लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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ganga

-अरुण तिवारी-

-…ताकि गंगा भी न मांग ले इच्छा मृत्यु-

28 मई, 2015; दिन गुरुवार, पंचाग के हिसाब से गंगा दशहरा यानी ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि! भगवान बाबा श्री काशीविश्वनाथ की कलशयात्रा का पवित्र दिन !! कभी इसी दिन बिंदुसर के तट पर राजा भगीरथ का तप सफल हुआ। पृथ्वी पर गंगा अवतरित हुई। ‘‘ग अव्ययं गमयति इति गंगा’’ – जो स्वर्ग ले जाये, वह गंगा है।

 

गंगा का सत्

पृथ्वी पर आते ही सबको सुखी, समृद्व व शीतल कर दुखों से मुक्त करने के लिए सभी दिशाओं में विभक्त होकर सागर में जाकर पुनः जा मिलने को तत्पर एक विलक्षण अमृतप्रवाह ! जो धारा अयोध्या के राजा सगर के शापित पुत्रों को पु़नर्जीवित करने राजा दिलीप के पुत्र, अंशुमान के पौत्र और श्रुत के पिता राजा भगीरथ के पीछे चली, वह भागीरथी के नाम से प्रतिष्ठित हुई; जो अलकापुरी की तरफ से उतरी, वह अलकनंदा और तीसरी प्रमुख धारा ’मंदार पुष्प सुपूजिताय’ के नाम पर मंदाकिनी कहलाई। शेष धाराओं ने भी अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग नाम धारण किए। इन सभी ने मिलकर पंच प्रयाग बनाये। जब तक ये अपने-अपने अस्तित्व की परवाह करती रही, उतनी पूजनीय और परोपकारी नहीं बन सकी, जितना एकाकार होने के बाद गंगा बनकर हो गईं। विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग के बाद पंच प्रयागों में प्रमुख देवप्रयाग के बाद गंगा बनकर बही धारा ने ही सबसे ज्यादा ख्याति पाई। अंततः भागीरथी उद्गम पर्वत से ही दूसरी ओर उतरी गंगा की बङी बहन यमुना ने भी बङप्पन दिखाया। मायके में बिछुङी बहने ससुराल के मार्ग मंे एकाकार हो गईं। बङप्पन ने यश पाया। इलाहाबाद, अद्वितीय संगम की संज्ञा से नवाजा गया। सागर से गंगा मिलन का स्थल, गंगासागर का नामकरण पाकर, अमर हो गया। जहां गई, कल्याणी ने परमार्थ ही किया।

 

इंसान का सच

यह गंगा का सत् है। कलियुगी इसंान का सच, गंगा ने अपने अवतरण से पहले ही जान लिया था। गंगा ने अवतरण से इंकार करते हुए सवाल किया था -‘‘मैं इस कारण भी पृथ्वी पर नहीं जाऊंगी कि लोग मुझमें अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पाप को धोने कहंा जाऊंगी ?’’ दुखद है कि गंगा आस्था के नाम पर, आज  हम सभी सिर्फ स्नान कर सिर्फ मैला ही बढा रहे हैं। गंगा दशहरा मनाने के नाम पर गंगा को मलीन ही बना रहे है। गंगा में वह सभी कृ्त्य कर रहे हैं, जिन्हे गंगा रक्षा सूत्र ने पापकर्म बताकर प्रतिबंधित किया था । गंगा दशहरा, माघ मेला, कार्तिक पूर्णिमा से लेकर कुंभ तक कभी अपनी नदी… प्रकृति व समाज की समृद्धि के चिंतन-मनन के मौके थे। हमने इन्हे दिखावा, मैला और गंगा मां का संकट बढाने वाला बना दिया। हमने गंगा को अपनी मां नहीं, अपनी लालच की पूर्ति का साधन समझ लिया है; भोग का एक भौतिक सामान मात्र! अपने लालच के लिए हम मां को कैद करने से भी नहीं चूक रहे। हम उसकी गति को बांध रहे हैं। मां के सीने पर बस्तियां बसा रहे हैं। हम भूल गये हैं कि एक संतान को मां से उतना ही लेने का हक है, जितना एक शिशु को अपने जीवन के लिए मां के स्तनों से दुग्धपान।

