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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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kamal5प्रस्तावना
विश्व की प्राचीनतम और जीवंत सभ्यताओं में भारतीय सभ्यता का स्थान अप्रतिम है। भारत का न सिर्फ एक महान अतीत और अत्यन्त प्राचीन इतिहास है, वरन् लोग मानते हैं कि यह एक विराट सम्पदा और ज्ञान से युक्त देश है। भारत को निरन्तर विदेशी हमलों और गुलामी का सामना करना पड़ा है। इसके कारण भारत का गौरव तथा इसकी अभूतपूर्व उपलब्धियों को धक्का लगा है। वे भारतीय, विशेषरूप से अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली में पढे-लिखे लोग भारत की संस्कृति और सभ्यता की महानता ही नहीं खो बैठे हैं, बल्कि वे अपनी तकनीकी उपलब्धियों तथा विपुल प्राकृतिक संसाधनों से भी दृष्टि हटा बैठे हैं।

इतिहास साक्षी है कि भारत एक अपार वैभव का देश था। ईश्वर ने इसे शस्य श्यामला, सुजलां सुफलाम् धरा का वरदान दिया है। दुनिया में भारत के किसानों को सर्वोत्कृष्ट कृषि विशेषज्ञ माना जाता था। चौथी शताब्दी ई0पूर्व से 19वीं शताब्दी के आरम्भ तक इन यात्रियों के वृत्तांत बताते हैं कि विश्व हमारी कृषि समृध्दि देखकर अचम्भित रह जाता था। तंजौर शिलालेखों (900-1200 ई0) और रामनाथपुरम शिलालेखों (1325 ई0) के रिकार्ड से पता चलता है कि यहां प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन धान की पैदावार होती थी। अत: आवश्यक है कि भारत पुन: उस कृषि तकनीकी को खोजे जिसमें हम अपनी बुध्दि और कृषि दक्षता का प्रयोग करते थे जिससे हमारा देश खाद्य के भण्डार से परिपूर्ण रहता था।

भारतीय अर्थव्यवस्था भी उतनी ही समृध्द थी जितनी हमारी कृषि। मैगस्थनीज से लेकर फाह्यान, ह्वेनसांग तक सभी विदेशियों ने भारत की भौतिक समृध्दि का गुणगान किया है। 1780 के कालखण्ड में बिहार के ग्रामों को स्वच्छता एवं आतिथ्य का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता था। गलियों की सफाई और धुलाई होती थी। प्रजा में यात्रियों के आतिथ्य-सत्कार तथा उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के प्रति असाधारण भाव रहता था।

पुराने ब्रिटिश दस्तावेजों से पता चलता है कि 18वीं और 19वीं शताब्दी के आरम्भ के ब्रिटेन के मुकाबले भारत तकनीकी और शैक्षिक क्षेत्रों में कहीं उन्नतिशील देश था। इसकी कृषि तकनीकी और उत्पादकता के रूप में चरमोत्कृष्ट थी, यहां लोहे और इस्पात का बढ़िया स्तर का उत्पादन होता था। दिल्ली महरौली स्थित लौह-स्तम्भ ने 1500 वर्षों से भी अधिक समय के थपेड़े झेले हैं और इस पर भी धूल जमने या जंग लगने के चिह्न नहीं है। विश्व के धातु-विज्ञानी तकनीकी के इस उच्च स्तर पर आश्चर्यचकित थे। भारत का वस्त्र उद्योग ब्रिटिश-पूर्व समय में एक बड़ा औद्योगिक उद्यम था। 18वीं शताब्दी के अंत तक भारत वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा निर्माता और निर्यातक रहा है, जबकि चीन का दूसरा नम्बर था।
भारत में खगोलशास्त्र, गणित, रसायन, भौतिकी और जीवविज्ञान में जो आधुनिकतम उल्लेख मिलता है, विश्वभर में इन सभी की मान्यता थी। औषधि और शल्य चिकित्सा के क्षेत्रों में भी इसका योगदान विख्यात है।

जीवंत सभ्यता के निर्माण में आयुर्वेद और योग का योगदान विश्व को भारत का सर्वोत्कृष्ट उपहार है। भारत प्लास्टिक शल्य चिकित्सा का ज्ञान रखता था और शताब्दियों से इसमें पारंगत रहा है और वास्तव में तो यहीं आधुनिक प्लास्टिक शल्य चिकित्सा का आधार भी है। डा0 एडवर्ड जेभर द्वारा आविष्कृत वेक्सीनेशन से पहले भारत सदियों से टीका लगाकर इलाज करता था।

फाह्यान ने 400 ई0 में मगध के बारे में लिखते हुए कहा है कि भारत में बड़े सुनियोजित ढंग से स्वास्थ्य प्रणाली प्रचलित थी। फाह्यान के अनुसार, इस देश के कुलीन व्यक्तियों और गृहस्वामियों ने सभी गरीबों, अनाथों, अपंगों और बीमार व्यक्तियों के लिए शहर में चिकित्सालयों की स्थापना की थी। ”उन्हें हर प्रकार की आवश्यक मदद दी जाती थी। चिकित्सक उनकी बीमारियों की जांच करते थे और उनके रोगी के अनुसार उन्हें भोजन, पानी, औषधि या काढ़ा दिया जाता था, इलाज होने के बाद वे स्वस्थ होकर लौटते थे।”

भारतीय विद्वानों के लेखन व अनेक वृतान्तों से नि:संदेह स्पष्ट है कि 18वीं सदी में भारत में न केवल बेहतर स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था थी, बल्कि उस समय इंग्लैण्ड में जो प्रणाली चल रही थी उसे देखते हुए जनसंख्या के हिसाब से स्कूलों और कॉलेजों की संख्या, स्कूलों और कॉलेजों में विद्यार्थियों की संख्या, विद्यार्थियों की कर्मठता और तीव्र बुध्दि, अध्यापकों की गुणवत्ता और निजी एवं सामाजिक संसाधनों से दी जाने वाली आर्थिक सहायता की तुलना में हमारे देश में कहीं अधिक बेहतर शिक्षा व्यवस्था थी। उस समय की प्रचलित धारणा के विपरीत स्कूलों और कॉलेजों की उपस्थिति में अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों, मुस्लिमों और कन्याओं की संख्या का प्रतिशत अत्यधिक प्रभावशाली था। महात्मा गांधी ने जब यह कहा था तो बहुत सही कहा था कि 1870 में कोई लगभग 50ं-60 वर्ष पूर्व साक्षरता की तुलना में 1931 में भारत अधिक निरक्षर था। भारत जलपोत निर्माण के साथ-साथ रंगरेजी के निर्माण और प्रयोग एवं कागज निर्माण में भी विशेषज्ञता रखता था।

1600 ई0 में भारत का विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 22.5 प्रतिशत हिस्सा था जो 1870 में ब्रिटिश शासनकाल में गिरकर 12.25 प्रतिशत रह गया, जबकि उसी काल में ब्रिटिश का हिस्सा तेजी से बढ़कर 1.8 प्रतिशत से 9.1 प्रतिशत हो गया। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो अर्थव्यवस्था पूरी तरह से अस्त-व्यस्त थी और विश्व में विनिर्माण, व्यापार और जीडीपी में भारत का हिस्सा गिरता गया। स्वतंत्रता के 62 वर्षों के बाद भी विश्व बाजार में भारत का हिस्सा अब भी एक प्रतिशत से भी कम है।

