लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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Raman_143185823डॉ. मयंक चतुर्वेदी

 

विकास, विकास और विकास देश में आज यह तस्वीर बनी है छत्तीसगढ़ राज्य की।

एक छोटा प्रदेश कम संसाधन और क्षेत्रफल के बावजूद कैसे तरक्की पर तरक्की

कर सकता है, इस प्रदेश के मामले में यह राज अब किसी से छिपा नहीं है।

भारत में विकास के लिए जब राज्य पुनर्गठन आयोग ने छोटे राज्यों की कल्पना

प्रस्तुत की, उस समय अधिकांश लोगों को छोटे राज्यों के सफल भविष्य को

लेकर संदेह था । छोटे राज्यों का सबसे बड़ा संकट था कम संसाधन, जागृति की

कमी, शिक्षा का अभाव और ढंचागत सुविधाएँ नहीं के बराबर होना।

भाषा, क्षेत्र, जातीय, सांस्कृतिक तथा लगातार की उपेक्षा से देश में जब

छोटे राज्यों के निर्माण की मांग तीव्र हुई तब इस आंदोलन से जुड़े लोगों

को लगता था कि नया राज्य बनते ही उनकी सारी समस्याओं का खात्मा हो जाएगा।

परिणामस्वरूप देश के नक्शे पर कई नए राज्य भी उभर कर आए। फिर भी

समस्याओं का समाधान नहीं हो सका, वह जस की तस हैं।

आज भी देश में अन्य छोटे राज्यों की मांग बदस्तूर जारी है, इस आशा के साथ

कि कभी तो भोर होगी, अपना सूरज और अपना आसमां होगा। लेकिन इसका दूसरा

पहलु उतना ही कड़वा है, आजादी के बाद से लेकर अभी तक कई छोटे राज्य बने

पर आत्मनिर्भरता की दिशा में अधिकांश छोटे प्रदेश कमजोर निकले । इसके

पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव को दोषी माना गया। वहीं इन प्रदेशों का

नैतृत्व अनेक अवसरों पर सही और तुरंत निर्णय लेने के मामले में फिसड्डी

साबित हुआ है।

 

ऐसा नहीं है कि छोटे राज्य के रूप में अपनी पारी शुरू करने वाले

छत्तीसगढ़ के सामने कोई चुनौति न आई हों। सुविधा सम्पन्न होने, शिक्षा का

विकास, ढांचागत सुविधाओं का निर्माण और निरंतर विकास करते हुए आगे बढ़ते

रहने की चुनौतियाँ छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद इस प्रदेश के सामने भी खड़ी

थीं।

 

1 नवंबर 2000 में जब यह प्रदेश अस्तित्व में आया, उस समय तात्कालीन

कांग्रेस सरकार के लिए करने को बहुत कुछ था, लेकिन कुछ ही दिनों में खनिज

संपदा और प्राकृतिक संसाधनों से भरापूरा यह राज्य उन लोगों की चारागाह बन

गया, जिन्हें इस प्रदेश से ज्यादा अपने विकास की चिंता थी। जोगी सरकार ने

ऐसे प्रयोग किए कि देशभर में कांग्रेस सरकार की आलोचना होने लगी।

छत्तीसगढ़ का जनमत कांग्रेस से छिटक गया।

अब यहाँ कि भोली-भाली वनवासी वाहुल्य जनता के सामने दो ही विकल्प थे या

तो फिर आदिवासी नेता के नाम पर जोगी को दोबारा मौका दें और अपना शोषण

बदस्तूर कराते रहें अथवा प्रदेश में सरकार बनाने का एक अवसर भारतीय जनता

पार्टी को दें । अपने नए प्रदेश के विकास की चाह रखने वाले यहां के

निवासियों ने सोच लिया था कि जो विधानसभा चुनावों में विजन छत्तीसगढ़

रखेगा और संपूर्ण विकास की बात करेगा हमारा वोट उसे ही जाएगा।

 

विकास के मुद्दे पर यह युद्ध आर पार है अंतिम ये प्रहार है कि स्थिति इस

छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ में बनी। कमल खिला, केवल खिला ही नहीं तो वह

अपने साथ सुन्दरता और रमनीयता को लेकर भी आया। छत्तीसगढ़ की जनता को लगा

रात कितनी भी घनी क्यों न हो आखिर उसे जाना ही पड़ा । नई सुबह और नई

आशाओं के द्वार अब खुलना शेष था इस घोषणा के साथ की प्रदेश का नया

मुख्यमंत्री कौन होगा?

