लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा कुलदीप चंद अग्निहोत्री

भारत सरकार चीन से संबंध सुधारने का हर संभव प्रयास कर रही है । संबंध सुधारने के जल्दी में वह किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है। पिछले दिनों चीन की सेना ने लदाख प्रांत में हो रहे एक निर्माण कार्य को बलपूर्वक रुकवा दिया । लेह के जिलाधिकारी ने मीडिया को इसका ब्योरा देते हुए यह भी बताया कि इसके विस्तृत जानकारी केन्द्र सरकार को दे दी गई है । लेकिन केन्द्र सरकार का रबैया पहले तो चीनी सेना की घुसपैठ को नकारने का ही था, बाद में उसने अपने सेनाध्यक्ष के माध्यम से बयान दिलवाया कि लदाख में भारत और तिब्बत ( जो अब चीन के कब्जे में है) की सीमा पर बनी वास्तविक नियंत्रण रेखा कागज के नक्शे पर खींची गई है जो बहुत आसान काम है। लेकिन पर्वतीय धरातल पर उसकी पहचान करना अत्यंत कठिन काम है । अतः यह पर्पेश्पन का मामला है जिसके कारण चीनी सेना भारतीय सीमा में आ जाती है । इसका कारण यह है कि इस पर्सप्रेशन के कारण चीनी सेना उसे चीन का क्षेत्र ही समझती है । दिल्ली के साउथ ब्लाक में इन दिनों यह चुटकुला प्रचलित हो गया है कि भारत सरकार लदाख में हुई घटना पर सख्त रबैया अख्तियार कर रही है और हो सकता है लेह के जिलाधिकारी पर कार्रवाई की जाए । कारण, उसने चीनी सेना की घुसपैठ की खबर मीडिया को देकर लोगों को भयभीत करने का देशविरोधी कार्य किया है । भारत सरकार की मानसिकता को लेकर दो संकेत स्पष्ट हैं । नक्शे पर वास्तविक नियंत्रण रेखा खिंचने का आसान काम भारत सरकार ने ले लिया है और उसे धरातल पर खिंचने के कठिन काम चीन को दे दिया है । लेह के जिलाधिकारी को दंड़ित करने का आसान काम भारत सरकार ने ले लिया है और भारतीय सीमा में घुसपैठ करने का कठिन काम चीन को दे दिया है । य़ह घटना कम से कम इतना तो प्रतिध्वनित करती ही है कि चीन से संबंध सुधारने के लिए भारत सरकार किस सीमा तक जाना चाहती है ।

लेकिन इसके विपरीत चीन का रबैया भारत के प्रति क्या है, इसके संकेत उसके व्यवहार से निरंतर मिलते रहते हैं । चीन के प्रधानमंत्री हु-जिन ताओ पिछले दिनों पर भारत के राजकीय दौरे पर आये थे । उन्होंने आते ही स्पष्ट किया कि भारत और चीन ( दरसल सीमा भारत और तिब्बत के बीच है ) में सीमा विवाद के ऐतिहासिक कारण हैं । अतः उसको सुलझाने में लंबा समय लगेगा । लंबे समय का संकेत चीनी भाषा में यही है कि जब चीन उसे सैन्य बल से सुलझाने में समर्थ होगा । या फिर सैन्य बल से सुलझाने के लिए वातावरण अनुकूल होगा । चीन ने 1962 में एक बार पहले भी सैन्य बल से सीमा विवाद सुलझाने का प्रयास किया था और भारत का काफी क्षेत्रफल अपने कब्जे में कर लिया था । आज तक चीन ने वह क्षेत्र छोडा नहीं है । हिमालयी सीमा से लगते भारतीय भूभाग पर अभी भी उसने अपना दावा ठोंका हुआ है ।
