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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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रमेश पतंगे

समता के विषय में इसाप की एक सुंदर कथा है। एक बार जंगल में शेर, सियार, भेड़िया और जंगली गधा इन चारों ने मिलकर सामूहिक शिकार करने का निर्णय लिया। शिकार के लिए वो चले गए। चारों ने मिलकर एक जंगली भैंसे की शिकार की। शिकार करने के बाद भक्ष्य को चार समान हिस्सों में बांटा जाएगा ऐसा पहले से ही तय था। शेर ने गधे को कहा, “इस शिकार को हम चारों में बांट दो।” गधे ने शिकार को चार समान हिस्सों में बांट दिया। शेर के सामने शेर का हिस्सा रखा गया। इतना छोटा सा हिस्सा देखकर शेर को क्रोध आया और वह बोला, “अबे गधे, तू तो गधे का गधा ठहरा। समानता इस प्रकार की होती है क्या?” ऐसा कहकर उसने गधे के गर्दन पर जोर से तमाचा मारा। शेर के तीक्ष्ण नाखून गधे के गले में घुसने के कारण वो मर गया। फिर शेर ने सियार को कहा, “अब तू इस शिकार का समान बंटवारा कर।” सियार ने चारों हिस्सों को इकट्ठा किया। उसमें से आधे से अधिक शेर को दिया और जो बचा था उसका भी आधे से अधिक हिस्सा भेड़िये को दिया और छोटा सा हिस्सा अपने पास रखा। बंटवारे का यह तरीका देखकर शेर प्रसन्न हुआ। उसने सियार से पूछा, “समता तत्व की इतनी अच्छी सूझ-बूझ तूने कहां से सीखी?” उत्तर में सियार कहता है, “मरे हुए गधे ने समता का सही अर्थ मुझे सिखलाया है।”

इसाप ने जब यह कहानी लिखी होगी तब शायद समता तत्व की चर्चा आज जिस प्रकार चलती है उस प्रकार नहीं चलती होगी। लेकिन इसाप की महानता इसमें है कि उसने समाज जीवन के एक शाश्वत सच्चाई को बहुत सुन्दर ढंग से अधोरेखित किया है। समाज में जो बलवान होता है उसकी समता की परिभाषा शेर जैसी रहती है। सोवियत रशिया में आर्थिक समता का एक प्रयोग किया गया। उसकी परिणति अंत में आर्थिक विषमता में हुई। इस संदर्भ में अंग्रेजी का एक वाक्य बहुत प्रसिध्द है। “All men are equal, but some are more equal” राजर्षि शाहूमहाराज आरक्षण नीति के पुरोधा माने जाते हैं। अपने छोटे से संस्थान में उन्होंने शासकीय सेवा में 50 प्रतिशत आरक्षण का घोषणापत्र प्रकाशित किया। उसकी तिथि थी 26 जुलाई 1902। इसे अब 105 बरस पूर्ण हो चुके हैं। उनके जीवन का एक प्रसंग है। किसी एक समय अभ्यंकर नाम के एक सज्जन महाराजा शाहूजी के साथ विवाद कर रहे थे कि आरक्षण के कारण गुणवत्ता (Merit) को खतरा पहुंचता है। आरक्षण के कारण क्षमतावान व्यक्ति, गुणवान व्यक्ति पीछे रह जाएगा। उसका अवसर (opporiturity) छीन लिया जायेगा। महाराज सब सुनते रहे। उस समय वे कुछ नहीं बोले। श्री अभ्यंकर को अपने साथ लेकर वे अश्वशाला में आए। उन्होंने अश्वशाला के प्रमुख को कहा, “सब घोड़ों के लिए खुराक (चंदी) रखी जाए और सब घोड़ों को छोड़ दो।” खुराक खाने के लिए सभी घोड़े दौड़ पड़े। जो तगड़े घोड़े थे उन्होंने दुर्बलों को खुराक के नजदीक आने नहीं दिया। दुर्बल घोड़े भूखे रह गये। अभ्यंकर की ओर मुड़कर महाराज ने कहा, “समाज में भी ऐसा ही होता है। जो सशक्त है वह कमजोरों को आगे आने नहीं देता। वह सब चीजों पर स्वामित्व निर्माण करने की चेष्टा करता है। इसी कारण दुर्बलों का भी संरक्षण हो, उन्हें भी अवसर मिले ऐसी Positive action करनी पड़ती है।”

