बचपन के मायने

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अल्हड़पन, भोलापन और मासूमियत  पहचान हैं यह सभी बचपन की, पर  आज तो बचपन भी एडवांस हो गया है।  लोरी दिलाती थी बचपन का एहसास  सुलाती थी मीठे सपनों में और बनाती  थी हमारी दुनिया को खास, पर आज  लोरी की जगह ख़त्म हो गयी है जैसे  वो किसी सुनहरी यादों में खो गयी है। … Read more »

कविता : प्रतीक

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मिलन सिन्हा यह पेड़ है हम सबका पेड़ है।   इसे मत छांटो इसे मत तोड़ो इसे मत काटो इसे मत उखाड़ो इसे फलने दो इसे फूलने दो इसे हंसने दो इसे गाने दो   यह पेड़ है हम सबका पेड़ है।   इसपर सबके घोसले हैं कौआ का है, मैना का है बोगला का… Read more »

बड़ी चकल्लस है

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रोज रोज का खाना खाना. बड़ी चकल्लस है| दादी दाल भात रख देती.करती फतवा जारी| तुम्हें पड़ेगा पूरा खाना.नहीं चले मक्कारी| दादी का यह पोता देखो कैसा परवश है| बड़ी चकल्लस है| “भूख नहीं रहती है फिर भी कहते खालो खालो| घुसो पेट में मेरे भीतर.जाकर पता लगालो| तुम्हें मिलेगा पेट लबालब.भरा ठसाठस है|” बड़ी… Read more »

कबड्डी

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तूम तड़क्का धूम धड़क्का. सुन्ने का है वादा पक्का| तू तू तू तू तू तू बोलेंगे| आज कबड्डी फिर खेलेंगे| यह है अपना खेल पुराना| इसको भाई भूल न जाना| रोज कबड्डी हमें खिलायें| हम ओलंपिक पदक दिलायें|

सूरज चाचा

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सूरज चाचा कैसे हो, क्या पहले के जैसे हो, बिना दाम के काम नहीं, क्या तुम भी उनमें से हो?   बोलो बोलो क्या लोगे? बादल कैसे भेजोगे? चाचा जल बरसाने का, कितने पैसे तुम लोगे?   पानी नहीं गिराया है, बूँद बूँद तरसाया है, एक टक ऊपर ताक रहे, बादल को भड़काया है|  … Read more »

एक नाटक- चलो सम्भल के

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                                     पात्र      एक बड़ा बच्चा                   सूत्रधार एक बच्चा                          ड्राइवर { ड्राइवर की वेस भूसा में } दूसरा बच्चा                       स्कूल बस    {पीले कपड़ों में }            चार बच्चों की                  प्रथम  टोली    { स्कूल ड्रेस में } चार बच्चों की                 … Read more »

बिना परीक्षा

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          बिना परीक्षा दिये छिपकली, हो गई पहली कक्षा पास| दीवारों पर घूम रही थी, फिर भी चिंतित और उदास| बिना परिश्रम मिली सफलता, उसे न बिलकुल भाई है| फिर से पहली कक्षा में ही, नाम लिखाने आई है|

अच्छा नाम‌

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तीन पांच तू मत कर छोटू, मैं दो चार लगाऊंगा| तेरे सिर पर बहुत चढ़े हैं, मैं सब भूत भगाऊंगा| यही ठीक होगा अब बेटे, मेरे  सम्मुख ना आना, जब भी पड़े सामना मुझसे, नौ दो ग्यारह हो जाना| कभी न पड़ा तीन तेरह में, सीधा सच्चा काम रहा| नहीं चार सौ बीसी सीखी| इससे… Read more »

दादाजी का डंडा

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दादाजी से झगड़ रहा था, उस दिन टंटू पंडा| मुरगी पहले आई दादा, या फिर पहले अंडा| दादा बोले व्यर्थ बात पर, क्यों बकबक का फंडा| काम धाम कुछ ना करता तू, आवारा मुस्तंडा| इतना कहकर दादा दौड़े, लेकर मोटा डंडा| इससे पूछो मुरगी आया, या फिर‌ पहले अंडा|

सच्चा मित्रः कविता

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सच्चा मित्र‌      झगड़ू बंदर ने रगड़ू,     भालू से हाथ मिलाया|     बोला तुमसे मिलकर तो,     प्रिय बहुत मज़ा है आया|                                    रगड़ू बोला हाथ मिले,      तो मन भी तो मिल जाते|      अच्छे मित्र वही होते,       जो काम समय पर आते|       कठिन समय पर काम नहीं,       जो कभी… Read more »