लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-    india
कुछ दिन पहले जोधपुर गया था। वहां के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के विधि संकाय में 1-2 फरवरी को एक विचार गोष्ठी थी। उसी में मुझे भाग लेना था। मेरा काम तो पहले दिन के उद्घाटन सत्र में बीज भाषण देकर समाप्त हो गया । गोष्ठी के निदेशक प्रो. सुनील असोपा ने जोधपुर के प्रसिद्ध स्थान देखने दिखाने की व्यवस्था कर दी थी । मैं जोधपुर राजवंश का क़िला मेहरानगढ़ देख रहा था । जिस चट्टानी पहाड़ी पर यह क़िला बना है, उसे चिड़िया टोंक कहते हैं , अर्थात चिड़िया की चोंच जैसी पहाड़ी । क़िला राजवंश के लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति है । रखरखाव बहुत ही सुन्दर है । अलबत्ता क़िले के अन्दर घुसने के साठ रुपये देने पडते हैं । लेकिन क़िले की भव्यता और उसकी संभाल देख कर साठ रुपये चुभते नहीं हैं । मेरे साथ डॉ. रंजनी गंगाहर भी हैं । ( संदेह न रहे , वे मेरी पत्नी हैं) वे बहुत साल पहले अपने कॉलेज के दिनों में कभी चित्तौड़ और उदयपुर के क़िले देख चुकीं हैं । कहने लगीं कि चित्तौड़ और उदयपुर के क़िले तो ध्वस्त हो चुके हैं , लेकिन मेहरानगढ क़िला तो बिलकुल सुरक्षित और भव्य है । मैंने कहा , इतिहास का यही न्याय होता है । चित्तौड़ उदयपुर के लोग और राजा देश की स्वतंत्रता के लिये विदेशी मुगलशासकों से निरन्तर युद्ध करते रहे ,तो उनके क़िले कैसे बच सकते थे ? उन्होंने क़िले गंवाकर यशकीर्ति अर्जित की है । यही कीर्ति उनकी पूंजी है । लेकिन जयपुर जोधपुर के राजा विदेशी मुग़लों के साथ मिल गये थे ।  इसलिये उन्होंने अपने क़िले तो बचा लिये, लेकिन यश कीर्ति खो दी ।  उदयपुर विश्वविद्यालय के प्रो. क्षेत्रपाल सिंह हमारे साथ थे । दरअसल वे ही क़िला दिखा रहे थे । उनकी व्याख्या में जयपुर जोधपुर के राजपरिवारों के मुग़लों से मैटरीमोनियल एलांसस हो गये थे। मुझे यह व्याख्या सचमुच अच्छी लगी । अंग्रेज़ी भाषा की यही ख़ूबी है । बह बड़े आदमी के अपमान जनक कृत्य को भी छिपाने का काम करती है । जो देसी भाषा में अश्लील है वह अंग्रेज़ी में साहित्य का सर्वश्रेष्ठ नमूना है । अंग्रेज़ी काल में भी जो ताउम्र गोरों के तलवे चाटते रहे उसे अंग्रेज़ी में एडमिनस्ट्रेटिव स्किलस कह कर महिमामंडित किया गया । टोडी बच्चा गुड एडमिनस्ट्रेशन का सर्वोत्तम उदाहरण बन गया । लेकिन आम आदमी को क्या कहा जाये ? उसकी भाषा भी अपनी है और व्याख्या भी अपनी । यही कारण है कि राजस्थान का आम आदमी जयपुर और जोधपुर के राजपरिवारों की मुग़लों के साथ इन रिश्तेदारियों को अपनी साधारण भाषा में इसे मैटरीमोनियल एलांसस नहीं कहता । वह तो केवल इतना जानता है कि जयपुर जोधपुर के राजपरिवारों ने अपनी रक्षा के लिये अपनी लड़कियां मुग़लों को दे दीं थीं। लेकिन यह कहते कहते शायद उसके मुंह में कड़वडाहट होती है और वह थूक देता है । चित्तौड़ के पास महाराणा प्रताप भी है और पद्मिनी भी है । एक की अपनी हल्दीघाटी है और दूसरी का अपना जौहर है, लेकिन इधर जोधावाई है । वह पद्मिनी न बन कर बच गई और उसका राजपरिवार महाराणा प्रताप न बन कर क़िले को सुरक्षित निकालकर ले आया । मुझे लगा कि जयपुर जोधपुर के राजपरिवार असली बुद्धिजीवी थे , जिन्होंने विदेशी शासकों के साथ मैटरीमोनियल एलायंसस करके अपने क़िले भी बचा लिये और अभी तक उन्हीं क़िलों से पैसा कमाने का रास्ता भी निकाल लिया। चित्तौड़ के क़िले खंडहर तो हो गये, लेकिन वहां के जनसंघर्ष से जो लोकगीत पैदा हुये , वे आज भी चित्तौड़ की कीर्ति को घर घर में गाते हैं । मेहरानगढ़ से ऐसा कोई लोकगीत नहीं जन्म ले पाया । कीर्ति के लोकगीत चित्तौड़ से ही जन्म ले सकते हैं, मेहरानगढ़ से नहीं।
मेहरानगढ़ में चामुण्डा का एक प्राचीन मंदिर भी है । लेकिन उसका क्या लाभ ? जिन दिनों मध्यकालीन भारतीय दशगुरु परम्परा के दशम् गुरु श्री गोविन्द सिंह जी सारे देश में ,”देहु शिवा वर मोहे ” का निनाद कर रहे थे , शायद उन दिनों भी जोधपुर राजपरिवार के लोग विदेशी शासकों से सन्धियों के प्रस्ताव इसी मंदिर में बैठ कर तैयार कर रहे होंगे । मां चामुण्डा ने भी मेहरानगढ में क्या क्या नहीं देखा होगा ? ऐसा नहीं कि इन राजपरिवारों में शौर्य की कमी थी या वे कायर थे । जयपुर और जोधपुर के राजा आपस में ख़ूब युद्ध करते थे । मेहरानगढ के क़िले में भी जयपुर के साथ युद्ध की एक गाथा अंकित की गई है । लेकिन विदेशी मुग़ल शासकों से लड़ने की इच्छा उनमें नहीं थी ।
