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लेखक: जयप्रकाश सिंह

 भारतीय गुलामी के हजार साल के कालखण्ड को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम कालखण्ड का सम्बंध इस्लाम से है जबकि द्वितीय कालखण्ड का सम्बंध इसाईयत से है। इस्लामिक गुलामी मूल रुप से राजनीतिक गुलामी थी। इस गुलामी का सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर रिसाव नहीं हुआ था। कुछ इतिहासकार हिंदुओं को जबरन इस्लाम में मतांतरित करने और सूफीवाद के उदय को सामाजिक सास्कृतिक परिदृश्य से जोड़कर देखते है। लेकिन मतांतरण के पीछे भी काम करने वाली शक्ति मूलरुप से राजनीतिक थी। इसके पीछे कोई वैचारिक आंदोलन काम नहीं कर रहा था।

सूफीवाद के उभार का राजनीतिक शक्ति से कुछ लेनादेना नहीं था। यह हिंदुत्व की सांस्कृतिक सबलता के कारण अस्तित्व में आया। सूफीवाद भारत की प्रबल सांस्कृतिक जठराग्नि की देन है। असीम बौद्विक और सांस्कृतिक पाचन क्षमता के कारण भारत सभी वाह्य प्रवृत्तियों को आत्मसात कर लेता है, और अपने पकृति के अनुरुप नई प्रवृत्तियां को जन्म देता है। यही सनातन भारत की महान आंतरिक और अमिट ताकत है।

इस बिंदु पर यह भी स्मरणीय है कि इस कालखण्ड में समाज की धारा ही मूल धारा थी। राजनीति की भूमिका एक सहायक की भूमिका तक सीमित थी। इसी कारण तत्कालीन राजनीतिक प्रक्रिया में बहुत कम लोगों की सहभागिता होती थी और बहुत कम ही लोग उससे प्रभावित भी होते थे।

अंग्रेजों के समय की गुलामी राजनीतिक के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक भी थी। अंग्रेजों ने भारत की राजनीतिक संरचना और संस्थानों के साथ ही समाज और संस्कृति की बनावट तथा बुनावट को भी प्रभावित किया। उन्होंने भारतीय जनमानस और उसके शक्तिकेंन्द्रों का बहुत बारीकी से अध्ययन किया। सामाजिक सांस्कृतिक समझ की इस कवायद से अग्रेंजों को भारत की नब्ज और तासीर को समझने में मदद मिली। उनके ध्यान में आया कि भारतीय जनमानस राज से नहीं बल्कि समाज से चलता है और भारतीय अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति बहुत संवेदनशील हैं। भारतीयों में इस विरासत को लेकर एक गौरव भाव भी है। अंग्रेजों को यह बात भी समझ में आयी कि आत्मगौरव की भावना राजनीतिक गुलामी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। और इस भाव के बने रहने पर भारतीयों पर अधिक समय तक शासन नहीं किया जा सकता।

भारत की नब्ज और तासीर को समझने के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों में आत्महीनता भरने के प्रयास शुरु किए। उन्होंने कुछ ऐसी मान्यताएं और अवधारणाएं गढ़ी जो नितांत भ्रामक थीं। और जिसका उद्देश्य केवल और केवल भारतीयों के बीच आत्महीनता और आत्म दैन्यता का भाव भरना था। इन प्रवृत्तियों को पैदा करने का साधन इतिहास को बनाया गया। भारत का इतिहास अंगेजों द्वारा लिखा गया और यह शायद अब तक पूरी दुनिया में लिखा गया सबसे विकृत इतिहास है। भारत पर आर्यो का आक्रमण एक ऐसी ही झूठी कहानी है। जिसका आज तक भारतीय इतिहासकार रट्टा मारते आ रहे हैं।

