लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला
कहा जाता है कि मुट्ठी भर अंग्रेज इंग्लैण्ड से कई गुणा विशाल भारत पर शासन करने में इसी कारण सफल हो पाए , क्योंकि उनकी सेना और पुलिस में नब्बे प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय ही थे । छल-छद्म की रीति व कुटिल कूटनीति से भारतीय राजाओं-रजवाडों का सहयोग-समर्थन और अंग्रेजी पढे-लिखे लोगों के अंग्रेज-परस्त प्रशिक्षण से निर्मित जन-मन में अंग्रेज-नस्ल की श्रेठता का भाव भर कर यहां शासन व विभाजन करने में सफल रहे वे लोग अब आजाद भारत को भी अपनी उसी नीति से शासित व विभाजित करने में लगे हुए हैं । अब उनके साधन बदल गए हैं । अब वे औपनिवेशिक सेना-पुलिस के भारतीय जवानों का नहीं , बल्कि असैनिक शैक्षणिक-अकादमिक संस्थानों के भारतीय ‘बौद्धिक बहादुरों’ का इस्तेमाल कर रहे हैं ।
भारत के प्राचीन शास्त्रों-ग्रन्थों के ईसाई-हितपोषक औपनिवेशिक अनुवाद हों , या आर्यों के पश्चिमी-विदेशी मूल के होने का बेसुरा-बेतुका राग ; नस्ल-विज्ञान का गोरी चमडी की कपोल-कल्पित श्रेठता-विषयक प्रतिपादन हो या संस्कृत को ग्रीक व लैटीन से निकली भाषा बताने वाले भाषा-विज्ञान का अनर्गल प्रलाप ; इन सब प्रायोजित अवधारणाओं को भारतीय जन-मानस पर थोपने और इससे अपना उल्लू सीधा करने में वेटिकन चर्च के पश्चिमी रणनीतिकार भारत के बुद्धिजीवियों का खूब इस्तेमाल करते आ रहे हैं । इसी तरह से लोकतंत्र , समता , स्वतंत्रता , मानवाधिकार , धर्म , सहिष्णुता , असहिष्णुता , आस्था-विश्वास आदि तमाम विषयों को स्वयं के हित-साधन और भारत के विखण्डन की कूटनीति से परिभाषित करने और फिर उस परिभाषा के अनुसार अपनी योजनाओं को हमारे ऊपर थोपने के लिए भी उननें भारतीय बौद्धिक-बहादुरों की ही फौज कायम कर रखी है ।
‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ से सम्बद्ध ऐसे ही एक बौद्धिक-बहादुर का नाम है- ‘कांचा इलाइया’ , जो भारत में मानवाधिकारों की वकालत करते हैं और भारत की प्राचीन भाषा-साहित्य को दलित-अधिकारों के मार्ग में सबसे बडा बाधक बताते हुए ‘संस्कृत’ की हत्या कर देने का हास्यास्पद बौद्धिक प्रलाप उगलते रहे हैं । ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष-२००१ में मानवाधिकार पर आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए संस्कृत की हत्या कर देने के अपने कार्यक्रम का एलान कर चुके कांचा इलाइया नामक यह बुद्धिबाज सनातन वैदिक धर्म को भारत की समस्त समस्याओं का कारण बताने का अभियान चलाते रहा है । वेटिकन चर्च के प्रचार-तंत्र से बहुप्रचारित इसकी पुस्तक- “ ह्वाई आई एम नाट ए हिन्दू ” में हिन्दू धर्म की ऐसी ही अनर्गल व्याख्या की गई है । इस पुस्तक पर कांचा को डी०एन०एफ० ने ‘पोस्ट डाक्टोरल फेलोशिप’ प्रदान किया है, तो भारत में राजीव गांधी फाऊण्डेशन द्वारा इसे प्रायोजित किया गया है । इस पुस्तक में कांचा इलाइया के द्वारा हिन्दू धर्म की तुलना जर्मनी के नाजीवाद से की गई है और इसे आध्यात्मिक फासीवाद के रूप में वर्णित किया गया है । हिटलर की तानाशाही के लिए भी हिन्दू धर्म को जिम्मेवार ठहराया गया है , क्योंकि वह जर्मन तानाशाह बडे शौक से हिन्दू-धर्म के एक प्रतीक-चिह्न (स्वास्तिक) का इस्तेमाल किया करता था और स्वयं को ‘आर्य’ कहा करता था । ‘पोस्ट हिन्दू इण्डिया’ नामक अपनी पुस्तक में कांचा ने हिन्दू धर्म के विरुद्ध एक नस्लवादी सिद्धांत गढते हुए लिखा है कि “ हिन्दू समाज में ब्राह्मण पशुओं से भी बदतर हैं , क्योंकि उनके मामले में पशु-वृति भी अल्प-विकसित है ” । इतना ही नहीं , यह बौद्धिक बहादुर वेटिकन चर्च-पोषित अपनी बौद्धिकता के बूते भारत के बहुसंख्यक समाज में सामुदायिक घृणा का विष-वमन करते हुए दलितों को गृह-युद्ध के लिए भडकाता है और कहता है- “ ऐतिहासिक रूप से अगडी जतियों ने पिछडी जाति के लोगों को हथियारों के बल पर दबाया है , जैसा कि हिन्दू-देवी-देवताओं का स्रोत हथियारों के उपयोग की संस्कृति में जड जमाये हुए है । भारत में गृह-युद्ध की अगुवाई करने की क्षमता दलितों में है , जिन्हें ईसाइयों का भी साथ मिलेगा ; क्योंकि भारतीय दलित ईसा मसिह को सर्वाधिक शक्तिशाली मुक्ति-दाता के रूप में पाते हैं ” । भारत में गृह-युद्ध की परिस्थितियां निर्मित करने और इसके आन्तरिक मामलों में युरोप-अमेरिका के हस्तक्षेप का आधार व औचित्य गढने के बावत वेटिकन-चर्च-पोषित संस्थाओं से दौलत-शोहरत हासिल करते रहने की कीमत पर अपनी बौद्धिकता का डंडा भांजने वालों में और भी कई नाम हैं ।
रोमिला थापर ऐसा ही एक बहुचर्चित नाम हैं , जिन्हें चर्च- पोषित पश्चिमी संस्थाओं ने परस्पर दुरभिसंधि कर इतिहासकार बना दिया है । वह तथाकथित इतिहासकार बडे जोरदार तरीके से यह लिखती-कहती है कि सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता और भारतीय राज्य-व्यवस्था दबदबा रखने वाले जातीय समूहों द्वारा नियंत्रित दमनकारी उपकरणों के अतिरिक्त कुछ नहीं है , जिन्हें ध्वस्त कर देने की आवश्यकता है ।
इसी तरह से मीरा नन्दा नामक बौद्धिक वीरांगना महिला बायो-टेक्नोलाजिस्ट है , जो प्राचीन भारतीय सभ्यता-संस्कृति, अर्थात सनातन वैदिक धर्म की निराधार निन्दा करने में अपने जैव-प्रौद्योगिकीय ज्ञान का इस्तेमाल करती हुई प्रचारित करती है कि भारतीय संस्कृति विज्ञान-विरोधी है । टेम्पलटन फाऊण्डेशन से दौलत और शोहरत दोनों हासिल करते रहने के एवज में सनातन वैदिक धर्म को येन-केन-प्रकारेन विज्ञान-विरोधी सिद्ध करने का ठेका चला रही यह महिला जब वेदों की वैज्ञानिकता का मुकाबला नहीं कर पाती तब ‘कालिंग इण्डियाज फ्री थिंकर्स’ (भारत के मुक्ति-चेताओं को बुलावा) नामक पुस्तक लिख कर उसमें स्वामी विवेकाननद और दयानन्द पर यह आरोप लगाती है कि उनने हिन्दू-वैदिक धर्म को विज्ञान-सम्मत प्रतिपादित करने का ‘आधारभूत पाप’ किया है ।