 

पैसा नहीं, प्यार चाहिए

हम यह भी भूल गये हैं कि मां से संतान का संबंध लाड, दुलार, स्नेह, सत्कार और संवेदनशील व्यवहार का होता है, व्यापार का नहीं। गंगा सफाई हेतु राजग सरकार का बजट दो हजार, 37 करोङ से बढकर, 20 हजार करोङ तक जा पहुंचा है। हम भूल गये हैं कि नदी को पैसा और कार्यक्रम बाद में, व्यवहार का सिद्धांत और नीति पहले चाहिए। क्या इस एक साल में कोई नीति बनी ? औपचारिक रूप से कोई सि़द्धांत तय किए गये ? बांध, बैराज, तटबंध, नदी की जमीन, नदी के प्रवाह और प्रदूषण को लेकर भारत में आज भी कोई नीति नहीं है। इसीलिए नदी कार्यक्रमों को लेकर भारत में विरोध हैं, विवाद हैं और असफलतायें हैं।

 

नमामि गंगे का जश्न और इच्छा मृत्यु

समाज गंगोत्सव मनाने में व्यस्त है और गंगा की मंत्री, ’नमामि गंगे’ की उपलब्धियों का जश्न मनाने में। दूसरी ओर, गंगा का एक संत इच्छा मृत्यु के अधिकार की मांग कर रहा है। 1998 से चले रहे तमाम विरोध और अदालती आदेश के बावजूद हरिद्वार में अवैध रेत खनन जारी है। बाढ नियंत्रण के नाम पर 19 अप्रैल को प्रशासन ने गंगा के तल से रेत खुदाई का आदेश पुनः दे दिया गया है। आरोप है कि प्रशासन, खनन माफिया के संग मिल गया है। इसके खिलाफ खङा मातृसदन, इस विरोध में पहले ही अपने स्वामी निगमानंद और स्वामी गोकुलानंद को खो चुका है। खबर आई कि 16 मई से स्वामी आत्मबोधानन्द का अनशन पर है। समाज, सरकार और प्रशासन.. तीनों की असंवेदनशीलता को देखते हुए मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद सरस्वती ने स्वयं को एक कमरे मंे बंद कर लिया। महामहिम राष्ट्रपति, उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय को लिखकर मरने की अनुमति चाही। हालांकि प्रशासन के अनुरोध ने वह कमरे से बाहर निकल आये हैं, लेकिन अनशन जारी है। मांग को लेकर सरकार चुप है और समाज भी।

 

एक नैतिक प्रश्न

नैतिक प्रश्न यह है कि जान की बाजी लगाकर भी गंगा की रक्षा को संकल्पित संतोें के प्रति संवेदनशील होकर, उनके लक्ष्य की पूर्ति के लिए तत्पर होना जरूरी है या जश्न मनाना ? 365 दिनों की आकलन ज्यादा जरूरी है या संत की जान के साथ अपनी जान लगा देना ? संवेदना के इन प्रश्नों को सामने रखें, तो कह सकते हैं कि इस एक साल में न गंगा को लेकर समाज की संचेतना लौटी है और न ही सरकार के भीतर, गंगा रक्षक संतानों को लेकर कोई वात्सल्य पैदा हुआ है। क्या वाकई मरी हुई संवेदना के लोग होते जा रहे हैं हम सभी ? यदि ऐसा ही रहा, तो एक दिन गंगा भी इच्छा मृत्यु की मांग कर बैठेगी। गंगा सफाई का बजट दो लाख करोङ रुपये पहुंचाकर भी हम गंगा को जिला नहीं सकेंगे। हम और कुछ न कर सकें, तो कम से कम गंगा दशहरा मनाने के नाम पर गंगा को मलीन तो न बनायें। गंगा की यही गुहार है। कृपया, सभी भारतवासी सुनें।

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