लेखक परिचय

अनिल द्विवेदी

अनिल द्विवेदी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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bjp-leader-dharam-lal-kaushikआपका समय शुरू होता है अब

तमाम अटकलें और पार्टीगत समीकरणों को ध्वस्त करते हुए धरमलाल कौशिक के हाथों में प्रदेश भाजपा की कमान चौबारा सौंप दी गई। स्पष्ट है कि कौशिक मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के ऐसे सारथी के तौर पर चुने गए हैं जिन्हें 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की नैया पार लगानी होगी। दरअसल अपने पहले कार्यकाल में प्रदेश अध्यक्ष धरम लाल कौशिक ने जिस तरह सरकार और संगठन को साधा तथा कई मोर्चों पर मुख्यमंत्री के लिए कवच बनकर खड़े हुए, उसी का प्रतिफल रहा कि रमन सिंह ने दुबारा उन्हें अपना सारथी चुना।

चौबारा भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनकर इतिहास रचने वाले धरम लाल कौशिक ने जिस साहस का परिचय दिया है, उसमें वे खुद अगिनपरीक्षा के दौर से गुजरेंगे। सवालों के गुच्छे दर्शा रहे हैं कि कौशिक की असली परीक्षा शुरू हो चुकी है। उन्हें जहां संगठन को मथना है, वहीं कार्यकर्ताओं में भरोसा जगाते हुए वह ऊर्जा भी पैदा करनी है जिसकी बदौलत पार्टी चौथी बार सत्ता में आने का ख्वाब पूरा कर सके। उन्हें खुद की ताकत का अहसास कराना है तो ताकत देना भी है।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के लिए जिन नामों की चर्चा थी, उसमें कौशिक सबसे अंतिम में थे। कई दिनों तक पार्टी इस मूड में रही कि नया अध्यक्ष आदिवासी या सतनामी खेमे से दिया जाए। दिल्ली में सक्रिय पार्टी के बड़े नेताओं का एक खेमा नंद कुमार साय या फिर सतनामी नेता जांगड़े को प्रदेश अध्यक्ष बनता देखना चाहता था। दरअसल पार्टी इन दोनों ही वोट बैंकों पर मजबूत पकड़ बनाए रखना चाहती है, मगर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हस्तक्षेप ने कौशिक की किस्मत जगा दी। बावजूद इसके आदिवासी खेमे को यह नियुक्ति रास नहीं आई है। इसके संकेत भाजपा के राष्ट्रीय सचिव रामविचार नेताम ने कौशिक की ताजपोशी के दौरान ही अपनी व्यंगात्मक-नाराजगी जाहिर कर दे दिए थे।

बिला शक कहा जा सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष कौशिक का होमवर्क और मैनरिज्म काफी बेहतर होता है। ज्यादा सुनना और कम बोलना जैसी फितरत उन्हें डॉ. रमन सिंह के समकक्ष खड़ा कर देती है। वे मृदुभाषी और जमीन ना छोडऩे वाले नेता हैं लेकिन अंदर से उस दहकते अंगारे की तरह हैं जिसके ऊपर सफेद राख पड़ी रहती है। गुजरे नगरीय निकाय चुनाव में जब पार्टी की प्रतिष्ठा दाँव पर थी तो एक वरिष्ठ मंत्री को कौशिक यह चेताना नही भूले कि पार्टी से ज्यादा आपकी साख दाँव पर है। इसका असर यह हुआ कि हारती हुई सीट पार्टी दो हजार वोटों से जीत गई थी।

यहां ठहरकर यह कहना गलत नही होगा कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती दुर्ग जिला है। पिछले कुछ सालों से पार्टी का यह अभेद्य किला ढहता जा रहा है। मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय, पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव सरोज पाण्डेय तथा पूर्व मंत्री हेमचंद यादव की आपसी प्रतिद्वंद्विता ने दल को कई बार नीचा देखने को विवश किया है। गुजरे नगरीय निकाय चुनाव में जिस तरह महापौर पद दुबारा कांग्रेस के हाथों गंवाया, उसके बाद पाण्डेद्वय को पार्टी आलाकमान के समक्ष चेहरा दिखाना दूभर हो गया है।

कौशिक का गृह जिला बिलासपुर में भी गुटबाजी रूपी चीन की दीवारें खड़ी हैं जिन्हें ध्वस्त करना नये प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुनौती होगा। यहां पर कौशिक एक तीर से दो निशान करना चाहेंगे। एक तो जूदेव परिवार तथा अमर अग्रवाल के बढ़ते कद को बांधकर रखना होगा वहीं दूसरी ओर वे खुद अपने कद को इस कदर बढ़ाना चाहेंगे कि पार्टी की नजर में उनके अलावा कोई ठहरे ही नहीं। हालांकि पहले विधानसभा अध्यक्ष और फिर पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के कार्यकाल में धरम लाल कौशिक ने अपनी योगयता साबित कर भाजपा आलाकमान को विश्वास में ले लिया है।

मोहने योग्य नफासत समेटे कौशिक राजधानी रायपुर में पार्टी ने जिस तरह महापौर चुनाव में मुसलसल शिकस्त खाई, उसने भाजपा की इस आशंका पर मुहर लगाई है कि पार्टी का जनाधार शहरी इलाकों से सिकुड़ता जा रहा है इसलिए कौशिक को इसे विस्तार देना होगा साथ ही आदिवासी इलाकों में जमी भाजपा की पैठ बनी रही, इसके भी प्रयास करने होंगे।

रफता-रफता ही सही, प्रदेश अध्यक्ष धरम लाल कौशिक ने अपनी विशेष टीम भी बनाई है। छोटे जूदेव से लेकर भूपेन्द्र सवन्नी जैसे आधा दर्जन चेहरों को लालबत्ती से नवाजा है। इनमें से दो चेहरे ऐसे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री ना तो मंत्री बनाने के इच्छुक थे और ना ही कोई निगम-मण्डल पकड़ाना चाहते थे लेकिन ऐनवक्त पर कौशिक के प्रभावी हस्तक्षेप ने इन नेताओं का बेड़ापार करवा ही दिया। बाकी दो को भी प्रदेश भाजपा के मुखिया का आर्शीवाद मिला है।

इस पूरी कहानी का लब्बोलुआब यही है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक, संगठन और सरकार में एक ऐसे शिखर पुरूष के तौर पर उभरे हैं जो उदार आईने में फिट हैं तथा पार्टी के लिए विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं। थोड़ा साफ करेंं तो उनके समर्थक उनमें मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी नजर पाते हैं। हालांकि अपनी अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ कौशिक इसे महज मीडिया का आंकलन करार देते हैं लेकिन सच यह है कि भविष्य में यदि मुख्यमंत्री पद के विकल्पों की तलाश पार्टी करती है तो जातीय समीकरण के हिसाब से कौशिक इस पर फिट बैठते हैं। वैसे उनके समक्ष रमेश बैस, सरोज पाण्डे, नंद कुमार साय, रामविचार नेताम, केदार कश्यप और बृजमोहन अग्रवाल जैसे वरिष्ठ विश्वसनीय चेहरे को पछाडऩा बड़ी चुनौती होगी जो तीव्र और लपलपाती इच्छा के साथ मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं।

अनिल द्विवेदी

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