लेखक परिचय

राजेश कश्यप

राजेश कश्यप

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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 budgetबहुप्रतिक्षित वर्ष 2013-14 का बजट आ गया। बजट पर राजनीतिकों, समीक्षकों और समाचार विश्लेषकों के बीच तर्क-वितर्कों के तीखे तीर बड़ी तेजी से चल पड़े हैं, जोकि परंपरागत रूप से कई दिनों तक चलेंगे। विपक्ष ने बजट को सिरे से ‘कन्फूज्ड’ कहते हुए निराशावादी करार दे दिया है और रस्मी रिवाज को अटूट बनाते हुए सत्तापक्ष ने भी बजट को विकासवादी बजट की संज्ञा देकर अपनी पीठ स्वयं थपथपा ली है। आम आदमी ने भी एक बार फिर बजट के बाद अपना सिर पीट लिया है। बजट से किसी भी वर्ग को कोई खुशी नहीं हुई है। सब समस्याएं, चिताएं, चुनौतियों जस की तस हैं और भविष्य में उनके और भी विकट होने की संभावनाएं पूर्ववत बनी हुई हैं। ऐसे समीकरणों के बीच ‘साढ़ हरे न सावन सूखे’ और ‘ढ़ाक के वही तीन पात’ जैसी प्रचलित लोकोक्तियां सहज स्मरण हो रही हैं। स्थितियां और परिस्थितियां तनिक भी बदली नहीं है और बदलने वाली भी नहीं लग रही हैं, ऐसे में बजट का क्या औचित्य रह जाता है? आम आदमी को महंगाई से निजात मिलने की तनिक भी उम्मीदें नहीं हैं। बेरोजगारों के लिए रोजगार की उम्मीदें नदारद हैं। किसानों के चेहरे पर खुशी झलकने कोई अवसर नहीं है। गरीबों, मजदूरों और बेघरों के लिए कोई राहत का समाचार नहीं है। मात्र 20 रूपये पर गुजारा करने वाली आधे से अधिक आबादी की बजट से जुड़ी सभी आकांक्षाएं एक बार फिर धूमिल हो गई हैं। महंगाई की मार की धार और भी तीखी होने के पूरे आसार हैं। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस आदि को आग लगने वाली है। बजट में आंकड़ों की बाजीगरी आम आदमी के जी का जंजाल बनकर रह गई है।

बजट से पूर्व कयास लगाए जा रहे थे कि संभवतः इस बार चुनावी बजट आएगा और वित्तमंत्री लोक-लुभावनी नीतियों की बौछार कर देंगे। ऐसे में आम आदमी स्वयं को यह सांत्वना देने के लिए तैयार बैठा था कि कम से कम कुछ समय तो कुछ राहतकारी साबित होगा! मंहगाई, गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, कर्ज जैसी विकट समस्याओं से थोड़े समय ही सही, कुछ छुटकारा तो मिलेगा! लेकिन, ऐसा तनिक भी नहीं हुआ। एक बार फिर सीधे-सीधे आम आदमी के हाथ में कई तरह के रंगों में लॉलीपॉप थमा दिए गए हैं। देश में चल रही विभिन्न योजनाओं के मदों में थोड़ा-थोड़ा उतार-चढ़ाव करने के अलावा बजट में और नया क्या है? क्या ‘निर्भया योजना’ और ‘महिला बैंक’ खोलने से देशभर में लुट रही अबलाओं की अस्मत पर रोक लग जाएगी? क्या महिलाओं को पूर्णतः ‘आत्म-निर्भर’ व ‘निर्भया’ बनाया जा सकेगा? किसानों को कौन सी राहत मिलने वाली है? किसानों व खेतीहर मजदूरों की दयनीय दशा पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? बैंकों से मिलने वाले कर्ज की विसंगतियों और उसके कारण मौत को गले लगाने के लिए किसानों की मजबूरियों पर कोई गंभीरता क्यों नहीं दिखाई दी? किसान सड़क पर अपनी फसलें डालने के लिए विवश नहीं होगा, यह आश्वासन क्यों नहीं मिला? मनरेगा में बाबुओं के भ्रष्टाचार पर पूर्णतः अंकुश लगेगा और पूरा पैसा मजदूरों तक पहुंचेगा, ऐसे प्रावधानों का अभाव क्यों?

