लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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वीरेन्द्र सिंह परिहार

अभी गत माह ही केन्द्र सरकार ने वर्ष 2011 की धार्मिक जनगणना के आॅकडें जारी किए-जिसके अनुसार 2001 से 2011 के मध्य हिन्दुओं की आबादी 16.76 प्रतिशत की दर से बढ़ी तो मुस्लिम आबादी 24.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी। गंभीर चिंता की विषय यह कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हिन्दुओं की आबादी 80 प्रतिशत से नीचे आ गई है। और 2001 में 80.5 प्रतिशत की तुलना में घट कर 79.8 प्रतिशत रह गई है। दूसरी तरफ मुस्लिमों की आबादी जो 2011 में 13.4 प्रतिशत थी, वह बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गई है। असम में जो मुस्लिम आबादी 2001 में 30.9 प्रतिशत थी, वह 2011 में 34.2 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह से पश्चिम बंगाल में वर्ष 2001 में जो मुस्लिम आबादी 25 प्रतिशत थी वह बढ़़कर 27 प्रतिशत हो गई है। कमोवेश इसी तरह से केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी जहां मुस्लिम भारी तादात में है वहां भी इसी अनुपात में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ी है। कुछ लोगों इसी से सतुंष्ट है कि पहले की तुलना में सिर्फ हिन्दुओं की ही नहीं, बल्कि मुसलमानों के आबादी की भी वृद्धि दर घट रही है। उदाहरण के लिए यह बताया जाता है कि 1991 से 2001 के मध्य मुस्लिम आबादी 29.51 फीसदी की दर से बढ़ी थी। इसके पहले 1981-91 में उसकी वृद्धि दर 32.88 फीसदी थी। इसके आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि बढ़ती आबादी के दुष्प्रभाव को मुस्लिमों के एक वर्ग ने महसूस किया है। बावजूद इसके मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा अब भी हजरत मोहम्मद की इस बात को मानता है कि औरतें अल्लाह की खेती ही है। बड़ा सवाल यह कि संपूर्ण मुस्लिम समुदाय अब भी यह नहीं महसूस कर पा रहा है कि बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या है जो एक हद तक हमारी गरीबी और बेकारी के लिए जवाबदेह है।

