लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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श्री भास्कर चतुर्वेदी को हमेशा से फूलों व फलों के बग़ीचों से बहुत लगाव था। सेवानिवृत्त होने के बाद उनका ये शौक जुनून बन गया था। उनके बंगले के चारों ओर ज़मीन थी जिसे उन्होने बहुत व्यव्थित तरीके से संवारा था। छोटे से शहर मे उनके बग़ीचे की बहुत चर्चा थी। आरंभ मे उन्होने विशेषज्ञों की सहायता ली और दूर दराज़ इलाकों की नर्सरी से भी पौधे मंगवाये। अब वे ख़ुद ही विशेषज्ञ हैं, उनकी अपनी नर्सरी है। बागबानी से संबधित पुस्तके भी बहुत हैं। इटरनैट से भी नई से नई जानकारी वो लेते रहते हैं।

बग़ीचे मे एक ओर गुलाब की क्यारियाँ थीं जिनमें विभिन्न किस्मो के अलग अलग रंग के गुलाब थे। गुलाब की देखभाल कटाई छंटाई भास्कर चतुर्वेदी स्वयं करते थे दूसरी ओर मौसमी फूलों की क्यारियाँ रंगीन छटा बिखेरती थीं।बीच मे हरे कालीन सा नर्म धास का लौन था। एक ओर औरचिड्स और क्रौटन खूबसूरती के साथ कटे छंटे बग़ीचे की शोभा बढा रहे थे। बरामदे मे सुन्दर सजीले गमलों मे तरह तरह के पौधे लगे थे। बंगले के अगल-बगल वाली ज़मीन पर आम, अमरूद ,अनार,नीबू कटहल केले और करोंदे आदि के पेड़ लगे थे। पीछे की ज़मीन पर मौसम की सब्ज़ियाँ उगाई जाती थीं।थोड़ी सी ज़मीन पर लैमनग्रास, एलोवेयरा पुदीना, तुलसी और कई जड़ी बूटियाँ भी लगाई हुई थीं। मकान के साथ फूलों वाली लतायें चढी हुई थी। पीछे की तरफ भी लताओं मे उगने वाली सब्ज़ियाँ मकान के ऊपर चढ़ा दी जाती थीं। रौशनी आने के लियें खिड़कियों के आसपास हमेशा कटाई छंटाई होती रहती थी। इससे मकान ठंडा रहता था और रौशनी की भी कमी नहीं होती थी। काम मे मदद के लियें एक माली था पर चतुर्वेदी साहब ख़ुद भी बग़ीचे मे बहुत काम करते थे। पेड़ पौधे उनके दोस्त,उनकी ख़ुशी और दुख दर्द के राज़दार थे। पेडों पर उगे फल सब्जियाँ तोड़कर सब जान पहचान वालों को या ग़रीबों की बस्ती मे बटवाने मे उन्हे बहुत आनंद आता था पर कोई चोरी से उनके बग़ीचे मे घुस जाय या किसी पेड़ से कोई फल तोड़ने की कोशिश करे तो उन्हें बरदाश्त नहीं होता था।

श्री भास्कर चतुर्वेदी के दो बेटे अपने अपने परिवारों के साथ अमरीका मे जाकर बस गये थे।कुछ वर्ष पहले पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। घर मे वो अकेले रहते थे शहर मे कुछ मित्र और रिश्तेदार थे पर उनका अधिकाँश समय अपने पेड़ पौधों की सेवा मे ही निकल जाता था, वो उनसे ही मन की बाते भी कर लेते थे। उनके दोनो बेटे उनसे विदेश मे आकर रहने का आग्रह कर कर के थक गये थे पर वो इसके लियें तैयार नहीं थे। बेटे साल दो साल मे आते रहते थे, बेटों ने कहा कि अगर हमेशा के लियें नहीं तो कम से कम 1-2 महीने ही आकर रह जायें पर अपने पेड़ पोधों के मोह की वजह से वे टाल देते थे। श्री भास्कर चतुर्वेदी भी अपने बेटों के परिवार के साथ अधिक समय व्यतीत करना चाहते ,विशेषकर अपने पोते पोतियों के साथ इसलिये उन्होने इसबार अपने बेटों का आग्रह मान लिया। वो दो महीने के लियें अमरीका जाने को तैयार हो गये।

दिन मे तो माली आता ही था शाम को 5-6 बजे तक रहता था पर अकेले एक आदमी उनका बग़ीचा सम्हालने लियें पर्याप्त नहीं था। दूसरे माली की तलाश शुरू हो गई। कई मालियों को जाँचने परखने के बाद एक नया माली रख लिया गया। अब रात को बग़ीचे के लियें एक चौकीदार की ज़रूरत भी थी क्योकि चतुर्वेदी जी जानते थे कि खाली मकान देखकर कोई भी चलते फिरते घुसकर पेड़ पौधों को नुक्सान पंहुचा सकता है। चतुर्वेदी जी सोचते कि सोने चाँदी को तो सुरक्षा के लियें कोई बैंक के लौकर मे रख सकता है, पर सबसे कठिन है बग़ीचे की सुरक्षा का प्रबंध करना। यहाँ तक कि पालतू कुत्ते बिल्लियों को छोड़कर जाना हो तो शैल्टर मे प्रबंध होजाता है पर उनके परिवार के नाज़ुक पेड़ पौधों की सुरक्षा और देखभाल का प्रबंध करना काफ़ी कठिन काम लग रहा था।

