लेखक परिचय

रमेश पांडेय

रमेश पांडेय

रमेश पाण्डेय, जन्म स्थान ग्राम खाखापुर, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। पत्रकारिता और स्वतंत्र लेखन में शौक। सामयिक समस्याओं और विषमताओं पर लेख का माध्यम ही समाजसेवा को मूल माध्यम है।

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-रमेश पाण्डेय-
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जल ही जीवन है। जल के बिना सृष्टि में कोई जीवित नहीं रह सकता। जल को दूसरा नाम पानी है। जीवन में हर जीव का अपना-अपना पानी है। अगर उसका वह पानी उतर जाए तो वह समाज में मुह दिखाने लायक नहीं रह सकता। सनातन धर्म में भगवान शिव एक ऐसे देवता हैं जो सबका पानी राखते हैं। इसीलिए शायद उन्हें सावन का महीना सबसे प्रिय है। इस पूरे महीने में वह पानी का ही काम देखते हैं। यही वह समय होता है, जब मानसून सबसे अधिक सक्रिय होता है और बरसात होती है। इस समय क्षुद्र नदियों में पानी आ जाता है और वह इतराने लगती है। भगवान शिव कोई ऐसा नही बचता जिसके पानी की रक्षा न करते हों। वैसे भी भगवान शिव सृष्टि के पहले जल कृषक है। वह छत पर पानी की खेती करने के विशेषज्ञ भी है और वैज्ञानिक भी है। सावन माह के इस पवित्र अवसर पर सभी दोस्तों, मित्रों, शुभचिंतकों को इस उम्मीद और अपेक्षा के साथ बधाई कि भगवान शिव ने जिस पानी पर पानी चढ़ाया, हम उस पानी का पानी न उतारे। देश के लिए पानी को बचाएं, पानी का प्रदूषित होने से बचाएं, नदियों को गंदा न करें, नदियों को सूखने से बचाएं। आज पूरे देश में मानसून को लेकर चिंता है। सूखे के हालात उत्पन्न हो रहे हैं। हमें सोचना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है। कहीं इसके लिए हम और हमारा समाज ही तो जिम्मेदार नहीं है। पानी की खेती कैसी की जाए, इसका संकेत भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा जी की धारा को रोककर मानव समाज को संकेत दिया है। पानी के इस प्रबलतम प्रवाह के वेग को सहनकर भगवान शिव ने पानी की एक बूंद को भी बेकार नहीं जाने दिया। पानी के एक बूंद की कीमत क्या है, इसका अंदाजा हमे इस प्रसंग से लगाना चाहिए। पानी के लिए पर्यावरणीय चक्रानुक्रम को बनाए रखना कितना महत्पूर्ण है, इसे हमें भगवान शंकर से सीखने की जरुरत है। शायद इसीलिए भगवान शिव के लिए पहले जल कृषक और छत पर खेती करने के विशेषज्ञ और वैज्ञानिक दोनों होने जैसे शब्द का प्रयोग किया गया है। आज देखें तो हम वर्षा के जल को किस तरह से बरबाद करते हैं। वर्षा के जल को न खेत में रोकते हैं और न ही तालाब और पोखरों में रुकने देते हैं। तालाब और पोखरों को तो भू-माफियाओं ने खत्म ही कर दिया। अब जंगलों को भी खत्म करने पर तुले हैं। अगर हमें अपना पानी सुरक्षित रखना है तो हमें वृक्षों कों, सर्पों को , औषधीय तत्व के पौधों को संरक्षित करना होगा। वन और पहाड़ों को संरक्षित करना होगा। जरा एक नजर उत्तराखंड की त्रासदी पर डाले तो देंखे कि वहां क्या हुआ। विकास के अंधानुकरण के नाम पर पहाड़ों को तोड़ा जाने लगा, वृक्षों को काटा जाने लगा। इसका दुष्परिणाम भी हमें झेलना पड़ा। फिर भी शायद कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। सावन के महीने में देशभर में भगवान शिव के मंदिरों पर जल चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ है। यह श्रद्धालु गंगा के पानी को कितनी पवित्रता के साथ लाकर भगवान शिव को अर्पित करते हैं। सोचें कि अगर अपने रोज की दिनचर्या में भी पानी को इसी तरह से संरक्षित करने की कोशिश करें तो शायद न नदियां सूंखेगी और न ही तालाब और पोखरे। जो पानी बचा भी है आज उसे प्रदूषित होने से बचा पाना सबसे बड़ी चिंता है। इस दिशा में भी हमें सोचना होगा। महाराष्ट्र का विदर्भ, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, मध्य प्रदेश के बीहड़ के इलाकों में सूखे के चलते किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, बिहार और झारखंड प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में पानी का संकट विद्यमान है। इस संकट को निकट भविष्य में दूर करने के लिए सावन की महत्ता को और व्यापक बनाना होगा। हर-हर महादेव।

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