लेखक परिचय

पुनीता सिंह

पुनीता सिंह

हिन्दी से एम.ए, साहित्य पढना व लिखना आपकी रुची है। उपल्ब्धि के तौर पर अभिवयाक्ति (कव्य संग्रह) का प्रकाशन, आकाशवाणी से कई रचनाएँ प्रसारित, पत्र - पत्रिकाओं आदि मे पचास से भी अधिक रचनाएँ प्रकाशित।

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india-gate-delhiशुक्रवार की वारिस और लम्बे जाम में दिल्ली वालों को सरकारी दावों का असली रुप देखने को मिला।जलभराव का नजारा भंयकर था। एक घन्टे की वारिश में ये हाल था सोचिये मानसून की अच्छी बरसात शायद दिल्ली को डुबो कर ही रख देती। गाडी बन्द कर कुदरत के कहर के थमनें और ट्रेफिक खुलने के इन्तजार के अलावा कोई दूसरा बिकल्प दिल्लीवालों के पास नहीं रह गया था।चंद मिनटॊं में ही शुक्रवार की शाम अंधेरी रात में बदल गई।मन नगेटिव विचारों से भरने लगा। हादसों के इस शहर में कुछ भी; कभी भी हो सकता है। सड्क धंसने, पेड. गिरने की घट्नायें ऎसे में अक्सर देखी गई है।आम आदमी हालात की चक्की में वैसे ही पिसा पडा है ऎसे में अगर कोई अनहोनी हो जाती है तो हालात बद से बदतर हो जायेंगें।जाम में फंसे सभी लोग भगवान भरोसे थे।जान हथेली पर थी ,ट्रेफिक व्यवस्था नाम की कोई चीज.थी।

किसी तरह घर पहुँचती हूँ ।घरवाले सही सलामत पाकर बहुत खुश थे।टी. वी. की एक खबर पर मेरा ध्यान जाता है-राहुल गांधी हवाईअड्डे से राजीवचौक तक मैट्रो का सफर जाम और बरसात के झमेले से बचने के लिये करते हैं।अच्छा होता राहुल कुदरत के इस कहर को अपनी आखों से देखते;जमीनी हकीकत से जुड्ते और दिल्ली के दिल के दर्द को अपने सीने में कुछ पल के लिये महसूस करते। दिल्ली के लोग प्रतिदिन भारी यातायातअव्यवस्था मॆं अपनी जिन्दगी का कीमती समय बर्बाद करतें हैं। क्या एक आम आदमी के वक्त की कोई कीमत नहीं हैं?इसके अतिरिक्त धुंआ, ध्वनिप्रदूषण,धूलमिट्टी की मार झेलता दिल्ली का आम आदमी अपनी सेहत से भी खिलवाड. करता है।प्रतिदिन जान हथेली पर लेकर बाहर निकलता है और मौत के मुहँ से निकल रात को जब घर में घुसता है तो दूसरी।रोटी, कपडा, मकान,मंहगाई जैसी बुनियादी] समस्यायें सुरसा की तरह मुंह फैलाये उसका स्वागत करतींहैं।सुविधाओं के नाम पर चुनावों मॆं वोट मांगने वाले नेताओं को जनता की इन मुसीबतों से कोई लेना देना नहीं है। हकीकत से बी.आई.पी. नेताओं का मुंह चुरा लेना कितना उचित है?

दिल्ली अब बरसात सहने लायक नहीं रह गयी है।दिल्ली की सड्कें मासूम जनता के खून से सनी रहती है ।बढ्ती जनसंख्या का बोझ दिल्ली की कमर तोड.कर रखा दे रहा है ।क्राइम का ग्राफ बढ्ता जा रहा है;सरकार कुछ सार्थक प्रयास करती नजर नहीं आती। नेता संसद में वक्त बर्बाद कर शोरशराबा करके जनता को दिखाने का प्रयास करते हैं कि वो उनके हमदर्द है पर जब कड्वी सच्चायी से सामना करने का वख्त आता है तो ये नेता अपना रास्ता क्यों बदल लेते है? काटे‘भरे रास्तों पर जब ये चलेंगे ही नहीं तो उसकी चुभन को महसूस कैसे कर पायेगे?सच तो ये है कि नेताओं का जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं है जनता के पैसों से सारी सुविधायें पाकर उनकी असुविधाओं से आखे फेर लेना इनकी फितरत है।इनके शौक है किताबें लिखना,देश विदेश की सैर करना और मीडिया की सुर्खियों में रहना ।जनता को अब इनकी असलियत को पहचानना ही होगा। तभी दिल्ली का दर्द कुछ कम हो पएगा।

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2 Comments on "दिल्ली का दर्द"

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rakesh upadhyay
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you have written a valid point.

परमजीत बाली
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सामयिक पोस्ट लिखी है।वैसे भी दिल्ली में दो तरह के प्राणी ही सुखी रह सकते है…पहले तो नेता….दूसरे अमीर आदमी…..आम आदमी तो मजबूरी में बस समय काट रहा है….

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