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दोहे / क्षेत्रपाल शर्मा

दोहे / क्षेत्रपाल शर्मा हाथ जेब भीतर रहे, कानों में है तेल नौ दिन ढाई कोस का वही पुराना खेल . छिपने की बातें सभी, छपने को तल्लीन सच मरियल सा हो गया झूट मंच आसीन. बचपन- पचपन सब हुए रद्दी और कबाड़, आध - अधूरे लोग हैं करते फ़िरें जुगाड़ . क्या नेता क्या यूनियन सबके तय हैं दाम, जीते ...

February 22nd, 2012 | लेखक : क्षेत्रपाल शर्मा | 3 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: दोहे

कांग्रेस- मनमोहन-सोनिया और अब राहुल-कुशल सचेती

कांग्रेस- मनमोहन-सोनिया और अब राहुल-कुशल सचेती कुशल सचेती कांग्रेस- मनमोहन-सोनिया और अब राहुल देख तेरे भारत की हालत क्या कर दी हे राम....! कांग्रेसासुरों की करतूतों का है ये परिणाम देख तेरे भारत....... गांधी बाबा के ये बंदे, रचते रहे नित नए फंदे, कितने ये मक्कार औ अंधे, इन धूर्तो के जाली धंधे, गांधी-नेहरू-गांधियों की मुग़ल सल्तनत देखी है ? वंशवाद का अज़ब तमाशा, ...

February 17th, 2012 | लेखक : कुशल सचेती | 29 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: famous poems, poem, Poems, कांग्रेस, मनमोहन-सोनिया, राहुल

कविता: बिल्ली का संदेश – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

कविता: बिल्ली का संदेश - प्रभुदयाल श्रीवास्तव एक दिवस बिल्ली रानी ने सब चूहों को बुलवाया ढीले ढाले उन चूहों को बड़े प्रेम से समझाया|   अपने संबोधन में बोली मरे मरे क्यों रहते हो इंसानों के जुर्म इस तरह क्यों सहते हो डरते हो।   गेहूं चावल दाल सरीखे टानिक घर में भरे पड़े क्यों जूठन चाटा करते हो खाते खाने गले सड़े।   प्रजातंत्र में नेता देखो कैसे लप लप खाते ...

February 14th, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 21 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता, साहित्‍य | Tags: famous poems, poem, Poem by Prabhudayal shrivastav, Poems, कविता, कवितायें, सर्वश्रेष्ठ कविता

कविता:छिंदवाड़ा की बात बड़ी है-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

कविता:छिंदवाड़ा की बात बड़ी है-प्रभुदयाल श्रीवास्तव छिंदवाड़ा की बात बड़ी है   टिक टिक चलती तेज घड़ी है छिंदवाड़ा की बात बड़ी है |   साफ और सुथरी सड़कें हैं गलियों में भी नहीं गंदगी यातायात व्यवस्थित नियमित नदियों जैसी बहे जिंदगी लोग यहां के निर्मल कोमल नहीं लड़ाई झगड़े होते हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई आपस में मिलजुलकर रहते रातें होती ठंडी ठंडी दिन में होती धूप कड़ी है छिंदवाड़ा की ...

February 13th, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 17 views | No Comments »
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कविता:मायाबी रावण बने सब आका-सुरेन्द्र अग्निहोत्री

कविता:मायाबी रावण बने सब आका-सुरेन्द्र अग्निहोत्री मायाबी रावण बने सब आका वोटों पर डालने को डाका   जमूड़े सबको पहचान लो ? पहचान लिया चारो तरफ घूम जा घूम लिया जो पूछँ वह बतलाऐगा हाँ बतलाऊँगा राजनीति का खेल निराला काले को सफेद कर डाला बन न पाया मुद्दा महँगाई आरपार की शुरू हुई लड़ाई लोकपाल को भूल रहे है लोग जनता को लग गया यह रोग गुटबंदी का खेल चल रहा अपना ...