भारत की समृध्दि, इसकी प्रतिभा और इसकी नैतिक समाज की स्थिति को लार्ड मैकॉले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में 2 फरवरी 1835 को दिए अपने भाषण में जो कुछ कहा था, उसे भलीभांति समझा जा सकता है-

”मैंने भारत यात्रा एक छोर से दूसरे छोर तक की है और वहां एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ा जो भिखारी हो, चोर हो, मैंने इस देश में इतना धन-वैभव देखा है, मैंने इतने अधिक नैतिक मूल्य देखे हैं, इतने क्षमतावान लोग देखे हैं, कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी भी इस देश को जीत पाएंगे। यह तभी संभव हो पाएगा, यदि हम इस राष्ट्र की रीढ़ की हड्डी ही तोड़ डालें, जो इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में बसती है और, इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि हम इसकी पुरानी और प्राचीन शिक्षा प्रणाली, इसकी संस्कृति को बदल डालें। यदि भारतीय यह सोचने लगे कि विदेशी और इंग्लिश ही उनकी अपनी चीजों और भाषा से ज्यादा बेहतर हैं तो फिर भारतीय अपना सम्मान, अपनी संस्कृति खो देंगे और फिर वे वहीं करेंगे जो हम उनसे कराना चाहेंगे, तभी वह देश सचमुच दास बन सकेगा।” अंग्रेजों ने इस नीति को पूरी सक्रियता से कार्यान्वित किया और ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण किया जिससे भारतीय अपनी प्रणाली को भूल जाएं।

कोई भी राष्ट्र अपनी घरेलू और विदेश नीतियों का कार्यक्रम तब तक तैयार नहीं कर सकता है जब तक उसे स्वयं अपना, अपने इतिहास, अपनी शक्ति और विफलताओं का स्पष्ट ज्ञान न हो। यह बात किसी भी देश के लिए और भी महत्वपूर्ण बन जाती है कि उसे अपने आधार का ज्ञान हो जिस पर आज के इस बहुत तेजी से चलते और वैश्वीकृत विश्व में उसके लोगों की जड़ें टिकी हों। बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, श्रीअरविन्द, महात्मा गांधी, डॉ. हेडगेवार जैसे स्वतंत्रता आन्दोलन का अभियान छेड़ने वाले महान नेताओं ने भारत की सभ्यता की स्पष्ट दृष्टि का निर्माण किया था। भारतीय विचारों और कार्यों के तौर-तरीके उनके राजनीतिक कार्यों के मूल में रहते थे। इन नेताओं के पास ऐसी दूरदृष्टि थी कि वे भारत के राजनैतिक और आर्थिक संस्थाओं एंव सभ्यता के प्रति चेतना का अविच्छिन्न रूप प्रदान कर भारत को एक देश, एक जन और एक राष्ट्र के रूप में ढाल सकें।

दुर्भाग्य की बात है कि स्वतंत्र भारत के नेताओं ने जल्द ही इस दूरदृष्टि को त्याग दिया और वे एक ऐसे संस्थागत ढांचे के निर्माण के काम में लगे रहे, जिसे अंग्रेजों ने तैयार किया था और जिसका भारत की विश्व-दृष्टि एवं उसकी जीवन-शक्ति से कोई सरोकार नहीं था, जो लगातार बाहरी हमलों और विदेशी शासन के रहते हुए भी
प्राण-शक्ति का काम करती।

हमारे छह दशकों की स्वतंत्रता के कार्यकाल में कुछ थोड़े समय को छोड़ कर, हमारे देश का शासन कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों के हाथों में रहा है। दुर्भाग्य है कि उन्होंने कभी भी भारत की सभ्यताओं की चेतना को समझ कर शासन के लिए सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक प्रतिमान तैयार करने पर विचार नहीं किया। इसकी बजाए उन्होंने जो कुछ भी और जैसा भी पश्चिमी देशों में हो रहा था, उसकी नकल करने की कोशिश की। आज इसके विनाशकारी परिणाम हमारे सामने हैं।

स्वतंत्रता के बाद आवश्यकता तो यह थी कि हम भारत के लोगों की भावनाओं और समझबूझ जानकर भारत की राजव्यवस्था को नया रूप प्रदान करते। ऐसा न होने का परिणाम यह हुआ कि हमारे सामने एक खण्डित समाज है, विशाल स्तर पर आर्थिक असमानताएं हैं, आतंकवाद और साम्प्रदायिक संघर्ष मौजूद हैं, असुरक्षा है, नैतिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पतन का दृश्य विद्यमान है और है एक ऐसा राज्य-तंत्र जो किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकता है। कभी-कभी कामकाज के प्रबंधन के लिए उपचारीय व्यवस्था लागू करने की कोशिश की जाती है, परन्तु सफलता हाथ नहीं आती। आवश्यकता तो ‘भारतीय विचार’ और साथ ही लोगों की भावनाओं और वरीयताओं पर आम सहमति बनाना है और देखना होगा कि किस प्रकार से भारत के लोग इसे विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, राजनैतिक संगठनों और सांस्कृतिक, सौन्दर्यानुभूति और नैतिक समझ-बूझ के लिए अभिव्यक्त करते हैं।

हमारे ऋषि-मुनियों और दार्शनिकों ने भारत की सभ्यताओं के प्रति चेतना को भली-भांति परिभाषित किया है और इनकी जड़ें भारतीय अथवा हिन्दू विश्व-दृष्टि में समाहित हैं। यह विश्व दृष्टि सम्पूर्ण और आध्यात्मिक है। इसमें माना गया है कि निर्माण-योजना में विविधता तो जन्मजात से ही विद्यमान रहती है, यह विभिन्न रूपों में उसी ब्रह्माण्ड के स्वरूप की झलक प्रदान करती है। इस प्रकार हम विविधता को स्वीकार ही नहीं करते, बल्कि उसका सम्मान भी करते हैं। यह एक समावेशी दृष्टि है और कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व आध्यात्मिक सह-अस्तित्व का सबसे श्रेष्ठ अनुभव है। भारतीय विचारों की परिकल्पना राष्ट्रीय सीमाओं के बहुत दूर तक पहुंचती है और वैदिक ऋषियों ने पुरातनकाल से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की घोषणा कर दी थी। भारतीय विश्वदृष्टि का क्षितिज, एक तरफ बामियान/कांधार से बोरोबुदुर/इंडोनेशिया तक फैला है तो दूसरी तरफ श्रीलंका से जापान तक इसका विस्तार बना रहता है। भारतीय संस्कृति के चिह्न तो विश्व के कुछ अन्य भागों में भी पाए जाते हैं। प्राचीन काल में भारत भले ही भौगोलिक रूप से अलग-थलग पड़ गया हो, परन्तु सांस्कृतिक सम्बन्धों, व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में वह कभी अलग नहीं पड़ा।

