लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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अषोक गौतमkumbh

कुंभ स्नान के लिए पार्वती प्रभु से बारबार आग्रह कर रही थीं पर प्रभु थे कि कोर्इ न कोर्इ बहाना बना पार्वती की बात टाल जाते। आखिर जब कुंभ खत्म होने के सिरे आया तो पार्वती ने प्रभु से कहा ,’ हे प्रभु! मैं जितनी बार कुंभ स्नान करने को कहती हूं आप हर बार कोर्इ न कोर्इ बहाना कर मेरे आग्रह को क्यों टाल जाते हैं? इसका अभिप्राय यह तो नहीं कि हम पाप के बोध से ऊपर उठे होते हैंं। या यह मान लिया गया है कि हम कोर्इ पाप ही न नहीं करते? पर पार्वती की बात सुन अबके भी प्रभु चुप रहे तो पार्वती ने आगे कहा,’ अगर प्रभु आपकी इच्छा नहीं तो मैं नंदी के साथ ही कुंभ में स्नान कर आती हूं,’ यह सुन प्रभु ने कहा,’ हे देवि! क्या करोगी कुंभ में स्नान कर? देखती नहीं कि कुंभ के स्नान के बाद संगम कितना दूषित हो गया है? अमरत्व चाहने वाले हलाहल में डुबकियां लगा रहे हैं। ऐसे में क्या तुम भी संगम को दूषित करवाने वालों में अपना नाम लिखवाना चाहती हो तो चलो ! कुंभ में नहाने के बाद बीमार पड़ गर्इ तो मुझे दोष मत देना ,. कह प्रभु ने अपना त्रिशूल उठाया और चलने को हुए।

पर कुंभ में स्नान की जिद ठान चुकी पार्वती नहीं मानी तो नहीं मानी। और…. पार्वती पीछे पीछे तो प्रभु आगे आगे! चलते चलते पार्वती ने प्रभु से पूछा,’ हे प्रभु! कुंभ में इतने लोगों ने डुबकी लगा ली! लगता है अब इस देश में धर्म की स्थापना हो ही जाएगी,’ पर प्रभु चुपचाप संगम की ओर चलते रहे तो पार्वती ने फिर कहा,’ हे प्रभु! मैं आपसे कुछ कह रही हूं, पर लगता है कि आप मध्यम वर्गीय परिवार के मर्दों की तरह मेरी हर बात को इस कान से सुन रहे हो और दूसरी ओर से निकाल रहे हो!

तो प्रभु ने कहा,’ ऐसी बात नहीं देवि!

‘तो क्या बात है? देखो न! कुंभ में संगम पर नेता, अभिनेता, अभिनेत्रियां, बाबा तथा जनमानस सब डुबकी लगा कैसे धन्य हो रहा है! प्रभु! महाकुंभ में भक्तों की भीड़ को देख लग रहा है कि आने वाले दिनों में अब कोर्इ हमें पूछने से रहा। कुछ बाबा हमारी साख कम करने में जुटे हैं और रही सही कसर…

‘ ऐसी बात नहीं देवि! अगर ऐसा होता तो स्वर्ग की पापुलेशन भी भारत की तरह हो जाती। पर तुम तो जानती ही हो कि वहां पर भी देवताओं की संख्या यूरोपीय देशों की तरह कम हो रही है।

‘क्या मतलब आपका?

‘ देवि! यहां आने के सबके अपने अपने स्वार्थ हैं। सब अपने अपने हाथ धोने आ रहे हैं! जीव का सबकुछ धुल जाता है पर एक यह स्वार्थ ही है जो हर बार जन्म लेने के बाद सैंकड़ों कुंभ स्नान कर भी ज्यों का त्यों रहता है। लेश मात्र भी नहीं धुलता !

‘ कुंभ में भी स्वार्थ?

‘ संपूर्ण ब्रहमांड में स्वार्थ कहां नहीं देवि? हम जो लाख अपमानित होने के बाद भी यहां जमे हैं कहो किसलिए? जनता की रक्षा के लिए? नहीं देवि! जब जनता के चुने नेता ही उसकी रक्षा नहीं कर सके तो हमारी उनके आगे क्या बिसात? हम तो खुद नेताओं के रहम ओ कर्म पर जीने वाले हैं। यहां पर जो नेता डुबकी लगाने आ रहे हैं न! असल में उनके मन में जब अपने लिए ही आस्था नहीं तो संगम के प्रति क्या होगी? लोकसभा के चुनाव नजदीक हैं सो वे कुंभ के बहाने अपने वोटरों की नब्ज टटोलने आ रहे हैं।

‘ और ये अभिनेता?

‘अपने दर्शकों की नब्ज टटोलने! दर्शकों से मिलने का इससे बेहतर और क्या बहाना हो सकता है? इस बहाने एक तीर से दो निशाने।

‘और बाबा लोग? बाबा किसकी नब्ज टटोलने आए हैं?

‘ अपने चेलों की!

‘और ये भगदड़ में मरने की परवाह न करने वाली जनता किसकी नब्ज टटोलने आर्इ है?

‘ आस्था की नब्ज टटोलने आर्इ है। पर क्या है कि इसे जब अपनी ही नब्ज नहीं मिल रही तो हमारी कहां मिलेगी? ऐसे में तुम यहां किसकी नब्ज टटोलने जा रही हो? प्रभु ने हंसते हुए पार्वती से पूछा तो पार्वती ने कहा,’ अपने भक्तों की।

‘ तो चलो, भक्तों से मिल लेते हैं, कह दोनों कुंभ में अपने भक्तों को ढूंढने लगे। एक दिन, दो दिन! एक टेंट, दो टेंट, टेंट पर टेंट! कुंभ में सबकुछ मिला पर सच्चा भक्त न मिला तो प्रभु ने पार्वती से पूछा,’ देवि अब?डुबकी नहीं लगानी क्या?

पार्वती ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अकेले ही अपने लोक को प्रस्थान कर गई!

 

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