February 13th, 2012 | लेखक : सुरेन्द्र अग्निहोत्री | 16 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: famous poems, poem, Poems, कविता, कवितायें, सर्वश्रेष्ठ कविता

कविता:यूपी में चुनावी जंग देखिये-विभोर गुप्ता

 कविता:यूपी में चुनावी जंग देखिये-विभोर गुप्ता  विभोर गुप्ता उत्तर प्रेदश में सियासी योद्धाओं की चुनावी जंग देखिये ऐसे-ऐसे दांव-पेंच कि अपनी-अपनी आँखें दंग देखिये "शाम की दवा" पूछने को "छोटे यादवजी" का ढंग देखिये गिरगिटों की तरह बदलते बागियों के बागी रंग देखिये घर-घर खाना खाने को "युवराज" के मन की उमंग देखिये निर्बलों से वोट मांगने को हाथ जोड़ते दबंग देखिये पापियों ...

February 12th, 2012 | लेखक : विभोर गुप्ता | 27 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: famous poems, poem by vibhor gupta, poem.poems, political poems, कविता, कवितायें, प्रसिद्ध कवितायें

कविता:योग्य उम्मीदवार की त‌लाश‌-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

कविता:योग्य उम्मीदवार की त‌लाश‌-प्रभुदयाल श्रीवास्तव योग्य उम्मीदवार की त‌लाश‌ पार्टी के सदस्य पदाधिकारी पशोपेश में थे कुछ पद के नशे में थे कुछ होश में थे संसदीय क्षेत्र के लिये जीतने वाले उम्मीदवार का चुनाव होना था कौन कितना ताकत्वर है कितना खर्च करेगा इस बात का भाव ताव तै होना था "घसीटालालजी ठुनठुना क्षेत्र के लिये सर्व श्रेष्ठ उम्मीदवार होंगें" पार्टी के महामंट्री ने जब दी सलाह तो पार्टी के ...

February 3rd, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 53 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता | Tags: famous poems, Hindi Poem, kavita, poem, poem by Prabhudayal Srivastav, कविता, कविताएं, श्रेष्ठ कविताएं, हिन्दी कविता

कविता ; हट धर्मिता – लक्ष्मी दत्त शर्मा

कविता ; हट धर्मिता - लक्ष्मी दत्त शर्मा हट धर्मिता, दब्बूपन व कायरता अहिंसा व सत्य सभी शस्त्र हैं गांधी के जिससे सुन्दर लगता हैं गुलाब के फूल की तरह कांटों में सजा गांधी गांधी का महात्मा वाला स्वरूप किसे पता है कि इसमें छिपी है पीड़ा, वेदना, सहनशीलता अहिंसा व सत्य की गहरी नींव मां ने की शुरू करवायी थी गांधी को महात्मा बनने की पहली पाठशाला पर मां तो मां है मां बनने पर ...

February 1st, 2012 | लेखक : लक्ष्मी दत्त शर्मा | 31 views | No Comments »
Posted in Category: कविता, साहित्‍य | Tags: Mahatma Gandhi, poem, कविता, हट धर्मिता

कविता ; बिटिया – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

कविता ; बिटिया  - प्रभुदयाल श्रीवास्तव इधर रोये बिटिया उधर रोये बिटिया पढ़ पढ़ के पा पा की प्यारी सी चिठिया| भईयों ने अपनी गृहस्थी सजा ली पापा से सबने ही दूरी बना ली अम्मा की तबियत हुई ढीली ढाली उन्हें अब डराती है हर रात काली सुबह शाम हाथों से खाना बनाना धोना है बरतन और झाड़ू लगाना जीने का बस एक ये ...

