लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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ऐतिहासिक रूप से ‘दलित’ एक नया अकादमिक-राजनीतिक मुहावरा है जो हिन्दुओं में अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। ‘अनुसूचित’ शब्द भी अंग्रेजों की देन है। उस से पहले हिन्दुओं में जातियों की सामाजिक स्थिति की कोई स्थाई श्रेणीबद्धता नहीं थी। ‘दलित’ संज्ञा का प्रयोग सर्वप्रथम स्वामी श्रद्धानन्द ने तब अछूत कहलाने वाले हिन्दुओं के लिए किया था। उन्हीं को गाँधीजी ने ‘हरिजन’ और डॉ. अंबेदकर ने ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ कहा। श्रद्धानन्द और अंबेदकर ने उन के उत्थान के लिए बहुत बडे काम भी किए। लेकिन उन के तमाम लेखन में कहीं एक शब्द नहीं मिलता कि गोमांस खाना इन जातियों की संस्कृति या पहचान है। व्यवहार में भी, आज तक कहीं ग्रामीण या शहरी इलाकों में दलितों के बीच गोमांस खाने का कोई प्रमाण नहीं है। ग्रामीण बस्तियों में दलितों के आचार, खान-पान, रीति-रिवाज वहीं रहने वाले दूसरे हिन्दुओं से मूलभूत रूप से भिन्न नहीं हैं।

इसलिए विगत 15 अप्रैल उस्मानिया विश्वविद्यालय में दलितों के ‘बीफ-इटिंग फेस्टिवल’ का समाचार कुछ हजम नहीं हुआ। कई विश्वविद्यालयों से हजार-पंद्रह सौ की संख्या में दलित छात्रों को निमंत्रित कर, समूह में बैठाकर गोमांस खिलाने का प्रस्ताव, प्रेरणा और उस के लिए वित्तीय सहयोग किन की ओर से आया? यह जानना आवश्यक है। एक दलित छात्र बी. सुदर्शन का नाम ‘आयोजकों में से एक’ के रूप में आया। मगर उस के पीछे किसी दलित संगठन का नाम नहीं था। एक दलित छात्र इतना बड़ा खर्च, प्रचार, व्यवस्था कर सके, यह असंभव है। तब वे साधनवान कौन थे, जिन्होंने यह उत्तेजक आयोजन करवाया?

यह जान सकने के बाद ही समाचार पूरा होगा, और वास्तविक स्थिति भी। उस के बिना दलितों की ‘सांस्कृतिक पहचान’, मनचाहे भोजन का ‘संवैधानिक अधिकार’ जैसे नकली, चाहे भारी लगने वाले जुमलों से कुछ पता नहीं चलता। दलित कोई विदेशी या अजूबा नहीं है, जिन्हें लोग नहीं जानते। हिन्दुओं में दलित और गैर-दलित सामूहिक रूप से एक दूसरे के साथ रहते हैं। गाँवों में उन के नियमित आपसी सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सम्बन्ध हैं। अतः पहले तो गोमांस ‘उत्सव’, फिर इसे दलितों की ‘सांस्कृतिक पहचान’ बताना – यह कब से या कैसे है? इस प्रश्न का उत्तर पाना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए भी क्योंकि यहाँ और बाहर भी कुछ गैर-हिन्दू समुदायों में ही इन दोनों कार्य की जगजाहिर परंपरा है। इसलिए पूरी संभावना है कि बीफ-इटिंग ‘फेस्टिवल’ जैसे आयोजन राजनीति-प्रेरित हैं। इन के सूत्रधार परदे के पीछे और कभी-कभी प्रत्यक्ष भी दलितों को मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर हिन्दू धर्म व समाज को निशाना बनाते हैं।

निस्संदेह, उन सूत्रधारों के आगे एक-दो दलित चेहरे भी होते हैं। लेकिन वे उसी तरह दिखाने की चीज हैं, जैसे डॉ. अंबेदकर की तस्वीरें। जिस प्रकार अंबेदकर के विचारों से प्रेरणा नहीं ली जाती; उसी प्रकार सूत्रधारों के आगे दिखने वाले दलित भी मुखौटे मात्र हैं जो स्वयं कुछ तय नहीं करते। मंच पर दिखने वाले दलित नेता-बुद्धिजीवी तथा डॉ. अंबेदकर की तस्वीरों के पीछे वास्तविक चेहरा किन्हीं और का है। वे ऐसे लोग हैं, जो न दलित हिन्दू हैं, न दलितों के दोस्त। उन का अपना एजेंडा है, जिसे साधने के लिए वे अज्ञानी, स्वार्थी दलित नेताओं/बुद्धिजीवियों का उपयोग करते हैं। कुछ टुकड़ों के बल पर, तथा कुछ दुष्प्रचार व मगज-धुलाई के जरिए।