 

मैदान में एक से एक सूरमा थे, कई विकल्पों के बीच भाजपा को मुख्यमंत्री

के रूप में किसी एक को चुनना था, वह भी ऐसा व्यक्ति जो केवल पार्टी में

सभी को साथ लेकर चलने में दक्ष न हो बल्कि इसके साथ राज्य के चहुंमुखी

विकास पर ध्यान रखने में सक्षम हो। भाजपा को रमन सिंह में वे सभी गुण

दिखे जो चुनौतियों से भरे छत्तीसगढ़ को नए कलेवर के साथ गढऩेवाले में

चाहिए थे। भरोसा उन पर इसलिए भी करना लाजमी समझा गया, क्यों कि उनके

नैतृत्व में ही भाजपा को चुनावी मैदान में सफलता मिली और कांग्रेस के सभी

मैनेजमेंट धरे के धरे रह गए थे।

 

वर्ष 2003 कांग्रेेस का सफाया-रमन की ताशपोशी

राज्य विधानसभा के प्रथम आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश

अध्यक्ष के रूप में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पार्टी को भारी बहुमत से

सरकार बनाने का अवसर मिला। उम्मीद से ज्यादा विस सीटे मिलने पर भाजपा का

केंद्रीय नैतृत्व भी आश्चर्य चकित था, उसे यह बात अचम्भित करती थी कि

आखिर आशा के बढक़र मिली सफलता के पीछे कितना श्रम और प्रयत्न होगा। उनका

रमन सिंह पर भरोसा करना कितना सही निर्णय था यह सोचकर ही भाजपा के

खेवनहार गद्-गद् थे। सभी ने सामुहिक मंत्रणाकर छत्तीसगढ़ के पहले

निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में रमन सिंह का नाम तय किया।

 

वह अवसर भी जल्द आ गया जिस दिन बतौर मुख्यमंत्री रमन सिंह को गौपनीयता की

शपथ लेना थी। 07 दिसम्बर 2003 को राजधानी रायपुर के पुलिस परेड मैदान में

आम जनता के बीच शपथ लेकर रमन सिंह ने इस राज्य के पहले निर्वाचित

मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की बागडोर सम्हाली। मुख्यमंत्री बनने के

बाद फिर पाँच साल तक असल जिंदगी में डाक्टर इस जननेता ने यह नहीं देखा कि

सुबह कब होती है और शाम कब। सिर्फ काम ही इनके जीवन का आधार बन गया। जो

लक्ष्य सामने था वह था बिमारु छत्तीसगढ़ की सर्जरी करना। उसे निम्नपायदान

से ऊपर की और विकास की गति देकर देश के विकसित राज्यों की श्रेणी में ला

खड़ा करना। नक्सलवाद जैसी समस्याओं से संघर्ष करना।

 

प्रदेश की बहुसंख्यक वनवासी जनता का ख्याल रख अपने पाँच साल के शासन के

दौरान रमन सिंह ने इतनी अधिक विकास योजनाओं पर कार्य किया कि जनता की वह

आम पसंद बन गए। इसी आम पसंद और सहमती ने उन्हें विधानसभा के दूसरे चुनाव

में 12 दिसम्बर 2008 को रायपुर के उसी पुलिस परेड मैदान में एक बार फिर

प्रदेश के निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में जनता की सेवा करने का अवसर

प्रदान किया।

 

सामान्य पारिवार से डाक्टरी तक

सामान्य परिवार में जन्म लेकर हर होनहार बच्चे की तरह पिता की आज्ञा

मानकर चलने वाले एक आदर्श बेेटे के समान रमन सिंह ने भी छात्र जीवन में

यह न सोचा होगा कि कभी उनको किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का अवसर

