लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेन्द्र चौहान
स्त्री-पुरुष के बीच असमानता दूर करने में भारत का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है और वैश्विक आर्थिक मंच की 2014 की स्त्री पुरुष असमानता सूचकांक में 142 देशों में इसने 114वां स्थान प्राप्त किया है। आर्थिक भागीदारी, शैक्षणिक उपलब्धियों और स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के पैमानों पर भारत को औसत से कम आंका गया है। वैश्विक आर्थिक मंच द्वारा जारी रपट के मुताबिक भारत पिछले साल के मुकाबले 13 पायदान लुढ़क गया। भारत, श्रमबल भागीदारी, अनुमानित अर्जित आय, साक्षरता दर और जन्म के समय लैंगिक अनुपात के संकेतकों के लिहाज से 20 सबसे अधिक खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल रहा। देशभर में स्‍त्री-पुरुष अनुपात चिंताजनक रूप से गिर रहा है और सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 1981 में 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1000-962 था जो 1991 में घटकर 1000-945 और 2001 में 1000-927 रह गया। इस गिरावट का जिम्मेदार, देश के कुछ भागों में व्यापक पैमाने पर हुई कन्या भ्रूण हत्याओं को जाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि 1995 में बने जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम (प्री नेटल डायग्नोस्टिक एक्ट, 1995 ) के मुताबिक बच्चे के जन्म से पूर्व उसके लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है। लेकिन व्यापक पैमाने पर इस कानून का उल्लंघन होता है। भारत सरकार ने स्वीकार किया कि वर्ष 2001 से 2005 के दौरान प्रतिदिन करीब 1800 से 1900 तक कन्या भ्रूण हत्याएँ हुई हैं। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2001-05 के दौरान प्रतिवर्ष लगभग 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्या हुई हैं। यह सरकारी आँकड़ा है जो इतना भयानक है, वास्तविक तस्वीर इससे भी कहीं ज्यादा भयावह हो सकती है। एक और चौंका देने वाला तथ्य यह है कि देश के ग्रामीण इलाकों में प्रति हजार लड़कों में लड़कियों की संख्या शहरी क्षेत्र से अधिक है। यानी देश के ग्रामीण इलाकों में प्रति हजार लड़कों पर 939 लड़कियाँ हैं और शहरी क्षेत्र में यही संख्या मात्र 894 है। इससे साफ जाहिर है कि गावों में कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन या तो नहीं है या फिर कम है। जबकि शहरों में रहने वाला तथाकथित पढ़ा-लिखा और खाया-अघाया तबका इस घिनौने कार्य में आगे हैं। ऐसे में कैसे कहा और माना जा सकता है कि शिक्षा लोगों को समझदार बनाती है। वर्ष 1901 में हुई जनगणना में प्रति हजार पुरुषों पर 972 स्त्रियाँ थीं। घटते-घटते 1991 तक यह संख्या सबसे कम यानी 927 पर पहुँच गई, जो अपने आप में एक गंभीर और चिंताजनक आँकड़ा था। शायद इसी के बाद सरकार की आँखें खुलीं और उसने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ थोड़ी सख्ती दिखाई, जिसका नतीजा निकला कि 2001 की जनगणना में यह आँकड़ा 933 पर पहुँचा, लेकिन यह भी कोई संतोषजनक स्थिति नहीं कही जा सकती है। बीती शताब्दी के शुरुआती आँकड़ों पर ही गौर करें तो पाएँगे कि जब हमारा समाज आज की तुलना में ज्यादा साक्षर नहीं था, सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों की जकड़न भी आज के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत थी और तकनीकी स्तर पर भी हम काफी पिछड़े हुए थे, तब लिंग अनुपात में असंतुलन आज जितना नहीं था। संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि भारत में बढ़ती कन्या भ्रूण हत्या, जनसंख्या से जुड़े संकट उत्पन्न कर सकती है जहां समाज में कम महिलाओं की वज़ह से सेक्स से जुड़ी हिंसा एवं बाल अत्याचार के साथ-साथ पत्नी की दूसरे के साथ हिस्सेदारी में बढ़ोतरी हो सकती है। और फिर यह सामाजिक मूल्यों का पतन कर संकट की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। लेकिन