लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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slaveलार्ड मैकाले ने फरवरी 1835 में ब्रिटिश संसद में कहा था कि, मैंने भारत के कोने-कोने की यात्रा की है और मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो या चोर हो। मैंने इस देश में ऐसी संपन्नता देखी, ऐसे ऊंचे नैतिक मूल्य देखे कि मुझे नहीं लगता कि जब तक हम देश की रीढ़ की हड्डी न तोड़ दें, तब तक इस देश को जीत पायेंगे और ये रीढ़ की हड्डी है, इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, इसके लिए मेरा सुझाव है कि इस देश की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को इसकी संस्कृति को बदल देना चाहिए। यदि भारतीय यह सोचने लग जाए कि हर वो वस्तु जो विदेशी और अंग्रेजी, उनकी अपनी वस्तु से अधिक श्रेष्ठ और महान है, तो उनका आत्म गौरव और मूल संस्कार नष्ट हो जाएंगे और तब वो वैसे बन जाएंगे जैसा हम उन्हें बनाना चाहते है – एक सच्चा गुलाम राष्ट्र । लार्ड मैकाले ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनी शिक्षा नीति बनाई, जिसे आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार बनाया गया ताकि एक मानसिक रूप से गुलाम कौम तैयार किया जा सके, क्योंकि मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से बढ़कर होती है। मैकाले की शिक्षा नीति 1947 तक निर्बाध रूप से जारी रही, आजादी के पश्चात भी हमने इसमें कोई रद्दोबदल करना उचित नहीं समझा और यूं ही इसे चलने दिया। जिसका नतीजा आज हमारे सामने है। देश में आज जो आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक हालात निर्मित हुए है, उसका मूल कारण यही शिक्षा प्रणाली है, जिसने हमारे आत्म गौरव का नाश कर हमे अंग्रेजों के आगे कमजोर बनाया। आजादी के समय के कई राजनेता और अफसर इसी गुलाम शिक्षा प्रणाली की देन थे, लिहाजा अंतर कुल इतना हुआ कि ब्रिटिश गए और हम अपने चुनिंदा प्रतिनिधियों के गुलाम बनकर रह गए, वही नियम कानून और निर्बंधनाएं हम पर लागू रहीं, जो आजादी के पहले लागू थी, बल्कि कई मामलों में तो स्थिति और भी खराब हो गई। समाज को आजादी का जो वाजिब हक मिलना था, वह नहीं मिला। कार्यपालिका के ब्रिटिश कालीन चरित्र के चलते स्वामित्वाधिकार उन्मूलन के बाद हुए भूमि सुधार के लाभ से जनता वंचित रही ना ही प्राकृतिक संसाधनों, जल जंगल और जमीनों पर स्थानीय आबादी को अधिकार हासिल हुए। ऐसे में बहुसंख्यक आबादी के लिये आजादी का कोई मोल नहीं रहा।

मानसिक गुलामी के कारण आज हमारा देश आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहा है। केन्द्र सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे करे लेकिन हकीकत सभी जानते हैं कि सरकारी नीतियां असंतुलित विकास को जन्म दे रहीं है, जिसमें एक ओर होगा, मेट्रो सिटीज् का चमचमाता इंडिया जिसकी अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों होगी, तो दूसरी और होगा गांवों में गरीबी और कर्ज से आत्महत्या करता लाचार किसान। भारत की इस स्थिति के पीछे विशेषज्ञ डब्लूटीओ और विश्व बैंक की नीतियों को दोषी मानते है, लेकिन प्रश्न ये उठता है कि आखिर हम पर यह नीतियां इतनी प्रभावशाली है क्यों? प्रश्न जितना सीधा है उत्तर भी उतना सपाटी ही मिलता है, कि भारत पर अट्ठारह लाख करोड़ से ज्यादा का विदेशी कर्ज है, ऐसे में हमारी सरकारें विदेशी नीतियां मानने को मजबूर है, भले ही वो कितनी भी जनविरोधी क्यों न हो। लेकिन सरकार ये नहीं बताती कि हम पर इतना विदेशी कर्ज आया कहां से । आजादी के बाद पहली बार विदेशी ऋण की आवश्यकता 1952 में पड़ी जब हमने पहली पंचवर्षीय योजना बनाई, जिसमें देशज ज्ञान और तकनीकी कौशल की उपेक्षा कर हमने विकास के विदेशी मॉडल को स्वीकारा और क्रियान्वित करने के लिए विदेशी कर्ज लेने पहुंचे। इस समय संसद में जबरदस्त बहस हुई। कई सांसदों ने मांग उठाई कि 1939 में भारत में ब्रिटेन को द्वितीय विश्व युध्द लड़ने के लिये जो 1700 करोड़ का कर्ज दिया था, उसकी वसूली की जाए। लेकिन प्रधानमंत्री की ब्रिटेन सरकार से वसूली की हिम्मत नहीं हुई तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध सुधारने के नाम पर उन्होंने इस रकम को भुलाकर कर्ज लेना ही उचित समझा, जिसकी परिणति मुद्रास्फीति से हुई जो आज तक नहीं रूकी, 15 अगस्त 1947 को जो एक रूपया एक डॉलर के बराबर होता था वो आज विदेशी कर्ज के बोझ से दबकर 41-42 रुपये तक गिर चुका है, भविष्य में कर्ज के साथ रुपये का मूल्य और गिरेगा, क्योंकि विदेशी कर्ज लेने की पहली शर्त ही होती है, मुद्रा का अवमूल्यन करना। मानसिक गुलामी और खुद को कमजोर कर आंकने का यह एक उदाहरण मात्र है।

