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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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विकास सिंघल

हिन्दू पलायनवादी क्यों है? हिन्दू कब तक सहेंगे और कब तक समझौतावादी बने रहेंगे। समझौतावाद ही हमारी कमजोरी बन गया है। और जब तक ये समझोतावाद बना रहेगा तब तक दुसरे लोग हमे ऐसे ही झुकाते रहेंगे। और ऐसे ही हम अपनी इस मात्रभूमि, जन्मभूमि, कर्मभूमि, पुण्यभूमि भारत वर्ष का बटवारा होते देखते रहेंगे। सर्वपर्थम अरबों ने सिंध पर हमला किया, राजा दाहिर अकेले लड़े बाकि पूरा भारत देखता रहा। परिणाम, अरबों की जीत हुई, मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्धी हिन्दुओ और बौद्धों का कत्लेआम किया, औरतों को गुलाम बनाकर फारस, बगदाद और दमिश्क के बाजारों में बेचा। जबरन धर्मांतरण करा कर मुस्लमान बनाया। सिंध भारत वर्ष से अलग हो गया। बाकि हिन्दुओं ने सोचा कि इस्लाम की आंधी उन तक नहीं आयेगी, वे चुप रहे। और सिंध से पलायन कर गए।

फिर बारी आई मुल्तान और गंधार की। मुल्तान जिसका वर्णन ऋग्वेद समेत लगभग सभी वैदिक ग्रंथो में है। मुल्तान का सूर्य मंदिर पुरे भारत वर्ष में काशी विश्‍वनाथ की तरह पूजनीय था। अरबों ने हमला किया सब तहस नहस कर दिया। सूर्य मंदिर तोड़ा, हिन्दुओं का कत्लेआम किया, तलवार की नोंक पर मुसलमान बनाया। पूरा भारत वर्ष चुप रहा। सोचा चलो मुल्तान गया बाकि भारत तो बचा। अब इस्लाम की आंधी और आगे नहीं बढ़ेगी। प्रतिकार नहीं किया।

मामा शकुनी का गंधार गया। राजा विजयपाल का साथ किसी ने नहीं दिया। हम फिर पलायन कर गए। सोचा बस इस्लाम की आंधी और आगे नहीं बढ़ेगी, बाकी भारत तो हमारे पास है। अगर सिंध, मुल्तान, गंधार के समय ही हिन्दुओं ने प्रतिकार किया होता तो इस्लाम की आंधी वही रुक जाती। परन्तु हमारा समझौतावादी और पलायनवादी रवैया जारी रहा। आज हम गांधीवाद का रोना रो रहे है, अरे तब तो गाँधी जी नहीं थे।

गजनी ने सोमनाथ तोड़ा। गुजरात को छोड़ कर सारा भारत चुप रहा। क्या सोमनाथ केवल गुजरात का था। सोमनाथ बारह ज्योतिर्लिंगों में से सर्वप्रथम है जिसका वर्णन ऋग्वेद में भी है। उस सोमनाथ के टूटने पर सारा भारत चुप रहा। गजनी यहीं नहीं रुका उसने मथुरा का श्रीकृषण जन्मभूमि मंदिर तोड़ा, मोहम्मद गोरी ने काशी विशाव्नाथ तोड़ा, बाबर ने श्रीराम जन्मभूमि का मंदिर तोड़ा और उस पर बाबरी मस्जिद बनवाई, औरंगजेब ने सोमनाथ, काशी विश्वनाथ और श्रीकृष्‍ण जन्मभूमि को पुनः तोड़कर पवित्र जगहों पर मस्जिदे बनवाई। मगर हम चुप रहे, सब कुछ सह गए। हमारे समझोतावादी और पलायनवादी रुख ने हमे फिर ठगा।