पाकिस्तान ने कश्मीर के जिस हिस्से पर कब्जा किया हुआ है, उसका कुछ हिस्सा उसने चीन को भी दे दिया है । जाहिर है कि चीन भारतीय क्षेत्र पर अपने दावे को पुख्ता सिद्ध करने के लिए इस हिस्से का उदाहऱण पेश करेगा ही । तिब्बत और पूर्वी तुर्कीस्तान, जिन पर चीन का कब्जा है, दोनों ही चीन की गुलामी से निकलने के लिए संघर्ष करते रहते हैं । इन दोनों देशों में स्वतंत्रता संघर्ष को कुशलता से दवाने के लिए और इनको परस्पर जोडने के लिए भारतीय क्षेत्र के लदाख के कुछ भूभाग पर चीन ने कब्जा ही नहीं किया हुआ बल्कि लदाख के ही शेष भूभाग पर ही वह अपना दावा जताता रहता है । चीनी सेना द्वारा लदाख क्षेत्र में बार बार अतिक्रमण का एक मुख्य कारण यह भी है । कश्मीर में विवाद के बने रहने से चीन के हितों की पूर्ति होती है । वह कश्मीर को विवादास्पद नहीं बल्कि पाकिस्तान का हिस्सा ही मानता है । पिछले दिनों चीन ने जम्मू कश्मीर के लोगों को भारतीय पासपोर्ट पर बीजा देने के बजाय एक अलग कागज पर बीजा देना शुरु किया था । संकेत स्पष्ट था । जम्मु कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं माना जा सकता । इसलिए भारत के पासपोर्ट पर वीजा कैसे दिया जा सकता है ।
चीन इस नीति का प्रयोग कर के भारत सरकार की प्रतिक्रिया भी देखना चाहता था । लेकिन भारत सरकार की प्रतिक्रिया निराश करने वाली ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों पर आघात करने वाली भी रही । जुबानी जमाखर्च करने के अतिरिक्त भारत सरकार तटस्थ मुद्रा में तमाशा देखती रही । जाहिर है इसे चीन का हौंसला भी बढता और आगे की रणनीति के लिए उसे संकेत भी मिलते । भारत सरकार के वार्ताकारों की जो त्रिमूर्ति कश्मीर में समस्या सुलझाने के नाम पर अलगाववादी व आतंकवादियों से बातचीत कर रही है उसे श्रीनगर के मीरवाइज ने बता दिया है कि वे कश्मीर के मामले में चीन की सहायता भी लेंगे । राज्य के लोगों को कागज पर वीजा देने की नीति को इसकी शुरुआत माना जा सकता है ।
चीन ने अब यही प्रयोग अरुणाचल प्रदेश के लोगों के लिए करना प्रारंभ कर दिया है । वे पिछले कुछ सालों से अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को लेकर मुखर हो गया है । दावा वह इस क्षेत्र पर पहले भी जताता रहा है, लेकिन पहले वह केवल प्रतीकात्मक ही होता था । पिछले कुछ सालों से वह मुखर ही नहीं हुआ बल्कि इस दावे को पुख्ता सिद्ध करने के लिए उसने व्यवहारिक कदम उठाने शुरु कर दिये हैं । अरुणाचल प्रदेश में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक के जाने पर उसने आपत्ति उठायी । पिछले दिनों दलाई लामा तवांग गये थे । तो चीन ने बाकयदा अपना विरोध दर्ज करवाया । य़ह ठीक है कि भारत सरकार ने दलाई लामा को तवांग जाने की अनुमति दे दी ( शायद यदि न देती तो अरुणाचल प्रदेश के लोग भी विरोधस्वरुप सडकों पर आ जाते) लेकिन सरकार ने उनकी तवांग की प्रेस कांफ्रैस पर पाबंदी लगा दी । जाहिर है सरकार स्वयं ही तवांग को दिल्ली से अलग मानने की बात स्वीकार करने लगी है । चीन का भी यही कहना है कि तवांग भारत के अन्य नगरों के जैसा नहीं है बल्कि वह भारत और चीन के बीच विवादास्पद है । अतः वहां कोई ऐसा काम नहीं किया जाना चाहिए जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढे । दिल्ली ने भी तवांग को शायद ऐसे ही दृष्टिकोण से देखा होगा । दिल्ली की इसी रबैये से चीन की हिम्मत बढी और उसने अरुणाचल प्रदेश के लोगों पर भी भारतीय पासपोर्ट पर वीजा देना बंद कर दिया और कागज पर वीजा देने की प्रक्रिया शुरु कर दी । भारत सरकार ने विरोध किया तो इस बार चीन की भाषा बदली हुई थी । उसने स्पष्ट कहा कि अरुणाचल प्रदेश के बारे में वह अपनी नीति नहीं बदलेगा । वह अरुणाचल प्रदेश के सरकारी अधिकारियों को तो किसी भी हालत में वीजा नहीं देगा बाकि लोगों को साधारण कागज पर ही बीजा मिलेगा ।