समाज में व्यक्ति किस कारण सशक्त बनता है? व्यक्ति को सशक्त करने वाले कारण इस प्रकार हैं-

व्यक्ति की जन्मजाति: व्यक्ति का जन्म अगर उच्च जाति में होता है तो जन्म के कारण ही वह सशक्त बनता है। समाज में उसे मान सम्मान प्राप्त होता है।

धनशक्ति: धनवान व्यक्ति के बारे में एक सुभाषितकार लिखता है, “जिसके पास विपुल धन है वह विद्यावान, कुलवान माना जाता है।” धनशक्ति के कारण सभी चीजें उसे आसानी से प्राप्त होती हैं।

राजशक्ति: व्यक्ति का जन्म किसी राजपरिवार में होता है तो राजसत्ता का बल उसे जन्मना प्राप्त हो जाता है। सत्ता स्थान पर पहुंचने के लिए उसे विशेष प्रयास या संघर्ष करने नहीं पड़ते हैं। इंदिराजी का पुत्र होने के कारण राजीव गांधी आसानी से प्रधानमंत्री बन गए। उनके पुत्र राहुल गांधी बिना प्रयास कांग्रेस के नेता बन गए।

धर्मसत्ता: धर्मसत्ता समाज में बहुत शक्तिशाली होती है। पुरोहित वर्ग धर्मसत्ता का अंग है। उसे मान-सम्मान, धन आदि प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। मठाधिपति, साधु-संत, प्रवचनकार जनता के आदर और स्नेह के पात्र होते हैं।

ज्ञानशक्ति: व्यक्ति को प्रतिष्ठा देने में ज्ञानशक्ति का योगदान बहुत बड़ा है। सामान्य जीवन में पढ़ा लिखा आदमी आदर का पात्र होता है। अनपढ़ों में एकाध पढ़ा हुआ व्यक्ति बहुत विद्वान समझा जाता है। जिसके पास विज्ञान का, अर्थशास्त्र का, समाजशास्त्र का, Managment शास्त्र का, सूचना तथा प्रौद्योगिकी का, आधुनिक तंत्रज्ञान का, व्यापार का ज्ञान होता है वह आज के जमाने में बहुत शक्तिशाली व्यक्ति समझा जाता है।

Media शक्ति: आधुनिक काल में Print Media तथा Electronic Media शक्तिशाली माना जाता है। उसकी शक्ति से राजनेता से लेकर धर्मनेता तक सभी डरते हैं। इस शक्ति के कारण राजसत्ता भी पलट जाती है। बोफोर्स कांड इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। पिछले साल कुछ विधायकों को घुसखोरी कांड में फंसाया गया। Media जिस के हाथ में है उसकी समाज पर सत्ता होती है। ‘Media rules the world‘ यह आज का मंत्र है।

संघटनशक्ति: अपना समाज जाति तथा पंथों में बंटा है। जिस जाति या पंथ के पास संघटन शक्ति होती है वह जाति या पंथ राजसत्ता को भी झुका देते हैं। ऐसे जाति या पंथ का अंग होने के कारण व्यक्ति के खिलाफ उंगली उठाना आसान बात नहीं होती।

यह सात कारण व्यक्ति को सशक्त बनाते हैं। इन सात शक्तिकेन्द्रों का बंटवारा समाज में समता के तत्तव के अनुसार कभी नहीं होता। जिसके पास शक्ति है वह उस शक्ति को कभी छोड़ना नहीं चाहता। शक्ति का एक समान गुणधर्म है Concentration करने का। राजपरिवार हमेशा यही चाहेगा कि सत्ता उसके परिवार के बाहर कभी न जाए। धनवान व्यक्ति भी यही चाहेगा कि धन उसके परिवार में ही सीमित रहे। डॉक्टर चाहेगा कि अपना बेटा या बेटी ही डाक्टर बने। इंजीनियर भी यही चाहेगा। धर्मसत्ता भी इसके लिए अपवाद नहीं है। जो गृहस्थी धर्माचार्य है वे अपनी बेटी या बेटे को ही उत्ताराधिकारी बनाते हैं। पूज्य पांडुरंग शास्त्रीजी की विरासत उनके बेटी के पास गई। यह स्वभाविक मनुष्य प्रवृत्ति है। इसे दुनिया की कोई भी ताकत या तत्तवज्ञान बदल नहीं सकता।

जिसके पास अल्पमात्रा में भी शक्ति या ज्ञान होता है वह उसे किसी के साथ बांटना नहीं चाहता। इसका एक रोचक उदाहरण मैं देना चाहूंगा। कुछ साल पहले लोनावाला में (पूना के पास) हम बैठक के लिए गए थे। बैठक समाप्त होने के पश्चात् घूमने के लिए एक सुमो चाहिए थी। एक सज्जन ने बताया, फलाने गली में सुमो का अड्डा है, वहां सुमो मिलेगी। उस जगह का पता पूछने के लिए आठ-दस दुकानवालों को हमने पूछा। उनका जवाब था, “हम आपको सुमो देते हैं। सुमो का अड्डा कहां हैं, पता नहीं।” दुकानकार ऐसा इसलिए कह रहे थे कि सुमो पर उसे कमीशन मिलने वाला था। उसे वह गंवाना नहीं चाहता था। यह प्रवृत्ति सभी क्षेत्र में रहती है। मैंने अगर ज्ञान दिया या information दी तो मेरा घाटा होगा। मेरे लिए Competitor खड़ा होगा यह भय रहता है।

व्यक्ति को सशक्त करने वाले केन्द्र तक पहुंचना समाज के दुर्बल और पिछड़े वर्ग के लिए महा कठिन काम है। जन्म के कारण जो विषमता पैदा होती है उसे दूर करना और भी कठिन कार्य है। समाज का कोई भी सशक्त वर्ग समता का तत्वज्ञान पढ़कर उसकी आवश्यकता महसूस कर समतायुक्त व्यवहार नहीं करेगा। समतायुक्त व्यवहार का अर्थ होता है Sharing of power, sharing of benifits of power. वह दयाभाव से दान देगा। पुण्य प्राप्ति के लिए या प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए सेवा कार्य में हाथ बढ़ाएगा लेकिन अपने मर्म की बात वह किसी के साथ Share नहीं करेगा।

शक्ति का दूसरा गुणधर्म है शोषण का और यह गुणधर्म जागतिक (Universal) है। जिसके पास शक्ति है वह जाने या अनजाने में भी शोषण करते रहता है। शोषण विषमता की जननी है। विषमता के 5 प्रकार हैं। (1) सामाजिक विषमता, (2) आर्थिक विषमता, (3) राजनैतिक विषमता, (4) धार्मिक विषमता, (5) सांस्कृतिक विषमता। जातिभेद सामाजिक विषमता को जन्म देता है। जातिभेद के कारण Graded inequality की उपज है। जो जिस जाति में जन्मा है वह अंत तक वही रहता है। डॉ. बाबासाहब जी के शब्दों में कहना हो तो, “हिन्दू समाज अनेक मंजिलों की इमारत है और उसकी कोई सीढ़ी नहीं। आर्थिक विषमता धन के विषम बंटवारे के कारण होती है। मार्क्‍स का Surplus value का सिध्दांत यहां पर काम करता है। श्रमिक का धन श्रम होता है। लेकिन उसका मूल्य धनवान व्यक्ति तय करता है। इसी प्रकार का विश्लेषण अन्य कारणों का भी किया जा सकता है। परन्तु विस्तार भय के कारण हम इन विषयों को यहीं छोड़ देते हैं।