इसका यह अर्थ नहीं कि सारा देश ही विदेशी मुग़ल शासकों के आगे नतमस्तक हो गया था या फिर जयपुर जोधपुर हो गया था ।  जयपुर और जोधपुर तो राजस्थान के भी और भारत के भी अपवाद हैं । ऐसे अपवाद और भी मिल जायेंगे । लेकिन देश का आम जनमानस तो संघर्षरत था । उसने विदेशी मुग़लों के आगे पराजय नहीं स्वीकारी । गुरु नानक देव जी ने तो हार जीत की परिभाषा ही बदल दी । उन्होंने कहा,”मन के हारे हार है , मन के जीते जीत ।” भारत के लोगों ने मन से पराजय कभी नहीं स्वीकारी । जहां भी उसे सही नेतृत्व मिल गया, उसने विदेशियों के छक्के छुड़ा दिये । गुरु गोविन्द सिंह जी ” चिड़ियों से बाज लड़ाने ” का प्रयोग कर रहे थे। इसमें वे बहुत सीमा तक सफल भी हुये । यह पूरी दश गुरु परम्परा साधारण परिवारों से ही निकली थी । दक्षिण में शिवाजी महाराज जनसाधारण को संगठित कर रहे थे । उन्होंने भी विदेशी शासन की चूलें हिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । महाराणा प्रताप तो महाराणा न रह कर रेगिस्तान की साधारण संतानों से एकाकार हो गये थे और उसी जनसाधारण से प्राप्त ऊर्जा से मुग़लों को ललकार रहे थे ।
जब जोधपुर और जयपुर मैटरिमोनियल एलांसस से भारत माता के माथे पर कलंक की गाथा लिख रहे रहे थे, तो अपने प्राण देकर उसे मिटाने का प्रयास भी सुदूर स्यालकोट में एक छोटा बालक हक़ीक़त राय कर रहा था। बन्दा वैरागी, जो अब व्यक्तिगत वैराग्य की कामना छोड़कर राष्ट्रमुक्ति के लिये सिंह बन चुका था , वह कहीं न कहीं अपने प्राण देकर भी इतिहास की इन्हीं कलंक गाथाओं का प्रायश्चित्त ही तो कर रहा था। जयपुर नरेश राम सिंह जब औरंगज़ेब की सेना का नेतृत्व करते हुये असम को जीतने के लिये डेरा डाले बैठा था तो लचित बड़फूकन के नेतृत्व में ब्रह्मपुत्र की संतानें  अपना रक्त बहाकर राष्ट्रसाधना ही तो कर रही थीं । गुरु तेग़ बहादुर अपने परिवार को पाटलिपुत्र में छोड़कर राम सिंह को इस राष्ट्रघाती काम से विमुख करने का प्रयास असम तक जाकर कर रहे थे। ब्रह्मपुत्र के तट पर धुबडी में उन्होंने राष्ट्रसाधना की जो अलख  जगा दी थी, उसकी ज्योति आज तक प्रज्ज्वलित है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने बहुत बाद में पूछा था ,” वीरों का कैसा हो बसन्त ? ” लेकिन भारत माता के पुत्रों ने तो सिकन्दर के आक्रमणों से लेकर, मुग़लों के शासनकाल से होते हुये जलियावाला बाग़ के नरसंहार तक हर वार इसका उत्तर अपना शीश कटा कर दिया। मैं आज मेहरानगढ़ के क़िले में घूमता हुआ उस इतिहास को याद करता हूं तो चिड़िया टोंक पर खड़ा मेहरानगढ शायद स्वयं ही लज्जा से मुंह छिपा रहा है। राठौड़ों की धवल कान्ति को कलंकित करने वाले राजपरिवार तो इतिहास हो गये, लेकिन मेहरानगढ़ किसके आगे अपना दुख रोये ?

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1 Comment on "भारत की संघर्ष गाथा और मेहरानगढ़ का क़िला"

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DR.S.H.SHARMA
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This is short and good article but we need to rewrite the history of Hindusthan with solid facts and figures howsoever bitter or unpleasant that may be. Our history i has been written by English historians and they have written to show their greatness and post independent historians have just repeated that like parrots except a few but now we need to rethink and it must be written with through research to tell the truth .Unless we face the truth we would be walking in the dark. This work cannot be done as long as congress is in power along… Read more »
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