राष्ट्रीय शर्म का विषय रही ‘कुपोषण’ की समस्या के अभेद कवच को काटने के लिए कारगर नीतियों का अभाव क्यों? ‘मिड डे मील’ जैसी बहुउद्देशियों योजनाओं का पैसा भ्रष्ट बाबूओं की जेब न भरे, इसके लिए कटिबद्धता क्यों नहीं? हर साल विभिन्न योजनाओं में विभिन्न मदों के अंतर्गत भारी धनराशि का प्रावधान किया जाता है। लेकिन, उनके क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार की दीमक लाईलाल क्यों बनाकर रखी हुई है? जब देश की आधे से अधिक आबादी को दो वक्त का खाना जुटाने की चिंता बनी रहती है, ऐसे में दो से पाँच लाख की आय पर दो हजार की छूट की घोषणा से कितने घरों में खुशी का सबब बनेगी? कितने प्रतिशत लोग पच्चीस लाख तक के पहले घर पर ब्याज में छूट का लाभ उठाने में सक्षम होंगे? ‘खाद्य सुरक्षा बिल’ के नाम पर जो ढ़ोल की अनहद गूंज देशभर में गुंजाई जा रही है, उस पर अनुमानतः एक करोड़ पचास लाख रूपयों की आवश्यकता होगी। जबकि, हालिया बजट मंे इसके लिए केवल दस हजार करोड़ रूपये ही खर्च करने का प्रावधान बनाया गया है। यह तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान भी नहीं है तो फिर ऐसी बड़ी घोषणाओं का ढ़कोसला क्यों? वित्तमंत्री ने महिला, युवा और गरीब के चेहरे दिखाई देने की बात कही। ऐसे में क्या बजट को इन तीनों वर्गों की उम्मीदों के अनुरूप कहा जाएगा? क्या इन वर्गों के चेहरों पर खुशी लाने में यह बजट सहायक सिद्ध होगा? इन सवालों का सहज जवाब है, जिसे देने की आवश्यकता नहीं है।

 

पिछले कुछ सालों से हर आम बजट की सबसे खास बात यह हो गई है कि उसमें कोई खास बात होती ही नहीं होती है। यह चौंकने की बात नहीं, बल्कि वास्तविक हकीकत है। हर बार वही सब औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं, जो गतवर्ष की चुकी होती हैं। हर बार सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा पूरे देश में आम बजट से पहले बड़ा ही अजीबो-गरीब माहौल तैयार किया जाता है। टेलीविजन चैनलों पर दिनरात बड़े-बड़े धुरन्धर विद्वान संभावित बजट की रूपरेखा खींचने लग जाते हैं। एक-दूसरे पर अपनी विद्वता झाड़ने के लिए अक्सर आपे से बाहर हो जाते हैं। राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाएं आम आदमी से भावी बजट पर प्रतिक्रियाएं मांगकर, उनकीं दुखती रग को दबाने के जन्मसिद्ध अधिकार का इस्तेमाल बखूबी करती दिखाई देती हैं। कुल मिलाकर, देश में ऐसा माहौल तैयार किया जाता है कि मानों सदियों बाद कोई नया नजारा दिखाई देने वाला हो। लेकिन, हकीकत में होता कुछ भी नहीं है। वही सब पुरानी घिसी-पीटी बातें और औपचारिकाताओं का बवंडर! बजट सत्र से पहले ही विपक्ष दल सत्तारूढ़ सरकार को सदन में ऐसे घेरने की धमकी देते हैं, मानों वे इस बार सरकार का बोरिया बिस्तर बांधकर ही दम लेंगे। सत्तारूढ़ सरकार हमेशा की तरह आम बजट को लेकर रहस्यमयी डुगडुगी बजाने लगती है। इस डुगडुगी की आवाज ठीक उस मदारी की तरह होती है, जो बंदरिया को अपने इशारों पर नचाने के लिए जोर-जोर से बजाता है। बंदरिया का मन नाचने का हो या न हो, लेकिन उसे मदारी की डुगडुगी की आवाज पर नाचना ही पड़ता है। बिल्कुल इसी तर्ज पर सत्तारूढ़ सरकार की डुगडुगी की आवाज पर आम आदमी को भी न चाहते हुये नाचना पड़ता है।

