहिए कि एक बदमाश उपदेशक, लोगों को उपदेश देने के नाम पर कितनी बड़ी तबाही को आमंत्रित कर सकता है । आपको बड़ी संख्या में लोगों को मारने के लिए किसी अबू-बकर अल-बगदादी जैसे तथाकथित खलीफा की आवश्यकता नहीं है। धर्म निरपेक्ष अक्सर यह कहते देखे जाते हैं कि आतंकवादी मुसलमान ही नहीं हैं, लेकिन यह फिजूल का तर्क है। जब आतंक का पूरा खाका ही काफिरों से लडऩे के लिए कुरान में दिए गए विशिष्ट प्रोत्साहन से तैयार किया जाता है, तो यह कहना आतंकवादी मुस्लिम नहीं हैं, एक सफ़ेद झूठ है। कुछ अन्य यह कहते देखे जाते हैं कि कुरान के अनुसार आतंकवाद न्याय संगत नहीं है। यह बहाना भी सत्य से आँख चुराने जैसा ही है । केवल कुरान ही नहीं, बल्कि इस्लाम का लगभग हर धार्मिक लेख निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा का सन्देश देता है । अगर हम इन धार्मिक मान्यताओं को सच के रूप में स्वीकार करते हैं, अगर मुसलमान यह मानते हैं कि पवित्र कुरान की हर बात भगवान के अंतिम शब्द है, तो यह कहना पूरी तरह भ्रामक है कि आतंकवादियों ने पुस्तक की गलत व्याख्या की है। मुसलमानों के पास भारत या अमेरिका या यूरोप जैसे धर्मनिरपेक्ष देशों में रहने के लिए आगे एक ही रास्ता है, और वह है इस्लामी आतंक के खिलाफ एक अधिकतम स्पष्ट स्थिति । इस आतंक का एक महत्वपूर्ण घटक है वैचारिक इस्लामवाद । अत: यह आवश्यक है कि जिहाद पर बहस के दौरान किसी अन्य का विरोध करते समय कुरान की आयतों का उपयोग बंद हो। इन सबसे बढक़र आदर्श स्थिति तो यह होगी कि जिन देशों में धर्मनिरपेक्षता पूर्व से ही प्रचलन में है, इस्लामी देशों में भी उसे सिद्धांत रूप में स्वीकार किया जाए ।

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