मिलेगा। वह जो विकास के लिए प्रशासन और व्यवस्थाओं की कल्पना करते हैं,

एक समय उसकी सभी बागडोर उनके हाथ में आ जाएंगी और वे अपने सपनों के

प्रदेश को गढ़ पाएंगे।

 

रायपुर के शासकीय आयुर्वेदिक चिकित्सा महाविद्यालय से बी.ए.एम.एस. की

उपाधि लेकर रमन सिंह गरीबों की सेवा करने के अपने सपने को साकार करने

लगे। बिना लालच सेवा का यह फल हुआ कि उनकी चर्चाएं कम समय में चारो तरफ

फैल गईं। रमन ने अपने कवर्धा के ठाकुरपारा में निजी चिकित्सक के रूप में

प्रैक्टिस करते हुए गरीबों का जो मुफ्त इलाज किया उससे गरीबों के डॉक्टर

के रूप में उन्हें लोकप्रियता के साथ एक अलग पहचान मिली।

राजनीतिक जीवन की नई पारी की शुरूआत

क्षेत्र की जनता उनमें अपना भगवान खोजने लगी। जनता को लगता था कि हमारी

गरीबी, पिछड़ेपन, अशिक्षा और कमजोरी जैसी सभी बिमारियों का इलाज डॉक्टर

साहब के पास है। लोकतंत्र का महत्व भी देश के विकास के साथ यहां की जनता

समझने लगी थी । सभी ने रमन सिंह से राजनीति में सक्रिय होने का आग्रह

किया।

वह पल विलक्षण होंगे जब जनता का यह निवेदन उनके पास आया होगा और जनसेवा

की भावना से भरे डॉ. रमन सिंह ने इसे अपना भाग्य मानकर स्वीकार्य कर

लिया। यहीं से इस चिकित्सक का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। 1976-77 से जो यह

चला तो आज तक चल रहा है।

 

सबसे पहले वे भारतीय जनता युवा मोर्चा, कवर्धा के पहले अध्यक्ष निर्वाचित

हुए। इसके बाद जनता के बीच अपने लिए वोट मांगने पहली बार 1983-84 में

शीतला वार्ड से कवर्धा नगरपालिका के चुनावों के दौरान पार्षद प्रत्याशी

के रूप में पहुँचे। जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताकर अपना प्रतिनिधि

चुना। इसके बाद क्षेत्र की जनता ने उन्हें विधानसभा में भेजा।

 

1990-92 और वर्ष 1993-98 तक वे तत्कालीन मध्यप्रदेश विधानसभा में भारतीय

जनता पार्टी के विधायक रहे। इस दौरान उन्होंने विधानसभा की लोक-लेखा

समिति के सदस्य और विधानसभा की पत्रिका विधायिनी के संपादक के रूप में भी

अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

अब जनता उन्हें सिर्फ विधायक के रूप में देखना नहीं चाहती थी। लोक

सरोकारों से जुड़े डॉ. रमन सिंह की एक नई पारी इंतजार कर रही थी। जनता ने

उन्हें अपने विकास की आवाज बनाकर 1999 के लोकसभा चुनाव में राजनांदगांव

क्षेत्र से भेज दिया। यह डॉ. साहब की प्रतिभा और लोकप्रियता ही थी जिसे

देखकर तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें केन्द्रीय

मंत्रिमंडल में शामिल कर वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री बनाया। सभी को

पता है कि डॉ. सिंह ने इस विभाग में केन्द्रीय राज्यमंत्री के रूप में

अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया था।

 

छ.ग. में भाजपा सरकार लाने के लिए रमन का त्याग

मंत्री का सुख क्या होता है ? यह उनसे पूछा जाए जो कभी मंत्री रह चुके

हैं, वे बेहतर बता सकते हैं। जिस पर कि स्वयं रमन सिंंह केन्द्रीय

मंत्रीमंडल के सदस्य थे। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद डॉक्टर साहब की कुशल

