उनके इंतज़ार में…

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-लक्ष्मी जायसवाल- बेजुबां ये अश्क़ अपना हाल खुद ही बताते हैं। आज भी तुम पर ये अपना अधिकार जताते हैं।। याद में तेरी अश्क़ बहाना भी गुनाह अब हो गया। कैसे कहें कि दिल का चैन पता नहीं कहां खो गया।। चैन-सुकून की तलाश में सब कुछ छूट गया है। क्यों मुझसे अब मेरा वजूद… Read more »

अब तो आंखें खोल

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-पंडित सुरेश नीरव- अमल से सिद्ध हुए हैवान जमूरे अब तो आंखें खोल। न जाने किसकी है संतान जमूरे अब तो आंखें खोल।। मिला है ठलुओं को सम्मान जमूरे अब तो आंखें खोल। हुआ है प्रतिभा का अपमान जमूरे अब तो आंखें खोल।। पराई थाली में पकवान जमूरे अब तो आंखें खोल। हमारे हिस्से में… Read more »

उल्फत-ए-ज़िन्दगी

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-लक्ष्मी जायसवाल- क्यों मेरी ज़िन्दगी पर मेरा इख़्तियार नहीं है क्या इस पर अब मेरा कोई भी अधिकार नहीं है। ज़िन्दगी के खेल में कैसे मैं इतनी पिछड़ गई कि अपने ही सपनों से अब मैं फिर बिछड़ गई। संवरने लगी थी ज़िन्दगी मेरे नादां अरमानों से क्यों मैं इन्हें संभाल नहीं पायी वक़्त के… Read more »

कब से भटकता है सफीना

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-जावेद उस्मानी- साहिलों की जुस्तजू में, कब से भटकता है सफीना जाता है क़रीबे भंवर, कि कहीं नाख़ुदा तो मिल जाए स्याही से खींचते हैं कुछ लोग, सेहर की उम्मीद को उनको भी काश कभी कोई मशाले हुदा तो मिल जाए ढूढ़ते रहते हैं खुद को हर जा, कहीं हम हैं भी कि नहीं हैं… Read more »

मुझे समझ नहीं आता

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-आजाद दीपक- तुझसे क्या बातें करूं मुझे समझ नहीं आता, इश्क करूं या सवाल! मुझे समझ नहीं आता; मेरी कहानी जब लिखेगा वो ऊपर वाला, मिलन लिखेगा या जुदाई, मुझे समझ नहीं आता; सभी आशिकों के दिल पर इक नाम लिखा होता है, मेरे दिल पर क्या लिखा है, मुझे समझ नहीं आता; परिंदा होता… Read more »

चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है !

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चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है ! तुही बता ये जिन्दगी, जाना तुझे किस ओर है !!   हर तरफ़ से आवाजें, कोलाहल और शोर है ! कुछ समझ आता नहीं, मंजिल मेरी किस ओर है !!   सब के सब बेकल यन्हा, सबके सपनों का जोड़ है ! किसके सपने तोरुं… Read more »

जीवन मर्म

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पाषाण हृदय बनकर कुछ भी नहीं पाओगे । वक्त के पीछे तुम बस रोओगे पछताओगे ।। ये आस तभी तक है जब तक सांसें हैं। सांस के जाने पर क्या कर पाओगे ।। इन मन की लहरों को मन में न दबाना तुम । ग़र मन में उठा तूफां कैसे बच पाओगे ।। भार नहीं… Read more »

मेरे क़ातिल कोई और नहीं मेरे साथी निकले

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-बदरे आलम खां-    मेरे क़ातिल कोई और नहीं मेरे साथी निकले मेरे जनाजे के साथ बनकर वो बाराती  निकले रिश्तेदारों ने भी रिस्ता तोड़ दिया उस वक़्त जब दौलत  कि तिजोरी से मेरे हाथ खली निकले मेरे किस्मत ने ऐसे मुकाम पर लाकर छोड़ दिया ग़ैर तो गैर मेरे अपने साये भी सवाली निकले… Read more »

अब किसी बात का भी अंदाज़ नहीं होता

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अब किसी बात का भी अंदाज़ नहीं होता हर वक़्त एक सा तो मिज़ाज नहीं होता। हैरान होता है दरिया यह देख कर बहुत  क्यूँ आसमां ज़मीं से  नाराज़ नहीं होता। खिड़की खोल दी,उन की  तरफ़ की मैंने अब परदे वालों का  लिहाज़  नहीं  होता। गुज़रा हुआ हादसा फिर से याद आ गया अब काँटा… Read more »

तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती

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सत्येंद्र  गुप्ता तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती वक़त के हाथ की शमशीर नहीं बदलती। मैं ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी तलाशता रहा ज़िन्दगी , अपनी ज़ागीर नहीं बदलती। कितने ही पागल हो गये ज़ुनूने इश्क़ में मुहब्बत  अपनी तासीर  नहीं बदलती। प्यार ,वफ़ा,चाहत ,दोस्ती व  आशिक़ी इन किताबों की तक़रीर नहीं बदलती। अपनी खूबियाँ, मैं किस के  साथ बाटूं अपनों के ज़िगर की… Read more »