लेखक परिचय

राजू सुथार

राजू सुथार

विकिपीडियन

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womanचौमासे के दिन भी क्या दिन होते है ? , ठंडी – ठंडी हवाएं चलती है , बारिश आती है और धरती मईया की तपन को दूर कर देती है साथ ही चारों ओर खूब रंगबिरंगे फूल ही फूल हो जाते है । बरसात के बाद लोग अपने – अपने खेतों में विभिन्न प्रकार की फसलें उगाते है और फिर खूब मेहनत करते है ताकि अपनों को और देश को अन्न की प्राप्ति हो । खेतों में लोग तरबूजों के बीजों पर शक्कर और गुलाबी रंग लगाकर बो देते है ताकि तरबूज मीठे और लाल गुलाबी हो ।

इसी प्रकार छोटे एवं बड़े लोग अपने – अपने पशुओं को लेकर खेतों में घास चराने के लिए चले जाते है और बच्चे भिन्न – भिन्न तरह के खेलों में मगन हो जाते है , इसी बीच अगर इन्द्रदेव की फिर से मेहर हो जाती तो सभी ये बालक एवं बालिकाएं , बूढ़े एवं नौजवान वहीं पर अपने पशुओं के साथ पानी से भींग जाते है । बरसात होने से किसानों के चेहरों पर साफ़ – साफ़ ख़ुशी झलकने लगती है लेकिन कभी – कभी भगवान की गंगा उलटी चल जाती है और फसल कटाई के वक़्त इन्द्र भगवान बरस पड़ते है जिससे फसलों की खराबी हो जाती है । चौमासे में जब बाजरे पर चिड़िया आती है और दाना चुगती है तो इससे लोग काफी दुःखी हो जाते है और कंकड़ मार देते है लेकिन कंकड़ चिड़िया को नहीं मारते है बाजरे को ही मारते है क्योंकि लोग काफी दयालु होते है ।

इसी प्रकार फसल धीरे – धीरे उन्नति करती है और फिर ये लाल – लाल तरबूज भी बड़े हो जाते है तो छोटे बच्चे विद्यालय जाना ही छोड़ देते है और दिन भर इन तरबूजों में व्यस्त रहते है साथ ही वे न तो समय पर नहाते है और नहा भी जाते है तो भी कोई फायदा नहीं क्योंकि ये नादान बच्चे फिर से गन्दे हो जाते है । जब ये बच्चे विद्यालय जाते तो छोटे मोटे ककड़ियां ,तरबूज भी अपने साथ ले जाते है और मौज करते रहते है ।

चौमासे में घर की औरते दिन भर खेतों में घास निकालने में ही व्यस्त रहती और घर के ज्यादातर पुरुष बाहर काम करने चले जाते है । महिलाओं को खाने में सब्जी बनाने में काफी मदद मिल जाती है क्योंकि इन दिनों खेतों हरी -हरी सब्जी ही सब्जी हो जाती है । महिलाएं दिन भर घास काटती है और रात में चैन की साँसें लेती है किन्तु सुबह फिर से इसी काम में लगना पड़ता है और पिछले दिन के घास को बारीकी से काटना भी पड़ता है इस कारण काम की चिंता हमेशा सताई जाती है ।

दिन गुजरते रहते है और रातें कटती रहती है बाजरे की फसल भी और ज्यादा बड़ी होती रहती है इसी प्रकार जब फसलों के काटने के दिन नजदीक आते है तो इन्द्रदेव अचानक मौसम को बदल देता है और चारों ओर काले – काले बादल छा जाते है जो कि इस वक़्त किसानों के फायदे के खिलाफ होते है , लोगों को चिंता खाये जाती है कि अगर बारिश हो गई तो फिर काफी नुकसान ही होगा , लेकिन कभी – कभी मौसम ऐसा ही बना रहता है और फसलों की निराई – गुड़ाई पूरी भी हो जाती है । इसी प्रकार जब इस ऋतु का अंत होने वाला होता है तो तब उस वक़्त ऐसा परिवेश हो जाता है जिसको कोई देखना पसन्द ही नहीं करता है चारों ओर सिर्फ़ सूखा ही सूखा धरातल मिलता है न तरबूज और न ही सब्जियां मिलती है मिलती है तो काटी हुई फसलें । अंततः लोग अपनी – अपनी फसलों को इकट्ठा करके मशीनी यंत्र से कई – कई लोग तो अपने हाथों से कूट – कूटकर अनाज अलग कर देते है तब किसी के अनाज ज्यादा होता है तो किसी के कम , फिर इसी प्रकार किसी के चेहरे पर ख़ुशी झलकती है तो कई कम फसल के कारण नाखुश नज़र आते हैं ।

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