इसके बाद भारत सरकार हस्बे मामूल चुप्पी धारण कर लेती है । लेकिन अरुणाचल प्रदेश का युवा चुप्प नहीं बैठ सकता । आखिर अरुणाचल छात्र संघ ने 26 जनवरी का सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार करने का निर्णय ले लिया । कारण ? भारत सरकार अरुणाचल को लेकर चीन के आगे घुटने क्यों टेक रही है । जो लडाई दिल्ली को लडनी चाहिए वह हिमालय की उपत्य़काओं में अरुणाचल प्रदेश के युवक लड रहे हैं । दिल्ली का ध्यान अरुणाचल को बचाने में उतना नहीं है जितना क्वात्रोची को बचाने में । अपनी अपनी प्राथमिकताएं हैं । कभी नेहरु ने चीन की इसी आक्रमणाकारी नीति के बारे में वहां घास का तिनका तक नहीं उगता । आज भारत सरकार लगभग उसी तर्ज पर अरुणाचल को बचाने से ज्यादा चीन से ब्यापार बढाने में उत्साह दिखा रही है । अभी तक चीन अरुणाचल के साथ लगती सीमा पर विवादास्पद ही बता रहा था, जिसे चीनी प्रधानमंत्री इतिहास की बिरासत बताते थे, लेकिन पिछले दिनों चीन सरकार ने आधिकारिक तौर पर गुगल अर्थ के मुकाबले जो विश्व मानचित्र जारी किया है उसने अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा ही दिखाया गया है । भारत सरकार का विरोध सब मामलों में आपत्ति दर्ज करवाने तक सीमित हो कर रह जाता है । ताजुब तो इस बात का है कि अरुणाचल, लदाख इत्यादि जिन क्षेत्रों पर चीन अपना दावा पेश करता है उन क्षेत्र में रहने वाले लोग चीन के दावे का ज्यादा सख्त तरीकों से विरोध करते हैं । राज्य सरकारें , जिनकी सीमा तिब्बत (चीन) से लगती है, वे केन्द्र सरकार से बार बार आग्रह कर रही हैं कि सीमाओं पर आधारभूत संरचनाओं को चुस्त दुरुस्त किया जाए,. क्योंकि सीमा विवादों को ज्यादा नुकसना सीमांत क्षेत्रों को ही उठाना पडता है ।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल केन्द्र सरकार से अनेक बार लिखित आग्रह कर चुके हैं कि पठानकोट-जोगेन्द्र नगर लाइन को ब्रोड गैज किया जाए और भनुप्पली से मंडी तक रेल पटरी बिछा कर उसे लेह तक ले जाया जाए ताकि सीमांत प्रदेशों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके । ध्यान रहे चीन अपनी रेल लाइन को ल्हासा तक ले आया है । उसे भारत व नेपाल की सीमा तक आते हुए ज्यादा वक्त नहीं लगेगा । इसके बावजूद हिमाचल प्रदेश की रेल लाइन की मांग को केन्द्र सरकार अपने क्षुद्र राजनैतिक चश्मे से देखती है और उसके लिए बजट का प्रावधान करने के लिए तैयार नहीं है । यदि देश की सुरक्षा का प्रश्न को भी केन्द्र सरकार दलीय स्वार्थों से देखेगी तो परिणाम का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है । अरुणाचल प्रदेश व जम्मू कश्मीर प्रदेश के मुख्यमंत्री सार्वजनिक तौर पर चीनी सेना की घुसपैठ की सूचना देते हैं और केन्द्र सरकार उसे नकारने में ही अपनी कूटनीतिक सफलता मानती है , जिसके चलते चीन सरकार को इस घुसपैठ को आधिकारिक तौर पर नकारने की भी जरुरत नहीं पडती ।
