लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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भारत नीति प्रतिष्ठान एक शोध संस्‍थान है। इसके मानद निदेशक हैं दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक श्री राकेश सिन्‍हा। श्री सिन्‍हा राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े हैं और संघ के संस्‍थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के जीवनीकार हैं। प्रतिष्‍ठान के बैनर तले विभिन्‍न समसामयिक मुद्दों पर संगोष्‍ठी का आयोजन वे करते रहते हैं। इसी क्रम में गत 14 अप्रैल को प्रतिष्‍ठान ने ‘समांतर सिनेमा का सामाजिक प्रभाव’ विषय पर संगोष्‍ठी का आयोजन किया। वामपंथी कवि-पत्रकार श्री मंगलेश डबराल इसकी अध्यक्षता करने आये थे। इस बात को लेकर वामपंथियों ने श्री डबराल की चहुंओर आलोचना शुरू कर दी। कहा कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के ‘विषैले प्रचारक’ की अगुआई वाली संस्‍था के कार्यक्रम में श्री डबराल क्‍यों गए ? सोशल साइट्स पर यह मामला जमकर उछला। बाद में श्री डबराल ने प्रतिष्ठान में अपनी उपस्थिति को ‘चूक’ बताई।

इसी मसले पर जनसत्ता ने अपने चार रविवारीय अंकों में वैचारिक एवं बौद्धिक संवाद पर बहस चलाया। इसके संपादक श्री ओम थानवी ने 29 अप्रैल को ‘अनन्‍तर’ स्‍तम्‍भ में ‘आवाजाही के हक में’ अपने विचार व्‍यक्‍त किए। इसके बाद पक्ष-विपक्ष में कई लेख लिखे गए। अंत में 27 मई को श्री ओम थानवी ने ‘अनन्‍तर’ में विचार व्‍यक्‍त कर इस बहस को समाप्‍त किया।

प्रवक्‍ता डॉट कॉम का मानना है कि स्‍वस्‍थ बहस लोकतंत्र का प्राण होती है। सब जानते हैं कि अपने देश में शास्त्रार्थ की परंपरा रही है, जिसके माध्‍यम से विभिन्‍न विचारधारा के लोग एक ही मंच पर विचार-विमर्श करते थे। वामंपथियों द्वारा प्रस्‍तुत यह वैचारिक छुआछूत दुर्भाग्यपूर्ण है। वैचारिक एकरूपता और एकरसता लोकतांत्रिक समाज के लिए घातक है। हम चाहते हैं कि प्रवक्‍ता के पाठक और लेखक इस विषय पर अपनी बात रखें जिससे हमारा लोकतांत्रिक समाज और सशक्‍त हो सके। 

इस पूरे प्रकरण को विस्‍तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें : http://www.pravakta.com/category/against-ideological-untouchability

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42 Comments on "परिचर्चा : ‘वैचारिक छुआछूत’"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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विचार को सीमा में नहीं बंधा जा सकता

डॉ. मधुसूदन
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अनुरोध पासवान जी की जून ६ की टिपण्णी पढ़कर असीम आनंद हुआ, जानकारी भी हुयी, इसी भाँति हमें आप उपकृत करते रहें, यह बिनती |

डॉ. मधुसूदन
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प्रवक्ता को एक प्रेम भरी चेतावनी|
यदि हम अपना मस्तिष्क बहुत ही खुला रखेंगे, तो यह जड़वादी, उसमें कचरा कूड़ा डाल डालकर, उसकी पहचान और गरिमामयी छवि ही समाप्त कर देंगे|
प्रवक्ता को पाठक पढ़ने इस लिए आते हैं, क्यों कि यहाँ उन्हें शुद्ध और देशहितकारी विचार पढ़ने मिलते हैं|
कीचड़ उछालने के लिए भी विचार स्वातंत्र्य का और वाणी स्वातंत्र्य का उपयोग किया जाता है|
ऐसे ही स्वातंत्र्य के परिणामों से पश्चिम सांस्कृतिक विनाश की ओर शनैः शनैः आगे बढ़ चुका है|
आपकी छवि समाप्त करना ही क्षुद्र विचारधाराओं का लक्ष्य है|

Niharika
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प्रवक्ता विचार जगत का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है. आज इसने वैचारिक दुनिया को गोलबंद करने का कम किया . इसके लिए इसके संपादक को बधाई. पर जब मी विचारिक छोआछोत के ऊपर काफी अच्छे लेख आये हैं. विपिन सिन्हा, अम्बचरण , राकेश सिन्हा के लेखो में तर्कपूर्ण बात है. परन्तु किसी वामपंथी ने अबतक प्रतिवाद नहीं किया है. वे यहं भी इसकी उपेक्षा कर छूअछोत ही कर रहे हैं. इसलिए वे राकेश सिन्हा की रणनीति में फसकर परेशां हुए. आज वामपंथ का बार धरा इसमें उलझ गया की संघ समर्थित मंच पर जाए या नहीं. प्रवक्ता ने विचार… Read more »
Mohinder
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I request Anurodh to extend his article and further the debate by arguing points for dialogue..

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