लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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narendra modi and rahul gandhiप्रमोद भार्गव

भारत में सीधे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री चुने जाने की संवैधानिक व्यवस्था नहीं है, बावजूद देश में जिस तरह का राजनीतिक माहौल आकार लेता जा रहा है, उससे साफ है कि राजनीति दो व्यकितवादी ध्रुवों पर केन्द्रित हो रही है। ऐसे में संप्रग और राजग गठबंधन के प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने सुनियोजित ढंग से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के रुप में राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी को आगे बढ़ा दिया है। यह स्थिति यदि 2014 के आमचुनाव में इन्हीं मंशाओं के अनुरुप नतीजे देती है तो हो सकता है कि हमारे यहां भी फ्रांस और अमेरिका की तरह दो दलीय संसदीय प्रणाली की मांग उठने लग जाए ?

इस सुनियोजित मुहिम की एक अच्छी बात यह है कि राहुल और नरेंद्र विकास और सुशासन  की बात आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन इस मुहिम का कमजोर पक्ष है कि दोनों ही नेता केवल औधोगिक विकास पर ज्यादा जोर देते हैं, जो भारत जैसे बढ़ी आबादी वाले देश के लिए समावेशी विकास का मजबूत आधार नहीं है। मोदी का तथाकथित गुजरात माडल औधोगिक संगठनों के लिए तो लाभकारी साबित हो सकता है, लेकिन गरीब व वंचितों के लिए नहीं ? यही कारण है कि गुजरात में कुपोषण, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार भी मोदी के शासनकाल में घटने की बजाय बढ़े हैं। ऐसे में इकतरफा विकास के किसी माडल को न तो किसी राज्य का समावेशी माडल माना जा सकता है और न देश का ?

मोदी माडल की स्वीकार्यता अथवा अस्वीकार्यता एक अलग बात है, किंतु मोदी ने जिस तरह से समझदारी से अपनी अखिल भारतीय छवि गढ़ने का देशव्यापी अभियान चला दिया है, वह उल्लेखनीय है। यह अभियान उन्हें केंद्रीय राजनीति के कर्णधार के रुप में ढालने का काम कर रहा है। इससे साफ है, भाजपा का भविष्य उन्हीं के कंधों पर है। इसीलिए उनकी रणनीति में दूरदर्षिता की झलक साफ दिखार्इ दे रही है। कोलकाता में जब मोदी मर्चेंटस चैंबर आफ कामर्स के कार्यक्रम को संबोधित करते हैं, तो वे पश्चिम बंगाल के अवाम की जन भावनाओं को भुनाने के लिए जहां, वहां की बलिदान की लंबी परंपरा को याद करते हैं, वहीं ममता बनर्जी को राजग गठबंधन से जोड़ने के सूत्र भी छोड़ते हैं। मोदी ममता को लुभाने की दृष्टि से कहते हैं, बंगाल में वामपंथी सरकार ने 32 साल के शासनकाल में जो गडढे खोदे हैं, उन्हें भरने में समय तो लगेगा ही और स्थानीय सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। मुझे तो लगता है मोदी की कोलकाता यात्रा को लेकर मोदी और ममता ने एक कूटनीतिक समझदारी बरती है। मोदी जानते हैं, उनके प्रधानमंत्री पद के दावों के प्रचार को लेकर जदयू के नीतिश कुमार खफा हैं, इसलिए जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि यदि राजग गठबंधन सत्ता में आता है और भाजपा प्रधानमंत्री के रुप में मोदी को ही आगे बढ़ाती है तो जदयू राजग से अलग हो सकता है, इसकी भरपार्इ ममता की तृणमूल कांग्रेस से संभव है। इसीलिए मोदी ममता की सराहना करते हैं। मोदी के कोलकाता में रहने वाले दिन ममता का दिल्ली चले जाना अनायास नहीं, बलिक एक तरह से पूर्व नियोजित था। क्योंकि मोदी की कटटर हिंदुत्ववादी छवि के चलते, उनकी बंगाल में 24 फीसदी मुसिलमों के वोट की चिंता स्वाभाविक है। इस लिहाज से आंख-मिचौली का यह खेल लोकसभा चुनाव तक जारी रहेगा। चुनाव परिणाम के बाद यदि राजग गठबंधन बहुमत में आता है और भाजपा संसदीय मण्डल मोदी को ही प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करता है तो उस समय होने वाली दरार को भरने का काम ममता कर सकती हैं। कोलकाता में मोदी की चिंता भाजपा को पूर्वोत्तर में भी विस्तार करती दिखार्इ देती है, इसलिए वे विकास के समाम पैमाने पर जोर देते हुए हाषिए पर पड़े इस क्षेत्र को उंचाइयों पर ले जाने का भरोसा देते हैं और उसकी शुरुआत बंगाल से करने का आवहान करते है।

