लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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एक समय था हमारे देश में, जब लोग इज्जतदार हुआ करते थे। आजकल लोग मालदार होते हैं। इज्जत उन्हें बतौर गिफ्ट-हैंपर माल के साथ फ्री मिल जाती है। इसलिए लोग अब माल के पीछे भागते हैं। इज्जत के पीछे नहीं। आज के चलन में जब बेचारी इज्जत खुद ही पीछे रह गई हो तो उसके पीछे पड़कर आदमी क्यों पिछड़ना चाहेगा। यूं भी अभी किसी रिसर्च कंपनी ने इस तथ्य पर आंकड़े नहीं जुटाए हैं कि इज्जत के पीछे चलने पर एक औसत आदमी अपने प्रतिद्वंदी से कितना कि.मी.पीछे रह जाता है। ऐसे निरर्थक सर्वेक्षणों की जरूरत भी क्या है।  ऐसी क्या कीमत रह गई है, आज खालिस इज्जत की। जो लोग फालतू में इतनी मगजमारी करें। और भी तमाम जरूरी काम हैं,जो आदमी को निबटाने हैं। इज्जत की कीमत, सफलता के मुकाबले आज दो कौड़ी की भी नहीं है। वैसे खुद कौड़ी की कीमत अब दो कौड़ी की नहीं रही। अब इज्जत जिसके पास है,समझिए वो कुछ ऐसी कौड़ियों का मालिक है,जिसे विश्व की किसी भी बैंक में नहीं चलाया जा सकता। भारत तो विकासशील देश है,यहां तो कौड़ियां चलती नहीं,बात समझ में आती है मगर इन कौड़ियों से आप ईथोपिया और युगांडा में भी कुछ नहीं ले सकते। ये औकात रह गई है अब कौड़ियों की। अब बाजार के चलन से इज्जत और कौड़ी दोनों को विश्व निकाला दिया जा चुका है। अब हमें भी देखिए कौड़ियों की कीमत आंकने के लिए कितनी दूर की कौड़ी लाए हैं। सोचा शायद स्थानीय कौड़ियों की कीमत के मुकाबिले शायद दूर की कौड़ी की कोई कीमत होती हो। मगर कौड़ियों की कीमत के बदले अब भारत सरकार के असली नोट तो क्या मिलेंगे जो नकली नोटों का कारोबार करते हैं वो भी अपने नोट के आगे  हमें फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे,यह हमें मालुम है। कौड़ी आज किसी भी हाल में दो कौड़ी की नहीं रही। अब तो कोई सास भी अपनी बहू को ताना मारते हुए यह नहीं कहती कि गांठ में ना कौड़ी,बीच बाजार में दौड़ी। अब कोई आज की डेट में कौड़ी लेकर बाजार में कुछ खरीदने जाएगा तो तत्काल समजसेवी संस्थाएं उसे पकड़कर भारत दर्शन के लिए मानसिक चिकित्सालय भेज देंगी। इसलिए अब कौड़ियों का चक्कर छोड़कर इज्जतदार मेरा मतलब मालदार बनने में ही समझदारी है। अब वो समझदारी जो माल में रूपांतरित हो सकती हो वही असली समझदारी है। इसलिए बंद दिमाग के अस्तबल से अक्ल के घोड़े निकालकर बाजार में दौड़ाइए और फटाफट माल कमाइए। हर शहर की इकलौती मालरोड और कुकुरमुत्तों की तरह पनपते आलीशान माल्स दिन-रात आपको मालामाल होने का फरमान जारी कर रहे हैं। प्लीज इनकी भी सुनो न। हां,माल कमाने से पहले यह भी जरूरी है कि आप माल की केमिस्ट्री को सही ढंग से समझलें। अगर हडबड़ी में नहीं समझ पाए तो जिंदगी की प्रयोगशाला में वक्त की तमाम परखनलियों का कचूमर निकालकर