मानव जाति की अनिवार्य एकता में आस्था रखना, यहां के हिन्दू चिंतन की अभूतपूर्व विशेषता है। वैदिक ऋषि भी घोषित करते हैं- ‘एकम् सद्विप्रा: बहुधा वद्न्ति।’ यह निश्चित ही यथार्थ में सेक्युलर विचार है क्योंकि इसमें माना गया है कि कोई भी व्यक्ति उस परमपिता तक पहुंचने के लिए स्वयं अपने पथ का अनुसरण कर सकता है। हिन्दू तो धर्मों की समरसता के विश्वास के लिए जाने जाते हैं इसी विश्व दृष्टि के कारण विश्व के विभिन्न भागों में लगभग जितने प्रचलित धर्म हैं, भारत में बड़ी शांतिपूर्वक उनका आचरण होता है और यह सदा होता भी रहेगा।

आज स्वतंत्रता के छह दशक बीत जाने पर भी भारत इनकी अंतर्निहित शक्ति और समय की भावना को पहचान नहीं पाया है। फलस्वरूप दिशाविहीन हो गया है। साथ ही इच्छा शक्ति भी खो बैठा है। यह लक्ष्य-विहीनता बहुत भारी है और इसने राष्ट्रीय जीवन के सभी पहलुओं को घेर लिया है। इस स्थिति में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। हमें एक नया उदाहरण प्रस्तुत करना होगा जिससे एक ऐसे समृध्द, प्रगतिशील और शक्तिशाली भारत का निर्माण्ा हो, जिसकी आवाज़ अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुनी जा सके।
भारत इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है बशर्ते कि लोग गम्भीरता से इस कार्य में जुट जाएं। हमारे पास विपुल मानव और भौतिकी संसाधनों का भण्डार है। भारतीय युवाओं ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं दिखा दी हैं और अपनी सामर्थ्य प्रमाणित कर दी है। विश्व स्तरीय सुविधाएं उपलब्ध न होने के बावजूद विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अन्तरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्रों में उन्होंने अभूतपूर्व प्रदर्शन कर दिखाया है। उद्योग, व्यापार और प्रबंधन व सूचना संचार प्रौद्योगिकी में उन्होंने सफलतापूर्वक चुनौतीपूर्ण कार्य कर दिखाए हैं। इतनी ऊर्जावान और जीवंत युवाशक्ति को लेकर और विवेकपूर्ण ढंग से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर, भारतीय लोग करिश्मा दिखा सकते हैं, बशर्ते वे भारत में रहकर आत्मविश्वास और गौरव से कार्य कर सकें। हमें अपने युवाओं को निर्णयकारी प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाने और पूर्ण अवसर प्रदान करने होंगे। वे ही हमारे भविष्य हैं और हमारी समृध्दि के वाहक हैं।

भारत के विकास को लेकर इस या उस मॉडल को अपनाने के लिए आंख मींच कर नकल करने की जरूरत नहीं है। उसे अपनी प्रतिभा और संसाधनों के अनुरूप अपना एक मॉडल तैयार करना होगा। पं0 दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में ऐसा मॉडल निहित है। भारत को मौलिक बनना होगा, भारत को नवीन आविष्कार करने होंगे और भारत को वैश्विक नेतृत्व की सीढ़ी पर ऊंचे ही ऊंचे चढ़ते चले जाना होगा। आज वैश्विक परिदृश्य एक समाधान, एक क्रांतिकारी समाधान की अपेक्षा करता है ताकि विश्व को विशाल आर्थिक मंदी और पूरे विश्व पर छाए आतंकवाद के कारण आने वाले विनाश से बचाया जा सके। भारत को इस निर्णायक घड़ी में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभानी होगी और इसके लिए भाजपा एक आधुनिक, शक्तिशाली, समृध्द, प्रगतिशील और सुरक्षित भारत के निर्माण के लिए प्रतिबध्द है।

डा0 मुरली मनोहर जोशी
अध्यक्ष
घोषणापत्र समिति
मार्च 2009

स्थिरता एवं सुरक्षा के लिए भारत को एक निर्णायक नेतृत्व की आवश्यकता

2004 में कांग्रेस का सत्ता में आना भाग्य के अजीब चक्र का परिणाम ही कहा जाएगा। वामपंथी दलों की मदद से कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने संसद में बहुमत प्राप्त कर लिया, जिसमें तालमेल का नितांत अभाव था कांग्रेस के सहयोगी दलों में अलग-अलग मंत्री अपने आवंटित मंत्रिमण्डलों को अपनी निजी जायदाद समझ कर चला रहे थे। यह वह सरकार थी जो सामूहिक उत्तरदायित्व और जवाबदेही के इन दो सिध्दातों से पूरी तरह बेखबर थी।

देश पर एक प्रधानमंत्री का बोझ लाद लिया गया, जो पद पर भले रहा हो, परन्तु सत्ता उसके पास नहीं थी। सरकार सत्ता में तो थी परन्तु अधिकारविहीन थी। माना जाता था कि यह सरकार आम आदमी के कल्याण का कार्य करेगी। आज जब संप्रग पांच वर्ष के बाद सत्ता से निष्कासित होने की तैयारी में है तो उसके पास ‘हाथ’ बढ़ा कर ‘आम आदमी’ के हित को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है।

यह सरकार चार बातों के लिए याद की जाएगी। इस सरकार का नेतृत्व आज तक के देश के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री ने किया। इस सरकार द्वारा एनडीए की नीतियों को पलट देने के कारण देश में असुरक्षा की भावना बढ़ी जिसे हम बार-बार हुए आतंकवादी हमलों, माओवादी विद्रोहों और अलगाववादी हिंसा के रूप में देख सकते हैं जिससे कुल मिलाकर सैकड़ों निर्दोष लोगों के प्राण गए। इस सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था की बेहद बदइंतजामी के कारण मुद्रास्फीति बढ़ी, मंहगाई बढ़ी, नौकरियां गई और तालाबंदियां हुईं। इस सरकार ने राज्य की एजेंसियों, अर्थात् सीबीआई का दुरुपयोग कर उच्च पदों पर भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया।

कांग्रेस ने पुराने कानूनों में दिखावटी बदलाव करके राष्ट्रीय सुरक्षा मोर्चे के अपने भयावह रिकार्ड पर लीपापोती करने का प्रयास किया, जिसमें विशेषरूप से आतंकवाद से नागरिकों की रक्षा करने में उसकी विफलता साफ दिखाई पड़ती है। इतना ही काफी नहीं रहा। इस सरकार ने आंकड़ों के साथ धोखा कर खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों की भी बेहद अनदेखी की, जो 2004 की तुलना में 8 प्रतिशत अधिक हो चुकी है।

पिछले वर्ष असंगठित क्षेत्र में लाखों लोगों की नौकरियां चली गई। कुशल श्रमिक भी संगठित क्षेत्रों में अपनी नौकरियां गंवा रहे हैं। यह स्थिति तो बेरोजगारी से भी बदतर है क्योंकि इसके कारण निश्चित आय पर निर्भर परिवारों के लोग कंगाल हो जाते है और राष्ट्रीय भावना मंद पड़ जाती है।

