लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

images (2)शर्मा जी ऊपर से चाहे जो कहें; पर सच यह है कि दिल्ली में रहने के बावजूद गांधी जी की समाधि पर जाने में उनकी कोई रुचि नहीं है। वे साफ कहते हैं कि जब मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूं, तो फिर दिखावा क्यों करूं ? पर इस दो अक्तूबर को बाहर से आये एक मित्र के साथ उन्हें राजघाट जाना ही पड़ा।

राजघाट में गांधी जी का साहित्य बड़ी मात्रा में बिक रहा था। उनके मित्र ने भी कुछ पुस्तकें खरीदीं। बाहर आये, तो वहां खिलौने वाले गांधी जी और उनके तीन बंदरों की मूर्तियां बेच रहे थे। वैसे तो इनके संदेश ‘बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो’ को अब कोई नहीं मानता, फिर भी शर्मा जी ने इन्हें घर में सजाने के लिए खरीद लिया। कुछ चाट-पकौड़ी खाकर वे वापस आ गये। रात की गाड़ी से मित्र महोदय भी वापस चले गये।

मूर्तियां शर्मा जी ने अपने शयनकक्ष में मेज पर रख दीं। रात में एक जरूरी काम से जब उनकी आंख खुली, तो वे हैरान रह गये। गांधी जी की मूर्ति की जगह एक बंदर बैठा था और बंदरों के स्थान पर गांधी जी का मुखौटा लगाये तीन हस्तियां विराजमान थीं। वे तीनों बार-बार गुस्से में बंदर को डांट-फटकार रहे थे और बेचारे बंदर जी चुपचाप उसे सुनकर आंसू बहा रहे थे।

गांधी नंबर एक – ऐ मिस्टर बंदर सिंह !

– जी मैडम जी।

– हमने कितनी बार कहा है साम्प्रदायिक हिंसा के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराने वाला विधेयक हर हाल में पारित होना चाहिए। फिर उसमें देरी क्यों हो रही है ?

– मैडम जी, कोशिश तो कर रहे हैं; पर दल और सरकार के अंदर उस पर बहुत विरोध है। यदि हमने दबाव डाला, तो सरकार टूट जाएगी। वैसे तो अब थोड़े ही दिन बचे हैं, फिर भी…..।

– बंदर सिंह, तुम ये क्यों नहीं समझते कि अब हिन्दू तो हमें वोट देंगे नहीं; पर यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो कम से कम मुसलमान और ईसाई वोट तो पक्के हो जाएंगे।

– हां, ये बात तो है।

– फिर..? और इस मुद्दे पर यदि सरकार गिरेगी, तो उसका भी बहुत अच्छा संदेश जाएगा। इसलिए बाकी सब काम छोड़कर इसे पारित कराओ। मेरी तबियत ठीक नहीं रहती। पता नहीं कब…। मैं अपनी आंखों के सामने अपने पप्पू को तुम्हारी कुर्सी पर बैठे देखना चाहती हूं। इसलिए चाहे जैसे भी हो, इस विधेयक को पारित कराओ।

– अच्छा मैडम जी, जो हुक्म।

गांधी नंबर दो – क्यों बंदर जी, अपराधियों को राजनीति में बनाये रखने वाले विधेयक के विरोध का मेरा नाटक कैसा रहा ?

– बहुत अच्छा रहा। सब आपकी प्रशंसा कर रहे हैं। अखबारों ने भी कई महीने बाद आपका चित्र पहले पृष्ठ पर छापा। आपने भी तो देखा होगा ?

– नहीं बंदर जी। हिन्दी पढ़नी तो मुझे आती नहीं। अंग्रेजी अखबारों में भी हर दिन नरेन्द्र मोदी को देखकर सुबह-सुबह मेरा मूड खराब हो जाता है। इसलिए मैंने अखबार पढ़ना ही बंद कर दिया है।

– आप ठीक कह रहे हैं हुजूर। पढ़ना तो मैं भी नहीं चाहता; पर क्या करूं, इसके बिना काम भी तो नहीं चलता ?