चीन से उत्पन्न सीमांत खतरे को लेकर भारत सरकार की इस चुप्पी के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि विदेश मंत्रालय में अभी भी पणिक्कर की शिष्य़ मंडली प्रभावी भूमिका में बैठी है । उनकी दृष्टि में चीन जिन क्षेत्रों की मांग कर रहा है उन्हें दे लेकर उसके साथ समझौता कर लेना चाहिए । लेकिन संभावित जन आक्रोश के खतरे को भांप कर वह ऐसा कहने का साहस तो नहीं जुटा पाते । अलबत्ता चीनी आक्रामक कृत्यों पर परदा डालने का काम अवश्य करते रहते हैं । चीन नीति को लेकर पंडित नेहरु का नाम लेकर रोने से ही कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती । यदि चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा बंद नहीं करता तो भारत सरकार तिब्बत को विवादास्पद मसला क्यों नहीं मान सकती । तिब्बत में तिब्बती लोग स्वतंत्रता हेतु संघर्ष कर रहे हैं । भारत सरकार उन्हें कूटनीतिक समर्थन तो दे ही सकती है । जब चीन के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति दिल्ली आते हैं, तो उनसे आग्रह कर सकती है कि तिब्बत समस्या सुलझाने के लिए दलाई लामा से बातचीत करे ।
यदि चीन जम्मू कश्मीर व अरुणाचल प्रदेश के लोगों को भारतीय पासपोर्ट पर बीजा देने से इंकार करता है तो भारत सरकार भी तिब्बत और पूर्वी तुर्कीस्तान के लोगों को चीनी पासपोर्ट पर बीजा न देकर साधारण कागज पर बीजा दे सकती है । चीन के मामले में भारत को केवल प्रतिक्रिया और औपचारिक विरोध दर्ज तक सीमित न रह कर स्वतंत्र नीति का अनुसरण करना होगा । सुब्रमण्यन स्वामी ने अपनी पुस्तक इंडियाज चाइना पर्सपेक्टिव में एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन किया है । चीन के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को कहा था चीन दो तीन साल में एक बार भारतीय सीमा का अतिक्रमण केवल इस लिए करता है ताकि भारतीय प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाया जा सके । अमेरिकी राष्ट्रपति के भारतीय प्रतिक्रिया के बारे में पूछने पर उसने हंस कर कहा था, वही ढुलमुल प्रतिक्रिया । भारत सरकार चीन के इस मनोविज्ञान को समझ कर भी अनजान बनने का पाखंड कर रही है और उधर अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, व जम्मू कश्मीर के लोग चीनी अतिक्रमण को लकेर दिल्ली से गुहार लगा रहे हैं । दिल्ली में कोई सुनने वाला है

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1 Comment on "चीन के जहरीले मंसूबे"

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himawant
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कुछेक साम्राज्यवादी शक्तियां हैं जो दक्षिण एसिया एवम हिमालय आर-पार के देशो में अशांति एवम कलह का वातावरण बना कर रखना चाहते है । लेकिन जब तक भारत, नेपाल, श्रीलंका, बंगलादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बर्मा, भुटान आदि देश आर्थिक रुप से एक संघ मे परिवर्तित नही होते तब तक किसी के लिए आर्थिक रुप से उन्नति कर पाना सम्भव नही दिखता । उसी प्रकार हिमालय आर-पार के दो बडे देशो में भी मित्रता भी आवश्यक है। श्री अटल बिहारी बाजपेयी जब विदेश मंत्री थें तो उन्होने एक राजनेता की भांती इस मित्रता की पुनर्स्थापना की नींव रखी थी। दक्षिण एसिया तथा… Read more »
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