सरस्वती नदी को कपोलकल्पना बताने को भी को भी इतिहास के रचा गया एक सामाजिक सांस्कृतिक षडयंत्र कहा जा सकता है। जिसका कभी अस्तित्व ही नहीं रहा है। लेकिन हाल में किए उत्खनन और उपग्रहों के जरिए लिए गए चित्रों ने यह बात साबित कर दी है कि सरस्वती नदी एक सच्चाई थी। इस नदी को फिर से एक सच्चाई बनाने का प्रयास भी शुरु कर दिए गए हैं।

सरस्वती नदी शोधयात्रा की एक लम्बी कहानी है। इस नदी के शोध में पहला कदम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मारोपंत पिंगले और विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैनी के पुरातत्वविद् स्व. डा.विष्णु श्रीधर वाकणकर ने उठाया। इन दोनों महानुभावों ने अन्त:सलिला सरस्वती नदी के सम्भावित मार्ग का खाका तैयार किया और प्रवाह के मार्ग को खोजने के लिए लगभग तीन हजार किलोमीटर का प्रवास किया।

इन दोनों महानुभावों ने 1985 में सरस्वती नदी के मार्ग के सटीक निर्धारण के लिए सरस्वती शोधसंस्थान, जोधपुर की स्थापना की। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से भी इस कार्य में सहयोग देने की अपील की और इसरो ने इस नदी के पुनर्खोज में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस नदी के मार्ग के शोध में महाभारत के शल्य पर्व से भी सहायता मिली। महाभारत के इस खण्ड में भगवान बलराम के यात्रा विवरण का प्रयोग सरस्वती के मार्ग की खोज में किया गया।

आज भी प्रयाग में गंगा और यमुना दो नदियों का संगम को त्रिवेणी कहा जाता है। भारतीय जनमानस में सरस्वती नदी से जुड़ी स्मृतियों के कारण ही प्रयाग को त्रिवेणी कहा जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से साबित हो चुका है कि पोंटा साहब के समीप करीबन तीन हजार पांच सौ साल पूर्व हुए भूचाल के कारण शिवालिक पर्वत में खिसकाव आ गया और यहां यमुना नदी का प्रवाह पश्चिम दिशा के स्थान पर दक्षिण हो गया। प्रवाह में हुए इस परिवर्तन से यमुना नदी ने सरस्वती के पानी को भी अपने में समाहित कर लिया। प्रयाग में यमुना गंगा में समाहित हो जाती है। प्रयाग को इसी कारण त्रिवेणी भी कहा जाता है।

सरस्वती की पुनर्खोज का महत्व केवल आस्था और विश्वास के स्तर तक नहीं है। इसके ऐतिहासिक आयाम भी हैं। यह आयाम अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के उपर थोपी गई सांस्कृतिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के द्वितीय स्वतंत्रता संग्राम में हमारी मदद दे सकते है। यह लड़ाई अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण और अधिक जरुरी है।

अंग्रेजो ने अपने द्वारा गढ़ी गई मान्यताओं से यह स्थापित करने का बलपूर्वक प्रयास किया कि राम और कृष्ण ऐतिहासिक पुरुष नही है। रामायण और महाभारत कपोल कल्पनाएं हैं, ऐसी कहानियां है जो कभी भी इस धरती पर घटी नहीं। भारत के सम्पूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों का निर्माण भगवान राम और भगवान कृष्ण के चरित्रों से पैदा होता है। और उन मूल्यों और आदर्शो का संचरण रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के जरिए आज तक समाज में होता रहा है। अंग्रेजों ने इसको कपोल कल्पना बताकर भारतीयों को अपनी जड़ों से काटने का प्रयास किया। वेदों को गड़रियों का गीत बताए जाने को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