– चुनाव सिर पर आ गया है बंदर जी। कुछ ऐसे ठोस उपाय बताओ, जिससे इस कठिन दौर में नैया पार हो सके।

– आप भी कैसी बात कर रहे हैं सर जी। ये उपाय मुझे पता होते, तो मैं ही चुनाव न जीत जाता। फिर भी एक बात बताता हूं।

– हां, हां, बताइये।

– आप अगले चुनाव तक पाउडर लगाना बंद कर दें। इससे आपका चेहरा दीन-हीन, उदास और गरीबों का हमदर्द सा लगेगा। अंदर चाहे जो हों; पर बाहर के कपड़े स्वदेशी और कुछ पुराने या मैले से पहनें। विदेशी जूते की जगह गांधी आश्रम की चप्पल अच्छी रहेगी। इससे गांधी जी भले ही सिर पर न हों, पैरों में तो रहेंगे ही।

गांधी नंबर तीन – बंदर अंकल, राबर्ट के कारोबार के बारे में आपका एक अधिकारी बहुत शोर कर रहा है, उसका कुछ किया ?

– जी हां, कई बार उसका स्थानांतरण कर चुके हैं, फिर भी उसका दिमाग ठीक नहीं हुआ। इसलिए इस बार उसे आरोप पत्र थमा दिया है। मेरी पूरी कोशिश है कि उसे जेल भिजवा दूं। जिससे उसका ही नहीं, बाकी सबका दिमाग भी ठीक हो जाए।

– जरा जल्दी करो बंदर अंकल। अब कुछ महीने ही तो बाकी हैं। इसमें जितना माल बना लें, उतना अच्छा है। पता नहीं, जीवन में फिर कभी ऐसा मौका मिले न मिले ?

शर्मा जी काफी देर तक उनकी बात सुनते रहे। फिर उन्हें नींद आ गयी। सुबह उठे, तो मूर्तियां वैसी ही थीं, जैसी राजघाट से खरीद कर लाये थे। वे बहुत देर तक सोचते रहे; पर माजरा समझ नहीं आया। अगली रात में भी ऐसा ही हुआ। आज सुबह जब वे पार्क में मिले, तो उन्होंने पूरी कहानी सुनाकर पूछा – क्यों वर्मा जी, दिन में तो गांधी जी और बंदर अपनी जगह रहते हैं; पर रात में वे स्थान बदल लेते हैं। ये क्या तमाशा है ?

– शर्मा जी, ये भारत की वर्तमान राजनीति का सच है। जो सरकार चला रहे हैं, वे दिखाई नहीं देते; और जो दिखाई दे रहे हैं, उनके हाथ में कुछ करने की ताकत नहीं है। इसलिए जो परदे के आगे हैं, उन पर थू-थू हो रही है और जो परदे के पीछे हैं, वे हर तरह से मजे में हैं।

– अच्छा जी.. ?

– जी हां। और जो परदे के पीछे हैं, उनके भी पीछे कौन है, यह बहुत कम लोगों को पता है। राष्ट्रीय राजनीति और अतंरराष्ट्रीय कूटनीति के इस अंतर को समझना आसान नहीं है।

– लेकिन राजनीति और कूटनीति के चक्कर में देश का शासन और प्रशासन तो चौपट हो जाएगा ?

– वाह रे मेरे प्यारे शर्मालाल। यदि तुम्हें अब भी शासन चैपट नहीं लगता, तो अपनी आंखों का इलाज वहां कराओ, जहां हर दीवाली पर लक्ष्मी जी अपने वाहन की सर्विस कराती हैं। इससे तुम्हें दिन के अंधेरे और रात के उजाले का अंतर साफ दिखने लगेगा।

बात काफी गहरी थी, इसलिए शर्मा जी के पल्ले नहीं पड़ी। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और आंखें पोंछते हुए प्रस्थान कर गये।

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2 Comments on "व्यंग्य बाण : बंदर जी के तीन गांधी"

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Bhupendra Mody
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very good satire….

बीनू भटनागर
Guest
बीनू भटनागर

अच्छा व्यंग

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