लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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ए.के. पंकज

हाल ही में बस्‍तर के आदिवासियों की समस्‍याओं और यहां चल रहे माओवादी आंदोलन पर राहुल पंडिता की पुस्‍तक ‘हेलो बस्‍तर’ प्रकाशित हुई है। राजीव रंजन प्रसाद ने इसकी समीक्षा लिखी और यह सर्वप्रथम प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर प्रकाशित हुई। इस समीक्षा पर ए. के. पंकज ने टिप्‍पणी लिखकर इसे एकांगी करार दिया है। हम इस टिप्‍पणी को विमर्श हेतु एक अलग पोस्‍ट के रूप में यहां प्रकाशित कर रहे हैं:

राजीव रंजन प्रसाद की यह समीक्षा भी एकांगी और उस गैर-आदिवासी नजरिये को सामने रखता है, जिसका आरोप वे ‘हैलो बस्तर’ के लेखक राहुल पंडिता पर लगा रहे हैं. हालांकि अपनी समीक्षा के निष्कर्ष में यह स्वीकार करते हैं कि -‘यह किताब पढे़ जाने योग्य है यद्यपि यह एक पक्षीय तथा एक ही दृष्टिकोण से माओवाद पर बात करती है। कोबाड की गिरफ्तारी से ले कर उनके द्वारा किताब के अंतिम अध्याय को लिखे जाने के बीच लेखक का विषय पर श्रम दिखाई पड़ता है।’ प्रसाद जी सिर्फ इसलिए सहमत नहीं हैं कि ‘पुस्तक में लेखक ने सतही दृष्टि से आदिवासियों के सवालों को देखने की कोशिश की है और माओवादी आंदोलन की आधी-अधूरी पड़ताल की है।’ तो ऐसे में सवाल उठता है कि बस्तर और आदिवासियों पर वे किस तरह के लेखन की अपेक्षा करते हैं? इसका जवाब उनकी ही पंक्तियों, उन पुस्तकों के उद्धरणों और शब्दों में निहित है, जिसका उल्लेख बड़ी गर्व से उन्होंने ‘हैलो बस्तर’ को खारिज करने के लिए इस्तेमाल किया है.

अपनी समीक्षा में बार-बार उन्होंने बस्तर के आदिवासी इलाके के लिए ‘वनांचल’ शब्द का इस्तेमाल किया है. भारत के आदिवासियों ने इस नामकरण को बहुत पहले ही नकार दिया है क्योंकि वे इसे अपने लिए सम्मानजनक नहीं मानते. और यह बताने की जरूरत नहीं है कि यह विशेषण उस सांस्कृतिक-राजनीतिक संगठन ने दिया है जो एक खास नस्ल, धर्म, संपद्राय और संस्कृति की श्रेष्ठता में यकीन करता है. धार्मिक कट्टरता के लिए जाना जाता है. अपने इस विचार को फैलाने के लिए आजादी के पहले से ही वह सांप्रदायिक कत्लेआम कराता आ रहा है जिससे अब तक लाखों लोग मारे जा चुके हैं. यहां यह याद रखना चाहिए कि भारत में नक्सलवाद और माओवादी परिघटना आजादी के बाद की है. जबकि आदिवासियों को खदेड़ने, लूटने और मारने का काम ‘आर्य’ लोग वैदिक काल से ही करते आ रहे हैं और जो आज अपने आपको ‘गर्व से हिंदू’ कहते हैं.

समीक्षा में वे बार-बार डॉ. हीरालाल शुक्ल की पुस्तक “बस्तर का मुक्तिसंग्राम” का जिक्र करते हैं. आदिवासी इतिहास के संदर्भ में समीक्षक महोदय ने उपरोक्त पुस्तक के पृष्ठ 241 से सगर्व यह पंक्ति उद्धरित की है – “राजनीति ने ईसाई धर्म में दीक्षित तथा अंग्रेजीदाँ बिहार के बिरसा मुंडा (1875-1901) को जो मान्यता प्रदान की वह मान्यता धुर-अशिक्षित तथा अपने आदिवासी धर्म में कर्तव्यनिष्ठ गुण्डाधुर को अभी तक नहीं मिल पायी. बिरसा का आन्दोलन ईसाई प्रभाव से अनुप्राणित था, जबकि गुण्डाधुर का आन्दोलन आटविक मानसिकता से प्रभावित था. यह भी ध्यान देने योग्य है कि बिरसा मुंडा तथा गुण्डाधुर दोनों ही सामयिक थे. स्वास्थ्य की गिरावट के कारण 9 जून 1901 को बिरसा मुंडा की मृत्यु हुई जबकि गुंडाधुर 1910 की क्रांति के असफल होने के बाद बीहड़ वनों में गुम हो गया.“

हीरालाल शुक्ल का यह उद्धरण पूरी तरह से ‘हिंदू’ श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित है. अब जिस व्यक्ति को यही नहीं पता हो कि बिरसा मुण्डा ईसाई नहीं थे वह आदिवासी इतिहास, संस्कृति और समाज के बारे में क्या लिखेगा? फिर यह कहना कि ‘बिरसा का आन्दोलन ईसाई प्रभाव से अनुप्राणित था’ उनके मानसिक दिवालिएपन का ही परिचायक है. आगे और देखिए ‘स्वास्थ्य की गिरावट के कारण 9 जून 1901 को बिरसा मुंडा की मृत्यु हुई’. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि बिरसा को जेल में जहर देकर मार डाला गया था और इस कृत्य को छुपाने के लिए बिना किसी डॉक्टरी परीक्षण के चुपचाप रातोरात उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया. बाद में ब्रिटिश सरकार ने कहा कि वे हैजा से मरे.

