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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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poetry

-विजय कुमार-

स्वप्न मेरे, अब तक वो अधूरे हैं;  

जो मानव के रूप में मैंने देखे हैं !

मानवता के उन्हीं स्वप्नों की आहुति पर

आज विश्व सारा;

एक प्राणरहित खंडहर बन खड़ा है !

आज मानवता एक नए युग-मानव का आह्वान करती है;

क्योंकि,

आदिम-मानव के उन अधूरे स्वप्नों को,

इस नए युग-मानव को ही पूर्ण करना होगा !

स्वप्न था कि,

एक अकाल मुक्त विश्व हो,

जहां न कोई प्यासा रहे और न ही कोई भूखा सोये;

हर मानव को जीने के लिए अन्न और जल मिले !

पर अभिशप्त आदिम तृष्णा ने अर्ध-विश्व को,

भूखा–प्यासा ही रखा है अब तक !

मेरा वो खाद्यान से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

एक हर भाषा के अक्षरों से संपन्न विश्व हो,

जहां हर कोई किताब और कलम को ह्रदय से लगाए;

अक्षरों से मिल रहे ज्ञान पर अधिकार हो हर किसी का !

पर निर्धनता के राक्षस ने कागज़ और कलम के बदले में,

क्षणिक मजदूरी थमा दी मासूमों के हाथों में !

मेरा वो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

एक स्वछन्द मेघों और स्वतंत्र विचारों से भरा हुआ विश्व हो,

जहां मानवता मुक्त पक्षियों की तरह उड़ान भरे;

जहां जीवन स्वतंत्रता और खुशियों की सांस ले हर क्षण !

पर युद्ध की विभीषिका ने बारूद से सारा आकाश ढक दिया है,

और निर्दोषों के रक्त से सींचकर, इस भूमि को अपवित्र कर दिया है !

मेरा वो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

इंसानों, पशुओं और वृक्षों से स्पंदित एक सुन्दर विश्व हो,

कि हर किसी को यहां जीवन-ऊर्जा की प्राण-छाया मिले;

इस धरा ने हम सभी को जीने लायक कितना कुछ तो दिया है !

पर इंसान हैवान बन गया, पशु मिट गए और वृक्ष ख़त्म हो गए,

और अब हमारा ये एकमात्र भूमण्ड़ल ख़त्म होने की कगार पर है !

मेरा वो प्रकृति के प्रति मातृभाव से भरे विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

सरहदे न रहे; सृष्टि में एक सकल बंधुत्व हर ओर बना रहे,

इस धरती पर जो कि हम सबके लिए है; सिर्फ मानवता ही बसी रहे;

पर, हमने सरहदे बना दी और जमीन को अनचाहे हिस्सों में बांट दिया !

अपने देश बेगाने से और अपने इंसान पराये से हो गए / कर दिए,

धर्म को अधर्म में बदल दिया और अंत में ईश्वर को भी बांट दिया !

मेरा वो सर्वव्यापी बंधुत्व वाले विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

हम प्रेम, मित्रता और भाईचारा को बिना शर्त निभाये,

पर हमने प्रेम की ह्त्या की, मित्रता में विश्वासघात किया;

और भ्रातुत्व के भाव को जलाया; और जीने के लिए शर्ते रखी  !

इंसानों का घृणित व्यापार किया और  स्वंय को लालसा / वासना के दांव पर लगाया,

और आज सम्पूर्ण विश्व प्रेम, मित्रता और भ्रातृभाव से वंचित है !

मेरा वो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबे विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

सारी पृथ्वी पर बुद्ध की असीम शान्ति की स्थापना हो,

सारी वसुंधरा में कृष्ण के पूर्ण प्रेम का बहाव हो;

सारी भूमि पर ईशा का सदैव क्षमाभाव हो !

हर धर्म, हर भाषा, हर जाती और व्यक्ति का सम्मान हो !

पर अब सिर्फ आदमियत की विध्वंसता बची है और ईश्वर कहीं खो से गए है !

एक अतुलनीय विश्व के जागरण का मेरा वो स्वप्न अब तक अधूरा है !

स्वप्न था कि,

मानव मुक्त हो राग, द्वेष, क्रोध, पाप और वासना के मन-मालिन्य से,

अहंकार, आकांक्षाओं, सांसारिक धारणाओं और असीमित आसक्तियों से;

और भर जाए जीवन के उल्लास से और प्रफुल्लित कर दे अपनी आत्मा को;

बच्चों की मासूमियत, फूलों के सौन्दर्य और वर्षा की तृप्त अनुभूतियों से !

एक नये जीवन का; एक नए युग-मानव का और एक नए विश्व का जन्म हो !

मेरा वो प्राण -स्पंदन से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधूरा है !

हां !

देशकाल के अंधेरे अवरोधनों से मुक्त होकर,

हमें एक नए युग-मानव के रूप में बदलकर;

मानवता के इन अधूरे स्वप्नों को पूरा करना ही होंगा !

हां !

वो हम ही होंगे जो एक नए विश्व का निर्माण करेंगे,

जहां निश्चिंत ही हम मानवो के सारे अधूरे स्वप्न पूरे होंगे !

हाँ !

एक सुन्दर और प्यारा विश्व होगा, जो हम सबका होगा;

जो खाद्यान्न से भरा हुआ होगा, हर किसी के लिए !

जो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान होगा, हर मानव के लिए !

जो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त होगा, हर इंसान के लिए !

जो प्रकृति के मातृभाव से भरा होगा, हर मनुष्य के लिए !

जो सार्वभौमिक, सर्वव्यापी बंधुत्व वाला होगा, हर व्यक्ति के लिए !

जो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबा हुआ होगा; हर किसी के लिए !

और मेरा वो आदिम / प्राचीन स्वप्न,

जिसमें मैं;

एक अतुलनीय, अप्रतिम,  उत्कृष्ट,  सार्वभौमिक, अद्भुत  और,

प्राण-स्पंदन से भरे हुए विश्व का नूतन जागरण देखता हूं;

वो अवश्य पूरा होगा !

मैं अपने सारे अधूरे स्वप्न,

इस धरा को और नए युग-मानव को समर्पित करता हूं!

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