लेखक परिचय

बृजेन्द्र अग्निहोत्री

बृजेन्द्र अग्निहोत्री

• जन्म : 02 जनवरी 1984 को फतेहपुर (उ.प्र.) के रेंय गांव में। • अर्थशास्त्र, ग्रामीण विकास व मानवाधिकार में स्नात्कोत्तर उपाधियां। मार्गदर्शन, आपदा-प्रबंधन, पारिवारिक शिक्षा व एचआईवी/एड्स जैसे विषयों में डिप्लोमा/प्रमाणपत्र कार्यक्रम। • दो काव्य संग्रह 'यादें' व 'पूजाग्नि' प्रकाशित तथा दो 'ख्वाहिशें' व 'पहचान' प्रकाशन की कतार में। • साहित्यिक पत्रिका 'मधुराक्षर' व समाचार पत्र 'आख़िर लिखना पड़ा' का संपादन-प्रकाशन। • 2001 से 'भारतीय समाज कल्याण समिति' के द्वारा सामाजिक कार्यों में संलिप्त।

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बृजेन्द्र अग्निहोत्री

महात्मा गाँधी का नाम सुनते ही हमारी स्मृति में एक देवतुल्य आकृति आ उभरती है। आजादी की चर्चा होते ही, महात्मा गाँधी का स्मरण अनासास हो जाता है। हमें यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि आज दासता की जंजीरों से मुक्त, हम जो खुले आसमान के नीचे सांस ले रहे है वह इसी महापुरुष की देन है। भारत में किसी भी अधिवासी के लिये महात्मा गाँधी को विस्मृत करना असंभव है। आप उनका विरोध कर सकते हैं, उनका तिरस्कार कर सकते हैं, उनकी प्रशंसा कर सकते हं, उनका उपहास कर सकते है, लेकिन उन्हें भुला नहीं सकते। इस ब्रह्मांड में ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो भारतीयों के मानस-पटल से उन्हें निकाल सके ।

23 जून 1757 की शाम को हमारे देश को गुलामी की जड़ों ने मजबूती से उस समय पकड़ लिया था, जब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच युद्ध हो रहा था…..मीरजाफर की गद्दारी के चलते एक ऐसा दृश्य उपस्थित था कि जिसमें दुश्मन से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली सेनायें दुश्मन से हारने के लिए मोर्चे पर आयी थी और फिर देश में गुलामी की जड़ों ने अपना प्रसार शुरू कर दिया। इंग्लैड के हितों के लिये भारत के उद्योग-धन्धे बर्बाद कर दिये गये। हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने के लिये गहरे जाल फैलाये गये। एक-दूसरे को आपस में लड़ाकर, रिश्वत के जोर से घर-घर में विश्वासघातियों को बढ़ावा देकर जमे हुये घरानों (खानदानों) को, जो उस समय समाज व्यवस्था के मजबूत स्तम्भ थे, उखाड़ फेंका गया। कुल मिलाकर देश को पूरी तरह गुलाम बनाने के लिये देश की संस्कृति, सभ्यता, व्यापार, व्यवसाय व शिक्षा को अंग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया।

बिना क्रान्ति के विकास की कल्पना कोरी गल्प के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। क्रान्ति की शुरुआत विद्रोह से होती है। और विद्रोह वही करता है, जिसके अन्दर अपना रक्त बहाने का हौसला होता है। हमारे देश में क्रान्ति का इतिहास बहुत पुराना है। भगवान राम ने उत्तर-दक्षिण भारत की एकता की क्रान्ति का बीज रोपा तो श्रीकृष्ण ने पूर्व-पश्चिम भारत की क्रान्ति का। बुध्द ने सामाजिक जड़ता के विरुध्द क्रान्ति का आगाज़ किया तो महात्मा गांधी ने अहिंसक क्रान्ति का। सौ साल तक धीरे-धीरे विद्रोह की चिंगारी सुलगती रही…ज्वाला बनी और विद्रोह के विस्फोट की तैयारी सुनिश्चित हो गयी। दासता के विरूध्द क्रान्ति की तिथि का निर्धारण 31 मई 1857 किया गया। लेकिन भला क्रान्ति के विस्फोट की तिथि कभी कोई पहले से निर्धारित कर पाया है। शायद इसीलिए यह विस्फोट निर्धारित तिथि से दो माह पहले 21 मार्च 1857 को ही हो गया ।

