लेखक परिचय

पियूष द्विवेदी 'भारत'

पीयूष द्विवेदी 'भारत'

लेखक मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी हैं। वर्तमान में स्नातक के छात्र होने के साथ अख़बारों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी करते हैं। इनका मानना है कि मंच महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं विचार और वो विचार ही मंच को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

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पियूष द्विवेदी ‘भारत’

‘परदे में रहने दो, परदा न हटाओ’, ‘परदा है परदा, परदे के पीछे पर्दानशी है’ ये तथा ऐसे ही और भी तमाम गाने हमारी हिंदी सिनेमा में आये और लोगों की जुबां पर अमर हो गए! इन गानों की सबसे बड़ी खासियत इनमे मौजूद शब्द ‘परदा’ है! ‘परदा’ नाम आते ही प्रायः हमारे दिमाग में घर के दरवाजे पर लटके एक कपड़े का चित्र स्फुरित हो जाता है! परदे से अमूमन लोगों का यही आशय होता है, पर वास्तव में परदे का स्वरुप इससे कहीं व्यापक और विराट है! यहाँ महत्त्वपूर्ण बात समझ की है! चूँकि, किसी की समझ में सुई भी तलवार से श्रेष्ठ है, तो किसी की समझ में तोप भी नही! बस इसीको समझ का अंतर कहते हैं!

सामान्यतः लोग, बाहर से अंदर के लिए दृष्टिबाधित करने के उद्देश्य घर के दरवाजे पर लटकाए जाने वाले एक विशेष आकार-प्रकार के कपड़े को परदा कहते हैं, और ये सही भी है, पर इसके अतिरिक्त भी परदे के बहुतों स्वरुप हैं, प्रयोग हैं! जैसे कि हम जो कपड़ा पहनते हैं, वो परदा है; हम जिस घर में रहते हैं, वो परदा है; यहाँ तक कि अगर हम किसीसे कोई बात छिपाते हैं, तो ये भी परदा ही है! इस प्रकार परदे का स्वरुप अत्यंत व्यापक है! उपर्युक्त बातें के स्वरूपों की व्यापकता की थीं! अब हम बात करेंग जीवन के तमाम क्षेत्रों में परदे के अस्तित्व और प्रभाव की! जरा गौर करते ही ये बात साफ़ हो जाती है कि परदा हमारी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तीनों व्यवस्थाओं को स्पष्टतया प्रभावित करता है!

सामाजिक तौर पर परदा तब अस्तित्व में आ जाता है, जब बात औरतों की हो! हमारे समाज में निर्मित ‘परदा-प्रथा’ इसका एक सशक्त उदाहरण है! परदा-प्रथा, ये हमारे पुरातन पूर्वजों द्वारा औरतों के प्रति निर्मित कुछ नियमों का एक समुच्चय है! इसके अंतर्गत आने वाले नियमों में ‘घूंघट’ का नियम प्रमुख है! घूंघट का नियम विवाहित औरतों, विशेषतः नवविवाहित औरतों के लिए है! इसके अतिरिक्त और भी बहुतों नियम हैं, जो परदा-प्रथा के अंतर्गत आते हैं! जैसे कि, धीरे बोलना; अपने पति के सिवाय किसी अन्य पुरुष से न के बराबर बोलना; किसी बड़े-बुजुर्ग के सामने कुछ खाना-पीना नही, आदि! ये सब नियम ‘घूंघट’ की तरह ही विवाहितों तथा विशेषतः नवविवाहितों के लिए हैं! आज इस आधुनिक युग में ‘परदा-प्रथा’ को समाप्त करने के अनेक प्रयास हुवे और हो रहे हैं, पर हमारे समाज में इसकी बुनियाद इतनी मजबूत है कि इसकी समूल समाप्ती असंभव तो नही, पर उसके समतुल्य अवश्य है!

अगर बात परदे के आर्थिक प्रभाव की करें, तो ये लिखना आवश्यक होगा कि परदे का आर्थिक अस्तित्व अधिक पुराना नही है! आर्थिक क्षेत्र में परदा तब अस्तित्व में आया, जब बढ़ते औद्योगीकरण तथा उसके द्वारा हुवे शहरीकरण के कारण समाज में मध्यमवर्ग का जन्म हुवा एवं ससमय वो सशक्त भी हो गया! इससे पूर्व समाज में दो ही वर्ग थे- उच्च और निम्न – इसलिए सम्पन-विपन्न में कोई भ्रम नही था! पर मध्यमवर्ग के आ जाने से यहाँ भ्रम की स्थिति बन गई, तब इस भ्रम की समस्या के समाधान के लिए परदे का सहारा लिया गया और व्यक्ति के दो प्रमुख परदे- घर और कपड़ा – उसकी आर्थिक दशा के मानक बनें! इस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में परदे का अस्तित्व स्थापित एवं प्रभावी हो गया!

राजनीति और परदे के रिश्ते का इतिहास तो अत्यंत पुरातन और स्वर्णिम है, इस रिश्ते को मजबूती देने वाले एक से बढ़कर एक राजाओं, राजनेताओं से इतिहास भरा पड़ा है, पर इसी इतिहास में कुछ ऐसे राजनेता भी हुवे हैं, जिन्होंने इस रिश्ते की कोई कद्र नही की, वरन ‘पारदर्शिता’ नामक किसी अस्त्र द्वारा बारबार इसकी समाप्ती का ही प्रयास किया! आजादी के तत्काल बाद भारत में भी कुछ ऐसे राजनेता हुवे, जिनके शासनकाल में ऐसा लगा कि परदा अपना राजनीतिक अस्तित्व ही खो देगा, पर यही वो दौर था, जब परदे ने भीषण संघर्ष करके जैसे-तैसे अपना अस्तित्व कायम रखा, फिर धीरे-धीरे वक्त बदला, नई पीढ़ी राजनीति में आयी और उसने परदे के राजनीतिक महत्व को समझते हुवे, राजनीति में उसके अस्तित्व का मजबूती से पुनर्स्थापन किया! अगर आज परदे के राजनीतिक अस्तित्व के विषय में ये कहें, तो अतिशयोक्ति नही होगी कि आज राजनीति में परदा नही है, वरन राजनीति खुद एक परदा बन गई है, जो चोरों, गुंडों आदि का पालन-पोषण और संरक्षण करती है, कर रही है! आज भी राजनीति और परदे के रिश्ते को मिटने के छिटपुट प्रयास अवश्य हो रहे है, पर अब ये रिश्ता ‘एक प्राणदो देह’ वाला हो चुका है, जिसका मिटाना सहज में तो संभव नही ही है!

अब और अधिक क्या कहूँ, चूँकि परदा तो वो शै है, जिसकी महिमा में जितना कहें उतना ही कम है! इसलिए, अंततः यही कहूँगा कि परदे के इस दिव्यज्ञान का उपदेश उन सभी लोगों को देना चाहिए, जो परदे को दरवाजे पर लटका एक कपड़ा-मात्र समझते हैं! हर परदा-विषयक ज्ञाता को ये कार्य पूरी जिम्मेदारी समझ के करना चाहिए, अन्यथा उसे दोष का भागी बनना पड़ सकता है, और तब उसकी रक्षा के लिए कोई परदा भी नही होगा

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