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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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– कुमार कृष्णन-
Vishnu-Prabhakar

विष्णु प्रभाकर जीः (जन्मदिन 21 जून) पर विशेष

हिन्दी साहित्य में एक प्रख्यात नाम है- विष्णु प्रभाकर। श्री प्रभाकर ने अपने दीर्घ साहित्यिक सेवाकाल में हिन्दी की अक्षय निधि को अनेकानेक विधाओं से सम्मुनत किया है। खासकर नाटक, एकांकी तथा जीवनी साहित्य के क्षेत्र में वे तो मूर्धन्य साहित्यकार हैं, पर साहित्य की अन्य ढेर सारी विधाएं उनसे कृतकाय हुई हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के मीरापुर गांव में जन्में विष्णु प्रभाकर ने किशोरवय से ही लिखना प्रारंभ कर दिया था। पहले विष्णुदयाल, विष्णु गुप्त, विष्णुदत। शुरू में लेखन ‘प्रेमबंधु’ नाम से किया एवं ‘विष्णु’ नाम से भी। सुशील नाम से समीक्षाएं लिखा करते थे। साहित्यिक सफर में ख्याति का मार्ग 1944 में उनके दिल्ली आगमन पर शुरू हुआ। श्री प्रभाकर का नाटक ‘डॉक्टर’ जहां आज भी अपनी ख्याति की कसौटी पर खरा उपस्थित हैं वहीं एकाकियों में प्रकाश और परछाइ, बारह एकांकी, क्या वह दोषी था, दस बजे रात आदि इस विधा में मील के पत्थर के रूप में आज भी मौजूद हैं। अपनी रचनाओं उन्होंने में आदर्शवाद, सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को प्रतिष्ठा दी। कथा जगत का वांग्मय उनकी सेवा से जितना समृद्ध हुआ है उससे कहीं ज्यादा विभिन्न साहित्यिक आंदोलनों में अथक योगदान दिया। शरतचंद्र के जीवन को समेटकर उनका लिखा आवारा मसीहा आज भी अपने गहरे भावबोध और गुणवत्ता का लोहा मनवा रहा है।