जब जब सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा और काशी पर किसी भी मुस्लिम शासक का राज हुआ उसने मंदिरों को तोड़ने के नए कीर्तिमान बनाये। इतिहासकार सीताराम गोयल, अरुण शौरी, रामस्वरुप के अनुसार मुस्लिमों ने इस देश में दो हजार मंदिरों को तोड़ कर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण कराया। क्या इतिहास में कभी किसी हिन्दू शासक ने कोई मस्जिद तुड़वाकर उसके स्थान पर मंदिर बनाया। क्या कोई हमें बताएगा। और तो और मुगलों के शासन के बाद जब अयोध्या, मथुरा, काशी पर हिन्दू मराठों का शासन आया तो भी उन्होंने पवित्र मंदिरों को तोड़ कर गर्भगृह की जगह पर बनाई गई मस्जिदों को नहीं हटाया। अयोध्या, मथुरा, काशी कोई गली नुक्कड़ पर बने हुए मंदिर नहीं थे। काशी विश्वनाथ, ऋग्वेद में वर्णित बारह ज्योतिर्लिंगों में से सर्वोच्च। अयोध्या का मंदिर जहा राम जी का जन्म हुआ। मथुरा का मंदिर जहाँ कृष्‍ण का जन्म हुआ ये पलायनवाद और समझौतावाद आज तक जारी है।

नेहरु, गाँधी और कांग्रेस ने देश का बंटवारा कराया हम चुप रहे। जिन्नाह और मुस्लिम लीग से ज्यादा देश के बटवारे के लिए यही लोग जिम्मेदार थे। ऋग्वेद की जन्मस्थली सिंध चला गया। वो सिंध जहाँ हमारी सभ्यता का जन्म हुआ। गुरुओं की धरती पंजाब चला गया। वो पंजाब जहाँ भगत सिंह का जन्म हुआ। पूर्वी बंगाल चला गया, जहाँ इक्यावन आदि शक्ति पीठों में से छ: शक्ति पीठ मौजूद है। जिनकी दुर्दशा आज वहां की सरकार और जनता ने बना दी है। मगर इस देश में मस्जिदें आज भी सीना ताने खड़ी है। हम फिर पलायन कर गए, नेहरु और गाँधी की बातों में आकर बंटवारा स्वीकार कर लिया। किसका बंटवारा भारत माँ का बंटवारा। भाग कर ”सेकुलर इंडिया” में आ गए। आ गए या मारकर भगाए गए ये हम सब जानते है।

आधा कश्मीर गया हम तब भी चुप रहे। कश्मीर में मस्जिदों से नारे लगाये गए। ”हिन्दू मर्दों के बिना, हिन्दू औरतों के साथ, कश्मीर बनेगा पाकिस्तान”। हम क्यों चुप रहे। क्या कश्मीर केवल कश्मीरी हिन्दुओं की समस्या है हमारी नहीं।

जरा याद करो कैसे फिलिस्तीन के मुसलमानों के लिए सारी दुनिया के मुसलमान एक हो जाते है। तो फिर कश्मीर के हिन्दुओं के लिए हम क्यों एक नहीं हुए।

वो कहते है ”हंस के लिया पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिंदुस्तान” और हम अब भी कह रहे है कि पाकिस्तान के साथ बात करेंगे।

हम क्यों नहीं सोचते सिंध, पश्चिम पंजाब और पूर्वी बंगाल को वापस लेने की। आखिर वो भी तो हमारी भारत माँ के अंग है। जिस दिन हम ऐसा सोचने लगेंगे उस दिन से भारत वर्ष फिर बढ़ने लगेगा और अखंड भारत फिर साकार रूप लेगा।

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2 Comments on "हिन्दुओं का पलायनवाद : आखिर कब तक"

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Manish Pathak
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bahut hi badhiya lekh,…. dhanyavaad

vimlesh
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दोस्तो कांग्रेस के प्रतिरोध करने के तरीके से अन्दाज लगा लो कि ईन लोगो ने हम हिन्दुस्तानियो से क्या क्या नही छिना होगा,जली नोटों के कारोबार में आइ यस आई को दोस दे कर सोनिया गघी हम सब को कैसे बेवकूफ बना रही है क्या आप जानते है भारत की करंसी की प्रिंटिग इंग्लॅण्ड में होती है और उस कंम्पनी का मालिक इटली का है जो अपराधी प्रवर्ति की माफिया सन्गठन का नजदीकी है .हम लोग अभी तक अपनी किस्मत को दोष देते थे हर बात मे अब मालुम चला हमे, हमारी मेहनत,हमारी समय, हमारे देश के हर नागरिक का… Read more »
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