February 1st, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 52 views | 5 Comments »
Posted in Category: कविता, साहित्‍य | Tags: daughter, girls, बिटिया

कविता ; लेन देन – दीपक खेतरपाल

कविता ; लेन देन - दीपक खेतरपाल लगती थी साथ साथ सीमा गांव और शहर की पर दोनों थे अलग अलग हवा शहर की एक दिन कर सीमा पार पंहुच गई गांव में और छोड़ आई वहां आलस्य फरेब मक्कारी आंकाक्षाएं महत्वआंकाक्षाएं बदले में ले आई निश्छलता निष्कपटता निस्वार्थ व्यव्हार पर इस लेन देन के बाद गांव गांव न रहा और ठुकरा दिया शहर ने वो सब लाई थी जो शहर की हवा गांव से    

February 1st, 2012 | लेखक : दीपक खेतरपाल | 14 views | No Comments »
Posted in Category: कविता, साहित्‍य | Tags: city, poem, village, कविता, लेन देन

व्यंग्य कविता ; काम वालियां – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

व्यंग्य कविता ; काम वालियां - प्रभुदयाल श्रीवास्तव काम वालियां नहीं कामपर बर्तन वाली दो दिन से आई इसी बात पर पति देव पर‌ पत्नि चिल्लाई काम वालियां कभी समय पर अब न आ पातीं न ही ना आने का कारण‌ खुलकर बतलातीं बिना बाइयों के घर तो कूड़ाघर हो जाता बड़ी देर से कठिनाई से सूर्य निकल पाता छोटी बच्ची गिरी फिसल कर‌ सभटल नहीं पाई बिना बाई के कौन पतीली चाय भरी ...

January 30th, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 53 views | No Comments »
Posted in Category: कविता, व्यंग्य, साहित्‍य | Tags: poem, vyangya, काम वालियां, व्यंग्य कविता

विपिन किशोर सिन्हा की कविता : वसन्त

विपिन किशोर सिन्हा की कविता : वसन्त झीने कोहरे की साड़ी का अवगुंठन सूर्य उठाता था, पोर-पोर में मस्ती भर जब पवन जगाने आता था। आम्र-कुन्ज में बौरों पर, भौंरे संगीत सुनाते थे, पंचम स्वर में श्यामल कोयल के गीत उभरते जाते थे। रक्त-पुष्प झूमे पलाश, सम्मोहित करते दृष्टि को, रसभरे फूल महुआ के गिर, मदहोश बनाते सृष्टि को। फूली सरसों ने दिया ...

January 29th, 2012 | लेखक : विपिन किशोर सिन्हा | 21 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता | Tags: बसंत

कविता : “विद्या बालन के लिए गीतों को गाना चाहती हूँ” – कृष्णमूर्ति

कविता : “विद्या बालन के लिए गीतों को गाना चाहती हूँ” - कृष्णमूर्ति कविता कृष्णमूर्ति की आवाज में ऐसी कशिश है कि उसे सुन कर कोई भी उनकी आवाज का दीवाना बने हुए नही रह सकता. आज कल कविता फिल्मों में न के बराबर ही गा रही हैं. बहुत दिनों के बाद उनकी आवाज फिल्म “रॉक स्टार” के गीत “तुम हो पास मेरे” ...

January 28th, 2012 | लेखक : प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 25 views | No Comments »
Posted in Category: कविता, साहित्‍य | Tags: poem, Vidya Balan, कविता, विद्या बालन

कविता : अलविदा– विजय कुमार

कविता : अलविदा– विजय कुमार  सोचता हूँ जिन लम्हों को ; हमने एक दूसरे के नाम किया है शायद वही जिंदगी थी !   भले ही वो ख्यालों में हो , या फिर अनजान ख्वाबो में .. या यूँ ही कभी बातें करते हुए .. या फिर अपने अपने अक्स को ; एक दूजे में देखते हुए हो ....   पर कुछ पल जो तुने मेरे ...