यह हिन्दी में अपनी तरह की पहली जीवनी है। पुस्तकाकार में होने से पहले यह तत्कालीन प्रमुख पत्रिका ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित हो चुकी थी।आवरा मसीहा के संदर्भ में विष्णु प्रभाकर के पुत्र अतुल प्रभाकर बताते हैं कि बम्बई के नाथूराम प्रेमी ने विष्णु प्रभाकर जी से कई बार आग्रह किया शरतचंद्र की जीवनी लिखने को परन्तु वे तैयार नहीं थे। परन्तु अब आग्रह निरंतर बना रहा तो वो तैयार हो गये। फिर शुरू हुई शरत के जीवन की खोज जो चुनौतीपूर्ण संघर्ष के रूप में निरंतर चौदह वर्षाें तक जारी रहा है। उन्होंने शरतचंद्र के किरदारों के स्त्रोत और रचना प्रक्रिया को टटोलने की दुष्कर चुनौती को स्वीकार किया और प्रमाणिकता के साथ निर्वहन भी।विष्णुजी ने इस जीवनी को लिखने के लिये बांग्ला ही नहीं सीखी, बल्कि उन जगहों पर गये, जहां शरत रहे थे और काम किया था बंगाल, बिहार और वर्मा में फैली तथा देश में न जाने कहां-कहां के बिखरे कथा सूत्रों को जोड़ने के लिए गहन यात्राएं की। उन दिनों वर्मा जाना आसान नहीं था। वहां जाने के लिये इजाजत मिलना भी कठिन था। कोई सीधी हवाई सेवा भी नहीं थी। विमान पोर्टव्लेयर होकर जाते थे या फिर सिंगापुर कुआंलालपुर होकर। इन सारी अड़चनों के अलावा वह या़त्रा महंगी भी कम नहीं थी। औपनिवेशिक काल की नियमित स्टीमर यात्री सेवा भी उपलब्ध नहीं थी, जिसका संदर्भ शरत् के उपन्यासों खासकर ‘पाथेरदावी’ में आता है। उस दौर में जब शरत् गये थे, चट्गांव से वर्मा पहुंचना काफी आसान था। वहां से दूरी कोई खास नहीं रहती। लेकिन पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के कारण यह मार्ग बंद हो चुका था। उन्हें इस कार्य के लिये किसी निजी, या सार्वजनिक संस्थान या प्रकाशन गृह से कोई मदद नहीं मिली। वे सदा मसीजीवी रहे। यह सब कैसे किया, यह कल्पना करना कठिन है। इस खोज का पहला पड़ाव बना भागलपुर जहां एक अद्भुत प्राकृतिक कहानीकार, उपन्यासकार शरतचंद्र के साहित्यिक जीवन की शुरूआत हुई। दिल्ली में आकाशवाणी के उर्दू कार्यक्रमों के प्रभारी थे सागर निजामी। उन्होंने भागलपुर के सत्येंद्र नारायण अग्रवाल के संदर्भ में बताया। सत्येंद्र नारायण अग्रवाल बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष हुआ करते थे राजनीतिक कद से ऊंचा उनका साहित्यिक कद था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन से तो वे जुड़े ही थे। साथ ही ‘बीसवीं सदी’ पत्रिका का सम्पादन भी करते थे। इससे लेखकों का एक विशाल समूह जुड़ा हुआ था। इस लिहाज से उन्होंने अग्रवाल साहब के यहां अपना पड़ाव डाला। उन्होंने यहां उन्हें पत्रकार बंकिमचंद्र बनर्जी से मिलवाया। बंकिम बाबू की पत्रकारिता के साथ साथ कला और साहित्य में गहरी पैठ थी। भागलपुर में कलाकेंद्र की स्थापना भी उन्होंने की थी। बंकिम बाबू ने यहां उन्हें शरतचंद्र के जीवन के विभिन्न पहलुओं से तथा जीवन के कथापात्रों से रू-ब-रू कराया। शरतचंद्र का बचपन भागलपुर में बीता। भागलपुर उनका ननिहाल था। भागलपुर के ही दुर्गाचरण प्राइमरी स्कूल में उन्होंने शिक्षा हासिल की। इसके अलावे टीएनजे कॉलेज में इंट्रेस में दाखिला लिया। भागलपुर से शरतचंद्र का गहना रिश्ता रहा है।

भागलपुर में उन्होंने कई नाटकों का मंचन किया तो साहित्यिक संस्था बंग साहित्य परिषद से जुड़े हुए भी थे। शरतचंद्र का उपन्यास ‘श्रीकांत’ भागलपुर की पृष्ठभूमि पर ही लिखा गया है। भागलपुर में ही रचित ‘क्षुदेर गौरव’ हस्त लिखित पत्रिका ‘छाया’ में प्रकाशित हुई। उनकी सुप्रसिद्ध कृति ‘देवदास’ की चंद्रमुखी भागलपुर के मंसूर गंज की तवायफ कालीेदासी है। यह कृति उसके यर्थाथ का चित्रण है। भागलपुर में वे बंगला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार बलायचांद मुखोपाध्याय ‘बनफूल’, शरतचंद्र के मामा सुरेंद्रनाथ के पुत्र रवींद्र गांगुली, पूर्णेन्द्र गांगुली, बचपन के मित्र फनीन्द्रनाथ मुखर्जी, चंडीचरण घोष, चंद्रशेखर घोष, निरूपमा देवी सहित कई लोगों से अनेकों बार मिले। यहां आकर उन सभी स्थलों पर जाकर उन्होंने जाना कि शरतचंद्र की कहानियों में भागलपुर कितना झलकता है। गंगा का किनारा, वहां के जंगल, खेत, फलों के बगीचे जहां उनके पात्र उत्पात मचाते हैं और किस तरह फल तोड़कर रसास्वादन करते हैं, पकड़े जाने पर सजा भी भुगतते हैं। शरत साहित्य के अनेकों पात्र भागलपुर के स्त्री पुरूष रहे हैं।शरत्चंद्र के प्रति कैसे आर्कषित हुए? इसके संदर्म में संदर्भ में स्वयं विष्णु प्रभाकर बताते हैं कि ‘समाने-समाने होय प्रणेयेर विनिमय के अनुसार शायद इसलिये हुआ कि उनके साहित्य में उस प्रेम और करूणा का स्पर्श मैंने पाया, जिसका मेरा किशोर मन उपासक था। अनेक कारणों से मुझे उन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, जहां दोनो तत्वों का प्रायः अभाव था। उस अभाव की पूर्ति जिस साधन के द्वारा हुई उसके प्रति मन का रूझाान होना सहज ही है। इसलिये शीघ्र ही शरतचंद्र मेरे प्रिय लेखक हो गये।’ भागलपुर से मिले प्रारंभिक सहयोग ने विष्णु प्रभाकर को शरतचंद्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के सृजन के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि ही नहीं प्रदान की बल्कि उनके अंदर अपने संकल्प की पूर्ति हेतु उत्साह का भी संचार किया। विष्णु प्रभाकर विशिष्ट कृति ‘आवारा मसीहा’ अनेकों संदर्भाें में विद्यमान है।