भारत के युवाओं पर सबसे अधिक मार पड़ी है, विशेष रूप से ऐसे युवा जो नौकरी बाजार में रोजगार पाने के उम्मीद लगाए बैठे थे। कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने उन्हें अंधकारमय भविष्य की राह पर छोड़ दिया।

जहां तक गरीबों की स्थिति है, कांग्रेस नेतृत्व में चले शासन में वे परित्यक्त महसूस करने लगे। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम भी उतना ही ‘असफल’ रहा, जितनी सरकार की अन्य योजनाएं। यूपीए सरकार पर यह बड़ी कटु टिप्पणी है कि उसके शासनकाल के पांच वर्षों में 5.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए।

यह भारतीय सांख्यिकी संस्थान के अध्ययन जो कि राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संगठन के द्वारा संकलित आंकड़ों पर आधारित है के अनुसार है। वास्तविक आंकड़े इससे कहीं अधिक होगें।

भयंकर गरीबी तथा बढ़ते हुए ऋणभार से बचने के लिए ग्रामीण भारत में हजारों किसानों ने आत्महत्या कर ली। वे सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं। कांग्रेस-नीत यूपीए शासन काल की इतनी ही भर्त्सनापूर्ण स्थिति नगरों में बढ़ती गरीबी की भी है। अनुमान है कि ‘इंण्डिया : अर्बन पावर्टी रिपोर्ट 2009′ के अनुसार शहरों और कस्बों की 23.7 प्रतिशत जनसंख्या गंदी बस्तियों में रहती है, जहां इन लोगों की जिन्दगी आंधी-तूफान, अपराधों, बीमारी और तनाव के बीच गुजरती है।’

इस प्रकार की घोर गरीबी और अपवंचितता, गरीबी रेखा के नीचे बढ़ते लोगों की संख्या राष्ट्र की महत्वाकांक्षा के विपरीत है। इन लोगों की भारी संख्या भारत को महाशक्ति बनाने में बाधक है और उन्हें दूर करने के लिए सरकार के उपचारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है, जिसके लिए भाजपा सत्ता में आने के बाद उपाय करने का प्रस्ताव करती है।

एनडीए के शासनकाल में स्थिरता भारत के समृध्द होने में सहायक हुई थी। यूपीए के शासनकाल में हुए भटकाव से विकासगति उलट गई। भाजपा स्थिरता को पुन: बहाल करेगी।

भाजपा सत्ता में आने के बाद तुरंत ही सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के प्रमुख मुद्दों का समाधान करेगी। भाजपा ढांचागत परियोजनाओं में भारी निवेश कर, कृषि को स्वस्थ बनाने और उद्योगों के लिए आसानी से ऋण उपलब्ध कराकर श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की रोजगार के अवसर बढ़ाने, खुशहाली प्रदान करने वाली नीतियों को फिर से शुरू करेगी और साथ ही साथ आतंकवादियों की लूट-खसोट से सभी लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी।

आज भारत के सामने नेतृत्व का सबसे बड़ा संकट है। देश को एक ऐसे कृतसंकल्प नेता की आवश्यकता है जो क्षमता, प्रतिबध्दता और विश्वास से परिपूर्ण होकर स्थिति को संभाल सके और आगे आकर नेतृत्व कर सके। देश को ऐसे नेता की जरूरत है जो सरकार की विश्वसनीयता और स्वयं लोगों की विश्वसनीयता को बहाल करे।

राजव्यवस्था के लिए ऐसे नेता की आवश्यकता है जो संघर्ष के बजाय आम सहमति, टकराव की बजाय विचार-विमर्श के मूल्यों को पहचानता हो। तभी कांग्रेस राज के दौरान हर क्षेत्र में फैली विफलता का स्थान सुशासन को मिल पाएगा।

ऐसे नेता केवल श्री लालकृष्ण आडवाणी हैं।

श्री आडवाणी का पिछले छ: दशकों का राष्ट्रसेवा का शानदार रिकार्ड है। वे एक बेदाग छवि के नेता हैं जो आपातकाल (1975-77) के दौरान लोकतंत्र के प्रमुख प्रणेताओं में से एक हैं जिन्होंने 19 महीने जेल में बिताए।

इन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सबसे बड़े जनांदोलन, अयोधया आन्दोलन का नेतृत्व किया तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं पंथनिरपेक्षता के वास्तविक अर्थों पर सशक्त बहस की शुरुआत की। केन्द्र में स्थिर एवं सफल गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार (1998-2004) बनाने तथा भाजपानीत एनडीए के विजय में वे श्री वाजपेयी के साथ प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे। भारत के उप-प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के रूप में देश को संकट की घड़ी में निकालने में इन्होंने श्री वाजपेयी की कुशलतापूर्वक सहायता की।

श्री आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए के मित्रदलों के साथ 2009 के आम चुनाव में जनादेश मांगेते हुए भाजपा गर्व का अनुभव कर रही है।

भाजपा 2009 का 15वां लोकसभा चुनाव एक ऐसे घोषणा-पत्र पर लड़ रही है जो पार्टी को परिवर्तन के उस कार्यक्रम से प्रतिबध्द करता है जो तीन लक्ष्यों : सुशासन, विकास एवं सुरुरक्षा से निर्देशित है। हमारा विशेष ध्यान राष्ट्र के युवाओं पर होगा, उनकी चिंताओं का समाधान करने पर होगा और उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने में उनकी मदद करने पर होगा। हम उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान कर श्रेष्ठता (Excellence) के माध्यम से सशक्तिकरण लाने पर जोर देंगे। हम लोगों के जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। हम अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर इसे कृषि, ग्रामीण विकास एवं असंगठित तथा अनौपचारिक क्षेत्र की ओर उन्मुख करेंगे। युवाओं के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर महंगाई घटाना तथा आधारभूत संरचना सम्बन्धी परियोजनाओं में भारी निवेश हमारी प्राथमिकता होगी।

भाजपा का मानना है कि पांच वर्षों के लक्ष्यविहीन शासन तथा गंवाए गए अवसरों के बाद अब समय आ गया है कि ऐसी सरकार बने जिसे ‘जैसी चाहते थे वैसी सरकार’ कहा जा सके। हमारी प्रमुख चिंता भारत का त्वरित, समावेशी, समान और बहुमुखी विकास एवं स्थायी वृध्दि करना होगा जिससे अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुंचे। हम ग्रामीण विकास में निवेश करेंगे, हम अर्थव्यवस्था को पुन: सशक्त बनाएंगे; हम उत्पादकता सुनिश्चित कर एवं किसानों को निश्चित आय प्रदान कर कृषि को फिर से लाभप्रद रोजगार के असंख्य अवसर पैदा कर लोगों की आजीविका को सुरक्षित करेंगे।