कुछ दिन मे एक चौकीदार का भी इंतज़ाम हो गया। माली तो बहुत पुराना था, उसे भी पेड़ पौधों से बहुत प्यार था,उस पर चतुर्वेदी साहब को भरोसा था, वो यह भी जानते थे कि पुराने माली के होते हुए नया माली भी कोई गड़बड़ नहीं कर सकेगा। चौकीदार से वो आश्वस्त नहीं थे। उन्होने उसकी परीक्षा लेनी चाही। जाने की तारीख़ से दो दिन पहले ही वो पूरे सामान के साथ एक स्थानीय होटल मे रहने चले गये। शाम को सात बजे के क़रीब वो नक़ली दाड़ी मूंछ लगाकर टीशर्ट जीन्स पहनकर काला चश्मा लगाकर, यानि कि अपना पूरा हुलिया बदलकर अपने घर पंहुच गये चौकी दार बग़ीचे मे टहल रहा था यह देख कर उन्हें बड़ी तसल्ली मिली।

चतुर्वेदी साहब ने चौकीदार को बुलाकर कहा ‘’भैया मुझे बग़ीचे मे से चार गुलाब के फूल तो़ड़ने दो।‘’

चौकीदार ने जवाब दिया ‘’बिल्कुल नहीं मेरे साहब मुझे बग़ीचे की देख भाल के लियें तनख़्वाह देते हैं। मै इस बग़ीचे से किसी को भी कुछ नहीं लेने दे सकता।‘’

चतुर्वेदी साहब ने कहा ‘’भैया दो चार गुलाब के फूल दोगे तो तुम्हारे साहब को पता भी नहीं चलेगा।‘’

‘’पता चले या न चले पर मै अपने मालिक का वफादार नौकर हूँ, मै कुछ नहीं दे सकता।‘’ चौकीदार बोला।

चतुर्वेदी साहब को लगा चौकीदार उनकी परीक्षा मे सफल हो गया है। वो प्रसन्न हो गये और उन्हौने बख़शीश के तौर पर चौकीदार को 200 रुपये देते हुए हाथ बढाया।

चौकीदार बोला ‘’साहब जी 200 रुपये मे आप चार क्या दस गुलाब तोड़ कर ले जा सकते हैं।‘’

चतुर्वेदी साहब उल्टे पाँव होटल लौट गये।अगले दिन सुबह वापिस आकर उन्होने सब नौकरों को बताया कि दिल्ली पंहुचकर उनकी तबियत ख़राब हो गई थी इसलियें वो वंही से लौट आये। अपने बेटों को भी उन्होंने ई-मेल भेज दी कि वो नहीं आ सकेंगे।

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5 Comments on "बग़ीचा (लघुकथा)"

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आर. सिंह
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मैं प्रयत्न तो करता हूँ कि अपनी सोच सकारत्मक ही रखूँ . सच पूछिए तो मेरे जिन्दगी की वास्तविकता यही है .मैं कभी नहीं चाहता कि हम इस लघु कथा के बगीचे के चौकीदारजैसा व्यवहार करें,पर जरा नजर उठा कर देखिये, क्या आपको सब जगह वही चौकीदार विभिन्न रूपों में नजर नहीं आता ?प्रवक्ता के पन्नों पर मेरी एक कविता है.शीर्षक है कविता का अंत (लिंक http://www.pravakta.com/r-singhs-poem-poetry-end )वह कविता मेरे निराशा के क्षणों को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है.उसमे कारण भी बताये गये हैं ,जो मुझे निराश करते हैं,पर मेरे जीवन की वास्तविकता यही है कि मैंने आशा का… Read more »
आर. सिंह
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इस कहानी में भास्कर चतुर्वेदी कौन हैं और कहाँ रहते हैं,यह तो मुझे नहीं पता ,पर गौर से सोचिये और हो सके तो दर्पण सामने रख कर सोचिये कि क्या हम सब बगीचे के उस चौकीदार की तरह नहीं हैं जो बिकने के लिए तैयार खड़े हैं?.सबका मूल्य अलग अलग है ,पर हममे से कितने हैं, जो किसी कीमत पर भी नहीं बिक सकते?

Vijay Nikore
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मानव की बदलती मनोवृति को कहानी के माध्यम अच्छा दिखाया है ।
विजय निकोर

Vijay Nikore
Guest

अच्छी कहानी लिखी है… पैसा मानव को कैसे बदल देता है !
विजय निकोर

pran sharma
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BAHUT HEE PYAREE LAGHU KATHA HAI .

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