लेखक परिचय

दीपक चौरसिया ‘मशाल’

दीपक चौरसिया ‘मशाल’

आप स्कूल आफ फार्मेसी, क्वीन्स युनिवरसिटी, बेल्फास्ट, उत्तरी आयरलैंड, यु. के. से फार्मेसी में स्नातक कर रहें हैं। आपकी लेखन में गहरी रुची है। आप समसामयिक विषयों, पर लेख, व्यंग्य व गीत - गज़ल लिखते हैं।

Posted On by &filed under गजल.


life-is-good-peak-districtबेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा।

वक़्त का हर एक कदम, राहे ज़ुल्म पर बढ़ता रहा।

ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी,

मैं मोमदिल कहती रही, वो पत्थर बना ठगता रहा।

उसको खबर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं,

मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता रहा।

मैं बारहा कहती रही, ए सब्र मेरे सब्र कर,

वो बारहा इस सब्र कि, हद नयी गढ़ता रहा।

था कहाँ आसाँ यूँ रखना, कायम वजूद परदेस में,

पानी मुझे गंगा का लेकिन, हिम्मत बहुत देता रहा।

बन्ध कितने ढंग के, लगवा दिए उसने मगर,

‘मशाल’ तेरा प्रेम मुझको, हौसला देता रहा।

Leave a Reply

11 Comments on "बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
dilip kumar
Guest

बहुत बढ़िया दोस्त ….. दिल के तार को छेड़ गई …..

Rajesh
Guest

बहुत ही सुंदर गजल . भविष्य में लिखते रहे

sathi66@gmail.com
Member

वोह—लाजबाब बधाई

डॉ. मधुसूदन
Guest

दीपक और मशाल दोनो जलती रखें। सुंदर।

RAJ JOSHI
Guest

बहुत सुन्दर आपके अल्फाज जो आपने इस सुन्दर गजल में प्रयोग किये है दिल खुश हो गया क्या बात कही है अपने,

उसको खबर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं,
मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता रहा।

वाह वाह बहुत शानदार,

“ये बात सच है की तू समझता है हमे बेखबर ,
शायद इसी लिए तू करता नही हमारी कदर ,
हम ना है नादान, करते है नज़रअंदाज़ तेरी हरकते ,
ये ना समझ की हम कुछ नही जानते .!”

wpDiscuz