‘हैलो बस्तर’ के लेखक राहुल पंडिता की समझ और उनके द्वारा दिए गए तथ्यों में भूल हो सकती है क्योंकि समीक्षक शब्दों में, ‘मैंने “मुम्बई-दिल्ली-वर्धा” से बस्तर लिखने वालों को कभी भी इस भूभाग को समग्रता से प्रस्तुत करने की जहमत उठाते नहीं देखा। कोई कंधे पर कैमरा उठाये दंतेवाडा पहुँच जाता है तो कोई नारायणपुर। कोई अपने स्रोतों-साधनों से भीतर संपर्क करता है और पहुँच जाता है माओवादी कैम्पों में … हो गया बस्तर भ्रमण, समझ आ गयी इसकी संस्कृति, इसका दर्द, इसकी आत्मा …अब बेचो।’ पर सवाल यह है कि हीरालाल शुक्ल और राजीव रंजन प्रसाद जैसे लोग तो वहीं रहे. वे क्यों नहीं समझ पाए बस्तर के आदिवासी, इतिहास और संस्कृति को? क्यों नहीं लिखी एक भी किताब कि भारतीय सत्ता और बाहरी समाज कैसे उनके साथ अमानवीय व्यवहार कर रहा है. कैसे बाहरी लोग आकर उनके बचे-खुचे संसाधनों पर भी काबिज हो गए हैं और जबरन उनका संस्कृतिकरण कर रहे हैं. कैसे पूरा आदिवासी इलाका औपनिवेशिक शासन के खात्मे के बाद भी आजाद भारत का सबसे बर्बर नवउपनिवेश बना हुआ है. इसलिए यह समझने की जरूरत है कि प्रसाद जी क्यों अभी भी बस्तर को ‘वनांचल’ कह रहे हैं प्रकारांतर से जिसका अर्थ होता है ‘जंगली’. कम से कम ‘हैलो बस्तर’ का लेखक बस्तर को बस्तर ही कहता है. वनांचल नहीं. अर्थात् राहुल आदिवासियों को आदि वासी कह कर सम्मान देते हैं. उन्हें गरिमा प्रदान करते हैं. जबकि समीक्षक वनांचल कह कर उस क्षेत्र में आदि काल से रह रहे आदिवासियों को ‘आर्यों’ के मुकाबले कमतर व हीन घोषित करते हैं. यह वही हिंदूवादी और बाहरी सोच है जिसके खिलाफ आदिवासी अस्मिता का आंदोलन पूरे देश में चल रहा है. आप माओवादियों या लेखक राहुल पंडिता के विचारों से असहमत हो सकते हैं, किंतु किसी भी तरह से मुख्यधारा के तथाकथित हिंदू, सभ्य-सुसंस्कृत समाज और गैर-आदिवासी सोच का प्रतिनिधित्व करने वाले शोषकों, दलालों व लुटेरों के सदियों से जारी अमानवीय कुकृत्य को सही नहीं ठहरा सकते. जिसके खिलाफ बस्तर, झारखंड और देश सहित दुनिया का समूचा आदिवासी समुदाय आज भी संघर्ष कर रहा है.

(टिप्‍पणीकार अखड़ा  वेबसाइट से जुड़े हैं)

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2 Comments on "‘हैलो बस्‍तर’ की एकांगी समीक्षा की है राजीव रंजन प्रसाद ने"

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जगत मोहन
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पंकजनंदन आपने राजीव रंजन को तो एक रंग दे दिया लेकिन आपके और राहुल पंडिता के लेखन को क्या रंग देंगे, आपके जाती भयियो ने तो पहले ही मार्क्स और लेनिन के कहने पर देश को आर्य और अनार्य के नाम पर देश को विभिन्न हिस्सों में बाँट दिया है अब और बांटने का कार्य कर रहे हो. आपके जाती भाई भी तो बन्दूक की नौक पर वन और वनांचल वन्सियो का शोषण ही कर रहे है. जानते हो वनांचल वन्सियो के कंधे पर बन्दूक रखकर २ हज़ार करोड़ उगाहते है सरकारी तंत्र और व्यापारियों से. वनवासी क्षेत्र का विकास… Read more »
नितेश नंदा
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नितेश नंदा

माफ कीजिये पंकज की जितनी हिन्दी की मुझे समझ है हीरालाक शुक्ल नें बिरसा मुण्डा का अनादर नहीं किया है। वो यह कहना चाहते हैं कि गुन्डाधुर भी समकालीन और समान ही महान आदिवासी योद्धा थे। इस एक उदाहरण के अलावा राजीव जी के तर्कों का कोई जवाब तो दीजिये। बस्तर के आदिवासी उनकी परंपरा बोली रहनसहन सोच बस्तर का भूगोल इतिहास बहुत कुछ है राजीव जी की समीक्षा में आपनें तो एक लाईन पकडी और लटक गये।

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