गर्दन नीचे किये या तो आप खुद बाहर निकल आएंगे या फिर शुभचिंतक दोस्तों के सामूहिक श्रमदान के जरिए बलपूर्वक,बड़ी विनम्रता से निकालकर फेंक दिए जाएंगे। तो माल कमाने की केमिस्ट्री का पहला पाठ है कि अपने-आप को माल समझो। अपने इर्द-गिर्द जो कुछ भी है,उसे माल समझो। अपनी कीमत लगाना सीखो और सही मौके पर अपने को बेचो। और मौका ढूंढकर सामनेवाले को बेच खाओ। और फटाफट माल बनाओ.। समझदार लोग तो पशुओं का चारा बेचकर,शहीदों के ताबूत बेचकर, और प्रतिभावान डाक्टर एक अदनी-सी किडनी को माल बनाकर, बेचकर खुद मालामाल हो रहे हैं। दुनिया गोल है। इसलिए आप दुनिया के किसी भी हिस्से में रहें आपकी जिंदगी का बस एकमात्र,इकलौता,एक ही गोल होना चाहिए- बस,हर तरह से,हर हाल में, माल बनाना। इस गोल दुनिया में माल बनाने के लिए यदि कुछ गोलमाल भी करना पड़े तो इसे प्रभु की इच्छा मानकर, इस सतकर्म को पूरे निष्ठा भाव से,तुरत-फुरतवाली फुर्ती के साथ संपन्न कर डालना चाहिए क्योंकि आलस्य जीवन का सबसे बड़ा शत्रु होता है। और ये जीवन प्रभु द्वारा दिया आपको एक ऐसा तोहफा है जो सिर्फ तोहफे पाकर ही प्रसन्न होता है। गोलमाल में मिली सफलता का आदमी के व्यक्तित्व पर बड़ा आयुर्वेदिक प्रभाव पड़ता है।।गोलमाल विजेता का शरीर फूलकर कुप्पा हो जाता है। आत्मीयजन तब ऐसे कामयाब व्यक्तित्व को गोलगप्पे के अतिप्रतिष्ठित संबोधन से संबोधित करके अपनी सम्मान भावना का प्रदर्शन करते हैं। अब देखिए यदि आप गोलगप्पा व्यक्तित्व के धनी हैं,तो पांच सितारा होटल के वातानुकूलित जिम आपको सुख भोगने के लिए दिन-रात ऐसे श्रद्धा भाव से आमंत्रित करते रहेंगे-जैसे श्रद्धाभाव से भक्त भगवान को करते हैं। शरीर की फालतू चर्बी कैसे हटाएं, यही आपका राष्ट्रीय चिंतन होगा। क्योंकि सफल आदमी ही इस देश का प्रतिनिधि होता है। एक्स्ट्रा कैलरी कैसे बर्न करें यही आपकी प्राथमिक चिंता होगी। गरीबी और भूख को कंधे पर ढोते ये गरीब-गंवांर भला क्या जानें कि बाडी को शेप में लाने के लिए कितने पापड़ बेलना पडते हैं। कितनी मेहनत आप रोज़ करते हैं। इस शरीर के लिए.. और इस नश्वर शरीर के खातिर कितने वैरागी भाव से,अपना सब-कुछ लुटाने का दिल रखते हैं। उस अमूल्य माल को जो दुनिया का जमाल है,उस माल को जो ईमानदार के लिए सबसे बड़ा कमाल है। आज के इस मालधर्मी दौर में हर शै सिर्फ माल है। नौजवानों को कई बार ये कहते सुना जासकता है कि- वाह क्या माल है। आफिस में अधेड़ बाबू दूसरे बाबू को हड़काते हुए कहता है- उससे पंगा मत लेना,वो बास का माल है….। उसे कल ही मैंने बास के साथ शहर के सबसे मंहगे माल में,बड़ी दुर्लभ दशा में देखा था।  