लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी महाराष्ट्र प्रदेश के हैं। मराठी में गडकरी का मतलब किले या दुर्ग की रक्षा करने वाला होता है। गडकरी को भाजपा के ढहे दुर्ग की रक्षा का काम सौंपा गया है। आज भाजपा के किले में सर्वाधिक मरम्मत की दरकार है। कई हिस्से इससे टूटकर दूर चले गए हैं। इन परिस्थितियों में गडकरी की जिम्मेदारी और जवाबदारी कहीं ज्याद बढ चुकी है।

27 मई 1957 को नागपुर में जन्मे गडकरी को संघपुत्र माना जाता है। भाजपा शिवसेना गठबंधन में लोक कर्म जैसे विभाग के मंत्री रहे गडकरी का नाम अनेक सफल प्रयोगों के लिए जाना जाता है। इसके पहले वे सूबे में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रहे हैं। 2004 से अब तक वे सूबे की भाजपा इकाई के प्रमुख रहे हैं। गौरतलब होगा कि जुम्मे के रोज ही गडकरी ने अपनी शादी की सालगिरह मनाई और शनिवार को पार्टी ने उन्हें देश का अध्यक्ष बनाकर एक तोहफा दिया है।

वैसे गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर संघ ने यह संदेश दे दिया है कि अब भाजपा की सियासत मराठा ही चलाएगा। वैसे भी संघ में मराठा क्षत्रपाें का खासा बोलबाला है। संघ का मुख्यालय भी नागपुर में ही है। अब तक के भाजपा के निजामों की प्रधानमंत्री बनने की चाहत के चलते लगातार रसातल की ओर जा रही भाजपा को नए निजाम संघ की मदद से कहां पहुंचाते हैं यह तो समय ही बताएगा, किन्तु अब संघ और भाजपा के बीच तालमेल काफी हद तक होने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं।

महाराष्ट्र सूबे में गडकरी का नाम जाना पहचाना हो सकता है किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर यह एक नया नाम ही है। देश के अनेक सूबों में गडकरी के नाम को लोग आसानी से पचा लें एसा संभव प्रतीत नहीं होता है। संघ ने नितिन गडकरी के अपेक्षाकृत युवा कांधाें पर कांटो भरा ताज रख दिया है। अनेक धडों में बंटी भाजपा को मझधार से निकालना गडकरी के सामने सबसे बडी चुनौति ही होगा।

एक तरफ गडकरी को राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी को साधना है, तो दूसरी तरफ अरूण जेतली, अरूण शोरी, सुषमा स्वराज जैसी शख्सियतों के बीच तालमेल बिठाना होगा। कुल मिलाकर राष्ट्रीय स्तर पर अनजान चेहरे के रूप में उभरे गडकरी को बत्तीस दांतों के बीच जीभ के मानिंद ही रहना होगा।

वैसे नितिन गडकरी में खासियतों का अकूत भण्डार है। वे खुले स्वभाव वाले अच्छे किस्म के वक्ता हैं। उनका व्यक्तित्व अब तक पारदर्शी ही माना जा सकता है। सूबे के उनके इतिहास को देखकर कहा जा सकता है कि संगठन चलाने के मामले में वे काफी हद तक सक्षम माने जा सकते हैं।

गडकरी के करीबी बताते हैं कि उनकी डिक्शनरी में असंभव शब्द का शुमार कहीं नहीं मिलता है। उनकी कल्पना शीलता गजब की मानी जा सकती है। वे खुद पर गजब का भरोसा करते हैं साथ ही उंचे ओहदे पर पहुंचने के बावजूद भी वे सदा ही अपने पैर जमीन पर ही रखते हैं। पिछले चुनावों में वे स्कूटर पर बैठकर ही वोट डालने निकल पडे थे।

दूसरी तरफ गडकरी की कमजोरियां उनकी सफलता के मार्ग में शूल बोने का ही काम करेंगी। नितिन गडकरी के सामने सबसे बडा संकट यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता बहुत कम ही है। गडकरी का आक्रमक रवैया और गलत सलत भाषा का इस्तेमाल उनके लिए घातक ही साबित हो सकता है।

उनके भोलेपन और खुले स्वभाव का लोगों के द्वारा जबर्दस्त तरीके से फायदा उठाया गया है। भविष्य में यही बात उनके लिए ऋणात्मक पहलू के तौर पर सामने आ सकती है। वे बहुत ज्यादा प्रयोगवादी माने जाते हैं, एसी स्थिति में संघ और उनके बीच टकराहट होने में समय नहीं लगेगा। इसके साथ ही साथ गडकरी अपने आभामण्डल के कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सम्मान नहीं देते हैं, जिससे उनकी छवि लोगों में नकारात्मक बनने में देर नहीं लगेगी।

आने वाले समय में गडकरी की अग्नि परीक्षा होने वाली है। तीन सालों में देश के दस राज्यों में चुनाव होने हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी, ताकि वे सर्वस्वीकार्य हो सकें। भले ही गडकरी संघ की सहमति से आए हों पर उनकी सफलता और विफलता कहीं न कहीं संघ और भाजपा के रिश्तों पर असर डालेगी। उन्हें भाजपा से ज्यादा अभी खुद की पहचान बनाने का काम करना होगा।

चूंकि भाजपा के नए निजाम ने अब तक महज एक सूबे के अंदर ही काम किया है अत: उनके अनुयाईयों की तादाद शेष भारत में कम ही है। अब उनके अध्यक्ष बनने के बाद उनसे जुडने वालों में अच्छे और बुरे की पहचान गडकरी के सामने सबसे बडी चुनौती ही होगी।

अपने महज दस मिनिट के उद्बोधन में गडकरी ने दर्जन भर से ज्यादा बार आडवाणी का नाम लिया है। माना जा रहा है कि गडकरी अब संघ से ज्यादा आडवाणी का आर्शीवाद चाह रहे हैं। कहा जाता है कि आदमी के इर्द गिर्द रहने वाले ही उसे महान या असफल बनाते हैं। इस लिहाज से गडकरी का औरा ही तय करेगा कि वे भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष के तौर पर सफल रहते हैं या फिर संघ की आशाओं पर तुषारापात ही करते हैं।

-लिमटी खरे

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