लेखक परिचय

संजय कुमार

संजय कुमार

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।समाचार संपादक, आकाशवाणी, पटना पत्रकारिता : शुरूआत वर्ष 1989 से। राष्ट्रीय व स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, विविध विषयों पर ढेरों आलेख, रिपोर्ट-समाचार, फीचर आदि प्रकाशित। आकाशवाणी: वार्ता /रेडियो नाटकों में भागीदारी। पत्रिकाओं में कई कहानी/ कविताएं प्रकाशित। चर्चित साहित्यिक पत्रिका वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित कमलेश्‍वर कहानी प्रतियोगिता में कहानी ''आकाश पर मत थूको'' चयनित व प्रकाशित। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा ''नवोदित साहित्य सम्मानसहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से सम्मानित। सम्प्रति: आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना में समाचार संपादक के पद पर कार्यरत।

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-संजय कुमार

जनसंचार शब्द से आज कोई अछूता नहीं है। खासकर जब 1780 में हिक्की ने भारत में जनसंचार के माध्यम समाचार पत्र की शुरुआत कर क्रांति का बीज जो डाला था, वह छोटा सा वृक्ष आज विशाल बरगद बन चुका है। संवाद को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने के लिए जिन जनसंचार माध्यमों का प्रयोग किया गया था वह वैश्विक होते हुए वे विभिन्नताओं के आगोश में है। जनसंचार के किसी भी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक यों कहे कि किसी भी पहलू से अछूता नहीं हैं। हर सामाजिक पहलू में इसकी जड़ता संजिदा के साथ मौजूद है। इससे समाज का कोई वर्ग अछूता नहीं है। जन संचार के आधुनिक माध्यमों ने गरीब-अमीर के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को सहज बना दिया है। सूचना पाने के माध्यम इतने सहज है कि दस रूपये की रेडियो से देश-विदेश की खबर पलकों में प्राप्त कर ली जाती है। सूचनाओं के आदान प्रदान में मोबाइल फोन/अंतरजालों ने सभी बाधाओं को लांघ दिया है।

सच है कि शुरूआती दौर में संचार को अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने वालों के पास कोई माध्यम, मीडिया को लेकर शैक्षिक व तकनीकी योग्यता नहीं रहा था। फिर भी शुरूआती दौर में जो काम हुआ एक मकसद के साथ। जन संचार के माध्यम मीडिया को जन हथियार बनाया गया और इसके माध्यम से जनता को शिक्षित करने, खबर, सूचना पहुंचाने के साथ-साथ मनोरंजन करने का काम किया। इसने अपने को इतना मजबूत बना लिया और इसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाने लगा। संचार का माध्यम यानी मीडिया। आमतौर पर प्रेस और पत्रकारिता को आज के आधुनिक स्वरूप में समग्र रूप से मीडिया के नाम से ही जाना जाता है। प्रेस यानी मीडिया, पत्रकारिता यानी मीडिया। यह पत्रकारिता के लिए सबसे प्रचलित नाम है। जो जन संचार से संबंध रखता है।

जन संचार की व्यापकता को देखते हुए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर काफी प्रयास हुए। इसे और व्यापक बनाने के लिए इसमें सैद्धांतिक और शैक्षिक पहलुओं को शामिल किया गया। वैष्विक और बाजारवाद ने जन संचार शिक्षा को जन्म दिया। इसकी व्यापकता ने व्यवसाय को जन्मा। बाजार व व्यवसाय के मायने बदल दिये। मीडिया जिससे जुड़ने में उच्च वर्ग कतराता था आज इसे व्यवसाय के रूप में चुनते है। इसे और धारदार बनाने के लिए तकनीकी और शैक्षिक बनाया गया। शुरूआती दौर में कुछ विष्वविद्यालयों में जनसंचार शिक्षा की पढ़ाई शुरू हुई। सरकारी तौर पर भारतीय जन संचार संस्थान इकलौती संस्था रही। जहां जनसंचार की पढ़ाई पढ़कर छात्र मीडियाकर्मी यानी संचारकर्मी बने और लोकतंत्र के चौथे खम्भे को और मजबूत करने के लिए मैदान में कूद पड़े। इसके प्रभाव ने हालात को बदला समय की मांग ने देश में जनसंचार के दो विष्वविद्यालय स्थापित किये। यहीं नहीं कालांतर में देश के विष्वविद्यालयों में जन संचार की पढ़ाई होने लगी। जहां सरकारी स्तर पर जन संचार शिक्षा बरगद के पेड़ की तरह और शाखाएं जोड़ी, वहीं निजी तौर पर देश में संस्थान खुले। इसमें भी व्यवसाय आया। आज हकीकत यह है कि देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह जन संचार शिक्षा संस्थाने खुली हुई है और रोजाना खुल रही हैं। इन संस्थानों में पांच हजार से लेकर लाखों रुपए की फीस छात्रों से वसूली जाती रही है।

