लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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– डॉ कुलदीप चंद अग्निहोत्री

भारत को क्षेत्रीय शक्ति केन्द्र के रुप में देखा जाने लगा है। इस क्षेत्र में चीन अपने आप को भारत अपने आप को प्रतिद्वन्दी मानता है। यह भी कहा जा सकता है कि चीन कुछ क्षेत्रों में भारत से आगे निकल गया है और भारत वहां तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है। परन्तु इतिहास गवाह है कोई भी शक्ति केन्द्र, चाहे विश्व शक्ति का हो या क्षेत्रीय शक्ति का, आइशोलेशन में नहीं रह सकता। उसकी सबसे बडी शक्ति उसके निकटस्थ पडोसी ही होते हैं। ये पडोसी देश उसकी शक्ति भी बन सकते हैं और उसकी कमजोरी भी। पडोसियों के बारे में, विशेषकर भूगोल के क्षेत्र में, कहा जाता है कि वे ईश्वर प्रदत्त होते हैं। कोई भी देश उनका स्वयं चयन नहीं कर सकता। परन्तु भारत को दुर्भाग्य कहना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त पडोसियों में भौगोलिक छेडछाड करते हुए अपने वक्त की सामा्रज्यवादी महाशक्तियों ने, भारत को कुछ कृत्रिम या ‘मैनमेड’ पडोसी भी दे दिए हैं। पाकिस्तान और चीन भारत के ऐसे ही पडोसी देश हैं। पाकिस्तान का निर्माण 1947 में ब्रिटिश सामा्रज्य ने भारत की प्राकृतिक सीमाओं को बदलकर किया था और चीन 1950 में तिब्बत पर कब्जा करने के पश्चात भारत का पडोसी देश बन बैठा।

भारत इस बात को अच्छी तरह समझता है कि पडोस के सभी देशों से शांतिपूर्ण सम्बंध होना ही काफी नहीं है बल्कि इन सभी देशों के लिए विकास की समन्वित समग्र रुपरेखा भी बननी चाहिए। शायद, आपसी सौहार्द एवं समग्र विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही दिसम्बर 1985 में भारत ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव, श्रीलंका से मिलकर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग परिषद् की स्थापना की थी। 2007 में इसमें अफगानिस्तान भी शामिल हुआ। दक्षेस में भारत की भूमिका को दोयम दर्जे की बनाने के लिए चीन भी इसका सदस्य बनने का प्रयास कर रहा है। पहले उसका समर्थन पाकिस्तान और बांग्लादेश ही कर रहे थे अब उसमें नेपाल भी शामिल हो गया है। चीन, अमेरिका, यूरोपीय यूनियन आस्ट्लिया को दक्षेस में आब्जर्वर का दर्जा पहले ही मिल चुका है। भूटान और मालदीव को छोडकर दक्षेस के बाकी सदस्य धीरे -धीरे भारत विरोधी गतिविधयों का केन्द्र बनते जा रहे है -ऐसे संकेत काफी अर्सा पहले ही मिलने शुरु हो गए थे।

भारत के लाख प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी रणनीति को त्याग नहीं कर पाया। इसमें उसे अमेरिका का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग प्राप्त है। पाकिस्तान और अमेरिका ने संयुक्त गठबंधन बनाकर तालिबान की आतंकवादी फौज तैयार की है। दोनों देश समय व परिस्थिति के अनुसार उसका प्रयोग अपने स्वार्थों के लिए करते रहते हैं। अमेरिका ने उसका उपयोग अफगानिस्तान में किया और पाकिस्तान ने भारत में। अमेरिका की शह पर पाकिस्तान अफगानिस्तान में तालिबान के सहारे छाया सरकार चलाना चाहता है। आतंकवाद से लडने का इतना हो -हल्ला मचाने के बावजूद अमेरिका और पाकिस्तान दोनों इस आतंकवादी सेना को मोह छोड नहीं रहे हैं। अमेरिका तो यहां तक जाने को तैयार है कि यदि तालिबान अमेरिका की छत्रछाया में जाने को तैयार हो जाए तो वह उसे अफगानिस्तान का ताज फिर से दे सकता है। अमेरिका के इसी तालिबान प्रेम को सूंघकर अफगान राष्ट्पति हामिद करजई का धमकी देनी पडी कि शायद उन्हें भी भविष्य में पहाडों में जाकर हथियार उठाने पडे। पाकिस्तान भला तालिबान का साथ क्यों छोडेगा? पाकिस्तान ने भारत को अपना स्वाभाविक शत्रु घोषित किया हुआ है और इससे लडने के लिए उसने तालिबान के प्रयोग को अपनी राज्यनीति का हिस्सा माना हुआ है। अमेरिका और पाकिस्तान उन्हीं तालिबानियों से लड रहे हैं जो उन्हीं की छत्रछाया से निकलकर आजाद हो गए है। इसी को ये दोनो देश आतंकवाद से लडने की संज्ञा दे रहे हैं। अमेरिका पाकिस्तान पर आतंकवाद के रास्ते से हटने के लिए दबाव डालने के बजाय भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह हर हालत में पाकिस्तान से समझौता करे और भारत सरकार अमेरिका के नीचे इतनी लगी हुई है कि तमाम अपमानों के बावजूद वह वार्ता के लिए तैयार हो जाती है। अप्रत्यक्ष रुप से इसका अर्थ यह है कि अमेरिका पाकिस्तान का शह दे रहा है िकवह 26 /11 के आक्रमण और पूणे बम विस्फोट के बाद भी भारत की ओर से निश्चिंत रह सकता है क्योंकि अमेरिका भारत को पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने की इजाजत नहीं देगा। पाकिस्तान दक्षेस का सदस्य होते हुए भी दक्षेस के दो अन्य सदस्यों भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ छद्म युद्ध लड रहा है।