राष्ट्रीय सुरक्षा : इस देश में फिर से भय का राज नहीं होगा

पिछले पांच वर्षों का शासनकाल लोगों के लिए दु:स्वप्न की तरह बीता है। इस अक्षम यूपीए सरकार के कारण आतंकवादियों, अलगाववादियों और विद्रोहियों ने खुल कर मौत और विध्वंस का ताडंव किया। 2005 में दीवाली की पूर्व संध्या पर दिल्ली में किए गए दु:साहसी हमले से लेकर अयोध्या में राम मंदिर पर फिदायीन हमला, हैदराबाद (मक्का मस्जिद भी शामिल), बंगलौर, जयपुर, अहमदाबाद और गुवाहाटी के भयानक बम-विस्फोटों से लेकर काशी में संकटमोचन मंदिर की पूजा-अर्चना करने वाले लोगों का कत्लेआम। आतंकवादियों ने निर्भय होकर बार-बार हमले किए। उधर प्रधानमंत्री ने संदिग्ध आतंकवादियों की तकलीफ से पीड़ित होकर बिना सोए रातें बिताईं तथा वे हमलों में मारे गए आतंकवादियों के रिश्तेदारों को ‘पुरस्कार’ देने के लिए बेताब रहे।

यूपीए सरकार ने भाजपा-नीत एनडीए सरकार द्वारा बनायी गयी आतंक-विरोधी व्यवस्था खत्म कर अपने शासनकाल की शुरुआत की। पोटा को निरस्त किया व जांच पड़ताल रोकी और आतंकवादियों पर मुकदमा चलाने की गति धीमी कर दी। संसद पर दु:साहसी हमला करने के पीछे मास्टरमाइंड मौहम्मद अफजल गुरू को पोटा के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा दी। परन्तु एक अनिर्णायक प्रधानमंत्री और कमजोर सरकार ने फांसी नहीं दी और भारत के दुश्मनों को स्पष्ट संकेत दिया कि जब तक कांग्रेस सरकार सत्ता में है, तब तक उसे सजा नहीं दी जाएगी।

इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आतंकवादी फिर हमारे शहरों में आए और मौत तथा विध्वंस के खूनी निशान छोड़ जाए। देश की राजधानी दिल्ली और देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर दोबारा हमले हुए और यही बात भारत की तकनीकी राजधानी बंगलौर में भी हुई। लगता है कि दैनिक यात्रियों की गाड़ियों पर बम विस्फोट काफी नहीं था कि आईएसआई ने मुम्बई में भयानक हमला करने के लिए फिदायीन भेज दिए जिन्होंने 26 नवंबर, 2008 को हमला किया, जो 60 घंटे से अधिक समय तक चलता रहा। भारत आतंकवादियों के सामने इससे पहले कभी इतना लाचार नहीं दिखा।

पाकिस्तानी एजेंसियों द्वारा प्रायोजित आतंकवाद शहरों, कस्बों और गांवों में छाए भय के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है। दूसरी ओर आम आदमी के जान-माल को माओवादियों से भी उतना ही खतरा है, जिन्होंने 13 राज्यों के 156 जिलों में हिंसा का जाल फैला दिया है। एनडीए सरकार द्वारा तैयार किए गए अंतर्राज्यीय समन्वय तंत्र को खत्म कर दिया गया और राज्य सरकारों को माओवादियों की बढ़ती दुश्मनी के सामने स्वयं अपनी रक्षा करने के लिए छोड़ दिया गया। जम्मू व कश्मीर में अलगाववादी हिंसा जारी रखने के लिए पाकिस्तानी आतंकवादियों की सेवाएं लेते रहते हैं। उत्तर-पूर्व में उग्रवादी निर्ममता से निर्दोष लोगों को मारते हैं और उनके अंगों को काट डालते हैं। असम की स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय है क्योंकि जिस उल्फा को एनडीए के शासनकाल में दबा दिया था, उन्होंने फिर से गु्रप बनाना और अपने कैडर को फिर से हथियार देना शुरु कर दिया है। उन्होंने आतंक की अथाह लहर पैदा कर दी है। राज्य सरकार ने हिंसा रोकने या उल्फा को दंडित करने के लिए कुछ नहीं किया है, उल्टे हत्यारों से बिना शर्त बात करने का प्रस्ताव रखा जा रहा है।

पूर्वी सीमा पर बेरोक-टोक घुसपैठ भी आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा है। आई.एस.आई., इसके जिहादी संगठन और स्थानीय आतंकी सेलों ने इन अवैध घुसपैठियों का दुरुपयोग किया, साथ ही विदेशी आतंकवादियों को हथियारों की मदद भी दी। सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घुसपैठ को ‘वाह्य आक्रमण’ नाम दिया है और आई.एम.डी.टी. एक्ट को निरस्त कर दिया। परन्तु कांग्रेस ने, केन्द्र तथा असम दोनों स्थानों पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को सरकारी आदेशों द्वारा घुमा-फिरा कर बिगाड़ने की कोशिश की है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने अवैध घुसपैठ रोकने के लिए राज्य सरकार पर कुछ न किए जाने पर बहुत निंदा की थी। उच्च न्यायालय ने उस पाकिस्तानी का उल्लेख किया जो बांग्लादेश के रास्ते असम में प्रवेश कर गया और उसने बिना किसी चुनौती के विधान सभा चुनाव लड़ लिया।

वोट बैंक की राजनीति से न केवल पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के एक बड़े इलाके की जनसांख्यिकी बदल गई है, बल्कि इससे राज्य के सत्ता-बल का भी क्षय हुआ है। भारत आग के ढेर पर बैठा है। इस सतत् अवैध घुसपैठ के परिणाम निश्चय ही विनाशकारी होंगे।

अब सत्ता से जाते हुए यूपीए सरकार ने पुराने कानूनों में संशोधन कर छेड़छाड़ करने का प्रयास कर और आतंकवाद से लड़ने के लिए राष्ट्रीय जांच अधिकरण बनाकर लोगों को बेवकूफ बनाना चाहा है। परन्तु इस प्रकार के अधूरे प्रयासों से 26/11 हमले के बाद फैला गुस्सा और बेचैनी न तो कम होने वाली है और न ही आतंकवाद से खतरे से निपटने के लिए सही दृष्टिकोण है।

भाजपा सत्ता में आने पर 100 दिन के भीतर निम्नलिखित उपाय शुरू करेगी :

1. कांग्रेस द्वारा समाप्त किए गए आतंक विरोधी तंत्र को फिर से बहाल करना; पोटा में सुधार लाना ताकि एक निवारक एवं उपकरण के रूप में इसे और अधिक कारगर बनाया जाए ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान किए बिना अपराधियों पर मुकदमा चलाया जा सके; और राष्ट्रीय जांच अधिकरण के कार्यप्रणाली को सुदृढ़ किया जाएगा।

2. राज्य सरकारों द्वारा संगठित अपराध और आतंकवाद के संबध्द में बनाए गए कानून को सहमति दी जाएगी; दूसरे राज्य सरकारों को भी ऐसे ही कानून बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