हजारों की तादाद में प्रत्येक वर्ष देश भर के सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों से जन संचार की शिक्षा प्राप्त कर छात्र पत्रकार बन इसे और मजबूत करने के लिए प्रयासरत हो जाते हैं। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज कुकुरमुत्ते की तरह फैलते जनसंचार संस्थानों से निकलने वाले छात्रों का प्लेसमेंट क्या व्यापकता के साथ हो पाता है? जवाब मिलेगा- नहीं। अकेले बिहार में लगभग सभी विष्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है। पटना को ही लें तो सरकारी कॉलेजों में केवल एक कॉलेज में प्रत्येक साल कम से कम पचास छात्र पत्रकारिता की कक्षा में दाखिला लेते हैं। नालंदा खुला विश्‍वविद्यालय में तो पत्रकारिता की पढ़ाई में दाखिल लेने वाले छात्रों की संख्या सैंकड़ों में होती है। इसमें दो मत नहीं कि जन संचार शिक्षा को लेकर प्रमुख शहरों से होते हुए गली-कूचे में खुले पत्रकारिता संस्थानों के समक्ष कई तरह की चुनौतियां हैं। जहां एक ओर माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में व्यापक बदलाव हुआ है, हजारों की तादाद में मीडिया के ग्लैमर और चकाचौंध से प्रभावित होकर हर वर्ग के छात्र इससे जुड़ रहे हैं। मीडिया को कैरियर बनाने की आपाधापी, छात्र-छात्राओं में देखी जा रही है। संस्थानों ने व्यापकता की सीमा को लांघते हुए संचार के शिक्षा संस्थानों को अति आधुनिक बना डाला है, तो वहीं यूजीसी और अन्य पत्रकारिता संस्थानों से मान्यता प्राप्त कर, चल रहे छोटे-मोटे शिक्षण संस्थानों में पांच हजार के शुल्क पर जन संचार की शिक्षा छात्र प्राप्त कर रहे हैं। इनके बीच एक संकट है कि आज भले ही भारी तादाद में मीडिया की ओर छात्रों का रुझान बढ़ा है, ज्यादातर मीडिया संस्थानों में मीडिया की पढ़ाई पढ़ने और पढ़ाने वाले अपने प्रोफेशन से न्याय नहीं कर पा रहे हैं। बिहार की राजधानी पटना में निजी और सरकारी तौर पर चलने वाले पत्रकारिता संस्थानों में लड़के और लड़कियों में कुछ ही के बीच मीडिया के रुझान को लेकर दिलचस्पी देखने को मिलती है। एक हाई-फाई मीडिया संस्थान के विभागाध्यक्ष कहते हैं कि मीडिया की पढ़ाई में प्रत्येक साल छात्रों की संख्या पचास से कम नहीं होती, लेकिन जो छात्र आते हैं उनमें कुछ मीडिया के ग्लैमर के तहत आते हैं तो कुछ टाइम पास के लिए। यह सोच अन्य शैक्षिक माहौल में भी व्याप्त है, लेकिन जहां तक मीडिया का सवाल है, इसमें अगर छात्रों के बीच गंभीरता नहीं रही तो वे असफल हो जायेंगे। एक बात और है कि कुछ लोग मीडिया की पढ़ाई इसलिए करते हैं कि कहीं प्रवेश नहीं मिला तो चलो मीडिया की पढ़ाई कर लेते हैं। हालांकि सरकारी स्तर पर सर्टिफिकेट कोर्स के तहत मीडिया की बारीकियों के बारे में पढ़ाया जाता है। एक संस्थान के निर्देशक ने बताया कि कुछ छात्र पूरी तरह से मीडिया के प्रति डिवोटी होकर आते हैं। वहीं पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षक भी सवालों के घेरे में रहते हैं, वे छात्रों को पत्रकारिता की व्यावहारिक और तकनीकी ज्ञान पूरी तरह से देने में असफल रहते हैं। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर निजी स्तर के पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाने वाले अखबारों से आते हैं। उनके पास भले ही रिपोर्टिंग, एडिटिंग का अनुभव हो, लेकिन वे पत्रकारिता के शैक्षिक पहलुओं को पूरी तरह नहीं बता पाते। इसके पीछे सामग्री का अभाव होना है। पहले पत्रकारिता की तमाम पुस्तकें विदेशी लेखकों के मिलते थे। आज माहौल बदला है और पत्रकारिता की तमाम पुस्तकें अंग्रजी के अलावे सभी भारतीय भाषाओं में अमूमन मिल ही जाते है। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान ने पुस्तकें प्रकाशित कर काफी सामग्री मीडिया संस्थानों को दी है। साथ ही कई प्रकाशकों ने भी पुस्तकें छापी है।