अमेरिका और पाकिस्तान एक दूसरे मोड पर भी कदम से कदम मिलाकर चलते दिखाई पड रहे हैं । ये दोनों देश अफगानिस्तान में से भारत की भूमिका को शून्य करने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। हमीद करजई के नेतृत्व में अफगानी सरकार नए परिदृश्य में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण मानती है। भारत भी अफगानिस्तान के नव-निर्माण में सार्थक भूमिका निभा रहा है। वैसे भी अफगानिस्तान और भारत के शताब्दियों पुराने सांस्कृतिक सम्बंध रहे है। अफगानिस्तान भारत का स्वाभाविक पडोसी है। 1947 के बाद सीमाओं में परिवर्तन हुआ है लेकिन उसके बावजूद अफगानिस्तान के 1947 से लेकर अब तक भारत के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बंध बने हुए हैं। जबकि पाकिस्तान को अफगान लोग सदा ही संदेह की नजर से देखते रहे हैं। अब अमेरिका अफगानिस्तान को अपने प्रभाव छेत्र का राज्य बना लेना चाहता है इसलिए वह नहीं चाहता कि भारत की किसी भी प्रकार की उपस्थिति वहां रहे। पाकिस्तान को भी यही स्थिति लाभकारी लगती है। अफगानिस्तान में अमेरिका प्रत्यक्ष रहे या फिर अच्छे तालिबान के माध्यम से अप्रत्यक्ष रुप से रहे, पाकिस्तान को इसका लाभ ही है। दोनों देश अफगानिस्तान के मामले में भारत को आउट करने की संयुक्त नीति पर चल रहे हैं। दरअसल, पाकिस्तान की सारी विदेश नीति ही भारत विरोध पर टिकी हुई है उसी पैमाने से वह अफगानिस्तान का मूल्यांकन कर रहा है।

भारत की इस घेरेबंदी में चीन भी अपनी प्रमुख भूमिका निभा रहा है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान को परमाणु शक्ति संम्पन्न देश बनाने में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। चीन पाकिस्तान को सैनिक दृष्टि से मजबूत कर ही रहा है, बलूचिस्तान के समीप सागर में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कर जलमार्ग से भी भारत की घेराबंदी कर रहा है। कश्मीर समस्या को केवल भारत -पाक समस्या न रहने देने के उद्देश्य से ही पाकिस्तान ने बलात अधिकृत जम्मू कश्मीर राज्य का एक हिस्सा कश्मीर को ही दे दिया है। और अब पाकिस्तान ने गिलगित और बालतिस्तान का अलग राज्य बनाकर समस्या को और उलझा दिया है। भारत विरोध की यह राजनीति चीन और पाकिस्तान की संयुक्त रणनीति है और अब तो चीन दक्षेस का सदस्य बनने के लिए भी जोर लगा रहा है।