भारतीय धर्म-दर्शन-संस्कृति-प्रदर्शक संस्थानों से जुडे हुए भारतीय बुद्धिजीवियों को भी भारत-विरोधी पश्चिमी षड्यंत्रकारी संस्थाओं ने एक तरह से ऊंचे दामों पर खरीद लिया है , जो ‘रंगे सियारों’ की तरह दिखते कुछ हैं और बोलते कुछ हैं । महर्षि अरविन्द के भारतीय दर्शन को प्रोत्साहित करने के निमित्त अमेरिका के सैन-फ्रान्सिस्कों-स्थित ‘कैलिफोर्निया इंस्टिच्युट आफ इण्टेग्रल स्टडिज’ में स्थापित एक संकाय से सम्बद्ध अंगना चटर्जी की बौद्धिकता ऐसी ही बिकाऊ माल है , जो भारत की सनातन वैदिक संस्कृति के किसी भी तथ्य को दलितों के दमन का षड्यंत्र प्रमाणित करने और भारत की सरकारी मिशनरियों एवं हिन्दू-संगठनों को अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हननकर्ता सिद्ध करने के लिए अपना ज्ञान बघारते रहती है । कश्मीर के श्रीनगर में ‘इण्टरनेशनल पिपुल्स ट्रिब्युनल आन ह्यूमन राइट्स एण्ड जस्टिस इन इण्डियन एडमिनिस्टर्ड कश्मीर’ नामक संस्था कायम कर मानवाधिकारों की स्थिति का अध्ययन-अनुसंधान करने-कराने वाली चटर्जी की इस अनैतिक बौद्धिकता को कश्मीरी समाचार पोर्टल चलाने वाले एक पत्रकार-सम्पादक मोहम्मद सादिक ने भारतीय सुरक्षा-बलों के विरूद्ध घृणा को हवा देने वाली और इस्लामी आतंकियों के हाथों की कठपुतली करार दिया है । मोहम्मद साहब ने कंगना की इस बौद्धिक बहादुरी पर सवाल खडा किया है कि उसने मानवाधिकार-अनुसंधान का केन्द्र भारतीय सीमा-क्षेत्र वाले कश्मीर को ही क्यों बनाया है , पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को अपने अध्ययन की परिधि से बाहर क्यों रखा है ?
इस तरह की बौद्धिक जोर-जबर्दस्ती से भारत के आंतरिक मामलों का अनुचित-अवांछित विश्लेषण एक अभियान का रूप लेता जा रहा है , जिसमें भारत की नयी पीढी के विद्यार्थियों-अध्येताओं को भी शामिल किया जा रहा है । विदेशों में पढने वाले भारतीय विद्यार्थियों को इस अभियान में शामिल करने के बावत अमेरिका-स्थित हार्टफोर्ड के ट्रिनिटी कालेज के अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन संकाय निदेशक- विजय प्रसाद काफी सक्रिय हैं , जो अपने कार्यों से यह प्रमाणित करने में लगे हुए हैं कि भारत के दलित-अछूत-आदिवासी अफ्रीका मूल के हैं और सनातन-वैदिक-हिन्दू धर्म फासीवादी व नस्लवादी है, इस कारण भारत में धार्मिक स्वतंत्रता व मानवाधिकार संकटग्रस्त है ।
विदेशी पैसों पर पल रहे इन बौद्धिक बहादुरों की फेहरिस्त में सेंड्रिक प्रकाश , टिमोथी शाह , जान प्रभुदोष , राम पुनयानी , जान दयाल , सीलिया डुग्गर , तिस्ता सितलवाड आदि अनेक नाम हैं , जो जैसे-तैसे यह प्रमाणित करने में लगे हुए हैं कि भारतीय सनातन वैदिक हिन्दू धर्म के कारण भारत में दलितों व अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता तथा उनके मानवाधिकार और लोकतंत्र खतरे में हैं , जिनकी रक्षा के लिए दुनिया की हवलदारी करने वाले अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए । इस प्रसंग में सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि अंग्रेजों के ईसाई-विस्तारवाद और नये औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के इस संयुक्त षड्यंत्र का क्रियान्वयन करने वाली फौज में अपने भारत के ही ‘अभारतीय’ सोच वाले भारतीय बौद्धिक बहादुर शामिल हैं , जिनके काले करामातों से एक ओर हमारा राष्ट्रीय जीवन कलुषित होता जा रहा है , तो दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आय दिनों अपने देश को रक्षात्मक रुख अपनाना पडता है ।

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