3. अवैध घुसपैठियों का पता चलाने व उन्हें वापस करने के लिए अभियान चलाएगी।

4. आई बी और रॉ जैसी खुफिया एजेंसियों को पूरी तरह से चुस्त-दुरूस्त किया जाएगा, और खुफिया जानकारियों के संग्रहण और प्रक्रिया की वर्तमान व्यवस्था को दुरुस्त करेंगे। खुफिया एजेंसियों के आधुनिकीकरण पर विशाल स्तर पर काम होगा ताकि वे बेहतर ढंग से तकनीकी का प्रयोग कर सकें और देश व विदेश में आतंकवाद के बदलते रूप पर तेजी से कार्रवाई कर सके। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को सभी खुफिया एजेंसियों का मुख्य केन्द्र बनाया जाएगा। यह सही समय पर गोपनीय सूचनाएं भेजने के लिए जवाबदेह होगी और खुफिया एजेंसियां चूकों के लिए भी जिम्मेदार होंगी। खुफिया सूचनाओं के संसाधन की प्रक्रिया में एजेंसियों की बहुलता को समाप्त किया जाएगा। खुफिया एजेंसियों में नियुक्तियां योग्यता के आधार पर होंगी, न कि राजनैतिक संरक्षण के आधाार पर, जैसा कि यूपीए के शासनकाल में एवं इससे पूर्व दशकों से कांग्रेस के शासनकाल से यह व्यवस्था चली आ रही थी।

5. साइबर वेल्फेयर, साइबर काउंटर-टेररिज्म, और नेशनल डिजीटल एसेट्स की साइबर सुरक्षा के लिए डिजीटल सिक्युरिटी एजेंसी स्थापित की जाएगी।

6. राज्य सरकारों को अपने-अपने पुलिस बलों को आधुनिक करने एवं नवीनतम हथियारों से लैस करने तथा संचार टेकनोलॉजी के लिए सभी प्रकार की सहायता दी जाएगी। यह ‘मिशन मोड एप्रोच’ के द्वारा किया जाएगा। किसी भी संकट की स्थिति में पुलिस को सबसे पहले पहुंचना होता है। अनुभव से सबक लेकर पुलिस बलों को प्रशिक्षित किया जाएगा और उन्हें मुम्बई जैसी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह से लैस किया जाएगा तथा उन्हें माओवादियों व अलगाववादियों से मिली चुनौतियों से निपटने के लिए भी ऐसा करना आवश्यक होगा।

7. सीमा प्रबंधन की समीक्षा होगी और सुधारा जाएगा। अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए दंडात्मक व्यवस्था की जाएगी।

8. भारत की विशाल तटरेखा लगभग असुरक्षित है। भारतीय समुद्रों में बेहतर गश्त लगाने के लिए नौसेना और तट रक्षकों को आवश्यक साधन उपलब्ध कराए जाएंगे और आतंकवादियों को समुद्री रास्ते से भारत प्रवेश से रोका जाएगा। तटीय सुरक्षा के समायोजन हेतु एक राष्ट्रीय सागरीय प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी।

9. आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों पर तेजी से मुकदमा चलाने के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएंगी। उनकी कार्यवाही निष्पक्ष होगी और पीड़ितों को तेजी से न्याय मिलेगा।

10. वे, जो देश सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं, उनसे निपटने के लिए कूटनीतिक उपायों सहित बल प्रयोग के उपायों का इस्तेमाल होगा। भारत, शेष विश्व के साथ आतंक पर ‘वैश्विक युध्द’ में साथ देगा, साथ ही भारत अपने घरेलू हितों के साथ समझौता नहीं करेगा, और आतंकवाद से नागरिकों की रक्षा करेगा।

11. केन्द्र बेहतर ढंग से अंतर्राज्यीय समन्वय स्थापित कराने व समय पर खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान कराने में सुविधा देगा और इसके अलावा माओवादियों के खतरे से निपटने के लिए एंटी-इंसर्जेंसी बल बनाने के लिए राज्यों को मदद देगा। माओवादी हमलों के मुकाबले के लिए छत्तीसगढ़ मॉडल का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही साथ, वामपंथी उग्रवाद को पैदा करने वाले सभी सामाजिक और आर्थिक मुद्दों के समाधान के लिए हर प्रकार का प्रयास किया जाएगा।

12. किसी भी विद्रोही गुट से बातचीत, सशर्त व संविधान के ढांचे के अन्तर्गत होगी।

भाजपा आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों को सीधा, स्पष्ट और मुखर संदेश देगी : उन्हें हर निर्दोष व्यक्ति की मौत की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उचित सजा तेजी से और निर्णायक रूप से दी जाएगी। कांग्रेस द्वारा वोट बैंक की राजनीति के अन्तर्गत राज्य की शक्ति का जो ह्रास किया गया है उसे पुन: बहाल किया जाएगा।

सभी के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र
भाजपा देश भर में राष्ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली स्थापित करने के लिए एक नए कार्यक्रम की शुरुआत करेगी ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा, सही ढंग से नागरिकों की हित-रक्षा, उचित कर संग्रह, वित्तीय समावेश और मतदाता पंजीकरण सुनिश्चित किया जा सके। मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, पासपोर्ट, राशन कार्ड और बी.पी.एल. कार्डों का पहले ही प्रयोग हो रहा है हालांकि सभी फोटो पहचान पत्र नहीं हैं। एनडीए का प्रस्ताव है कि प्रत्येक भारतीय के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र रखना जरूरी है। इस कार्यक्रम को तीन वर्ष में पूरा कर लिया जाएगा।

राष्ट्रीय पहचान पत्र में पर्याप्त ‘मेमोरी’ और ‘प्रोसेसिंग’ क्षमताएं रहेगी, ताकि उनका बहु-आयामी प्रयोग हो सके। इसके माध्यम से एनडीए सुनिश्चित करेगा कि कुशल ढंग से लोगों का हित हो और कर-संग्रह हो सके।

कार्ड को बैंक खातों से भी लिंक किया जाएगा। सभी प्रकार के कल्याणकारी भुगतान, जिनमें विधवा और वृध्दावस्था पेंशन भी शामिल रहेगी, तथा अन्य व्यापक योजनाओं को, जैसे मां और बाल सहायता/किसान क्रेडिट, छात्र सहायता और माइक्रो-क्रेडिट योजनाओं को भी राष्ट्रीय पहचान पत्र के माध्यम से कार्यान्वित किया जाएगा।

व्यक्तियों के लिए कार्ड से पैसा बचाना और उधार लेना भी संभव हो सकेगा; किसानों के लिए बैंक क्रेडिट मिल सकेगा और सही-सही ‘लैंड टाइटल्स डेटा’ भी स्थापित हो सकेगा।

राष्ट्रीय पहचान पत्र से नागरिकों की सही पहचान करने से राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी और इस प्रकार अवैध घुसपैठ को रोका जाएगा। सभी प्रकार के वित्तीय लेन-देन, सम्पत्ति खरीदना और सार्वजनिक सेवाएं प्राप्त करना भी राष्ट्रीय पहचान पत्र के आधार पर संभव हो सकेगा जिससे जालसाजी और ‘हैकिंग’ को रोका जा सकेगा।