वाराणसी में हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्धाटन का अवसर था। इस विशाल उत्सव में अंग्रेजी पदाधिकारियों से लेकर देश के राजा-महाराजाओं का जमघट लगा था। एक से एक शानदार व्यक्तित्व … सभी अधिक से अधिक जेवरों से लदे। उत्सव का सामियाना ऐसा कि जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो..।

गाँधी जी एक वर्ष पहले अफ्रीका से लौटे थे। सत्याग्रह की वजह से उन्हें कुछ लोग जानते थे, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनका कोई स्थान नहीं था। उन दिनों गाँधी जी कठियावाड़ी बंडी और धोती पहनते थे। सिर पर साफा भी शोभायमान रहता था। समारोह चल रहा था। सभी वक्ता अपने भाषणों की कपोल कल्पना के माध्यम से मोहक समां बांध रहे थे। श्रोता स्वयं को किसी दूसरी दुनिया में महसूस कर रहे थे। गाँधी जी का नंबर आया तो लोगों ने उन्हें आश्चर्य से ऐसे देखा, जैसे मीठे गुड़ के बीच कीट। और गाँधी जी ने अपने पहले वाक्य से ही स्वाद किरकिरा कर दिया। उन्होंने अपने पहले ही वाक्य से सबको झकझोर दिया, नीद से जगा दिया, स्वप्न तोड़ दिया –

”……..मैंने हर अंधेरे कोने में मशाल जला कर देखा है और चूंकि आपने मुझे बातचीत की यह सुविधा दी है, मैं अपना मन आपके सामने खोल रहा हूँ….। आप लोग एक क्षण के लिये भी इस बात को अपने मन में जगह न दे कि जिस आध्यात्मिकता के लिये इस देश की ख्यति है और जिसमें उसकी कोई उपमा नहीं, उस आध्यात्मिकता का संदेश, बातें बघार कर दिया जा सकता है।”

और फिर मानों गहरी नींद में डूबे लोगों के ऊपर ठन्डे जल से भरा घड़ा ही उडे़ल दिया-

”…. हम भाषण देने की कला के लगभग शिखर पर जा पहुँचे हैं। अब तो हमारे मनों में स्फुरण और हाथ-पांव हिलने चाहिए।”

अंग्रेजी भाषण देने वालों पर वह भड़के-

”पिछले दो दिनों से यहां जो भाषण दिये गये, यदि उनमें लोगों की परीक्षा ली जाये और मै परीक्षक होऊँ, तो निश्चित है कि ज्यादा लोग फेल हो जायें, क्योंकि इन व्याख्यानों ने श्रोताओं के हृदय नहीं छुये।”

गहनों से लदे विलासी राजा-महाराजाओं पर वह सिंह की तरह गरजे –

”जब गहनों से लदे इन अमीर उमरावों से भारत के लाखों लोगों को मिलाता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि इन अमीरों से कहूं कि जब तक आप अपने जेवरात नहीं उतारते और इन गरीबों की धरोहर मानकर नहीं चलते, तब तक भारत का कल्याण नहीं है।”

राजाओं के ईश्वर वायसराय को भी उन्होंने नहीं बख्शा-

”पुलिस के पहरे में जुलूस निकलवाने का मरणान्तक दु:ख भोगने से उनका मर जाना अच्छा है।”

ऐसी बातें उन्होंने कब सुनी थी। बेचारे, परेशान हो गये। ऐनी बेसेंट तो इतनी परेशानी हुई कि भाषण खत्म करने को कह बैठी। गाँधी जी ने अध्यक्ष की तरफ देखा। अध्यक्ष दरभंगा के महाराज सर रामेश्वर सिंह थे। उन्हांने कहा की संक्षेप में कहिये और गाँधी जी फिर दहाडे –