दूसरी ओर पत्रकारिता संस्थान की व्यापकता और प्रत्येक वर्ष पढ़ाई पूरी कर निकलने वाले छात्रों के समक्ष प्लेसमेंट की भी समस्या रहती है। बड़े संस्थान तो सब्जबाग दिखा कर छात्रों को दाखिले के लिए प्रलोभित करते हैं, वहीं उनके प्लेसमेंट को लेकर उनमें सजगता नहीं दिखती है। मीडिया उद्योग बन चुका है। लेकिन इसमें जगह पाने की स्थिति पर प्रश्‍न चिन्ह लगा है। देखा जाये तो देश दुनिया की खबरों को मीडिया अनोखे अंदाज में लोगों के सामने लाने की दिशा में रोजाना कुछ न कुछ नया करके रिझाने की फिराक में रहता है। मीडिया के लिए मिशन शब्द उसके डिक्षनरी से लगभग गायब हो चुका है। दूसरों की जिंदगी में ताक झांक कर खबर बनाना, इसकी फिदरत है। लेकिन इसके अंदर की खबर किसी को नहीं मिलती? चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं ने जब खबरिया चैनलों पर एक विशेषांक निकाला तो मीडिया जगत की कुछ अंदरूनी बातें सामने आयी। लोग चौंके। बहस हुई। मीडिया के ठेकेदारों के बीच हड़कंप मचा। वाद-विवाद का दौर चल पड़ा। हंस और कथादेश में छपे मीडिया के अंदर की बात पर सफाई दी जाने लगी, तो वहीं मीडिया पर उंची जाति के कब्जे की बात को खारिज करने का भी सिलसिला चला। जाहिर है मीडिया के अंदर के सच पर जब मीडिया के ही लोगों ने हमला बोला तो इसे तथाकथित मीडियाकर्मी पचा नहीं पाये। आज कुछ अखबार जहां मीडिया पर आलेख छाप रहे हैं वहीं बेव पत्रकारिता से जुड़े लगभग सभी अंतरजालों ने अपने यहां मीडया पर एक कॉलम ही चला दिया है जबकि कई अंतरजाल सिर्फ मीडिया तक ही सीमित है। खैर, बात मीडिया के अंदर की है। इसमें स्थान पाने की बात है। मीडिया के अंदर कई सच है, जो सामने नहीं आते और आते भी हैं तो उसे जगह नहीं दी जाती। इधर, आर्थिक तंगी की मार से जहां पूरा विष्व परेशान है। हर जगह छटंनी/ संस्थान को बंद करने का सिलसिला सा चल पड़ा है। तो ऐसे में, मीडिया संस्थान भी इससे अछूते नहीं हैं। पत्रकारों को निकालने का दौर चल पड़ा है। अंतरजालों पर इन दिनों पत्रकारों के निकाले जाने और चैनल/ प्रकाशन के बंद होने से पत्रकारों के बेरोजगार की होने की खबरें लगातार मिल रही है। वहीं नये समाचार पत्रों के प्रकाशन की भी खबर है। जहां एक ओर पत्रकारों के निकाले जाने की खबर मिल रही है वहीं दूसरी ओर नये समाचार पत्रों के प्रकाशन की खबर भ्रम पैदा करती मिलती है। मीडिया हाउस के बंद होने और पत्रकारों के निकाले जाने की खबर किसी न किसी रूप में तो मिल जाती है। लेकिन मीडिया में एक बात है जो सामने नहीं आती। वह है नियुक्ति की। पत्रकारिता संस्थानों से पढ़ाई पूरी कर निकलने वाले अक्सर सवाल कर बैठते है।