विदित है कि ईसाई मिशनरी जब किसी हिन्दू को धर्मांतरित करते हैं तो प्रायः उन्हें गोमांस खाने तथा भारतीय राष्ट्र से अलग निष्ठा बनाने हेतु प्रेरित करते हैं। यह तथ्य जस्टिस नियोगी आयोग (1956) की रिपोर्ट में दर्ज है, और आज भी मामूली खोज-बीन से पता चल जाता है कि असम, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ के जंगलों में धर्मांतरण कराने वाले मिशनरी क्या प्रेरणाएं देते हैं। दूसरी ओर, इस्लामी तबलीगी भी गोमांस पर जोर देते हैं। इसलिए नहीं कि इस्लाम में गोमांस खाना जरूरी हो, बल्कि इसलिए कि हिन्दू गोपूजक हैं, अतः भारत के मुसलमानों को गोमांसभक्षी बनाने पर जोर दिया जाता है। यह बात प्रसिद्ध उलेमा अली मियाँ ने भी कही है, और स्वयं डॉ. अंबेदकर ने भी। चूँकि मामला गोमांस और दलितों का है, इसलिए डॉ. अंबेदकर के ही शब्द देखना अधिक उपयुक्त होगा।

डॉ. अंबेदकर के शब्दों में, “अनुचित लाभ उठाने की इस प्रवृत्ति का दूसरा प्रमाण मुसलमानों द्वारा गोहत्या के अधिकार और मस्जिदों के पास बाजे-गाजे की मनाही की माँग से मिलता है। धार्मिक उद्देश्य से गो-बलि के लिए मुस्लिम कानूनों में कोई बल नहीं दिया गया है, और जब वह मक्का और मदीना की तीर्थयात्रा पर जाता है, गो-बलि नहीं करता है। परन्तु भारत में दूसरे किसी पशु की बलि देकर वे संतुष्ट नहीं होते हैं। सभी मुस्लिम देशों में किसी मस्जिद के सामने से गाजे-बाजे के साथ बिना आपत्ति के गुजर सकते हैं। यहाँ तक कि अफगानिस्तान में भी जहाँ धर्म-निरपेक्षीकरण नहीं किया गया है, मस्जिदों के पास गाजे-बाजे पर आपत्ति नहीं होती है। परन्तु भारत में मुसलमान इस पर आपत्ति करते हैं, मात्र इसलिए कि हिन्दू इसे उचित मानते हैं।” (डॉ. भीमराव अंबेदकर, ‘संपूर्ण वाङमय’, खंड 15, भारत सरकार, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, द्वितीय संस्करण, पृ. 267)

अर्थात्, गोमांस खाने पर जोर देने की जिद हिन्दू-विरोध और अनुचित लाभ उठाने हेतु की जाती है। क्या आज के दलित नेता/बुद्धिजीवी डॉ. अंबेदकर की यह बात दुहराते हैं? या दुहराएंगे, विशेषकर उन गैर-हिन्दू ‘सहयोगियों’ के सामने, जो दलितों के हमदर्द बने फिरते हैं? जिस तरह ‘सांस्कृतिक पहचान’ और ‘संवैधानिक अधिकार’ बताते हुए गोमांस खाने का समूह आयोजन किया गया, क्या सुअरमांस के आयोजन को वही सहयोग और प्रचार मिलेगा? जबकि सुअर कुछ दलित जातियों का सचमुच भोज्य है। इस लेखक ने वर्षों स्वयं यह देखा है। क्या दलितों के वे सहयोगी किसी ‘पोर्क-इटिंग फेस्टिवल’ के आयोजन में सहयोग देंगे, जो ‘बीफ-इटिंग’ का आयोजन कराते हैं? क्या विश्वविद्यालयों के वामपंथी प्रोफेसर उसी तरह ठसक से उस का समर्थन करेंगे, जैसे गोमांस के लिए उत्साह से करते हैं? स्पष्ट है, कि ऐसे कथित दलित आयोजनों में डॉ. अंबेदकर का चित्र या किसी दलित आयोजक का नाम मात्र बाह्याडंबर हैं।