वैसे शरतचंद्र के जीवन पर ‘आवारा मसीहा’ के पूर्व अनेकों पुस्तक हिन्दी व बांग्ला में लिखी गयी, लेकिन आवारा मसीहा न सिर्फ एक अनुपम कृति है बल्कि जीवनीपरक लेखन का विशिष्ठ उदाहरण है। हिन्दी में वैसे तो अनेक जीवनियां लिखी गयी है, लेकिन कथ्य की दृष्टि से सम्पूर्ण नहीं हैं इसका मूल कारण सम्पूर्ण रचना का अभाव समुचित अध्ययन न कर पाने का हैं आज की साहित्यिक गहमागहमी में लोग जोखिम भरा काम करने से परहेज करते हैं। वे ऐसा करना चाहते हैं कि जिससे तुरंत उनका नाम सुर्खी में आए और पैसा भी बने। बकौल विष्णु प्रभाकर दूरगामी प्रभाव डालने वाली कृति का पैसे सम्बंध नहीं होता है। सफल जीवनी लेखन के लिए सम्पूर्ण अध्ययन बड़ा आवश्यक है। इसके अलावा पात्रों का चयन भी महत्वपूर्ण है। जीवनी न तो इतिहास है न उपन्यास ही। इसमें कल्पना नहीं हो इसलिए एक शुद्ध और सात्विक पात्र की आवश्यकता है। प्रेमचंद्र का जीवन एक उपन्यास है वह इसलिए कि वे युग के प्रतिनिधि उपन्यासकार हैं। प्रेमचंद्र की जीवनी पर अमृत राय का ‘कलम का सिपाही’ उपन्यास की झलक निराला पर रामविलास शर्मा का ग्रंथ महत्वपूर्ण है। गोस्वामी तुलसीदास के पात्र भी। पात्र का सबसे सशक्त पक्ष भी एकबारगी उठे। ऐसा न हो कि अधूरे पक्ष को छोड़ इसके दूसरे पक्ष की ओर भाग लिया जाय। पात्र और इसका तटस्थ अध्ययन सम्पूर्ण सूचनाओं की जानकारी तथा भाषा और शिल्प की कसी हुई बनावट जीवनी परक लेखन के लिए आवश्यक है और यह भी कि चुने पात्रों से निष्ठा और आस्था भी हो। इस लिहाज से यह उनकी महत्वपूर्ण कृति है। ‘आवारा मसीहा’ साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिये सबसे ज्यादा हकदार था, लेकिन उस वर्ष का पुरस्कार भीष्म साहनी को ‘तमस’ के लिये दिया गया। विष्णु जी की इस कृति को ‘पाब्लो नेरूदा पुरस्कार’ दिया गया। नेरूदा चिली के प्रसिद्ध स्पाहनी कवि रहे हैं, जिन्हें 1973 में नोवेल पुरस्कार मिला था। वह बीसवीं सदी के महान कवियों में से हैं। यह पुरस्कार इसलिये दिया गया कि आवारा मसीहा साहित्य अकादमी पुरस्कार से बंचित रह गया। दो दशक बाद 1993 में साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें ‘अर्द्धनारीश्वर’ उपन्यास के लिये दिया गया।पुरस्कारों के नाम पर साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं अनाचार करती रही हैं। बावजूद इसके उनके और भीष्म साहनी के बीच कोई बातचीत नहीं हुई न ही किसी तरह का मनमुटाव या वैमनस्य हुआ।