विश्व के साथ सवांद : भारत की आवाज सुनुनी जाएगी

भाजपा का मानना है कि नवोदित भारत को राष्ट्रों के समुदाय तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं में उनका सही स्थान मिलना चाहिए। भाजपा का यह भी विश्वास है कि आज के बहुध्रुवीय विश्व में किसी देश के पास दूसरे देशों के मुकाबले अधिक अधिकार नहीं होने चाहिए। इसके लिए भाजपा सत्तारूढ़ होने पर पूरे विश्व के देशों के साथ समान शर्तों पर सार्थक रूप से कूटनीति करेगी।

भाजपा भारत और अमेरिका के बीच अच्छे सम्बन्ध चाहती है। भारत अमरीकी सामरिक साझेदारी को समानता के सिध्दान्त के आधार पर मजबूत करेगी। परन्तु हम न तो भारत के राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करेंगे और न ही किसी अन्य मित्र देश के सम्बंधों को बिगड़ने देंगे। भाजपा यूपीए सरकार के बिगाड़े गए सम्बन्धों में संतुलन को बहाल करेगी।

भारत के रूस और मध्य एशियाई गणतंत्र देशों के सम्बन्धों को पुन: निर्माण कर उन्हें वास्तविक धारातल पर लाया जाएगा और इन्हें अधिकतम पारस्परिक लाभप्रद बनाया जाएगा।

हम यूरोपीय संघ, पश्चिमी एशियाई देशों और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाएंगे। हम अरब देशों के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत बनाएंगे और इजरायल के साथ सहयोग बढ़ाएंगे-दोनों सम्बन्धों का आपस में कोई अन्तर्संबंध नहीं है और दोनों ही भारत के लिए लाभप्रद हैं।

चीन के साथ अनिर्णीत सीमा विवाद के समाधान की बातचीत प्रक्रिया, जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने शुरू किया था, फिर से शुरू की जाएगी। हम मानते हैं कि भारत और चीन दोनों ही मिलकर समृध्द हो सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं, जिसके लिए आर्थिक सहयोग इसमें योगदान दे सकता है।

भारतीय महासागरीय क्षेत्र में भारत को एक विशिष्ट भूमिका निभानी है जिसका वह पूरी शक्ति से अनुसरण करेगा।

भारत अपने पड़ोसी देशों से मित्रवत तथा सहयोगात्मक सम्बंध बनाए रखने में विश्वास रखता है। हम यह भी मानते हैं कि भारत के पड़ोसी देशों की राजनीतिक स्थिरता, प्रगति और शांति दक्षिण एशिया की प्रगति और विकास के लिए आवश्यक है : सार्क इन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक अच्छा मंच है।

परन्तु भाजपा पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्ध बनाते हुए एक मात्र राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखेगा। इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए भारत अपने निर्णय और कार्य करेगा :

पाकिस्तान : पाकिस्तान के साथ तब तक कोई भी ‘पूर्ण सवं ाद’ नहीं हो सकता है जब तक कि (क) पाकिस्तान अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में आतंकवादी ताने-बाने को ध्वस्त नहीं कर देता है, (ख) जब तक वह आतंकवादी तत्वों और संगठनों पर सक्रिय रूप से मुकदमा नहीं चलाता है, (ग) जब तक वह सीमापार आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति बनाकर उस पर स्थायी और निश्चित रूप से बंद नहीं कर देता है, (घ) जब तक वह भारत पर आतंकवादी हमले करने के लिए तीसरे देशों के प्रयोग बंद नहीं करता है, और (ङ) जब तक वह भारत की धरती पर अपराध करने वाले व्यक्तियों को भारत को सौंप नहीं देता है।

नेपाल : भाजपा यूपीए के उन पूर्वाग्रहों से छुटकारा पाने के लिए भारत की नेपाल नीति की समीक्षा करेगी, जिनसे नेपाल में घटी घटनाओं पर भारत का प्रत्युत्तर प्रभावित रहा, यह आवश्यक है क्योंकि नेपाल के साथ हमारी देश की सभ्यता का इतिहास एक जैसा है। भारत-नेपाल के सम्बन्धों का आधार मित्रतापूर्ण, पारस्परिक सहयोग और हितों के सामंजस्य पर टिका होना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी और बातचीत के आधार पर पारस्परिक हितों और लाभों को ध्यान में रखकर बदलाव लाया जाएगा। भाजपा चाहेगी कि नेपाल एक स्थिर, समृध्द देश बनकर उभरे और हमारा प्रयास रहेगा कि युगों पुराने भाई-चारे के बंधनों को मजबूत किया जाए।

भूटान : भूटान के साथ वर्तमान निकट सम्बन्धों को मजबूत किया जाएगा।

बांग्लादेश : भाजपा पारस्परिक सहायता लाभ के मुद्दों पर बांग्लादेश सरकार के साथ सक्रिय के रूप में काम करेगी। ढाका में मित्रवत सरकार भारत के हित में है।

श्रीलंका : भाजपा मानती है कि श्रीलंका को आतंकवाद से अपनी भूमि पर निपटने का अधिकार है। साथ ही, कोलम्बो में सरकार को श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यक समुदाय के राजनीतिक, आर्थिक और मानवाधिकारों की भी रक्षा करनी चाहिए। भाजपा श्रीलंका के साथ उत्कृष्ट सम्बन्ध रखने की नीति पर चलेगी और पिछले पांच वर्षों में बिगड़े सम्बन्धों को फिर से सुधारने के लिए पहल करेगी।

अफगानिस्तान : भाजपा मानती है कि भारत को अफगानिस्तान के लोगों की मदद करने और उस देश के पुनर्निर्माण एवं उनके समाज को स्थिरता प्रदान करने के साथ-साथ पाकिस्तानी शरणस्थलों से काम कर रहे तालिबानों के हमलों से वहां के लोगों के जीवन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। भाजपा भारत-अफगानिस्तान सम्बन्धों को और अधिक मजबूत बनाएगी और अफगानिस्तान की स्थिरता, सुरक्षा और समृध्दि के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर काम करेगी।

विदेशों में भारतमाता के पुत्र
भाजपा विदेशों में बसे भारत मूल के लोगों के साथ गहन सम्बन्ध बनाए रखेगी। भाजपा की सतत यह नीति रही है कि वह विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों के हितों में साथ दे। एनडीए के शासनकाल में प्रवासी भारतीयों और उनकी पैतृक भूमि के बीच सम्बन्धों को और पुन: शक्तिशाली बनाने के लिए विशेष प्रयास किए गए थे। इन प्रयासों को और तेज किया जाएगा।

भारत की रक्षा : न समझौता न छूट
हमारी क्षेत्रीय और वैश्विक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे परिवर्तन को देखते हुए थल सेना, वायु सेना और नौसेना को मजबूत करना बहुत जरूरी है। दुख की बात है कि कांग्रेस ने सैनिकों की बड़ी उपेक्षा की है और थल सेना, वायु सेना तथा नौसेना की समस्याओं को हल न कर पाने के कारण उनमें अपार असंतोष पैदा हो गया है।

