मानव ही मानवता को शर्मसार करता है

0
289

मानव ही मानवता को शर्मसार करता है
सांप डसने से क्या कभी इंकार करता है

उसको भी सज़ा दो गुनहगार तो वह भी है
जो ज़ुबां और आंखों से बलात्कार करता है

तू ग़ैर है मत देख मेरी बर्बादी के सपने
ऐसा काम सिर्फ़ मेरा रिश्तेदार करता है

देखकर जो नज़रें चुराता था कल तलक
वो भी छुपकर आज मेरा दीदार करता है

दे जाता है दर्द इस दिल को अक़्सर वही
अपना मान जिसपर ऐतबार करता है

मुझको मिटाना तो चाहता है मेरा दुश्मन
लेकिन मेरी ग़ज़लों से वो प्यार करता है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here