वास्तविक राजनीति उन सूत्रधारों द्वारा संचालित है, जो गोमांस खिलाने जैसे सांकेतिक कारनामों से हिन्दू-विरोधी परियोजना चला रहे हैं। वे दलितों के दोस्त नहीं, दिली दुश्मन हैं। उन का लक्ष्य है हिन्दू समाज को धीरे-धीरे तोड़कर नष्ट कर देना। इस के लिए वे अज्ञान में डूबे, स्वार्थी दलित या ब्राह्मण, किसी का भी उपयोग करते रहते है। उन्हें सभी रामविलासों, मायावतियों को अफजल, इमराना या माइकल, जूली बनाने के सिवा किसी चीज में दिलचस्पी नहीं। मिशनरी तो यह कहते भी हैं। मगर यह दलित समुदाय की कोई इच्छा नहीं, जो अपने देवी-देवताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ संतुष्ट हैं, जो मूलतः दूसरे हिन्दुओं के समान ही है।

दलित लोग मुसलमान या ईसाई बन जाएं, यह डॉ. अंबेदकर की भी इच्छा नहीं थी। उल्टे वे इसे हानिकारक समझते थे। बौद्ध धर्म में दीक्षा लेते समय अंबेदकर ने विस्तार से यह बताया था। इसीलिए आज दलितों के सेमेटिक शिकारी उन्हें अंबेदकर के बदले इलैया जैसे मिशनरी-पोषित प्रचारकों के पाठ पढ़ाते हैं। क्योंकि उन का उद्देश्य दलितों को हिन्दू समाज से तोड़कर पहले कमजोर, फिर नष्ट करना है। इसीलिए वे ‘बीफ-इटिंग फेस्टिवल’ जैसी धूर्त्त तरकीबें करते हैं, जिस से दलित और गैर-दलित हिन्दुओं में झगड़ा ठने, बढ़े। उस्मानिया विश्वविद्यालय आयोजन उसी का नया उदाहरण है।

वस्तुतः सभी समाचारों में यही कोण आया भीः बीफ-इटिंग के समर्थन और विरोध, दोनों के उल्लेख में दलितों का ‘अधिकार’, गोमांस खाने की ‘परंपरा’, ‘दक्षिणपंथी हिन्दूवादी’, ‘उच्च जातियाँ’, ‘ब्राह्मणवाद’, ‘दलितों पर अत्याचार’, आदि आदि जुमले वहाँ भरे हुए हैं। देश-विदेश में यही जुमले प्रचारित करना ही सूत्रधारों का उद्देश्य था! पहले से प्रचार कर सामूहिक रूप से गोमांस खाने पर कुछ हिन्दू उत्तेजित होंगे ही, और विरोध करेंगे; और बस! पहले से बताए होने से मीडिया सामने रहेगा ही, उस के समक्ष नकली-असली आक्रोश दर्शाते हुए सदियों से दलितों पर अत्याचार, अन्याय होने की बात कहना और किसी न किसी तरह थोड़ी हिंसा करवाना या कर देना, और सब कुछ को उच्च जातियों द्वारा दलितों पर जुल्म के रूप में दुनिया भर में प्रचारित कर देना। उन्हें इस में सरलता से सफलता मिल गई।

इतना कैलकुलेटेड खेल सरलता से समझा जा सकता है। अमेरिकी अखबार ‘काउंटरपंच’ में फरजाना वरसी ने लिखा भी कि यदि उसी हैदराबाद में कोई ईसाई ग्रुप पोर्क इटिंग फेस्टिवल करे, तो क्या विरोध नहीं होगा? यानी, बीफ-इटिंग ‘फेस्टिवल’ आयोजित करने वाले जानते थे कि उस से विवाद और कटुता बढ़ेगी, और यही उन का उद्देश्य था। स्वयं दलित समुदाय यह नहीं चाह सकता। अपने ही समाज के दूसरे समूह को अकारण चिढ़ाना, खाम-खाह झगड़ा करना, एकदम बेतुकी बात है। जिसे गोमांस खाना हो, वह खाता ही है। जैसे, मणिशंकर अय्यर। तब किसी दलित को कोई क्यों रोकेगा? मगर इसे राजनीतिक स्टंट बनाना दूसरी चीज है। जो समूह दुर्बल माना जाता हो, वह वैसे भी ऐसा नहीं करेगा। फिर इसलिए भी, कि दलित समुदाय की वास्तविक समस्याओं, भावनाओं, परंपराओं और इच्छाओं से गोमांस का दूर-दूर से भी कोई संबंध नहीं। इसलिए मामूली छान-बीन स्पष्ट कर देगी कि वास्तविक सूत्रधार कोई और थे।

बीफ-इटिंग के बदले यदि कोई दलित छात्र नायारण गुरू, डॉ. अंबेदकर या स्वामी श्रद्धानन्द के विचारों का अध्ययन-शिविर चलाना चाहें, तो उसे आयोजित करने हेतु कोई गैर-गिन्दू सहयोगी नहीं आएंगे। जबकि उस में सहयोग करने वाले अन्य हिन्दू हजारों मिल जाएंगे। इस से भी दलितों को अपनी स्थिति समझ लेनी चाहिए।