सब प्रकार की विषमता के कारण समाज पुरूष को Cancer जैसी भयंकर बीमारी लग जाती है। Cancer ग्रस्त व्यक्ति का एक ही भवितव्य सुनिश्चित है- मृत्यु! जिस समाज पुरूष के शरीर में सब प्रकार की विषमता का Cancer घुसा है उसकी मृत्यु को कोई टाल नहीं सकता। भारत सहित दुनिया के समाज के इतिहास का अगर हम अवलोकन करे तो इस सत्य को समझने में कठिनाई नहीं होगी। बंगाल के संदर्भ में स्वामी विवेकानन्दजी ने लिखा है कि आप धनिक और उच्चवर्गीय लोग सोने की थाली में खाना खा रहे थे। गरीब, दीनदुखी, भूखे, कंगाल अपने ही बांधवों की ओर ध्‍यान देने के लिए आपके पास समय नहीं था। अन्न के कारण लोग भूखे मर रहे हैं। इस पीड़ा को भगवान को सहा नहीं गया। ईश्वर न्याय किया और आपको सबक सिखाने के लिए मुस्लिम आक्रामकों को भेज दिया। विवेकानंदवाणी ऐसे समय बहुत कड़वी होती है।

पांच प्रकार की विषमता व्यक्ति को दस प्रकार से दुर्बल बनाती है। (1) सब प्रकार के ज्ञान से उसे वंचित रखती है।, (2) उसे निर्धन बनाती है।, (3) उसे अंधविश्वासी बना देती है।, (4) उसका सांस्कृतिक अध:पतन करती है।, (5) निर्धन और गरीब होने के कारण उसका जीवन पशुतुल्य बन जाता है।, (6) सब प्रकार की पराधीनता का वो शिकार बन जाता है।, (7) आत्मविश्वास, आत्मतेज खो बैठता है।, (8) समाज की सभी प्रकार की व्यवस्था में वह उदासीन बन जाता है।, (9) जब परकीय आक्रमण होता है तब उसके खिलाफ लड़ने की उसकी मानसिकता नहीं रहती।, (10) परधर्मियों का वह आसानी से शिकार बन जाता है।

समाज की उदासीनता के संदर्भ में इसाप की कहानी याद आती है। एक धोबी था। उसका एक गधा था। एक दिन उस गांव में परचक्र आया। लोग भागने लगे। धोबी गधे को कहता है, “अरे तू भी भाग जा। आक्रमणकारी तुझे पकड़ ले जाएंगे।” तब गधा कहता है, इसे मुझमें क्या फरक पड़ने वाला है? मालिक बदल जाएगा; बोझा तो वही ढोना है। बोझ ही ढोना है तो मेरे लिए मालिक कौन है, इसका कोई मतलब नहीं रहता। इसाप फिर से विदारक सत्य की बात करता है। पूने के पास कोरे गांव में अंग्रेजों की पेशवा के साथ 1918 में अंतिम लड़ाई हुई। जिसमें पेशवा हार गए। मराठी राज्य की इतिश्री हो गई। अंग्रेजों की फौज यहां के ही अस्पृश्यवर्ग के महार जाति की थी। उत्तर पेशवाई में अस्पृश्य वर्ग पर जो अनन्वित अत्याचार किये गए इसके कारण महारों को यह राज्य अपना राज्य है ऐसा नहीं लगा।

व्यक्ति को दुर्बल बनाने वाले दस कारणों का निराकरण करने की सबसे बड़ी शक्ति राज्य यंत्रणा में (State power) होती है। राज्य का यह काम है कि वह समाज के दुर्बल वर्ग को सबल बनाए। आरक्षण इसका एक तरीका है। आरक्षण के कारण दुर्बल वर्गों को अवसर उपलब्ध होता है। आरक्षण के बिना अवसर उपलब्ध होना असंभव है। आरक्षण के कारण Participatory role बढ़ता है। सहभागिता के बिना समरसता असंभव है। सहभागिता के कारण जो कार्य चलता है उसके विषय में आत्मभाव निर्माण होता है। संस्था जीवन में सहभागिता है तो वह संस्था अपनी लगेगी। गांव के ग्रंथालय से लेकर संसद तक समाज के सभी वर्गों की सहभागिता रहेगी तब इन सभी संस्थाओं के संदर्भ में आत्मीय भाव जगेगा। संस्था व्यक्तियों के कारण बनती है। एरवाद विचार जीवनमूल्य और ध्‍येय संस्था की आधारशिला होती है। आत्मीयता का मतलब होता है व्यक्तियों के प्रति आत्मीय भाव, मूल्यों के प्रति आत्मीयभाव, ध्‍येय के प्रति आत्मीयभाव विशेष अवसर देकर और हर स्थान पर आरक्षण की व्यवस्था कर सहभागिता की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।