विष्णु प्रभाकर कई दशकों तक लेखन में सक्रिय रहे। वह तमाम परिवर्तनों के साथ ही नहीं सहभागी रहे हैं। हिन्दी नाट्य साहित्य में उनका स्थान आद्वितीय है। उनकी अधिकतर एकांकी सामाजिक जीवन से जुड़े हैं। अपने एकांकी में जीवन के विविध चित्रों मानव मन की क्रिया, प्रतिक्रिया और आंतरिक संघर्ष का चित्रण किया है। नाटकों की मूलवृति से स्पस्ट होता है कि वे मानवतावादी कलाकार हैं।उनके साहित्य में विषय का वैविघ्य नहीं के बरावर है। नारी नियती की वहुआयामी त्रासदी उनके उपन्यास का केंद्रीय कथ्य है। उनकी हर रचना मानवतावाद का हिमायत करती है। वर्गीय भेदाभेद, मध्यमवर्गीय समाज की अनैतिकता तथा आर्थिक अभाव को अभिव्यक्त करते हैं। ‘अर्द्धनारीश्वर’ जीवनभर की संचित गांधी दृष्टि है। इस दृष्टिद से इस उपन्यास में स्त्री उत्पीड़न के प्रमुख पख का साक्षात्कार कराते हैं। उनका व्यक्तित्व वहुआयामी तथा कृतित्व का पक्ष बेजोड रहा है। परिवेश एवं अनुभव जगत का लेखाजोखा ही उनका व्यक्तित्व है। समाज के दलित, पीड़ित एवं अभावग्रस्त पात्रों को अभिव्यक्ति देकर नई चेतना जागृत करते हैं। वे वह नक्कशीदार महल जो अपनी खुरदरी नींव के प्रति श्रद्धालु भी हैं। रचना प्रक्रिया में आदर्श अगर मंजिल है तो वे यर्थाथ को आनिवार्य मानते हैं।उनकी बहुचर्चित कहानी ‘धरतीे अब भी घूम रही है’ और ‘स्यापामुका’ है। इनमें समय के सच को लेखक ने उकेरा हैं ‘स्यापामुका’ आतंकवाद से गुजर रहे पंजाब की पीड़ादायक स्थितियों की दास्तान हैं ‘धरती अब भी घूम रही है’ भ्रष्टाचार को अनावृत्त नहीं करती है। क्येांकि वह तो खुद ही नंगा है। कहानी उससे बाहर निकलने के प्रयासों में उसके चक्रव्यूह में फंस जाने की विवशता को उठाती हैं दो बच्चे यहां भावी पीढ़ी का प्रतीक भी है और निरीह तथा तंत्र की चालाकियों से अनभिज्ञ सबको अपने जैसा सच्चा मानने के भोलापन का द्योतक भी। उनकी रचनाओं में ‘अधूरी कहानी’ भी है। समय है बंटवारे से थोड़े पहले का यानी बंटवारे के बन रहे हालात का। यह वह समय था जब नफरत दोनों तरफ के जिलों में ठूंस-ठूंस कर भरी जा रही थी। इस कहानी में दो धर्माें के दो युवक बंटवारे को सही गलत ठहराने में उलझ रहे हैं। अंत में एक प्रश्न उठता है कि ‘-सच कहना, मुहब्बत की लकीर क्या आज बिल्कुल ही मिट गयी है? यह कहानी का चरम नहीं है, उसका मर्म है। बंटवारे के समय और उसके बाद मुहब्बत को जिलाये रखने की सबसे ज्यादा जरूरत थी। उनकी रचनाओं में विषय की काफी विविधता देखी जाती है। घटनाओं का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया है। उनकी रचनाओं में विवरण के बजाय मार्मिक तत्व जयादा है। जैनेंद्र, प्रेमचंद्र, निराला, रामधारी सिंह दिनकर, बाल कृष्ण शर्मा, नवीन आदि तमाम साहित्यिक हस्तियों के बीच बैठने वाले श्री प्रभाकर देश-विदेश की अनेक उपाधियों तथा पुरस्कारों से पुरस्कृत हैं। दिल्ली में ‘शनिवार सभा’ जैसी साहित्यिक गोष्ठी लगाकर, लोगों को प्राथमिकता देकर उन्होंने दिल्ली जैसे व्यस्त नगर को साहित्य का केंद्र बनाने में अक्षुण्ण भूमिका निभायी। इस गोष्ठी में दिल्ली के सभी साहित्यिक भाग लेते थे। गोष्ठी की खासियत थी कि हिन्दी के तमाम मंच यहां समान रूप से प्रयोगवादी, प्रगतिवादी तथा परंपरावादी सभी लोग एक दूसरे से मिलते तथा खुलकर बातचीत करते।