”….यदि किसी दिन हमें स्वराज्य मिलेगा तो अपने पुरुषार्थ से मिलेगा, अंग्रेजों के दान से नहीं।”

मंच पर कानाफूसी आरम्भ हो गई। लोग एक-एक कर खिसकने लगे। गाँधी जी का भाषण अधूरा रह गया। लेकिन यही अधूरा भाषण, आगे चलकर गाँधी-क्रांति का घोषणा-भाषण सिद्ध हुआ।

कांग्रेस में गोखले के वर्चस्व के बाद गाँधी जी का उदय हुआ। 19 फरवरी 1915 को गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उनके राजनीतिक गुरू ने उन्हें राजनीति में आने से पहले भारत की विभिन्न स्थितियों का, विभिन्न परिप्रेक्षो में अध्ययन करने को कहा, गाँधीजी ने वही किया। इन्होंने 23 नवम्बर 1919 की खिलाफत काफ्रेंस में पहली बार ‘नान कोआपरेशन’ शब्द का प्रयोग किया और 1920 में पूरा देश इससे परिचित ही नहीं, सराबोर हो गया।

17 नवम्बर 1921 में ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ के आने के विरोध में पूरे बम्बई ने हड़ताल की, जबकि पूरे देश में शान्ति थी। बम्बई में हिंसा भड़काई गई। गवर्नर ने शाही मेहमानों का स्वागत किया, जिसमें पारसी, यूरोपियन और एंग्लो इंडियन भी शामिल थे। असहयोगियों ने इन पर बरसना शुरू कर दिया… 18 से 21 नवंबर तक गोलियां चलती रही। पुलिस ने भी गोलियां चलाई। 400 से अधिक लोग घायल हुए और 53 मारे गये। गाँधी जी इस घटना से बहुत दु:खी थे। दंगों में घूमे… लोगों को रोका, लेकिन जनता पर दूसरा जुनून सवार था। गाँधी जी की यह बात नहीं सुनी गई। गाँधी जी हैरान थे कि उनके अहिंसा के पढाये बरसों के पाठ का जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। अब उन्होंने अपना आखिरी रामबाण छोड़ा और भूख हड़ताल (तीन दिन का व्रत) रखा तथा लोगों से सत्याग्रह का अनुग्रह किया। उसी समय चितरंजन दास के पुत्र और पत्नी दोनों को खादी बेचने के अपराध में गिरफ्तार किया गया। फिर तो जेलें भरने लगी। गाँधी जी का रामबाण काम कर गया। जनमानस पुन: अहिंसक रास्ते पर चल पड़ा था। लोगो से वह कहते थे-

”…..मुझे प्राय: ख्याल आता है कि या तो जल्दी से जल्दी भारत से भाग निकलूँ या उसे जल्दी से जल्दी स्वतंत्र करूं। स्वतंत्रता का इतना ही अर्थ है कि हम किसी से भी नहीं डरे और हमारे दिल में जो हो वही कह सकें, कर सकें। जो लड़का करोड़ों मनुष्य के सामने सीधे खड़ा रहकर अपनी बात कह सके, वह सच्चा साहसी है। इसलिए आपके लिए पहला पाठ तो ‘ना’ कहना सीखना है। यह ज्यादा अच्छा है कि आप प्रतिज्ञा न ले, प्रतिज्ञा लेकर तोड़ना भयंकर अपराध हैं……शास्त्रों में कहा गया है कि प्रतिज्ञा लो तो उसके लिए मरो।…हाँ, व्याभिचार की…झूठ की प्रतिज्ञा ली है, तो अवश्य तोड़ी जा सकती हैं। पर त्याग की प्रतिज्ञा कभी बदली नहीं जा सकती। प्रतिज्ञा भंग से जो दु:ख हुआ मैं उसे व्यक्त किये बिना नहीं रह सकता। इसलिए मैं विनयपूर्वक कहता हुँ कि कसम न लो और कसम लो तो पृथ्वी रसातल में चली जाये तो भी उसे न तोड़ो।”

