लेखक परिचय

अनुशिखा त्रिपाठी

अनुशिखा त्रिपाठी

लेखिका स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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kamalआतंकवाद पर बनी कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर विवादों का साया गहरा गया है। विवाद की शुरुआत उस वक़्त हुई जब इस हफ्ते हैदराबाद के एक व्यवसायी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ९५ करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म पर रोक लगाने की मांग की थी। फिल्म को २५ जनवरी को ही प्रदर्शित किया जाना था लेकिन फिल्म में मुस्लिम समुदाय को नकारात्मक तरीके से पेश करने की शिकायत के बाद तमिलनाडु सरकार ने इसके प्रदर्शन पर दो सप्ताह तक की रोक लगा दी थी। हासन द्वारा इस प्रतिबंध के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश के वेंकटरमण ने शनिवार को फिल्म देखी थी और फैसला सोमवार को सुनाने को कहा था। सोमवार को सुनवाई के दौरान हासन के वकील ने प्रतिबंध को चुनौती दी और मुख्य मामले के साथ सुनवाई का आग्रह किया था। यह प्रतिबंध जिलाधिकारी ने आपराधिक दंड संहिता की धारा १४४ के तहत राज्य में लगाया गया है। विवाद के चलते फिल्म को ३० से ८० करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। तमिल, तेलुगू और हिंदी में एक साथ बनाई गई इस फिल्म को कर्नाटक में भी समस्या का सामना करना पड़ा था लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने बेंगलुरु के १७ सिनेमाघरों सहित कर्नाटक के ४० सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति दे दी है और अब पुलिस की ओर से पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था किए जाने के बाद राज्य भर में इसका प्रदर्शन किया जा रहा है। न्यायालय ने हासन को सलाह दी है कि वह सरकार के साथ मिलकर इस विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की कोशिश करें। किन्तु इस बीच हैदराबाद के व्यवसायी मोहम्मद हाजी ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में फिल्म पर रोक लगाने की मांग करती अपनी याचिका में कहा है कि यह मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है। वहीं तमिलनाडु सरकार ने भी विश्वरूपम पर बैन लगाने के लिए हाईकोर्ट में अपील कर दी है। अपनी फिल्म पर हो रही राजनीति से दुखी होकर कमल हासन ने एक पत्रकार वार्ता में धमकी भरे लहजे में कहा कि यदि उनके साथ न्याय नहीं हुआ तो वे भारत छोड़ किसी सेक्युलर देश में रहना पसंद करेंगे। उन्होंने प्रख्यात चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में उन्हें भी कट्टरपंथियों द्वारा छोड़ने पर मजबूर किया गया।

 

प्रथम दृष्टया तो कमल हासन की इस बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखती कि भारत सेक्युलर देश नहीं है। भारत जैसी धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता कमल हासन को दुनिया के किसी देश में नहीं मिलेगी। जहां तक एम एफ हुसैन साहब की बात है तो उन्होंने हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्रों की प्रदर्शनी लगाकर उसे कला का दर्ज़ा दिया था जिसे कोई भी धर्म या सम्प्रदाय स्वीकार नहीं कर सकता। हालांकि हुसैन साहब का भारत छोड़कर जाना देश के लिए अपूरणीय क्षति थी किन्तु यह भी साबित हुआ कि उन्होंने अपनी स्वेच्छा से भारत छोड़ा था न कि किसी के दबाव में। माना कि विश्वरूपम की रिलीज टलने से कमल हासन को आर्थिक नुकसान हुआ है और नुकसान का यह आंकड़ा तब और भी बढ़ जाता है जबकि उन्होंने अपने जीवन की सारी जमा-पूंजी इस फिल्म के निर्माण में लगा दी हो। किन्तु क्या कमल हासन यह भूल गए कि उन्होंने जो भी अर्जित धन अपनी फिल्म विश्वरूपम में लगाया है वह इसी भारत देश से कमाया हुआ है? आज कमल हासन लोकप्रियता के जिस शिखर पर हैं उन्हें उसपर देश की जनता ने ही बिठाया है। उनकी विश्वव्यापी पहचान भारत की ही देन है। ऐसे में कमल हासन का देश छोड़ने का निर्णय भावावेश में लिया गया गलत निर्णय कहा जाएगा। यह भी संभव है कि कमल हासन की धमकी की गंभीरता को देखते हुए तमिलनाडु सरकार विरोध के स्वर को कम कर दे किन्तु हासन ने जाने-अनजाने जिस प्रवृति को जन्म दे दिया है उससे हर नेता-अभिनेता देश छोड़ने की धमकी का दबाव देकर सरकार द्वारा अपनी शर्तें मनवा सकता है। चूंकि फिल्म अभी उत्तर भारत में रिलीज नहीं हुई है लिहाजा यह कहना मुश्किल है कि अफगानिस्तान की पृष्ठभूमि और वहां प्रायोजित आतंकवाद के चित्रण से भारत के मुस्लिम समुदाय की भावनाएं कैसे आहत होंगी किन्तु इतना तो तय है कि विवाद की वजह का हल देश के साम्प्रदायिक सौहार्द को बरकरार रखते हुए होना चाहिए। फिल्में किसी भी समाज का आईना होती हैं और यह बात अभिनेताओं से लेकर निर्माताओं को भी सोचना चाहिए। विश्वरूपम पर उत्पन्न विवाद ने भारतीय सिनेमा को आत्ममंथन पर मजबूर किया है। ताजा विवाद से विश्वरूपम का हिट होना तय है और हासन की झोली में नोटों की बरसात भी होगी किन्तु विवाद से उत्पन्न तनाव ने कितनी ही संस्थाओं के अमूल्य समय को नष्ट किया है। पूरे मसले को सभी संबंधित पक्ष साथ बैठकर सुलझाएं और यही हमारी संस्कृति भी है।

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