भाजपा तुरंत ही उनके सभी बकाया मुद्दों का समाधान करेगी। भारत की रक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भाजपा निम्नलिखित प्रतिबध्दताओं को ध्यान में रखेगी :

1. लम्बे समय से लम्बित सैनिक साजों सामान प्राप्त करने के काम को चरणबध्द ढंग से पारदर्शिता और तीव्रता से निपटाया जाएगा।

2. रक्षा बलों के लिए बजट आवंटनों को उनके समाप्त होने की अवधि से पूर्व ही खर्च कर लिया जाएगा।

यूपीए सरकार ने रक्षा बलों के प्रति नितांत लापरवाही के कारण बजट आवंटन का लगभग 24,000 करोड़ रूपया बेकार कर दिया जिसे पांच वर्षों में खर्च किया जाना था। इससे न केवल हमारे जवानों का जीवन खतरे में पड़ गया, बल्कि देश की सुरक्षा पर भी आंच आ गई।

3. हमारे सैनिक बल राष्ट्र की सेवा में कार्यरत हैं और उन्हें बेहतर वेतन और विशेषाधिकार प्राप्त करने का हक है। इस उद्देश्य के लिए भाजपा निम्नलिखित उपाय करने के लिए प्रतिबध्द है :

क. वेतन और विशेषाधिकारों के बकाया पड़े मुद्दों की फिर से समीक्षा की जाएगी और रक्षा सेवाओं के लिए सन्तोषजनक हल निकाला जाएगा।

ख. थल सेना, वायु सेना और नौसेना एवं अर्ध-सैनिक बलों के सभी कार्मिकों को उनके वेतन तथा अन्य परिलब्धियों पर आयकर देने से छूट दी जाएगी।

ग. परमवीर चक्र जैसे वीरता पुरस्कार के विजेताओं के लिए मानदेय जो अभी काफी कम 500 से 3000 रुपए के बीच है में 10 गुना वृध्दि कर 5000 से 30,000 रुपए के मध्य लाया जाएगा। इसे गत काल प्रभाव से लागू किया जाएगा तथा यह कर मुक्त होगा।

घ. समान रैंक, समान पेंशन का सिध्दांत लागू किया जाएगा।

ड़ अफसरों की कमी को पूरा करने के लिए युवाओं तथा युवतियों के लिए प्रोत्साहनकारी उपाए किए जाएंगे।

च. रक्षा सेवाओं के सेवानिवृत्त कार्मिकों के मामलों का सम्माननीय हल सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।

4. सभी स्तरों पर रक्षा कार्मिकों की वर्तमान रक्षा सेवाओं में कमी को आकर्षक कैरियर विकल्प के उपाय किए जाएंगे। इनमें प्रतिस्पर्धी वेतन और विशेषाधिकार तथा पेंशन लाभ शामिल रहेंगे। ये काम एक चरणबध्द समय में पूरा किया जाएगा।

5. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन की क्षमताओं को बढ़ाया जाएगा। राष्ट्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पारम्परिक रक्षा उत्पादन के लिए पीपीपी रूप को तलाशा जाएगा और सन 2020 तक विश्व बाजार में भारत एक प्रतिस्पर्धी भूमिका का निर्वहन कर सकेगा।

स्वतंत्र सामरिक परमाणु कार्यक्रम
भाजपा का मानना है कि कांग्रेस ने भारत के सामरिक परमाणु कार्यक्रम के साथ भयंकर खिलवाड़ किया है। पोकरण-II और उसके बाद की घटनाक्रम से प्राप्त लाभ को संकीर्ण स्वार्थ की खातिर भट्ठी में डाल दिया गया है। फलत: जो चाहते हैं कि भारत के परमाणु कार्यक्रम को रोककर पलट दिया जाए, तथा वह अंतत: निरस्त हो
जाए, आज लाभ में हैं।

भाजपा सत्ता में आते ही इस दु:स्थिति को बदल वापस सही राह पर लाएगी। भारत में थोरियम टेक्नॉलाजी कार्यक्रम को तेज किया जाएगा और सभी प्रकार की वित्तीय सहायता दी जाएगी ताकि यूपीए सरकार द्वारा की गई भयंकर गलतियों को सुधारा जाए। भारत को परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता है, परन्तु इसके लिए हम अपने राष्ट्रीय रणनीतिक हित बलिदान नहीं करेंगे। कांग्रेस ने भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर को-ऑपरेशन समझौते को बेहद जरूरी बता कर भारत के लागों को बेवकूफ बनाया है और समझ में नहीं आता कि इससे लोगों के घरों में बिजली पहुंचाने में कैसे मदद मिलेगी। उसने यह सब कुछ दो अत्यंत महत्वपूर्ण बातें छिपा कर किया है।

पहली बात, जैसा कि सीएजी ने भी कहा है, यूपीए सरकार ने भारत के अपनी परमाणु ईंधन आपूर्ति भण्डारों का पता लगाने की जरा भी कोशिश नहीं की है। अगर ऐसा किया होता तो हमारे रिएक्टर आज की तुलना में कई गुना अधिक बिजली का उत्पादन करते। दूसरी बात, परमाणु ऊर्जा अत्यधिक महंगी है और आम आदमी इतना खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकता है। अन्तिम विश्लेषण यही है कि भारत-अमरीकी परमाणु समझौता भारत का सशक्तिकरण्ा के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य तो भारत को अमरीका पर निर्भर बनाना और हमें भेदभावपूर्ण व्यवस्था में बांधकर, जिससे पाकिस्तान मुक्त है, भारत को शक्तिविहीन करना है।

भाजपा भारत की परमाणु-प्रसार रोकने की प्रतिबध्दता का सम्मान करेगा। परन्तु हम निम्नलिखित रुप में स्वतंत्र परमाणु नीति पर चलेंगे :

1. सभी विकल्प खुले रहेंगे और भारत के सिविल तथा सैन्य परमाणु कार्यक्रमों की प्रौद्योगिकीय प्रगति के लिए सभी उपाए करेंगे।

2. बदलती यथार्थताओं के अनुसार विश्वसनीय-न्यूनतम निवारक बनाए रखेंगे।

3. सी.टी.बी.टी, एफ.एम.सी.आर और एम.टी.सी.आर सहित किसी भी नियंत्रण व्यवस्था पर सहमत होने से पूर्व सभी पार्टियों की आम सहमति बनाएंगे।

जिस प्रकार से कांग्रेस और प्रधानमंत्री ने भारत-अमरीकी परमाणु समझौते पर अनावश्यक और खेदजनक गोपनीयता बनाए रखी, उसे देखते हुए भाजपा का प्रस्ताव है कि संविधान में संशोधन लाया जाए, जिससे सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाए कि भारत के रणनीतिक कार्यक्रमों, क्षेत्रीय अखण्डता और आर्थिक हितों का अतिक्रमण करने वाले किसी भी द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर करने से पूर्व संसद की स्वीकृति/अभिपुष्टि दो-तिहाई मतों से प्राप्त की जाए।

जारी…

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