आम बजट के प्रति आम आदमी की सभी उम्मीदें टूट चुकी हैं। अब उसके लिए आम बजट निरर्थक हो चुका है। क्योंकि उसे भलीभांति पता है कि बजट के नामपर एक बार फिर सरकार उसकी खाल खींचने वाली है। एक तरह से आम आदमी को सरकार के हाथ में आम बजट यूं दिखाई देता है जैसे निर्दयी कसाई के हाथ में भयंकर कौड़ा। यह सौ फीसदी कड़वा सच है कि आम बजट आम आदमी को दिग्भ्रमित करने का लाजवाब सरकारी जादूई कौड़ा है। यह ऐसा अनूठा जादूई कौड़ा है जो हाड़-मांस को सूरमा बनाकर, आम आदमी की रूह तक कंपा देता है और उसको खुलकर ‘उफ’ तक भी नहीं करने देता। फूटपाथों पर जीवन-निर्वाह करने वाले और झुग्गी-झोंपड़ियों में उम्मीदों की डोर बांधे करोड़ों लोगों के लिए आज तक कोई बजट खुशियां लेकर नहीं आया है। यदि आया है तो सिर्फ छलावा लेकर। भ्रष्ट और बेईमान लोगों को नकेल डालने के लिए किसी भी आम बजट में कोई प्रावधान क्यों नहीं होता है? अरबों-करोड़ों रूपयों के घोटालों और घपलों की अथाह धनराशि और कालेधन की अकूत धन-सम्पदा को आम आदमी की दयनीय हालत को सुधारने की घोषणाएं किसी भी बजट में क्यों नहीं होती हैं? आम बजट से आम आदमी के हित एकदम गौण क्यों होते हैं? बेरोजगारी और बेकारी का नारकीय जीवन जीने वाले करोड़ों लोगों के लिए आज तक कौन सा आम बजट पेश हुआ है? गन्दे नालों, गन्दे स्थानों और चौंक-चौराहों पर कागज बीनकर रोटी का जुगाड़ बनाने वाले और भीख माँगकर बचपन गुजारने वाले भावी कर्णधारों के लिए कब नई उम्मीदें लेकर आयेगा आम बजट? चाहे कोई भी कुछ भी कहे। आम बजट के लिए अब कोई मायने नहीं रह गये हैं। यह सिर्फ औपचारिकता भर रह गया है। सत्ता पक्ष को मनमाना बजट पेश करना है, विपक्ष को हंगामा मचाने की कवायद पूरी करनी है, प्रिन्ट व इलैक्ट्रोनिक मीडिया मेें दो-चार दिन महाबहसों का विषय बनना है और आम आदमी को हमेशा की तरह खून के आँसू रोना है। कहना नहीं होगा कि यदि यह ड्रामेबाजी कुछ समय और चलती रही तो देश में ऐसी विकट और विस्फोटक स्थिति पैदा हो जाएगी, जिसकी कल्पना शायद किसी ने भी नहीं की होगी। विडम्बना का विषय तो यह है कि वर्ष 2013-14 के बजट से भी पुरानी ड्रामेबाजी से कोई सबक नहीं लिया गया है। निःसन्देह यह ड्रामेबाजी निकट भविष्य और भी घातक साबित होने वाली है।

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