यह स्त्री-विरोधी नज़रिया किसी भी रूप में गरीब परिवारों तक ही सीमित नहीं है। भेदभाव के पीछे सांस्कृतिक मान्यताओं एवं सामाजिक नियमों का अधिक हाथ होता है। यदि यह प्रथा बन्द करना है तो इन नियमों को ही चुनौती देनी होगी। भारत में स्त्री को हिकारत से देखने को सामाजिक-आर्थिक कारणों से जोड़ा जा सकता है। भारत में किए गए अध्ययनों ने स्त्री की हिकारत के पीछे तीन कारक दर्शाए हैं, जो हैं- आर्थिक उपयोगिता, सामाजिक-आर्थिक उपयोगिता, एवं धार्मिक कार्य। अध्ययन आर्थिक उपयोगिता के बारे में यह इंगित करते हैं कि पुत्रियों की तुलना में पुत्रों द्वारा पुश्तैनी खेत पर काम करने या पारिवारिक व्यवसाय, आय अर्जन या वृद्धावस्था में माता-पिता को सहारा देने की सम्भावना अधिक होती है। विवाह होने पर लड़का, एक पुत्रवधू लाकर घर की लक्ष्मी में वृद्धि करता है जो घरेलू कार्य में अतिरिक्त सहायता देती है एवं दहेज के रूप में आर्थिक लाभ पहुंचाती है जबकि पुत्रियां विवाहित होकर चली जाती हैं तथा दहेज के रूप में आर्थिक बोझ होती हैं।

स्त्री की हिकारत के पीछे सामाजिक-आर्थिक उपयोगिता संबंधी कारक यह है कि चीन की तरह, भारत में, पुरुष संतति एवं पुरुष प्रधान परिवारों के प्रथा यह है कि वंश चलाने के लिए कम से कम एक पुत्र होना अनिवार्य है, एवं कई पुत्र होना परिवारों के ओहदे को अतिरिक्त रूप से बढ़ा देता है। स्त्री से हिकारत का अंतिम कारक है धार्मिक अवसर, जिनमें हिन्दू परम्पराओं के अनुसार केवल पुत्र ही भाग ले सकते हैं, जैसे कि माता/पिता की मृत्यु होने पर आत्मा की शांति के लिए केवल पुत्र ही मुखाग्नि दे सकता है। समाज में बेटी बेटे के अधिकारों और उत्तरदायित्वों मे समन्वय की बहुत कमी है। अधिकतर लोग एक बेटा तो चाहते ही हैं और इस चाह मे कभी-कभी कई बेटियाँ हो जाती हैं। आज विज्ञान ने यह सुविधा दी है कि गर्भ के आरंभिक सप्ताहों मे ही भ्रूण के लिंग की जानकारी मिल जाती है और गर्भपात कराया जा सकता है अतः कुछ लोग अनचाही बेटियाँ न पैदा करके कन्या भ्रूण हत्या जैसा गैर कानूनी काम करवाते हैं। कुछ चिकित्सक भी चोरी छिपे यह काम करके मोटी रक़म कमाने मे लगे हुए हैं। हरयाणा, राजस्थान और दिल्ली सहित कई राज्यों मे लडकियों की संख्या लड़कों के मुक़ाबले कम है। कन्याभ्रूण हत्या के दूरगामी परिणाम बहुत बुरे हो सकते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी बार बार गर्भपात करवाना माँ के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लियें सही नहीं है। इस कुप्रथा को रोकने के लिये कड़े कानून के साथ दोषियों को सख्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिये। इसके अतिरिक्त समाज की सोच भी बदलना ज़रूरी है, सिर्फ कह देने भर से कि बेटी बेटे का दर्जा बराबर है काम नहीं चलेगा, उन्हें हक़ और जिम्मेदारी मे बराबर की साझेदारी निभाने की स्वतन्त्रता समाज को देनी पड़ेगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ये अपराध ऐसे ही होता रहेगा। अजीब विडंबना है कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या-भ्रूण हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। समाज में लड़कियों की इतनी अवहेलना, इतना तिरस्कार बेहद चिंताजनक और अमानवीय है। जिस देश में स्त्री के त्याग और ममता की दुहाई दी जाती हो, उसी देश में कन्या के जन्म पर पूरे परिवार में मायूसी और शोक का छा जाना विडंबना ही है। आज भी शहरों के मुकाबले गांव में दकियानूसी विचारधारा वाले लोग बेटों को ही ज्यादा तबज्जो देते हैं लेकिन माता पिता का भी यह कर्तव्य बनता है कि वे समाज के दबाव में आकर लड़की और लड़के में फर्क न करे। दोनों को समान स्नेह और प्यार दे। दोनों के विकास में बराबर दिलचस्पी ले। बालक-बालिका दोनों प्यार के बराबर अधिकारी हैं। इनके साथ किसी भी तरह का भेद करना मानवता के साथ खिलवाड़ होगा यह समझना भी आवश्यक है।

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