January 27th, 2012 | लेखक : विजय कुमार सप्पाती | 24 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: famous poems, Hindi Poem, poems by Vijay kumar, कविता, कविताएं, विजय कुमार, विजय कुमार की कवितायें, श्रेष्ठ कविताएं, हिन्दी कविता

कविता : देह – विजय कुमार

कविता : देह – विजय कुमार देह के परिभाषा को सोचता हूँ ; मैं झुठला दूं !   देह की एक गंध , मन के ऊपर छायी हुई है !!   मन के ऊपर परत दर परत जमती जा रही है ; देह …. एक देह , फिर एक देह ; और फिर एक और देह !!!   देह की भाषा ने मन के मौन को कहीं जीवित ही म्रत्युदंड दे दिया ...

January 26th, 2012 | लेखक : विजय कुमार सप्पाती | 37 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: famous poems, Hindi Poem, poems by Vijay kumar, कविता, कविताएं, विजय कुमार, विजय कुमार की कवितायें, श्रेष्ठ कविताएं, हिन्दी कविता

कविता : मेरा होना और न होना – विजय कुमार

कविता : मेरा होना और न होना  – विजय कुमार   मेरा होना और न होना ....       उन्मादित एकांत के विराट क्षण ; जब बिना रुके दस्तक देते है .. आत्मा के निर्मोही द्वार पर ... तो भीतर बैठा हुआ वह परमपूज्य परमेश्वर अपने खोलता है नेत्र !!! तब धरा के विषाद और वैराग्य से ही जन्मता है समाधि का पतितपावन सूत्र ....!!! प्रभु का पुण्य आशीर्वाद ...

January 25th, 2012 | लेखक : विजय कुमार सप्पाती | 24 views | No Comments »
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कविता:जोगन-विजय कुमार

कविता:जोगन-विजय कुमार मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !! मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !   तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे ! मैं ...

January 24th, 2012 | लेखक : विजय कुमार सप्पाती | 23 views | 1 Comment »
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कविता:एक स्त्री जो हूँ-विजय कुमार

कविता:एक स्त्री जो हूँ-विजय कुमार स्त्री – एक अपरिचिता   मैं हर रात ; तुम्हारे कमरे में आने से पहले सिहरती हूँ कि तुम्हारा वही डरावना प्रश्न ; मुझे अपनी सम्पूर्ण दुष्टता से निहारेंगा और पूछेंगा मेरे शरीर से , “ आज नया क्या है ? ”   कई युगों से पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ भोग्या ही रही मैं जन्मो से ,तुम्हारे लिए सिर्फ शरीर ...

January 23rd, 2012 | लेखक : विजय कुमार सप्पाती | 28 views | No Comments »
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ममता त्रिपाठी की कविता : सृष्टि

ममता त्रिपाठी की कविता : सृष्टि   धन्य है तिमिर का अस्तित्व दीपशिखा अमर कर गया । धन्य है करुणाकलित मन हर हृदय में घर कर गया । ज्योति ज्तोतिर्मय तभी तक जब तक तिमिर तिरोहित नहीं । जगति का लावण्य तब तक जब तक नियन्ता मोहित नहीं । पंच कंचुक विस्तीर्ण जब तक तब तक सृष्टि प्रपञ्च साकार । बालुकाभित्ति सी ढह जायेगी जैसे होगा उसका विस्तार ...

January 22nd, 2012 | लेखक : ममता त्रिपाठी | 107 views | 3 Comments »
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कविता:तुम्हारा आना-विजय कुमार

कविता:तुम्हारा आना-विजय कुमार कल खलाओं से एक सदा आई कि , तुम आ रही हो... सुबह उस समय , जब जहांवाले , नींद की आगोश में हो; और सिर्फ़ मोहब्बत जाग रही हो.. मुझे बड़ी खुशी हुई ... कई सदियाँ बीत चुकी थी ,तुम्हे देखे हुए !!!   मैंने आज सुबह जब घर से बाहर कदम रखा, तो देखा .... चारो ओर एक ...

January 22nd, 2012 | लेखक : विजय कुमार सप्पाती | 1 views | No Comments »
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