उच्चशिक्षित युवा हर देश की उम्मीद होती है, लेकिन भारत के संदर्भों में यह कथन, पूरी तरह से सही नहीं है, क्योंकि हमारा युवा हमारे लिये बोझ ज्यादा साबित हो रहा है । मैकाले के तौर तरीकों से तैयार युवा वर्ग के लिए देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत बासी और फूहड़ बातें हो चुकी है, जिससे जितनी जल्दी नाता तोड़ लिया जाए उतना ही बेहतर है। आज वो समाज की स्थापित मान्यताओं को विदेशी ज्ञान के चश्में से देखकर उन्हें बदलने पर जोर देते हैं, लेकिन वो ये भूल जाते हैं, कि भारत जैसे विविधता भरे राष्ट्र को कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही मान्यताएं बांधती है, इनके टूटने का मतलब है देश में बिखराव आना। स्वतंत्रता संग्राम के समय क्रांतिवीरों ने इन्हीं मान्यताओं के आधार पर उच्च नैतिक मूल्य स्थापित किये जिसके बल पर पूरे राष्ट्र को एक जुट किया गया। आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने इन्हीं मूल्यों को नागरिकों के मूल कर्तव्य के रूप में अनुच्छेद 51 (क) में शामिल किया और नागरिकों से अपेक्षा की गई कि वह उच्च आदर्शों को और अधिक मजबूती प्रदान करें। लेकिन यहां भी समस्या वही रही । मैकाले की शिक्षा नीति जिसने इन आदर्शों को मजबूती देना तो दूर समझना भी मुनासिब नहीं समझा । शिक्षित वर्ग को नागरिक अधिकार सारे चाहिए लेकिन कर्तव्यों के प्रति वो विमुख है। परिणाम हमारे सामने है, देश के शिक्षित युवा वर्ग की आंखों पर जो विदेशी चश्मा चढ़ा है, उससे केवल देश का पिछड़ापन ही दिखाई देता है, जबकि उसे यह भी नहीं मालूम कि वह क्या नहीं जानता, क्योंकि उसके चश्में का लैंस इतना सक्षम नहीं कि इस देश की बारीकियों को देख सके, आधुनिक ज्ञान का यह चश्मा युवा पीढ़ी को स्पष्ट निकट दृष्टि प्रदान कर पाने में भी सक्षम नहीं तो दूर दृष्टि की कल्पना ही बेमानी है। इस कथन को यूं भी समझा जा सकता है कि आज हम पर जिस तरह की विदेशी नीतियां लादी जा रही हैं, उसका निर्धारण डब्लूटीओ और अमेरिका करता है, ना कि हमारी सरकारें। यह नीतियां कितनी दुखदायरी है, इसका अंदाजा वैट कर प्रणाली, मुक्त बाजार और कृषि क्षेत्र में बढ़ रहे विदेशी दखल से लगाया जा सकता है, इनका प्रभाव आज भले ही सीमित हों लेकिन साल दर साल ये बढ़ने ही वाला है, इसलिए आज नहीं तो कल हम भी इसकी जद में आयेंगे । ये वही समय और परिस्थितियाँ है जो आज से डेढ़ सौ साल पहले 1857 में बनी थी, जिसके बाद देश अंग्रेजों का गुलाम हो गया । तब भी हमारे शिक्षित वर्ग को कुछ भी गलत होते नहीं दिख रहा था और आज भी हमारे शिक्षित वर्ग को सब ठीक दिखाई दे रहा है । वो शहरों का चमकीला भारत देखकर खुश है, जबकि हमारे संसाधनों जल, जंगल, जमीन और राजकोष पर बढ़ते विदेशी अधिकार उसे दिखाई नहीं देते। दरअसल विदेशी तंत्र ने इस मानसिक गुलाम पीढ़ी को पंगु बनाने के लिए विलासी बनाना भी शुरू कर दिया है, ताकि विद्रोह की गुंजाइश ही खत्म हो जाए, इसके लिए मीडिया को हथियार बनाया गया, शिक्षित वर्ग को सिनेमा और क्रिकेट जैसे मामलों में उलझाकर रखों ताकि वो देश की वास्तविक समस्याओं से कट जाए। लेकिन अफसोस कि हमारे शिक्षित वर्ग को अपने चश्में से यह सब नहीं दिखता, क्योंकि विदेशी संस्कृति ने उसे ऐश्वर्य भोगी जो बना दिया है । अब उसके लिए देश और समाज मायने नहीं रखता, वह आत्मकेंद्रित हो चुका है, ऐसे ही आत्मकेंद्रित विलासी राजाओं और नवाबों ने यह देश अंग्रेजों को सौंपा था, आज राजशाही नहीं लोकतंत्र है, जिसमें जनता ही राजा और नवाब है, लिहाजा ये विदेशी ज्ञान में पढ़ी नई पीढ़ी उसी विलासी शासक की तरह अपने हिस्से का देश विदेशी हाथों में सौंप रही है।

-आशुतोष दीक्षित

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1 Comment on "आजाद देश के गुलाम नागरिक"

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sunil patel
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आशुतोष जी ने वाकई बहुत सार्थक एवं यथार्थ लेख लिखा है। जितना अच्छा लिखा है उतना ही सार्थक उसका नाम ’’आजाद देश के गुलाम नागरिक’’ भी दिया है। सच मे कौन कहता है कि हम पूर्ण रूप से आजाद हैं। हम सिर्फ उपरी तौर से आजाद हुए हैं किन्तु मानसिक रूप से हम आज भी गलाम ही है। अंग्रेज जाते हुए हुऐ हमारे अन्दर कई वायरस डाल गए जिनमे से तीन मुख्य है 1. अंग्रेजी, 2. क्रिकेट और 3. चाय। यह ऐसे वायरस है जिनसे हम अगले 500 सालों के लिए गुलाम बन गऐ हैं। बड़े ही दुखः का विषय… Read more »
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