लेखक परिचय

सत्येन्द्र गुप्ता

सत्येन्द्र गुप्ता

M-09837024900 विगत ३० वर्षों से बिजनौर में रह रहे हैं और वहीं से खांडसारी चला रहे हैं

Posted On by &filed under गजल.


तुम से मिलकर, तुम को छूना अच्छा लगता है

दिल पर यह एहसान करना, अच्छा लगता है।

लबों की लाली से या नैनों की मस्ती से कभी

चंद बूंदे मुहब्बत की चखना ,अच्छा लगता है।

लाख छिप कर के रहे, लुभावने चेहरे , पर्दों में

कातिल को कातिल ही कहना अच्छा लगता है।

देखे हैं शमशीर दस्त ,जांबाज़ बहुत से हमने

ख़ुद को ख़ुद में ढाले रखना, अच्छा लगता है।

तड़पाता है दर्द-ए-जिगर ,जब जीने नहीं देता

पुराना ज़ख्म कुरेद के सिलना अच्छा लगता है।

ठहरी हैं हज़ार ख्वाहिशें ,इस नन्हे से दिल में

मगर फिर भी सपने देखना, अच्छा लगता है।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz