लेखक परिचय

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रहे बल्कि एक सक्रिय पत्रकार की तरह कई अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं पढ़ाई और लिखाई के साथ-साथ मीडिया में सार्थक हस्तक्षेप के लिए मीडिया स्कैन नामक मासिक का संपादन भी कर रहे हैं.

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dalitsयूनिसेफ के सहयोग से दलित आर्थिक आंदोलन और नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स ने मिलकर एक अध्ययन किया है। यह अध्ययन स्कूलों में दलित बच्चों की स्थिति का जायजा लेने के मकसद से किया गया। इसके नतीजे बेहद चैंकाने वाले हैं। बीते दिनों इसे जारी किया गया। इस रपट से एक बात तो बिल्कुल साफ हो जाती है कि अभी भी भारत का समाज दलितों के प्रति घृणा का भाव ही रखता है। इस रपट में जिन-जिन राज्यों का अध्ययन किया गया उन सब राज्यों के स्कूली बच्चों के साथ स्कूल में भेदभाव बस इसलिए किया गया क्योंकि वे दलित थे। इस रपट में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भेदभाव की वजह से बड़ी संख्या में दलित बच्चे अपने आगे की पढ़ाई बरकरार नहीं रख पाते।

इस रपट को चार राज्यों के 94 स्कूलों की हालत का अध्ययन करके तैयार किया गया है। दलित बच्चों के साथ हुए भेदभाव के उदाहरणों से यह रपट भरी पड़ी है। उन उदाहरणों के जरिए एक खास तरह की मानसिकता में जकड़े समाज को समझा जा सकता है। इस रपट को तैयार करने वाले राजस्थान के एक स्कूल में गए। वहां जाकर उन्होंने पूछा कि किस बच्चे को यहां के शिक्षक अक्सर पीटते हैं और क्यों पीटते हैं? इस सवाल का जवाब तुरंत वहां मौजूद बच्चों ने दिया। यह जवाब ऐसा है जो खुद को सभ्य कहने वाले समाज का असली चेहरा दिखाता है। बच्चों ने इस सवाल के जवाब में तुरंत एक ऐसे बच्चे की ओर इशारा किया जो दलित है। उन बच्चों ने यह भी कहा कि दलित होने के नाते वह निशाने पर रहता है।

यह मामला केवल राजस्थान का नहीं है। दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की स्थिति है। बिहार का उदाहरण लिया जा सकता है। इस राज्य में दलितों के नाम पर सियासत करने की पुरानी परंपरा रही है। दलितों के रहनुमा होने का राग अलापने वाले लालू प्रसाद यादव ने इस राज्य पर पंद्रह साल तक राज इसी तरह की राजनीति करके किया। अभी इस राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। वे भी दलितों के नाम पर सियासत करने से बाज नहीं आते। पर इस राज्य के स्कूलों की हालत यह है कि स्कूल के शिक्षक दलित बच्चों के अभिभावकों से इस बात की शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे साफ कपड़े नहीं पहनते और कक्षा में उनके शरीर से बदबू आती है। बिहार की ही एक दलित छात्रा ने बताया कि शिक्षक हम लोगों यानी दलित बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं देते। हमें जमीन पर बैठाया जाता है।

हालात की बदहाली का आलम यह है कि मिड डे मिल में मिलने वाले भोजन में भी दलित छात्रों के साथ भेदभाव बरता जा रहा है। उन्हें जो खाना मिल रहा है उसकी गुणवत्ता सही नहीं होती है। इसके अलावा दलित बच्चों को भरपेट भोजन भी मिड डे मिल योजना के तहत नहीं मिल रहा है। इस तरह की शिकायत कई बच्चों ने की। बिहार के दलित बच्चों ने यह भी शिकायत की कि उन्हें कक्षा में सबसे पीछे बैठने को कहा जाता है। इसके अलावा शिक्षक उनका होमवर्क भी नहीं जांचते हैं। इस भेदभाव के जरिए शिक्षकों की मानसिकता का भी अंदाजा लगाया जा स्कता है। स्कूलों को तो विद्या का मंदिर कहा जाता है। इसके बावजूद अगर वहां जाति देखकर शिक्षा दी जा रही है, जाति देखकर बर्ताव किया जा रहा है तो यह पूरी स्कूली व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

उत्तर प्रदेश में भी दलित बच्चों की हालत अच्छी नहीं है। ऐसा एक दलित महिला यानी मायावती के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद है। मायावती की पूरी सियासत ही दलितों पर आधारित है। कांशीराम ने दलितों के वोट की ताकत को भांपकर ही बसपा की नींव रखी थी। उसी को मायावती ने आगे बढ़ाया और दलितों के रहनुमा होने का ढोंग रचते हुए वे राज्य की मुख्यमंत्री भी बनीं। वैसे उनका इरादा तो इसी सियासत को जारी रखते हुए देश की सत्ता पर काबिज होना भी है। पर खुद उनके राज में दलित बच्चों के साथ जिस तरह का भेदभाव उत्तर प्रदेश के स्कूलों में किया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि दलित मुख्यमंत्री होेना अलग बात है और दलितों का उत्थान होना बिल्कुल अलग सी चीज है। उत्तर प्रदेश के स्कूलों में दलित बच्चों की हालत को देखकर जिस मायावती को राज्य की सत्ता के शीर्ष पर देखकर वहां के दलित खुश होते हैं और उन्हें अपना नुमाइंदा समझते हैं उस मायावती के लिए दलित सिर्फ वोट पाने का जरिया मात्र हैं।

दलित बच्चों के साथ स्कूली स्तर पर हो रहे भेदभाव की रपट तैयार करने वाले जब उत्तर प्रदेश गए तो वहां के बच्चों ने कई तरह की शिकायतें कीं। दलित बच्चों ने बताया कि उन्हें स्कूल के शौचालय के इस्तेमाल करने से रोका जाता है। उत्तर प्रदेश में दलित बच्चों को कई ऐसे काम दिए जाते हैं जिसके बारे में यह माना जाता है कि उसे कुछ खास जाति के लोग ही कर सकते हैं। यहां के बच्चों को शौचालय का इस्तेमाल करने से रोकने के कई मामले तो आए लेकिन उन बच्चों को शौचालय साफ करने के लिए जरूर कहा गया। कहना न होगा कि बच्चे स्कूल जाते हैं पढ़ाई करने के लिए। वे शौचालय की सफाई करने वहां नहीं जाते हैं। इसके अलावा इस रपट में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों में बच्चों से सिर्फ दलित होने के कारण स्कूल परिसर की सफाई करवाने और पानी भरवाने का काम करवाया जा रहा है।

पहली बात तो यह कि इस तरह के काम किसी भी स्कूली छात्र से करवाना गलत है। दूसरी बात यह कि इस तरह के कामों के लिए स्कूलों में अलग से व्यवस्था होनी चाहिए। एक तरफ तो छात्रों को स्कूल तक लाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ अगर छात्रों से इस तरह का काम करवाया जाएगा तो जाहिर है कि वे स्कूल छोड़ने की फिराक में ही रहेंगे। स्कूलों में छात्रों से काम लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। बच्चे स्कूल जाते हैं पढ़ाई करने के लिए। वे वहां काम करने नहीं जाते। अगर उन्हें इस तरह का काम ही करना हो तो उनके पास हजारों  रास्ते हैं।

स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव के कई दुष्परिणाम स्वाभाविक तौर पर सामने आते हैं। जब इन बच्चों के प्रति शिक्षकों का रवैया ही भेदभावपूर्ण रहेगा तो स्वाभाविक है कि उस स्कूल के गैर दलित बच्चों के मन में भी दलित बच्चों के प्रति एक खास तरह का पूर्वाग्रह पैदा होगा। वहीं दूसरी तरफ दलित बच्चे हीनभावना से ग्रस्त होते जाएंगे। ऐसा हो भी रहा है। इसका परिणाम बड़ा भयानक हो रहा है। पहली बात तो यह कि भेदभाव की वजह से शुरुआत से ही दलित बच्चों को अवसरों की असमानता की समस्या से जूझना पड़ता है। आगे चलकर यही उन्हें शिक्षा से बाहर कर देता है। जो किसी तरह अपनी शिक्षा बरकरार रख भी पाते हैं उनके मन में भी कुछ खास तरह की बातें घर कर जाती हैं। जिससे वे जल्दी उबर नहीं पाते है और इसका उनके काम पर इसका बुरा असर पड़ता है।

खैर, इस रपट में यह भी बताया गया है कि ज्यादातर स्कूल वैसे जगह पर हैं जो उच्च जाति के लोगों के दबदबे वाला क्षेत्र है। बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खास तौर पर ऐसी स्थिति है। इस रपट में यह अनुमान लगाया गया है कि दलित बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए औसतन आधे घंटे का सफर करना पड़ता है। महाराष्ट में दलित बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए बहुत ज्यादा सफर नहीं करना पड़ता है। पर यहां भी ज्यादातर स्कूल उन्हीं क्षेत्रों में हैं जहां उच्च जाति वालों का दबदबा है।

दरअसल, स्कूलों में भेदभाव होना कई तरह के सवाल खडे़ करता है। पहली बात तो यह कि अगर स्कूलों में भेदभाव हो रहा है तो कहीं न कहीं शिक्षा व्यवस्था में कोई गंभीर खामी है। अपने यहां स्कूलों को विद्या का मंदिर माने जाने की परंपरा रही है। पर सही मायने में वैसे जगह को मंदिर कहना सही होगा क्या जहां सिर्फ किसी खास जाति में पैदा होने के आधार पर भेदभाव हो? वहीं दूूसरी तरफ शिक्षकों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। भारत में तो शिक्षकों को बेहद सम्मान दिया जाता रहा है। पर अगर उनका बर्ताव बच्चों में भेदभाव वाला हो तो यह बेहद चिंताजनक है। शिक्षक की नजर में स्कूल में पढ़ने वाला हर बच्चा समान होना चाहिए। तब ही वह सही ढंग से अपने दायित्व का निर्वहन कर पाएगा। पर अगर उसका रवैया ही भेदभाव वाला हो तो जाहिर है कि वह समाज के साथ अन्याय कर रहा है। स्कूली शिक्षा के दौरान बच्चों के मन में जो बीज पड़ते हैं उसका असर उनकी पूरी जिंदगी पर होता है। इसलिए भेदभाव को खत्म करने की शुरुआत तो इसी स्तर से होनी चाहिए और इसमें शिक्षकों की बड़ी अहम भूमिका है।

स्कूली स्तर पर बच्चों से भेदभाव करके खांचों में बंटे समाज को जोड़ने का नहीं बल्कि तोड़ने का काम ही किया जा रहा है। कहना न होगा कि बच्चे ही आने वाले समय में हर मोर्चे पर अहम भूमिका में होंगे। इसलिए उनका मानसिक विकास किसी जाति विशेष के प्रति पूर्वाग्रह के साथ होना ठीक नहीं है। इसके अलावा इस शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों के चयन प्रक्रिया में व्याप्त खामियों को भी दूर करना होगा। अहम सवाल यह है कि आखिर वैसे ही शिक्षक इस व्यवस्था में क्यों आ रहे हैं जो जाति के आधार पर भेदभाव कर रहे हैं?

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