संगठन क्षमता को ध्यान में रखकर जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें

छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नियुक्त करने का मन

बनाया तो पार्टी के निर्णय को अपनी सहमति मानी। डॉ. सिंह ने केन्द्रीय

वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री के पद से बिना ये सोचे कि आगे कभी मंत्री

बनने का अवसर मिला भी या नहीं, अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने

प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल ली, और कांग्रेस के कुशासन व जोगी

राज से प्रदेश को मुक्त करने के लिए मानो वे जी-जान से जुट गए हों।

 

उनकी मेहनत और संकल्प का परिणाम यह हुआ कि 01 दिसम्बर 2003 को हुए

छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा के प्रथम आम चुनाव में पार्टी ने भारी बहुमत से

सरकार बनाने का जनादेश प्राप्त किया । 05 दिसम्बर 2003 को रायपुर में

आयोजित अपनी पार्टी की आहूत बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से विधायक दल का

नेता चुन लिया गया।

यह डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व का ही कमाल था कि भाजपा को यहां फिर पीछे

मुडक़र नहीं देखना पड़ा। छत्तीसगढ़ में लोकसभा, नगरीय निकाय, त्रिस्तरीय

पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव में भाजपा को भारी सफलता मिलने का जो दौर

शुरू हुआ वो आज भी जारी है।

 

एक मुख्यमंत्री के रूप में रमन की पारी

मुख्यमंत्री के रूप में अपने पांच वर्ष के प्रथम कार्यकाल में डॉ. रमन

सिंह ने राज्य में अनेक जन-कल्याणकारी योजनाएं शुरू की। जरूरतमंद तबकों

तक सीधी पहुंच की कारगर सोच के कारण उनके शासन में बनी अभिनव योजनाओं को

प्रखर सफलता मिली। वर्ष 2005 में कई अखबारों समाचार पत्रिकाओं और खबरिया

चैनलों ने अपने सर्वे रिपोर्टों के जरिए श्री सिंह को देश का

सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री घोषित किया गया।

 

राष्ट्रीय स्तर पर काम का आंकलन और रमन को सलाम

आखिर इस राजनेता की समाजसेवा की धुन ने देश में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर

दी कि राजनीति में समाजसेवा के मायने क्या हो सकते हैं को लेकर देशभर में

बहस छिड़ गई। जनतंत्र का अर्थ सत्ता के शीर्ष पर पहुँचकर व्यक्तिगत लाभ

कभी नहीं हो सकता, यह तो सेवा का माध्यमभर है यह बात अब रमन सिंह के

कार्य व्यवहार और शैली से सभी को समझमें आने लगा था। रमन की राजनीतिक

कुशलता और संकल्प शक्ति से पिछड़ा छत्तीसगढ़ देश के नक्शे पर तेजी से

विकसित होते राज्यों की श्रेणी में शीर्ष पर पहुँचने लगा।

 

देश की अनेक नामी संस्थाओं ने रमन के काम को आंकलन शुरू कर दिया था

तकनीकी संस्थान (एम.आई.टी.) द्वारा पुणे में तीन फरवरी 2008 को आयोजित

समारोह में डॉ. रमन सिंह को भारत अस्मिता श्रेष्ठ जनप्रतिनिधि एवार्ड

2008 के अलंकरण से सम्मानित किया गया। तात्कालीन सर्वोच्च न्यायालय के

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.जी.बालकृष्णन के हाथों डॉ. रमन सिंह को

यह प्रतिष्ठित लाईफ टाईम एचिव्हमेंट एवार्ड मिला। भारतीय लोकतंत्र के

विकास और प्रजातंत्र को सुदृढ़ बनाने में उनके योगदान के लिए उन्हें यह

गौरवपूर्ण सम्मान मिलते समय भी डॉ. रमन ने हमेशा की तरह अपनी चिरपरिचित

शैली में इसका श्रेय अपने काम को न देकर भाजपा कार्यकर्ताओं की अथाह

मेहनत और छत्तीसगढ़ की जनता को दिया।

 