अनुवादों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी को व्यापक रूप देने में अथक मेहनत की। भारत के गैर हिन्दी भाषी प्रांतों का भ्रमण किया और उनकी साहित्यिक गहराई को भी परखने का प्रयास किया। उनका मानना था कि हिन्दी के करीब गैर हिन्दी साहित्य को लाने के लिए उन प्रांतों की भाषा सीखना जरूरी हैं साथ ही गैर हिन्दी भाषियों की परंपरा और उनसे जुड़े व्यक्ति को भी उस अनुवाद में पूरा स्थान देकर मौलिकता के सूत्र में पिरोने में सफलता प्राप्त की। इससे भाषायी टकराव की संभावना क्षीण हुई, आपसी सद्भाव तथा हिन्दी के विकास के मार्ग प्रशस्त हुए। ‘आवारा मसीहा’ के बाद केरल के एक नाटककार की जीवनी लिखी तो दूसरी ओर कश्मीर के कई चरित्रों को लेकर रक्तचक्र, देवता, युद्ध के समय आदि नाटक लिखे। इसके अलावा गुजराती में पटेल पर, मराठी में देशपांडे के चरित्र को लेकर फीचर लिखे। शंकराचार्य, अहिल्याबाई तथा उम्र रशीद पर लिखी पुस्तकें काफी लोकप्रिय हुई।

वे किसी भी वाद से प्रतिबद्ध नहीं थे। उनपर महात्मा गांधी के दर्शन और सिद्धातों का गहरा असर हुआ। महात्मा गांधी के दर्शन को अपने जीवन में उतारने की कोशिश की।गांधी से इसलिए प्रभावित थे कि उनकी नीतियां सत्य, अहिंसा, परोपकार, मृदुभाषिता उन्हें अच्छी लगती थी। यह हर इंसान के लिए आवश्यक आदर्श है। उनके मुताबिक ‘अन्याय और हिंसा का प्रतिकार हर हाल में होना चाहिए। झुकना बहुत बड़ी कमजोरी है, मैं झुकने में यकीन करता। गांधी ने दूसरों के लिये जीवन जीने की सीख दी। मेरे अंतरतम का विश्वास है कि यदि लोग इस पर चल सकें तो समस्याएं सुलझ जाएंगी। मनुष्य वेहतर नागरिक बन सकेंगे। फिर भी गांधीवाद को सामाजिक संगठन या शासन विधि के रुप में नहीं लिया गया। सफलता असफलता का पता तभी चलेगा जब लोग प्रयोग करेंगे। विकासशील देशों में ग्राम स्वराज का तरीका अपनाया गया। जापान ने नई तालीम अपनाया।’’ आरंभिक दौर में वे मार्क्सवाद से जुड़े थे। ‘मास्को पीस’ सम्मेलन के लिए मास्को भी गए। वहां सोवियत लैंड पुरस्कार भी मिला। आजादी की लड़ाई उन्होंने देखी। आजादी की लड़ाई का प्रतीक खादी का कपड़ा तथा सर पर टोपी हुआ करता था। उसी दौर से उन्होंने इसे धारण किया। वे यायावर की भांति रहे तथा जीवन के सत्य को तलाशते रहे। स्वाभिमान के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। वर्ष 2005 में राष्ट्रपति भवन में कथित दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने पद्म भूषण लौटाने की घोषणा की थी। भागलपुर उनकी प्रसिद्ध कृति ‘आवारा मसीहा’ का प्रारंभ स्थल है भागलपुर। जहां बंगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र ने एक लंबी अवधि बितायी थी।

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1 Comment on "‘आवारा मसीहा’ का आरंभ स्थल भागलपुर"

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shyamnandan kumar
Guest

dear sanjivji,
printing format of articles is not available. so, please made it available.

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