राजसत्ता को यह काम कैसे करना चाहिए इस विषय में एक पुरानी कहानी है। वह कहानी करूणा सागर भगवान गौतम बुध्द ने बताई है। वाराणसी का एक राजा था। उसके पास थोड़ा धन जमा हो गया। वह यज्ञ करना चाहता था। राजपुरोहित को उसने यज्ञ के बारे में पूछा। राजपुरोहित ने उसे कहा, “महाराज यज्ञ करने के लिए यह समय अनुकूल नहीं है। अपने राज्य में युवक बेकार हैं। खेती की उपज बहुत कम है। राज्य का व्यापार घटता जा रहा है। मेरी सलाह है कि जो धन राजकोष में जमा हुआ है उसका सदुपयोग करना चाहिए। कास्तकारों को उत्तम बीज, खाद तथा खेती के अवसर देने चाहिए। इसके कारण खेती की उपज बढ़ेगी और राजस्व भी बढेग़ा। जो युवा अपना निजी व्यवसाय करना चाहते हैं उन्हे पूंजी देनी चाहिए। सरकारी कामों को बढ़ाकर बेरोजगारों को काम देना चाहिए। उसके कारण भी राजस्व बढ़ेगा। व्यापार के लिए व्यापारियों को धन देना चाहिए। अच्छी सड़कें बनानी चाहिए। सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध करने चाहिए। इससे भी राजस्व बढ़ेगा।” राजा ने वैसे ही किया। संपत्ति निर्माण के कारण धन बढ़ गया। लोग खुशहाल हो गए। राज्य का विकास हो गया।

आज के राज्य शासन को इस कथा से सबक सीखना चाहिए। धनपति के लिए सेज निर्माण करने से विषमता बढ़ेगी। दुर्बल वर्गों को प्रशिक्षित कर उनको पूंजीपति बनाने की योजना बनानी चाहिए। शिक्षा के निजीकरण के कारण दुर्बल वर्ग आधुनिक शिक्षा से वंचित रहेगा। आवश्यकता है शिक्षा के वंचितीकरण करने की। वंचित वर्ग के लिए केवल विद्यमान शिक्षा प्रणाली में आरक्षण पर्याप्त नहीं। उनके सक्षमीकरण के लिए विशेष शिक्षण संस्था University बनाने की आवश्यकता है। Banking क्षेत्र, आई.टी. Biotechnology, Hoteling, पर्यटन, Marketing इत्यादि आधुनिक क्षेत्र में प्रशिक्षित कर हमारे पिछडे बंधुओं को प्रगति का विशेष अवसर देना चाहिए। किसी एक जमाने में समाजवादी समाजरचना यह अपना नारा था। उसके कुछ अच्छे-बुरे दोनों पहलू हैं। अब हमारा नारा होना चाहिए समरसतावादी समाजरचना। समाज के सभी शक्ति केन्द्रों में समाज के दुर्बल पिछड़े वंचित वर्गों का सहभाग बढ़ाने की नीति अपनानी पड़ेगी। ऐसी नीति का एक vision document तैयार करना चाहिए और उसे कठोरता से क्रियान्वित करना चाहिए।