उत्तर प्रदेश के हरिद्वार-क्षेत्र खासकर पौड़ी में दासों की मंड़ी लगती थी। यहां मनुष्य खुलेआम जानवरों की तरह बिका करते थे। अंग्रेजों ने दास-प्रथा तो बन्द कर दी, लेकिन बेगार-प्रथा के रूप में उसका एक अंश अपना आतंक जनता पर बनाये रखने के लिए बचा लिया। 1920-21 में जब गाँधी जी का खिलाफत असहयोग आंदोलन देश में आंधी की तरह उड़ा, तो देश में बेगार का आतंक भूत की तरह छाया हुआ था। गाँधी व अन्य नेताओं की वाणी देश भर में गूँजी और लोगों में क्रांति का संचार हो गया। विद्रोह आरम्भ हो गया। जगह-जगह बेगार से लोगों ने टक्कर ली और बेगार समाप्त हो गयी।

जहाँ ईसाइयों के अनेक पादरी गाँधी जी की तुलना ईसा मसीह से करते थे। वही ईसाई-धर्म को मानने वाले अंग्रेज इस मसीह को सताने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। 26 अप्रैल 1942 के ‘हरिजन’ में पहली बार गाँधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आन्दोलन की बात कही-

”हिन्दुस्तान के लिए चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो, भारत की और इंग्लैड़ की अच्छी सुरक्षा इसी में है कि अंग्रेज व्यव्स्था और शान्तिपूर्वक समय रहते भारत से चले जायें।”

गाँधी जी ने भविष्यवाणी की-

”यह एक ऐसा आन्दोलन होगा कि इसका महत्व समस्त संसार अनुभव करेगा और यह तो निश्चित है कि इसकी ओर अंग्रेजों का ध्यान आकृष्ट होगा।”

यदि भारत स्वतंत्र हो तो जापान के आक्रमण का सामना कैसे करेगा…? इस प्रश्न पर गाँधी जी का कहना था कि अंग्रेजी फौज, युद्ध के समय तक रुके या अंग्रेज हिन्दुस्तान की हुकूमत मुस्लिम लीग को सौंप दें और कांग्रेस उसे अपना सहयोग दे। लेकिन अंग्रेजों ने एक न सुनी। तब जाकर 7-8 अगस्त 1942 को कांग्रेस महासमिति ने बम्बई में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास कर दिया। इस पर बोलते हुए गाँधी जी ने कहा-

”पूर्ण गति-अवरोध, हड़ताल और समस्त अहिंसात्मक साधनों का प्रयोग करके प्रत्येक व्यक्ति अहिंसा के दायरे में चरम सीमा तक जाने के लिए स्वतंत्र है। सत्याग्रही मरने के लिए बाहर जायें, जीने के लिए नहीं। राष्ट्र का उद्धार केवल उसी अवस्था में होगा, जबकि लोग मृत्यु को ढूंढने और उसका सामना करने के लिए बाहर निकलेंगे। हमारा नारा है-करेंगे या मरेंगे।”

09 अगस्त 1942 की प्रात: ही गाँधी जी गिरफ्तार हो गये। अधिकांश दूसरे प्रमुख नेता भी पूरे देश में इस तरह दबोचे गये कि कोई न बचे। लेकिन हुआ यह कि नेताओं के न रहने पर, हर आदमी अपना नेता हो गया और देश में संसार की सबसे बड़ी जनक्रांति उभर उठी। इस जनक्रांति ने अंग्रेजी सरकार की जड़े हिला दी।

एकता पर जोर देते हुए गाँधी जी कहते थे-

”…यदि हिन्दू और मुसलमान आज एक हो जायें तो संसार की कोई भी शक्ति हमें दबा नहीं सकती।….जैसे उजाला अंधेरे को दूर करता है, वैसे ही हम झूठ को सत्य और बुरी शक्तियों को आत्मबल से नष्ट कर सकते हैं।”