सरस्वती नदी की खोज ने अंग्रेजों द्वारा गढ़ी गयी अनेक विकृति और कुत्सित अवधारणाओं को एक ही झटके में खत्म कर दिया है। सरस्वती नदी शोध तथा द्वारिका, लोथल, धौलवीरा, कालीबंगा आदि स्थलों पर हुए उत्खनन से महाभारत की ऐतिहासिकता सिद्व हो गई है। साथ ही खम्बात की खाड़ी के उत्खनन से तो भारतीय इतिहास दस हजार वर्षो से भी अधिक पुराना होने के प्रमाण मिले हैं। प्रवासी भारतीय अमेरिका विद्वान डा. नरहर आचार्य ने तारामंडल साफ्टवेयर के आधार पर महाभारत युध्द की तिथि का अकाटय प्रमाण प्रस्तुत किया है।

सरस्वती नदी शोध के परिणामस्वरुप भारतीय इतिहास की अत्यंत प्राचीनता सिध्द होने से अंग्रेजो द्वारा गढ़ा गया ‘आर्य आक्रमण का सिध्दांत’ भी ध्वस्त हो चुका है। अंग्रेजों की मान्यता है कि आर्यो ने लगभग 1500 ईसापूर्व भारत पर आक्रमण किया। यदि ऐसा है तो महाभारत में सरस्वती नदी का उल्लेख कैसे सम्भव है और मंत्रद्रष्टा ऋषियों द्वारा वेदों की रचना की सरस्वती के तट पर कैसे सम्भव हुई।

आज जरुरत इस बात की है हम सरस्वती नदी शोधयात्रा के निष्कर्षों को लेकर समाज में जाएं। भारत में पढ़ाए जाए रहे विकृत इतिहास के तथ्यों को सरस्वती नदी के खोज के आलोक में फिर से कसने की जरुरत है। समाज को बताने की जरुरत है कि अग्रेजों द्वारा इतिहास से जरिए भारत का जो चित्र खींचा है, वह विकृत है। भारत दीन -हीन कभी नहीं रहा। भारत का अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास और उज्जवल सांस्कृतिक परम्परा है।

सरस्वती नदी शोधयात्रा आस्था को ऐतिहासिक मान्यता प्रदान करने की एक आधारभूत कड़ी का काम किया है। इसलिए सरस्वती का खोज को भारतीय आस्था और इतिहास का संगम कहा जा सकता है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए की यह एक शुरुआत मात्र है।

इसी संदर्भ में सेतुसमुद्रम परियोजना से उपजे विवाद पर नजर डालने से यह सिध्द होता है कि रामसेतु से भी आस्था और इतिहास के मिलन की व्यापक संभावनाएं खुलती हैं। रामसेतु भगवान राम के काल की अभियांत्रिकी का अद्भुत उदाहरण है। सरस्वती नदी शोध की तरह यदि भारतीयता को समर्पित लोगों ने रामसेतु को लेकर भी काम शुरु किया तो पश्चिम के विज्ञान और इतिहास की सीमाएं अपने आप टूट जाएंगी। क्योंकि भारतीय कालगणना का विशाल सागर पश्चिम के संकीण खांचे में नहीं फिट हो सकता। इतिहास और विज्ञान की सीमाओं के टूटने के साथ ही हमारे उपर अंग्रेजो द्वारा गलत अवधारणा के जरिए थोपी गई सांस्कृतिक गुलामी की कडियां भी स्वत:टूट जाएगी। भारतीय मानसिकता पर जमी गाद अपने आप साफ हो जाएगी। भारत के नवोत्थान में इस क्षेत्र में काम किया जाना सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी होगा।

भारत को भारतीय आंखों से देखने और भारतीय नजरिए से समझने का समय अब आ गया है। सरस्वती नदी शोध ने इस काम की शुरुआत की है और रामसेतु में इसको नई उंचाईंया प्रदान करने की सम्भावनाएं और सामर्थ्य है। जरुरत है तो केवल दृ ढ़तापूर्वक आगे बढ़ने की। अगर हम आगे बढ़ते हैं तो प्राचीन के साथ साथ भावी इतिहास भी अपना ही होगा।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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