जैसा कि हम पहले ऊपर लिख चुके हैं Sharing of power vkSj sharing of benefits of power इसके लिए व्यक्ति तथा व्यक्ति समूह कभी तैयार नहीं होता। जो व्यवस्था बनी रहती है उसमें एक जबरदस्त vested interest lobby तैयार हो जाती है। समाज का उच्चवर्णीय हमेशा आरक्षण का विरोध ही करेगा। समाज का पूंजीपति वर्ग आर्थिक समता को कभी स्वीकार नहीं करेगा। समाज का राजनीतिक वर्ग power sharing के लिए तैयार नहीं होगा। (महिला आरक्षण विधेयक इसका ज्वलंत उदाहण है।) आरक्षण का जिनको लाभ हो रहा है ऐसा वर्ग भी क्रीमी लेअर की संकल्पना को स्वीकार नहीं करता। उसका भी vested interest group बन गया है। सभी के विरोध को पैरों तले दबा कर जिस प्रकार राजर्षि शाहू महाराज ने समाज के वंचितों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया उसी नीति का कड़ाई से पालन करना चाहिए। आरक्षण का प्रश्न केवल मात्र शिक्षा, रोजगार, सक्षमीकरण तक ही सीमित नहीं, आज यह विषय अपने अस्तित्व के साथ जुड़ा है। जब तक हमारे समाज के अंतिम पंक्ति का अंतिम व्यक्ति सबल नहीं बनता तब तक हम किसी भी प्रकार के आतंकवाद से लड़ नहीं सकते। अन्तरराष्ट्रीय Eco-terrorism से नहीं लड़ सकते, अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आक्रमण से नहीं लड़ सकते; इस तथ्य पर शांत चित्त से हमें विचार करना चाहिए।

(लेखक सुप्रसिध्द चिंतक व ‘विवेक’ मराठी साप्ताहिक पत्रिका के संपादक हैं)

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24 Comments on "आरक्षण का सामाजिक जीवन में महत्व"

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रघुवीर जैफ ,जयपुर
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रघुवीर जैफ ,जयपुर

आरक्षण पर बवाल करने से कथित उच्च वर्ग का कब्जा /आदिपत्य भारत के संसाधनों और एक आरामदायक पदों की स्थिति में है , उस पर बहुसंख्यक वर्ग का ध्यान नहीं जाता |अगर एक निष्पक्ष रायशुमरी करवाई जाये तो साबित हो जायगा कि सामान्य वर्ग के लगभग 90 % उम्मीदार लिखित परीक्षाओं में फिसड्डी होते है लेकिन साक्षात्कर में आरक्षित वर्ग से 150 से 190 अंक ज्यादा लेकर प्रतिभावान बन जाते है | भारतवर्ष से ज्यादा मानवीय गुणों का अपमान अन्य देशों में नहीं है |

samvatsar anil
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just imagine: today india is surrounded by powerful enemies, our army is short of fire power| we need unity + power + brains, irrespective of castes | is it ever possible in the current situation when powerful communities are violating for reservation on caste basis ?

j.p.gupta
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sadiyo seg

Rekha Singh
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General Colin Powell से किसी व्यक्ति ने कहा की आप अमेरिका के सबसे पहले African American General है तब उन्होने तत्परता से उसका जबाब देते हुए और उस पद के लिए अपनी योग्यता सिद्द करते हुआ कहा की मै हमेशा से सबसे Best General बनना चाहता था | समस्त भारत एवं भारतवासियों को इससे सबक लेना चाहिए की आरक्षण के माध्यम से कोइ भी व्यक्ति किसी पद के लिए अपनी सेर्वोच्य योग्यता सिद्ध नहीं कर सकता ,हां अपवाद हो सकते है | भारत शब्द उन लोगो के लिए है जो वोट बैंक की राजनीति करते है सत्ता मै बने रहने… Read more »
क्षेत्रपाल शर्मा
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क्षेत्रपाल शर्मा
मैं सत्यार्थी जी के विचारों से सहमत हूं . मेरे अपने विचार यह हैं . आरक्षण की स्थिति और सामाजिक समीक्षा क्षेत्रपाल शर्मा आज समाज का हर वर्ग नौकरियों में आरक्षण की मांग करता है.इसे एक आसान रास्ते के रूप में वे चाहते हैं. आज आज़ादी मिले 65 वर्ष हो चुके हैं . कभी गूजर तो कभी और वर्ग इस तरह की मांग उठा देते हैं हाल ही का मध्य प्रदेश का किस्सा मालूम ही है. दक्षिण के राज्यों में स्थिति से निबटने लिए वहां के पढे लिखे युवकों ने खाड़ी देशों की राह पकड़ी. आन्दोलनों को देखते हुए सर्वोच्च… Read more »
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