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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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jtotiba fuleभारत दुनियां का एकलौता देश है जिसने कभी किसी राष्ट्र को गुलाम नही बनाया और न ऐसा चाहा। भारत ही ऐसा देश है जहाॅं मानव की जिन्दगी के लिए हर वस्तु का उत्पाद हो सकता है ।यह देश किसी अन्य देश को न तो कभी गुलाम बनाया और न ही ऐसा करने की कभी इच्छा की ।परन्तु इस महान देश में महादुख की बात ये है कि यहाॅ के ऊॅची जाति के लोग निची जाति के लोगों को सदियों से गुलाम बनाते आयें हैं ।निची जाति के लोग लम्बे अर्से से अपने जीवन को जानवरों की तरह काटते हुए आये हैं जिन्होने जीवन काटना चाहा वे किसी भी तरह काटकर बेनाम चले गए और जो जीवन को जीना चाहे उन्होनें क्रांति कर डाली ।

क्रांति करने वालों में ऐसा ही एक महापुरूष था महात्मा ज्योतिबा फूले जिन्हे आज हम सामाजिक क्रांति के पितामह के नाम से भी याद करते हैं ज्योतिबा फूले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में एक माली परिवार में हुआ था निम्न जाति के लोंगों के लिए शिक्षा का द्वार बंद था लेकिन इन्होने लाखें मुसीबतों का सामना करते हुए शिक्षा अर्जन कर ली । 13 साल की उम्र में उनकी शादी सावित्री बाई फूले के साथ हो गई । ज्योतिबा फूले तब तीसरी कक्षा तक पढे थे । शादी के बाद भी वे अध्ययन को जारी रखे उनकी पत्नी भी स्कूली शिक्षा नही हुई थी वे अपनी छुट्टियों के दिनो में अपनी पत्नी को पढातें थे ।फूले जी का ध्यान दबी – पिछडी जातियों की लडकियों की शिक्षा पर गया और 01 जनवरी 1848को पूना में लडकियों की पहली पाठशाला खोली ।इस स्कूल की प्रधान अध्यापिका उनकी पत्नी सावित्री फूले थी । 1848 में ही उन्होने पूना में ही प्रौढ शिक्षा केंद्र भी खोला इस तरह उन्होने 04 वर्ष में 18 स्कूल खोल डाले ज्योतिबा फूले और उनकी पत्नी के इस कार्य से ब्रिटिश शासन प्रभावित हुआ और सार्वजनिक रूप से उन्हे 1852 में शाल पहनाकर अभिन्नदन किया । 29 जून 1853 को बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की । गांॅव के मजदूर किसान दिन मे पढ नही पाते थे उनके लिए 1855 में रात्री पाठशाला उनके द्वारा खोली गई ।1863 में एक अनाथालय खोला ।उस समय अस्पृश्य जाति के लोगों को सार्वजनिक कुंए से पानी खींचने का अधिकार नही था। ज्योतिबा फूले ने उनके लिए 1868 में अपने घर के कुंए को खोल दिया ज्योतिबा राव फूले की कोई संतान न थी उन्होने 1874 में एक बच्चे को गोद लिया यशवंत राव नाम का यह बच्चा एक बडा डाक्टर बना यही ज्योतिबा फूले का वारिस बना ।

1876-77 के दौरान पूनसा में भारी अकाल पडा लोग दाने दाने के लिए तरसते थे महात्मा फूले ने भूखे लोंगों के लिए विभिन्न 52 जगहों में अन्न दान केंद्र खोले ।

प्ति के मरने के बाद पत्नि का कटवाना ,सफेद वस्त्र पहनना जेवर न पहनना इस रिवाज का महात्मा फूले ने विरोध किया । दलित शोषित समाज को मानवीय अधिकार प्राप्ति हेतु सामाजिक आंदोलन चलाने के लिए महात्मा फूले ने 23 सितम्बर 1873 को सत्य शोधक समाज की स्थापना की अपनी मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व उन्होने सार्वजनिक सत्यधर्म नामक पुस्तक की रचना की यह उन्की मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुई कई पुस्तक लिखे जीवन के हर पहलू में क्रांति करने वाले इस महापुरूष ने 28 नवम्बर 1890 को हमेशा के लिए आंख मुद ली । महात्मा ज्योतिबा फूले का जीवन समाज को समर्पित रहा और समाज को जगाते जगाते चले गए इतिहास को झांक कर देखे तो आज भी उनका जीवन प्रासंगीक है ।

-सुनील एक्सरे

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