आमजन के अंतर्मन को झकझोरते हुए गाँधी जी भावुक हो उठते थे-

”….आज जिन परिस्थितियों में पढ़ते हैं, उसमें ऐसी ही शिक्षा मिलती है कि मन में मनुष्य का डर रखना पड़े। परन्तु मैं उसे सच्चा एम.ए. कहूंगा, जिसने मनुष्य का डर छोड़कर ईश्वर का डर रखना सीखा हो।…अंग्रेज इतिहासकार कहते हैं कि भारत में तीन करोड़ लोगों को दिन में दो बार पेट भर खाने को नहीं मिलता। बिहार में अधिकांश लोग सत्तू-नमक नि:सत्व खुराक खाकर रहते हैं। जब भुनी हुई मक्की का आटा, पानी और लाल मिर्चों के साथ गले के नीचे उतारते हुए मैंने लोगों को देखा तो मेरी ऑंखों से आग बरसने लगी।….ऐसी स्थिति में आप निश्चिंत होकर कैसे बैठ सकते हैं… मैं कहता हूँ कि हुकूमत राक्षसी है, इसलिए इसका त्याग करना हमारा धर्म है।…शान्तिमय असहयोग करने की ताकत आपमें न आये, तो भारत नष्ट हो जायेगा।”

उनका मानना था-

”…हमें बताया गया है कि हमारे इस देश में कभी देवता निवास करते थे। जिस देश को मिलों की चिमनियों से निकलने वाला धुंआ और कारखानों का कर्कश स्वर भयानक बनाये हुए है; जिसकी सड़कों पर ऐसे मुसाफिरों से भरी गाड़ियां तेजी से इधर-उधर दौड़ रही हैं, जो नहीं जानते कि उनका लक्ष्य क्या है और जो प्राय: भ्रान्त चित्त रहते हैं,… उस देश में देवताओं के निवास की कल्पना करना असंभव है। मैं इन बातों का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि ये भौतिक उन्नति की प्रतीक मानी जाती है, किन्तु इनसे हमारे सुख में एक कण भी वृध्दि नहीं होती।”

गाँधी जी के सपनों का भारत कुछ ऐसा था-

”मैं एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए काम करूंगा, जिसमें ऐसी स्थितियां होंगी कि सबसे गरीब लोग भी इसे अपना ही देश मानेंगे। जिसके निर्माण में उनकी आवाज़ असरदार होगी और भारत एक महान देश होगा, जहां ऊँचे या नीचे वर्ग के लोग नहीं होंगे। जहां सभी सम्प्रदाय के लोग पूर्ण सामंजस्य के साथ रह सकेंगे। ऐसे भारत में न तो अस्पृश्यता का अभिशाप होगा, न शराबखोरी या नशाखोरी का। महिलायें भी पुरुषों जितने अधिकार पा सकेंगी…मेरे सपनों का भारत ऐसा ही है…।”

गाँधी जी का स्वप्न, स्वप्न ही रह गया। आज हम उनसे दूर होते चले जा रहे हैं। हमारे उनके पास पहुंचने और उनको समझकर उनसे प्रकाश लेने की इतनी आवश्यकता शायद कभी नहीं थी, जितनी आज है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विश्रृंखलित, विघटित और विजड़ित होते जा रहे हैं, हम। गाँधी जी के जिन मूल्यों ने हमें एक दिन सबसे बड़े साम्राज्य से नज़रें मिलाकर, उसे निर्भीक चुनौती देने की शक्ति प्रदान की थी। उन मूल्यों को हम भूलते जा रहे हैं हम। यदि इन मूल्यों को हमने पूरी तरह विस्मृत कर दिया, तो वह दिन दूर नहीं जब यह दुनिया ही हमें भूल जायेगी।

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1 Comment on "बिना क्रांति के विकास की कल्पना कोरी गल्प"

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Sanjay Pati Tiwari
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अग्निहोत्री जी, बहुत बहुत धन्यवाद/ आपने बहुत ही अच्छा प्रस्तुतीकरण दिया है/ कम से कम सौ साल पहले के भारत की तस्वीर से लोगों को आज के संदर्भ में सोचने का रास्ता दिया आपने/ बहुत अच्छा लगा/

संजय पति तिवारी

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