केंद्र ने माना रमन के कार्य का लोहा

केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों व कांग्रेस के कई मंत्रियों को भी

डॉ. रमन सिंह के कुशल नैतृत्व का लोहा मानना पड़ा। उन्होंने भी रमन के

सुशासन की सराहना समय-समय पर की। अपने प्रदेश के लिए विकास की हर संभव

संभावना को तलाशने में यह डाक्टर कभी पीछे नहीं रहा। राज्य के स्वास्थ्य

को हानि पहुँचाने वाली हर नब्ज पर नजर रखने के कारण डॉ. रमन सिंह राजनीति

क्षेत्र में भी कुशल चिकित्सक साबित हुए हैं।

 

छ.ग. की सेहत सुधारने के लिए वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में

विदेशों में जाकर इंन्वेस्टर्स को आमंत्रित करने में कोई गुरेज महसूस

नहीं करते। ब्रिटेन, फ्रांस तथा स्विट्जरलैण्ड प्रवास कर निवेशकों एवं

भारतवंशियों से भेंट कर उन्हें छत्तीसगढ़ में निवेश करने के लिए आमंत्रित

कर भविष्य में शक्तिशाली और खुशहाल प्रदेश बनाने की दिशा में वे प्रयत्न

करते दिखाई देते हैं।

 

यही कारण है कि उनकी प्रेरणा से बनाई गई नई आकर्षक उद्योग नीति को देश

के व्यापारिक जगत के अलावा विश्व स्तर पर सराहा गया। पिछले वर्षों में

छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक औद्योगिक निवेश हुआ और जो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

द्वारा जारी बुलेटिन में विभिन्न राज्यों के तुलनात्मक निवेश के आंकड़ों

में छत्तीसगढ़ को सर्वप्रथम बताया गया। निश्चित ही वह रमन के करिश्माई

व्यक्तित्व का कमाल है।

 

 

गुणवत्ता और काम पर फोकस

मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन ने सबसे ज्यादा जिस बात पर अपना ध्यान

दिया वह है काम की गुणवत्ता और योजनाओं के व्यवहारिक पक्ष पर। योजनाएँ

एसी कक्षों से निकलकर खेत-खलियानों और मेड़ों तक पहुँच गईं। एक के बाद एक

उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण और अभिनव योजनाएं छत्तीसगढ़ में अनुसूचित

जाति-जनजाति तथा पिछड़े वर्गों के उत्थान के साथ ग्रामीणों और किसानों की

बेहतरी के लिए प्रारंभ की। जिनमें लगभग 36 लाख गरीब परिवारों के लिए तीन

रूपए किलो चावल वितरण की मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना, 25 पैसे

किलो में नमक वितरण योजना, लगभग नौ लाख गरीब परिवारों के लिए नि: शुल्क

एकलबत्ती कनेक्शन, एक लाख से अधिक किसानों को सिंचाई पम्प कनेक्शन,

सहकारी समितियों के माध्यम से प्रदेश के किसानों को सिर्फ तीन प्रतिशत

ब्याज पर कृषि ऋ ण सुविधा, तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए बिना शुल्क चरण

पादुका वितरण, लाखों स्कूली बच्चों को शुल्क रहित पाठ्य पुस्तक वितरण

जैसी अनेक योजनाओं का यहां जिक्र किया जा सकता है।

 

बड़े कार्य और बड़ी सफलता

डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व के पहले पांच वर्ष के कार्यकाल में जहां

छत्तीसगढ़ को देश के प्रथम विद्युत कटौती मुक्त राज्य के रूप में देशभर

में एक नयी पहचान मिली, वहीं उन्होंने छत्तीसगढ़ की आम जनता की बोलचाल की

भाषा छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाया। यहां के जिस बहुसंख्यक

वनवासी समुदाय को अपनी बोली को राष्ट्रीय पहचान दिलाए जाने की आस वर्षों

से थी वास्तव में उसकी सही पहचान रमन सरकार के आने के बाद ही हकीकत में

बदल सकी।

 