1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तब मोटे तोैर पर यह माना जाता है कि उस वक्त हिन्दुओं की आबादी 84 प्रतिशत और मुस्लिमों की आबादी 9 प्रतिशत थी। ऐसी स्थिति में जिस ढ़ंग से मुस्लिम आबादी का अनुपात बढ़ रहा है वह निश्चित रूप से एक गंभीर चिंता का विषय हैं। जम्मू -कश्मीर तो पूर्व से ही मुस्लिम बहुल आबादी वाला प्रदेश है -ही और जहां मुस्लिम बहुमत में होंगे, वहां हिन्दुओं की स्थिति क्या होगी, इसे जानने और समझने के लिए काश्मीर -घाटी का उदाहरण पर्याप्त है। जहां के 4.00 लाख हिन्दू अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन जी रहे है। अब असम में यूं तो मुस्लिम आबादी 34.2 फीसदी हो गई, पर वहां कम-से-कम आठ जिले ऐसे हे, जो मुस्लिम बहुल हो गए है। जहां मुस्लिम आबादी 50 से 75 फीसदी तक पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या 19.2 फीसदी हो गई है, लेकिन वहां भी छः जिलों में मुस्लिम आबादी 40 से 50 फीसदी हो गई है। पश्चिमी बंगाल के कई सीमावर्ती जिलों और बिहार के कुछ जिलों की भी यही स्थिति है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ जिले का संजरपुर तो आतंकवाद की नर्सरी ही कहा जाता है। लेकिन देश के जिन हिस्सों में भी मुस्लिम बहुसंख्यक हो गए है, वहां हिन्दू सुरक्षित नहीं है। अकेेले असम में मुस्लिम आबादी पिछले 40 सालों में पांच गुना से भी ज्यादा बढ़ चुकी है। इसका एक बड़ा कारण घुसपैठ भी है। अब इसी बढ़ती आबादी का परिणाम यह है कि असम के कुछ जिलों में बसे बोडों लोगो से इनका कई बार टकराव हो चुका है, जिसमें कई लोगों की जाने जा चुकी हैं। स्थिति यह है कि देश के पूर्वी हिस्सें के दस से बारह हजार गाॅवों में मात्र मुस्लिम ही है। मुस्लिम जनसंख्या कैसे बढ़ती है, यह देखने के लिए असम के नौगाॅव जिले को लिया जा सकता है। 1901 में यहां मुस्लिम जनसंख्या मात्र 4 प्रतिशत थी जो वर्तमान में 51 प्रतिशत से ज्यादा हो गई हेै। आजादी के बाद केरल में जहां 70 प्रतिशत से ज्यादा भूमि हिन्दुओं के पास थी, वही अब 40 प्रतिशत से भी कम हो गई है। यही स्थिति बंगाल के सीमावर्ती जिलों की है, जहां हिन्दू जमीन जायदाद बेचकर भाग रहे हैं.  समस्या यह है कि मुस्लिमों की बढ़ती आबादी सिर्फ भारत मेंएक विश्वव्यापी समस्या नहीं है। फ्रांस जैसे यूरीपीय देश में भी मुस्लिम आबादी दस प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और ऐसा माना जाता है कि वर्ष 2050 तक मुस्लिम जनसंख्या ईसाई जनसंख्या को भी पीछे छोड़ देगी। इसके चलते यूरोपीय देशों में भी कई तरह के निरोधात्मक कदम उठाने शुरू कर दिए है। फ्रांस में बुरकों में प्रतिबंध लगाया जा चुका है तो स्विट्जरलैण्ड में मस्जिदों में बड़ी ऊॅचाई तक मीनारे बनाने में। आई.एस.आई.  कह ही चुका है कि आने वाले वर्षो में भारत समेत दुनिया के कई देशों में इस्लाम का झण्डा फहरा देगा।बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या के घनचक्कर में ही आए दिन लव जेहाद की घटनाएं सुनने को मिलती रहती है। प्रसिद्ध फ्रंेन्च दार्शनिक आगस्ट्स कोने ने 19वीं सदी में ही कह दिया था कि जातियों की जनसंख्या राष्ट्रों की नियति होती है। विवेकानन्द ने बहुत पहले चेतावनी दी थी कि देश में जब एक हिन्दू घटता है तो देश में एक शत्रु की संख्या बढ़ जाती है। कौन नहीं जानता कि पाकिस्तान का निर्माण इसीलिए हुआ कि उन क्षेत्रों में हिन्दु अल्पतम में आ गया था। कश्मीर घाटी भी इसीलिए हिन्दूविहीन हो गई क्योंकि वहां हिन्दू अल्पतम में था। अब असम और केरल जैसे राज्यों मंे भी यदि यही स्थिति रही, तो ऐसी स्थितियांे के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। कम्युनिष्ट देश चीन तक ने इस तथ्य को बाखूबी समझा तभी तो उसने सिक्यांग जैसे मुस्लिम बहुल राज्य में एक ओर तो हान वंश के चीनियो को बसाकर जनसंख्या को सतुलित किया और दूसरे वहां पर अलगाववादी और हिंसक गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाई। लेेकिन हमारा देश वोट बैंक की राजनीति के चलते इस असन्न खतरे से आॅखे बंद कर बैठा है।

एक तथ्य यह भी उल्लेखनीय है कि 2 बच्चों तक जो परिवार नियोजन कराते है, उन्हे सरकार ग्रीन कार्ड देती है,जिसमें कई सुविधाएं देने का उल्लेख होता हेंै। जैसे कि पूरे परिवार के लिए निःशुल्क चिकित्सा सुविधा। पर सरकारें स्वतः इस दिशा में ईमानदारी से अपनी प्रतिबद्धता का पालन नहीं करती। जरूरत इस बात की है कि इस बढ़ती जनसंख्या वृद्धि जिसमें एक या दो बच्चों तक कई महत्वपूर्ण सुविधाएं दी जाएं तो दो से ज्यादा बच्चों पैदा करने पर लोगों को हतोत्साहित करने का प्रावधान हो। निःसन्देह देश में बढ़ रही जनसंख्या भी एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन इसके साथ ही बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या भी एक बड़ी चुनौती है, जिसमें राष्ट्र की पहचान एवं अस्मिता का संकट मुंह बाएं खड़ा है। देश को इन दोनो ही चुनौतियों से निपटना है।

वस्तुतः मुसलमान जो अब भी अपनी पहचान के नाम एक बंद समुदाय है। इससे देश के बहुसंख्यक समाज में कई गंभीर आशंकाएं व्याप्त हैं। जरूरत इस बात की है कि उन्हें मदरसों की शिक्षा से मुक्त कर आधुनिक शिक्षा दी जाए। पर इसका सबसे बडा समाधान तो देश के राष्ट्रीय समाज अर्थात हिन्दुओं की एकजुटता पर बहुत कुछ निर्भर है।

 

 

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