मुझे समझ नहीं आता

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-आजाद दीपक- तुझसे क्या बातें करूं मुझे समझ नहीं आता, इश्क करूं या सवाल! मुझे समझ नहीं आता; मेरी कहानी जब लिखेगा वो ऊपर वाला, मिलन लिखेगा या जुदाई, मुझे समझ नहीं आता; सभी आशिकों के दिल पर इक नाम लिखा होता है, मेरे दिल पर क्या लिखा है, मुझे समझ नहीं आता; परिंदा होता… Read more »

चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है !

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चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है ! तुही बता ये जिन्दगी, जाना तुझे किस ओर है !!   हर तरफ़ से आवाजें, कोलाहल और शोर है ! कुछ समझ आता नहीं, मंजिल मेरी किस ओर है !!   सब के सब बेकल यन्हा, सबके सपनों का जोड़ है ! किसके सपने तोरुं… Read more »

जीवन मर्म

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पाषाण हृदय बनकर कुछ भी नहीं पाओगे । वक्त के पीछे तुम बस रोओगे पछताओगे ।। ये आस तभी तक है जब तक सांसें हैं। सांस के जाने पर क्या कर पाओगे ।। इन मन की लहरों को मन में न दबाना तुम । ग़र मन में उठा तूफां कैसे बच पाओगे ।। भार नहीं… Read more »

मेरे क़ातिल कोई और नहीं मेरे साथी निकले

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-बदरे आलम खां-    मेरे क़ातिल कोई और नहीं मेरे साथी निकले मेरे जनाजे के साथ बनकर वो बाराती  निकले रिश्तेदारों ने भी रिस्ता तोड़ दिया उस वक़्त जब दौलत  कि तिजोरी से मेरे हाथ खली निकले मेरे किस्मत ने ऐसे मुकाम पर लाकर छोड़ दिया ग़ैर तो गैर मेरे अपने साये भी सवाली निकले… Read more »

अब किसी बात का भी अंदाज़ नहीं होता

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अब किसी बात का भी अंदाज़ नहीं होता हर वक़्त एक सा तो मिज़ाज नहीं होता। हैरान होता है दरिया यह देख कर बहुत  क्यूँ आसमां ज़मीं से  नाराज़ नहीं होता। खिड़की खोल दी,उन की  तरफ़ की मैंने अब परदे वालों का  लिहाज़  नहीं  होता। गुज़रा हुआ हादसा फिर से याद आ गया अब काँटा… Read more »

तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती

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सत्येंद्र  गुप्ता तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती वक़त के हाथ की शमशीर नहीं बदलती। मैं ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी तलाशता रहा ज़िन्दगी , अपनी ज़ागीर नहीं बदलती। कितने ही पागल हो गये ज़ुनूने इश्क़ में मुहब्बत  अपनी तासीर  नहीं बदलती। प्यार ,वफ़ा,चाहत ,दोस्ती व  आशिक़ी इन किताबों की तक़रीर नहीं बदलती। अपनी खूबियाँ, मैं किस के  साथ बाटूं अपनों के ज़िगर की… Read more »

हर वक्त तो हाथ में गुलाब नहीं होता

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हर वक्त  तो हाथ में गुलाब नहीं होता उधार के सपनों से  हिसाब नहीं होता। यूं तो सवाल बहुत से उठते हैं ज़हन में हर सवाल का मगर ज़वाब नहीं होता। शुहरत मेरे लिए  अब  बेमानी हो गई ख़ुश पाकर अब मैं  ख़िताब नहीं होता। रात भर तो सदाओं से घिरा रहता हूँ मैं सुबह… Read more »

सत्येंद्र गुप्ता की गजले

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 संग बीमार नहीं हुआ जाता टूटी किश्ती में सवार नहीं हुआ जाता ! हज़ार कयामतें लिपटती हैं  क़दमों से मगर फिर भी लाचार नहीं हुआ जाता ! बेशुमार धब्बे हैं धूप के तो दामन पर हम से ही गुनाहगार नहीं हुआ जाता ! रहमतें तो बरसती हैं आसमां से बहुत रोज़ के रोज़ साहूकार नहीं… Read more »

तेरी आहट

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                    जग मोहन ठाकन तेरी वक्रोक्ति को लबों की सजावट समझकर हम खिल खिलाते रहे  मुस्कुराहट समझकर जब जब घण्टी बजी किसी भी द्वार की हम दौड कर आये तेरी आहट समझकर ना आना था ,    ना आये    तुम कभी संतोष कर लिया तेरी छलावट समझकर… Read more »

अपनी भाषा और अपनी आन को लड़ते रहे उनके हिस्से लाठियों की मार है इस देश में ?

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राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्मान के लिये आन्दोलन करने वाले श्याम रूद्र पाठक के साथ पुलिस ने लगातार अभद्रता की पुलिसिया हरकत बताती हैकि इस देश में लोक तंत्र की असलियत क्या है. लोकतंत्र के पतन पर एक ग़ज़ल पेश है . कौन कहता है मेरी सरकार है इस देश में आम है जो आदमी… Read more »