राजधानी रायपुर के नजदीक एक विशाल अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का

निर्माण डॉ. रमन सिंह के प्रथम कार्यकाल में हुआ। उन्होंने शासकीय

कर्मचारियों को केन्द्र के समान छठवां वेतन मान स्वीकृत किया और हजारों

दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नियमितिकरण के जरिए नौकरी में एक सुरक्षा

की भावना प्रदान की। ग्राम सुराज अभियान के माध्यम से राज्य के दूर-दराज

गावों तक जनता के बीच अचानक पहुंच कर लोगों के दुख-दर्द को जानने, समझने

और यथासंभव तुरंत हल करने की उनकी अनोखी शैली के कारण छत्तीसगढ़ी जनता आज

उन्हें मानवीयता के स्तर पर अपने सबसे अधिक निकट पाती है।

 

दूसरी पारी-महत्वपूर्ण काम

डॉ. रमन सिंह ने अपने नेतृत्व की दूसरी पारी में सर्वाधिक गरीब,

अन्त्योदय राशन कार्ड धारक परिवारों को सिर्फ एक रूपए किलो में और बाकी

सभी गरीबों को दो रूपए किलो में चावल उपलब्ध कराने तथा किसानों को ब्याज

मुक्त कृषि ऋ ण सुविधा प्रदान करने जैसे राज्य के हित में अनेक लोक

हितकारी कदम उठाएं हैं।

भाजपा के जिस राजनीतिक घोषणा पत्र को वे जनता के पास ले गए मुख्यमंत्री

बनने के अपने दूसरे कार्यकाल में उन जन-कल्याणकारी घोषणाओं और घोषणा पत्र

के सभी वायदों को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ वे पूरा करने में सफल रहे

हैं।

 

छत्तीसगढ़ को देश के एक आदर्श और खुशहाल राज्य के रूप में विकसित करना ही

उनका एक प्रमुख लक्ष्य है। जिसकी पूर्ति के लिए यह राजनेता अनवरत चल रहा

है। छत्तीसगढ़ में विकास के अभी अनेक काम होने हैं। यहां नक्सलवाद एक

बड़ी चुनौति है, जिससे आज देश के कई राज्य जूझ रहे हैं। छत्तीसगढ़ को

इससे मुक्त करने के लिए रमन सिंह ने केंद्र सरकार के सामने कई उपाय बताए

हैं लेकिन जो सहयोग उन्हें केंद्र सरकार से चाहिए वह अभी तक नहीं मिल सका

है। परिणाम स्वरूप यहाँ आए दिन नक्सली घटनाएं होती रहती हैं। डॉक्टर रमन

अपने राज्य के सीमित संसाधनों के साथ आज संगठित नक्सलियों से संघर्ष कर

रहे हैं। ऐसे और भी मुद्दे हैं, जिनसे राजनीति का यह कर्मयोगी रोज जूझता

है।

विकास के स्तर पर छोटे राज्यों के लिए आदर्श बने इस प्रदेश को अभी विकसित

कहलाने के लिए अभी बहुत-कुछ करना शेष है। कई योजनाएँ, संकल्प और कार्य

हैं जिन्हें पूरा करने का मादा इस परंपरागत उपचार के चिकित्सक डॉ. रमन

सिंह के पास मौजूद है। आज डाक्टर साहब छ.ग. में विकास का पर्याय हैं।

विकास के अपने सपने को पूरा करने के लिए अभी उन्हें और अवसर दिया जाना

चाहिए। डॉ. रमन सिंह जिस कुशलता और समर्पण के साथ यहां जनतंत्र की सेवा

में लगे हैं, उसे देखकर यही कहना होगा कि छत्तीसगढ़ के विकास के लिए फिर

रमन चाहिए ।

 

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1 Comment on "छत्तीसगढ़ को फिर चाहिए रमन"

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DR.S.H.SHARMA
Guest

This is an excellent article and we should work hard for DR.RAMAN ‘S victory by telling them of his work and future plans.

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