इस ब्रांड का माल,ऐसा माल होता है जो कभी माल गाड़ी से,कहीं भी नहीं ढोया जाता। मगर फिर भी कहलाता माल है। इस माल को हासिल करने के लिए भक्तगण रोज़ मंत्र-जाप करते हैं-माल…आ, माल…आ। जिन संतों के हाथ में माला होती है ऐसे संत मालाराम भी इसी मंत्र का जाप करते हैं। नासमझ भक्त  समझते हैं कि गुरूजी माला मांग रहे हैं। वो सिर खुजाते हैं कि गुरूजी के हाथ में जब पहले से ही माला है तो फिर ये दूसरी माला क्यों मांग रहे हैं। क्या गुरूजी आश्रम में बहुमालाप्रथा की शुरूआत कर रहे हैं। घौंघा वसंत भक्त यही सोच-विचार करते रह जाते हैं,उधर मेधावी भक्त गुरूजी के हाथ में माला डी पकड़ाकर,तुरंत सेवा का फटापट गोपनीय पुण्य कमा लेते हैं। यूं भी समझदार को इशारा काफी होता है। समझदार भक्त तुरंत भांप लेते हैं कि किस वक्त पूजा में किस प्रकार की पूजन सामग्री गुरूजी को लगेगी। आश्रम में पूजन सामग्री की व्यवस्था हमेशा भक्त ही करते हैं। अगर खुद गुरूजी को ही करनी होती तो बेचारे आश्रम में ही क्यों आते। घर पर तो आलरेडी व्यवस्था थी। घर और आश्रम में  फर्क होता है। जब घर छोड़ ही दिया तो पूजन में भी गुरूजी घर की सामग्री उपयोग में नहीं लाते हैं। बड़े नियमवाले हैं, गुरूजी। इसीलिए समाज में उनकी इज्जत है। भक्तों की कृपा से खूब माल आ रहा है आश्रम में। गुरूजी भी तो उच्छाधारी हैं। सभी भक्तों की भावना समझकर इच्छा को माल में रूपांतरित कर देते हैं। बड़े सिद्ध साधु हैं। माल का महत्व भक्तों के लिए है। गुरूजी को माल से क्या प्रयोजन। निष्काम आत्मा हैं,गुरूजी। गुरूजी के आश्रम में माल है। इसीलिए गुरूजी इज्जतदार संत हैं। माल को परखने की बड़ी सिद्ध विश्वामित्री दृष्टि है,गुरूजी के पास। इसलिए चोखा और खरा ही माल आश्रम में प्रवेश पाता है,कूड़ा-कचरा नहीं। कचरा माल तो बाहर ही चुंगी-नाके पर जब्त कर लिया जाता है। आखिर आश्रम की भी तो कोई इज्जत है। आश्रण..आश्रम है कोई क्लब नहीं। कि कैसा भी माल खप जाए। जिसमें पूर्ण समर्पण की भावना, अत्यंत तीव्र होती है,वही इस आश्रम में प्रवेश की पात्रता रखता है। प्रेम के मामले में गुरूजी पूरे कबीरपंथी हैं। कर की माला छांड़ के मन की माला फेर..। कर की माला अर्थात घर की माला छोड़कर मन की माला..यानी जो माला मन को भाए उस माला पर ही गुरूजी कर फेरते हैं।  गुरूजी की माला ही गुरूजी का माल हैं। कोई ग्रहस्थ तो हैं नहीं,जो घर के सारे कबाड़े को माल कहें..। बड़ा एकात्म है यहां माल और इज्जत में। परस्परता की टकसाल में ही इज्जत माल में ढलती है और माल इज्जत में। इस परस्परता को तोड़ना ही अपराध है।  यही इज्जत पर हाथ डालना कहलाता है। जो इत्ती-सी भी बात नहीं समझते उन  झुग्गी-झोपड़वाले मवालियों की काहे की इज्जत। इसलिए ही तो यह गरीब इज्जत रोज़ लुटने को मजबूर है। अगर इनके पास भी माल होता तो मजाल थी किसी की इनकी इज्जत पर हाथ डालने की। इन्हें कौन समझाए कि आज माल की इज्जत है। और आज माल ही इज्जत है। और इज्जतदार होने के लिए मालदार होना पहली ौर आवश्यकरूप से जरूरी शर्त।

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