यदि दलित जन्मना ही माने जाएं, जो अंग्रेजों से पहले नहीं था (नीची जातियों की कोई सूची नहीं थी); तब रामायण के रचयिता वाल्मीकि और महाभारत के रचयिता व्यास, दोनों ही दलित लेखक थे। एक अहेरी, दूसरे मछुआरे थे। आधुनिक महापुरुषों में नारायण गुरू भी जन्मना ‘दलित’ थे, जिन के चरणों में सभी हिन्दू झुकते रहे। यदि दलितों को प्रेरणा लेनी हो तो वाल्मीकि से लेकर डॉ. अंबेदकर तक, भारतीय महापुरुषों, ज्ञानियों की कोई कमी नहीं है। हर हाल में, उन्हें अपने शिकारियों को दोस्त समझना बंद करना चाहिए।

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14 Comments on "दलितों के दुश्मन दोस्त / शंकर शरण"

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आर. सिंह
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अपनी बात को आगे बढाते हुए मैं प्रवक्ता सम्पादक द्वारा उद्धृत,पंडित,हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा दी हुई हिन्दू की निम्न परिभाषा पेश कर रहा हूँ:हिन्दू अर्थात् भारतीय : पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी “मुसलमानों के आने से पहले इस देश में नाना विश्वासों और आचार-विचारों के भेद से नाना प्रकार के धर्म-मत प्रचलित थे। परन्तु जीवन के प्रति उनकी दृष्टि एक विशेष प्रकार की एकरूपता ही थी। इस एकरूपता के कारण ही नाना मतों के मानने वाले, नाना स्तरों पर खड़े हुए नाना मर्यादाओं में बंधे हुए अनेक जनवर्ग एक सामान्य नाम से पुकारे जाने लगे। यह नाम था “हिन्दू’। हिन्दू अर्थात्… Read more »
आर. सिंह
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विजय जी, आपके बताए पुस्तक को मैंने पढ़ा.इसमे लेखक ने हिन्दू धर्म और सनातन धर्म को एक माना है.भगवद गीता का जो सन्दर्भ पेश किया गया है ,वह भी इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता है,क्योंकि मेरे विचारानुसार जिस समय भगवद गीता की रचना हुई थी उस समय यह शब्द और उससे जुडा हुआ कोई धर्म था हीं नहीं.धर्म संबंधी किसी भी पौराणिक विवाद में खासकर सबसे पौराणिक विवाद जो बौद्धों और सनातनियों का था,उसमे भी मुझे नहीं लगता कि हिन्दू शव्द का इस्तेमाल हुआ है. हिन्दू शब्द सनातन का प्रयायवाची कब और कैसे बन गया यह शोध का विषय… Read more »
विजय
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यदि श्री आर. सिंह सचमुच ‘हिन्दू’ शब्द में ही जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी रखते हों, तो उन्हें बेल्जियन विद्वान कोएनराड एल्स्ट की पुस्तक “हू इज ए हिन्दू” जरूर पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक इस वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध हैः
http://koenraadelst.bharatvani.org/books/wiah/index.htm

डॉ. मधुसूदन
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मानस शास्त्र सही कहता है, कि
==> हीनता ग्रंथि से पीडित, इतना घोर पीडित होता है, कि, उस ग्रन्थिको छिपाने के लिए, भाँति भाँति का दिखावा और तमाशा करते रहता है।
==>एक हीनताग्रंथिसे पीडित को मैं जानता हूँ, जो अपने आपको इतना पीछडा समझता है, कि शराब, सिगरेट – पीकर अंग्रेज़ों की बराबरी कर के दिखाता है।
चार गालियां अपनी ही संस्कृति को देता रहता है।
यह सारे जोकर उसी मानस की उपज है।

आर. सिंह
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अनिल गुप्त जी जब लिखते हैं कि ” हिन्दू शब्द किसी मत या संप्रदाय के लिए न होकर इस भूखंड में रहने वालों के लिए प्रयोग किया गया है.अतः वास्तव में ये शब्द हमारी राष्ट्रीयता का द्योतक है.”उनके द्वारा निर्देशित होकर गूगल पर जाने पर भी हिन्दू शब्द का यही अर्थ मिला,तो फिर हमने इसे सनातन धर्मियों का प्रयायवाची कब और कैसे बना दिया? मैं समझता हूँ कि विद्व जन इस पर प्रकाश डालेंगे.अगर हिंदू शब्द के असली अर्थ को लिया जाए तो सिन्धु घाटी यानि विन्ध्य पर्वत के उतर के सभी निवासी चाहे वे किसी सम्प्रदाय या धर्म के… Read more »
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