तिब्बत के बाद चीन की नजर नेपाल पर ही थी। भारत सरकार की विदेश नीति की विफलता ही कही जाएगी की चीन ने नेपाल में साम, दाम, दण्ड, भेद सभी अस्त्रों का प्रयोग करके वहां सशक्त भारत विरोधी लॉबी, सशस्त्र माओवादियों के रुप में खडी कर ली है। अब माओवादी सत्ता के केन्द्र में भी पहुंच चुके है। उनका एजेण्डा केवल वर्तमान में भारत विरोध नहीं बल्कि हजारों -हजारों सालों से स्थापित भारत -नेपाल के सांस्कृतिक रिश्तों को समाप्त करना भी है। पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियांे पर आक्रमण माओवादियों की इसी रणनीति का हिस्सा था। भारत विरोधी माओवादी अहिंसा में विश्वास नहीं करते बल्कि वे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए हथियारों पर ज्यादा भरोसा रखते हैं । ये हथियार उन्हें चीन और बांग्लादेश से ही प्राप्त होते हैं। श्रीलंका में लिट्टे की समाप्ति के बाद पाकिस्तान वहां अपना प्रभाव बढाने की कोशिश कर रहा है। लिट्टे के कारण सिंघली जनमानस भारत विरोधी बने, इस प्रयास में चीन व पाक दोनों लगे हुए हैं। तमिल व सिंघली समस्या का समाधान कैसे हो -इसका रास्ता अभी तक भारत सरकार नहीं खोजपायी। इसका एक कारण, यह भी है कि भारत सरकार दोनों देशों के सांस्कृतिक रिश्तों का उपयोग करना नहीं चाहती। सरकार की दृष्टि में भारत की संस्कृति और सांस्कृतिक रिश्ते ही साम्प्रदायिकता के द्योतक हैं। जबकि दो देशों में सम्बंधों को सबसे मजबूत आधार सांस्कृतिक रिश्ते ही होते हैं। अन्य कारणों को घ्यान में रखकर रिश्ते बनाए जाएंगे तो उसमें चीन और पाकिस्तान प्रतिद्वन्दी बन ही जाएंगे।

बांग्लादेश का पाकिस्तान से अलग होने का कारण उसकी अलग भाषायी और सांस्कृतिक पहचान ही थी। भारत ने बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेकिन निर्माण के तुरंत बाद वहां चीन और अमेरिका जैसी शक्तियां सक्रिय हो गयी। वे नहीं चाहती थी कि बांग्लादेश में भारत के प्रति सद्भावना कायम रहे। पाकिस्तान की कट्टर इस्लामी शक्तियां तो बांग्लादेश में सक्रिय हो ही गयी थीं। धीरे-धीरे बांग्लादेश में भी कट्टर इस्लामी ताकतों की प्रभावकारी भूमिका बन गयी और यह देश पूर्वोत्तर में भारत विरोधी ताकतों का अड्डा बन गया। बांग्लादेश का भारत विरोधी ताकतों का अड्डा बनना अपने आप में भारत सरकार की विदेश नीति की सबसे बडी विफलता कही जाएगी। दरअसल, भारत सरकार अपनी विदेश नीति भौतिक कारकों पर आधारित रखती है जबकि इस क्षेत्र में सम्बंधों को आधार बहुत बडे स्तर पर सांस्कृतिक कारक ही हैं। दक्षेस में इस सांस्कृतिक एकता को प्रमुख आधार बनाया जा सकता था लेकिन भारत सरकार संस्कृति की बात करने से ही शरमाती रही। और अब 28 -29 अप्रैल को भूटान की राजधानी थिम्फू में दक्षेस के सोलहवें सम्मेलन में पाकिस्तान के राष्टृपति गिलानी ने आतंकवाद की नयी व्याख्या करके दक्षेस के आधार को ही हिला दिया है। दक्षेस अपने देशों के लोगों के विकास के लिए, एक संयुक्त रणनीति के अनुसार आतंकवाद से लडना चाहता है लेकिन बकौल गिलानी आतंकवाद की जडें इतिहास में हैं। और शायद गिलानी के अनुसार इतिहास दृष्टि वही सही है जिसकी व्याख्या पाकिस्तान या फिर अमेरिका कर रहा है। गिलानी ने अपने भाषण में आतंकवाद का कारण आर्थिक असंतुलन और अन्याय भी बताया। आतंकवाद को यह दार्शनिक आधार प्रदान करने के दो लाभ हो सकते हैं। पाकिस्तान कश्मीर में अपनी आतंकवादी गतिविधियों के लिए इतिहास में घुस सकता है और आर्थिक कारणों का उल्लेख करके उसने आतंकवाद की मार्क्सवादी व्याख्या कर दी है जो शायद चीन को भी अच्छी लगे। दक्षेस को बने 25 वर्ष पूरे हो गए हैं। दक्षेस में भारत की सफलता की खोज तो की ही जानी चाहिए। साथ ही, इस बात का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि भारत सरकार अपने निकटस्थ पडोसी देशों में भी भारत विरोधी शक्तियों के कूटनीतिक एवं राजनीतिक प्रयासों को विफल क्यों नहीं कर पा रही।

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