लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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-प्रवीण दुबे-
election 2014

लोकसभा 2014 का चुनाव एक आम चुनाव भर नहीं था, यह देशवासी समझ रहे थे। प्रशंसा करनी होगी, अभिनंदन की पात्र है देश की जनता जनार्दन जिसने देश के नव निर्माण का एक स्पष्ट जनादेश दिया है। देश के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का परिणामों के बाद पहला ट्वीट बेहद कम शब्दों में जनादेश की सम्पूर्ण भावना को परिलक्षित करता है। वे कहते हैं यह भारत की जीत है। निश्चित रूप से यह विजय अकेले श्री नरेन्द्र मोदी की जीत नहीं है यह विजय सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की भी नहीं है। यह विजय सिर्फ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की भी नहीं है। यह जीत कश्मीर से कन्याकुमारी तक एवं द्वारका से मेघालय तक देश के विश्वास की जीत है। जनादेश 2014 स्वयं अपने आप में एक अद्भुत जनादेश है। 1977 में आपातकाल के खिलाफ एक जनाक्रोश था और कांग्रेस उस आक्रोश की आंधी में धराशायी हुई थी, पर तब जनादेश सिर्फ एक आक्रोश का प्रगटीकरण था। 1984 में भी देश ने कांग्रेस को एकतरफा समर्थन दिया था। पर वह एक भावुक जनादेश था, जनादेश में स्व. इंदिरा गांधी के प्रति श्रद्धांजलि थी 2014 का परिदृश्य अलग है। आज 2014 में देश कांग्रेस के कुशासन से त्रस्त था। दु:खी भी था, पर यह जनादेश सिर्फ गुस्सा लिए हुए नहीं है। 2014 का जनादेश विश्वास का जनादेश है। आस्था का जनादेश है। यह जनादेश उमंग का जनादेश है और नि:संदेह सकारात्मक ऊर्जा लिए इस जनादेश के शिल्पी अभिनंदन के पात्र हैं, वंदनीय हैं।

कौन है शिल्पी- निश्चित रूप से, निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक विजय के नायक आज नरेन्द्र मोदी ही हैं। सियासत उन्हें विरासत में नहीं मिली है। विरासत में मिले हैं उन्हें संस्कार और आज इन संस्कारों का ही परिणाम है कि श्री मोदी ने अपने पुरुषार्थ का प्रगटीकरण किया परिश्रम की पराकाष्ठा की और राजनीतिक पंडितों को झुठलाते हुए असंभव को संभव कर दिखाया। निश्चित रूप से वे बधाई के पात्र हैं, अभिनंदन के अधिकारी हैं।
श्री मोदी को इस विजय के लिए आज मैन ऑफ द नेशन की संज्ञा राजनीतिक विश्लेषक दे रहे हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है। लेकिन यह भी एक सच है कि जनादेश की यह अधूरी एवं अपूर्ण व्याख्या होगी। वस्तुत: नरेन्द्र मोदी एक प्रतीक हैं। यह जनादेश एक व्यक्ति की जीत नहीं है। आज नरेन्द्र मोदी विश्वास का दूसरा नाम है, पर्याय है। रेखांकित करें इन पंक्तियों को कारण फिर एक बार बौद्धिक अय्याशी करने वाले इस जनादेश को विकृत रूप देने का प्रयास कर रहे हैं। देशवासियों ने आसेतु हिमाचल भारतीय जनता पार्टी के विचारों के प्रति अपना विश्वास प्रगट किया है पर, वे जनादेश का अपमान करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।

अब परिदृश्य भाजपा या मोदी बनाम राजनीतिक दल नहीं बल्कि देश बनाम राजनीतिक दल बन रहा है। जो बेहद खतरनाक है। उन्हें यह अब समझना ही होगा कि यह जीत राष्ट्रवादी विचारों की स्वीकृति की जीत है। सुदूर पूर्वांचल में आज अगर भाजपा का परचम लहरा रहा है, अगर आज जम्मू-कश्मीर में भाजपा की जीत का उत्सव है। अगर आज दक्षिण में पश्चिम बंगाल में भी कमल खिल रहा है, तो यह राजनैतिक परिवर्तन अकस्मात नहीं आया है। यह वर्षों की साधना का परिश्रम का प्रतिफल है और इस जनादेश के रचयिताओं में उन सब हजारों लाखों कार्यकर्ताओं का भी योगदान है जिनका इतिहास में कहीं नाम नहीं आएगा और इसीलिए यकीनन यह जनादेश आज उनको भी प्रणाम करता है। राजनीतिक विश्लेषकों को कम से कम अब अपनी आंखों के मोतियाबिंद का इलाज करा ही लेना चाहिए। उन्हें यह समझना ही होगा, मानना ही होगा कि यह जनादेश उसी वैचारिक अधिष्ठान की जीत है। जिसके मूल में राष्ट्रवाद है। वरना वे भी उसी तरह खारिज होंगे। जैसे आज कांग्रेस हुई है। आजादी के बाद से अब तक के इतिहास में यह कांग्रेस का सर्वाधिक खराब प्रदर्शन है। वह भी तब जब वह अपने बुजुर्ग नेतृत्व को परम्परानुसार पीछे ढकेल कर कट्टर सोच नहीं युवा जोश के साथ राहुल गांधी को आगे बढ़ा रही थी। परन्तु कांग्रेस सैकड़ा तो दूर 50 का आंकड़ा पार नहीं कर पाई। किसी राज्य में दहाई तक न पहुंचना और कहीं-कहीं खाता न खुलना संकेत है इस बात का कि देश कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बढ़ रहा है। कांग्रेस मुक्त भारत का आशय भ्रष्टाचार मुक्त भारत, तुष्टीकरण मुक्त भारत, जाति मुक्त भारत, अहंकार मुुक्त भारत, विभेदकारी राजनीति मुक्त भारत। यही कारण है कि देश में दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस आज न केवल सत्ता से बाहर है, अपितु देश में आज विपक्षी दल होने का विश्वास भी खो रही है। जनादेश ने क्षेत्रीय दलों की अतिमहत्वाकांक्षा पर भी एक अल्प विराम लगाया है। इन दलों को भी आज स्वयं का आत्म निरीक्षण करना होगा कि वे क्यों आम परिदृश्य से बाहर हैं। भाजपा नेतृत्व ने अपना सम्पूर्ण प्रचार अभियान विकास एवं सुशासन के मुद्दे पर लड़ा और वे देश का विश्वास जीतने में सफल रहे। विजय की वेला में भाजपा नेतृत्व भी यह समझ रहा है कि, अपेक्षाएं हिमालयी हैं। रातों रात परिवर्तन संभव नहीं है। पर राजनीतिक इच्छा शक्ति, नीयत में पारदर्शिता एवं कठोर अनुशासन देश की तस्वीर बदल सकता है। सुखद संकेत है कि भाजपा का श्रेष्ठी नेतृत्व अवसर मिलने पर स्वयं को हमेशा प्रमाणित करता है। फिर एक बार एक सुअवसर उसके हाथ में है। देशवासियों की शुभकामनाएं उसके साथ हैं।

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