प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक इसके संपादक या फिर उपसंपादक/ संवाददाता या यो कहें कि मीडिया के अंदर किसी पद की नियुक्ति का पता ही नहीं चल पाता है। संपादक के पद के लिये तो विज्ञापन आता ही नहीं। अचानक पता चलता है कि फलाने अखबार के संपादक की जगह फलाने ने ले ली है। यहां तक मीडिया हाउस में कार्य कर रहे लोगों तक को पता नहीं चल पाता है और रातों रात संपादक बदल जाते हैं। वहीं सरकारी क्षेत्र की नियुक्तियां कई प्रक्रिया से गुजरती है। नियुक्ति आदेशपाल का हो या फिर अधिकारी-कर्मचारी का। विज्ञापन प्रकाशन के बाद कई महीनों तक नियुक्ति की प्रक्रिया चलती है। लेकिन मीडिया हाउसों में ज्यादातर नियुक्तियां अंधेरे में हो जाती है। हालांकि, कुछ मीडिया हाउस नाम के लिए विज्ञापन प्रकाशित करते हैं। इनका प्रतिशत बहुत ही कम है। देखा जाये तो नियुक्ति के मामले में जितनी पारदर्शिता सरकारी संस्थाएं बरतती हैं, उतना गैर सरकारी संस्थाएं नहीं। मामला केवल नियुक्ति तक का ही नहीं है। बल्कि वेतन को लेकर भी पारदर्शिता नजर नहीं आती। संपादक या फिर उच्चे पदों पर गोपनीय नियुक्ति का मामला थोड़ी देर के लिये समझ में आता है लेकिन निचले स्तर पर यानी उपसंपादक/संवाददाता या फिर प्रशिक्षु पत्रकार की गोपनीय नियुक्ति का मामला सवाल खड़े करते मिलते हैं। देश भर के विष्वविद्यालयों में आज पत्रकारिता की पढ़ाई होने लगी है। हर साल हजारों छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में मीडिया हाउसों के चक्कर लगाते मिलते हैं। कई जुगाड़ व जातीय संस्कृति की वजह से नौकरी पाने में सफल हो जाते हैं। जिन्हें नहीं मिल पाता है उनमें मीडिया को लेकर एक गतिरोध उत्पन्न हो जाता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी वार्षिक समीक्षा रिर्पोट के अनुसार देश में चार सौ से भी ज्यादा चैनल है। इनमें दो सौ से ज्यादा न्यूज चैनल यानी खबरिया चैनल है और लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा गैर खबरिया चैनल यानी नॉन न्यूज एंड करंटअफेयर्स से संबधित चैनल हैं। जहां पत्रकारों की भारी संख्या में खपत होती है। इधर कई और नये चैनल खुले है। वहीं आरएनआई के अनुसार 31 मार्च 2006 तक पंजीकृत समाचार पत्रों की संख्या 62,483 थी। जाहिर सी बात है, जब देश भर के हर छोट-बडे शहरों में समाचार पत्र छप रहे हैं तो वे बिना पत्रकारों व संपादकों के नहीं। सच तो यह है कि एकाध समाचार पत्र ही नियुक्ति से संबंधित विज्ञापन विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित करते हैं। ज्यादातर मीडिया हाउसों में होने वाली नियुक्ति अंधेरे में ही हो जाती है। जिसका खामियाजा पत्रकारिता संस्थाओं से निकलने वाले छात्रों को भुगतना पड़ता है। इस बात को पत्रकारिता संस्थाओं में पढ़ने वाले छात्र समझ चुके हैं और वे भी पढ़ाई पूरी करने के बाद मीडिया हाउस में नौकरी पाने के लिए जुगाड़ संस्कृति की ओर मुड़ रहे हैं। हालांकि मीडिया हाउस जुगाड़ और जातीय समीकरण को खारिज करते हैं और योग्यता की दुहाई देने से परहेज नहीं करते। सवाल उठता है कि पत्रकारिता संस्थाओं के छात्र जब पढ़ाई पूरी कर नौकरी के लिये निकलते हैं तो क्या उनके पास योग्यता नहीं होती? बहरहाल, मीडिया को भी पारदर्शी होने की जरूरत है। खास कर पत्रकारों की नियुक्ति के मामले में। ताकि नई पौध को कुछ नया करने का अवसर मिल सके।

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2 Comments on "पारदर्शी हो मीडिया ताकि नई पौध को अवसर मिले"

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संजय कुमार
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थैंक्स

पंकज झा
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बिलकुल ठीक कह रहे हैं संजय जी. वास्तव में तकनीक में तो नयी-नयी चीज़ों ने क्रान्ति ला ही दी, वास्तव में मीडिया के मानव संसाधन में भी नावाचार की ज़रूरत है.अफ़सोस यही है कि हिक्की से शुरू हुआ मीडिया आज ‘फिक्की’ का शरणागत हो गया है….अच्छा आलेख.

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