दूसरी तरफ कांग्रेस संभावित प्रधानमंत्री के रुप में राहुल गांधी को आगे बढ़ा तो रही है, लेकिन उसका आत्मविश्वास मजबूत दिखार्इ नहीं दे रहा है। इस तथ्य की पुष्टि हाल ही में दिगिवजय सिंह के आए बयान से होती है। सिंह ने कहा है कि कांग्रेस अगला लोकसभा चुनाव सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के ही नेतृत्व में लड़ेगी। साथ ही चुनावी मुहिम के दौरान किसी भी नेता को प्रधानमंत्री के रुप में पेश नहीं करेगी। इस बयान से साफ है कि कांग्रेस राहुल को चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री पद का दोवेदार घोषित करने वाली नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस ने आभास कर लिया है कि यदि लोकसभा का चुनाव मोदी बनाम राहुल होता है तो मोदी राहुल पर भारी पड़ सकते हैं। लेकिन कांग्रेस इस सीधी मुठभेड़ से भले ही बचने की कोशिष करे मीडिया ने जरुर मानसिकता बना ली है कि वह इस लड़ार्इ को अमेरिकी तर्ज पर मोदी बनाम राहुल ही पेश करेगा।

इसका सबसे ज्यादा नुकसान मुलायम सिंह संभावित तीसरे मोर्चा को उठाना होगा। हो सकता है, वह वजूद में ही न आने पाए। इस मोर्चे को वजूद में लाने का सबसे सुनहरा मौका तब था, जब एफडीआर्इ के मुददे पर ममता ने केंद्र से समर्थन वापिस ले लिया था। मुलायम इस समय गर्म लोहे पर चोट करने से चूक गए और अब उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा मोदी का लगातार बढ़ता कद और उत्तर प्रदेश में सुरसामुख की तरह पसरती अराजकता है। लिहाजा अब तीसरा मोर्चा आकार ले ले, ऐसी संभावनाएं न्यूनतम हैं। क्योंकि वैसे भी तीसरे मोर्चे के ज्यादातर संभावित खिलाड़ी संप्रग और राजग गठबंधन में पहले से ही भागीदार हैं।

कांग्रेस भविष्य की संभावनाओं का आकलन करते हुए सावधानी जो भी बरते, किंतु अब यह जग जाहिर हो चुका है कि भाजपा, मोदी और राजग के विपरीत ध्रुव राहुल गांधी ही हैं और संप्रग गठबंधन सत्ता में आता है तो उसके प्रधानमंत्री राहुल ही होंगे। इसलिए राहुल उस सोच और उन सरोकारों को तो आगे लेकर बढ़ें हीं, जिसका हिस्सा समग्र भारतीय हों। साथ ही उन्हें गुजरात माडल के आदर्श घोषित किए गए मिथक को भी तोड़ने की जरुरत है। कैग की हाल ही में आर्इ रिपोर्ट से साफ हुआ है कि गुजरात में भ्रष्टाचार व मनमानी का बोलबाला है। पूंजीपतियों को केंद्र सरकार की तरह जानबूझकर लाभ पहुंचाया गया है। यही वजह है कि गुजरात को निर्भीक व निष्पक्ष लोकायुक्त नहीं मिल पा रहा है। गुजरात सरकार ने राज्य विधानसभा में जो लोकायुक्त आयोग विधेयक 2013 पेश किया है, वह न केवल जन भावनाओं के प्रतिकूल है, बलिक जिस तरह के लोकपाल की मांग देश में हो रही है, उसके विरुद्ध भी है। राहुल को इस विधेयक का पर्दाफाश करने की जरुरत है।

मोदी ने फिक्की के महिला मंच को संबोधित करते हुए एक सवाल के जबाव में बड़ी मासूम साफगोर्इ बरतते हुए कहा कि उन्होंने गुजरात के निकाय चुनाव संबंधी महिला आरक्षण विधेयक को राज्य मंत्री मण्डल से पारित कराकर राज्यपाल होने के बावजूद वे उसे मंजूर नहीं कर रही हैं। जबकि 50 प्रतिषत महिलाओं को चुनाव लड़ने का हक देने वाले इस विधेयक की हकीकत है कि इसमें चुनाव सुधार की दृष्टि से अनिवार्य मतदान की शर्त भी जोड़ दी है। जबकि यह एक अलग मुददा है और एकाएक इसे कानूनी रुप देना संभव भी नहीं है। साथ ही गुजरात में कुपोषण का मुददा भी एक बड़ा मुददा है। यदि गुजरात में दुग्ध उत्पादन में 80 फीसदी बढ़ोत्तरी हुर्इ है तो क्या कारण है कि शिशु कुपोषण का शिकार हो रहे हैं ? क्या उनके हिस्से का दूध छीनकर दिल्लीवासियों को पिलाया जा रहा है ? गुजरात माडल के ये ऐसे मिथ हैं, जिन्हें तोड़ने की जरुरत है। अब यह राहुल की चिंतन दक्षता पर निर्भर है कि वे इन मुददों को कैसे उभारते हैं। व्यकित केन्द्रित होती ये बहसें यदि नीति केन्द्रित भी हों, तो देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत दे सकती हैं।

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1 Comment on "दो ध्रुवों पर केन्द्रित होती भारतीय राजनीति"

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mahendra gupta
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सही व सटीक आकलन , जनता के समक्ष नीति आधारित बातें ही आनी चाहिए,तभी वह सही तरीके से मतदान कर सकेगी.

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