लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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बात उन  दिनों  की है, जब रेलगाड़ी में प्रथम श्रेणी में सफर करना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी. श्रेणियाँ भी तो बहुत होती थी. प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, बीच में इंटरक्लास (हिंदी समतुल्य शब्द नहीं मिला) और फिर जनता की अपनी श्रेणी यानि तृतीयश्रेणी. वातानुकूलित डब्बे तो आम तौर पर गाड़ियों में होते ही नहींथे .हाँ कुछ खास .गाड़ियों में प्रथम श्रेणी वातानुकूलित डब्बे अवश्यथे, पर वे साधारण क्या, आमतौर से असाधारण कहे जाने वाले लोगों की भी पहुँच के बाहर हुआ करते थे. हवाई सफर भी दुर्लभ ही था .प्रथम श्रेणी के डब्बे में भी अलग अलग दो या चार बर्थ वाले कमरे हुआ करते थे, जिनमे अपना टॉयलेट के साथ स्नानगृह हुआ करता था.इनके दरवाजे बाहर खुलते थे यानि पूर्ण स्वतंत्रता.फिर केविन का प्रचलन हुआ, जिसमें गलियारे के बीच दो या चार बर्थ वालेकेविनबननेलगे .और दोनों छोर पर दो दो टॉयलेट श्रेणियाँ भी कम होगयी .इंटर क्लास सबसे पहले हटा. फिर तृतीय श्रेणी. इसके साथ ही लम्बी दूरी वाले गाड़ियों में सोने के बर्थ भी आये. सतर के दशक के अंत तक आते आते तो द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित डब्बे भी आने लगे. इनका किराया साधारण प्रथम श्रेणी के बराबर ही था, फिर भी प्रारम्भ में प्रथम श्रेणी के पुराने यात्री इनको उतना नहीं पसंद करते थे, क्योंकि इसमें एक तो केविन में दरवाजों के बदले परदे थे औ रगलियारे में भी बर्थ थे, पर बाद में गर्मी और ठंढ से निजात के चलते इनके प्रति झुकाव बढ़ने लगा. फिर तो सरकार ने इसका किराया प्रथम श्रेणी से थोड़ा ज्यादा कर दिया, फिर भी मांग में कमी नहीं आई और  धीरे धीरे प्रथम श्रेणी परदे से गायब ही हो गया. अब तो वातानुकूलित गाड़ियां भी चलने लगी है. वायुयान यात्रा भी ज्यादा सुलभ हो गया और बड़े शहरों के अतिरिक्त कुछ मझोले कद की शहरों तक इनका विस्तार हो गया है,.

पर ये सब तो बात की बातेहैं. मेरी इस कहानी का सम्बन्ध तो उन दिनों से है, जब प्रथम श्रेणी का बहुत महत्त्व था. प्रथम श्रेणी में यात्रा करना बहुत शान की बात समझी जाती थी. मेरे जैसे साधारण लोग तो उसमे सफर करने की सोच भी नहीं सकते थे. रेलवे की तरफ से बिस्तर देने  का प्रचलन भी नहीं आरम्भ हुआ था, होल्डाल में आवश्यक बिस्तर, तकिया आदि लेकर चलते थे लोग. हमारे जैसेलोग तो उसका लुफ्त तभी   उठा पाते थे, जब ऑफिसियल कार्य से कही जाना होता था उसी समय अपना यह शौक पूरा करने का सुअवसर प्राप्त होता था. ऐसे उस जमाने में भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं थी, जो पैसा तो वसूलते थे प्रथम श्रेणी का पर सफर करते थे तृतीय या इंटर श्रेणी में. पता नहीं वे लोग कैसे यह तिकड़म भिड़ाते थे? पर मैं उनलोगों में से था, जिन्हे इस सफर का लुफ्त तिकड़मबाजी से ज्यादा अच्छा लगता था. प्रथम श्रेणी के यात्री की इज्जत भी बहुत थी. समय समय पर बेयरे की हाजिरी लग जाती थी.चाय से लेकर खानेपीने तक का प्रबंध कमरे के अंदर हो जाता था.

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उस रात्रि को जब मैं अपने डब्बे में चढ़ा, तो देखा कि वह दो बर्थ वाला यानि कूपे था.उसमें एक यात्री पहले से मौजूद था. लगता है कि वह बहुत पहले से सफर कर रहा था, क्योंकि खाने के जूठे वर्तन पड़े हुए थे और उसने अपना ढीलाढाला रात्रि पोशाक पहन रखा था. गाड़ी रूकते ही एक आदमी अंदर आया और जूठे वर्तन उठाकर ले गया. उसने सुबह के चाय के लिए पूछा तो मेरे सहयात्री ने मना कर दिया और सुबह में गाड़ी के स्टेशन पर रूकने के पांच मिनट बाद उसे आने को कहा. वह आदमी मुझे रेलवे का बेयरा नहीं लगा मुझे ज्यादा सोचना नहीं पड़ा. बेयरा भी तुरत हाजिर हो गया. उसने सुबह चाय और नाश्ते के लिए पूछा. मैंने तो आर्डर दे दिया, पर उसने मना कर दिया. मैंने उस समय कुछ पूछना उचित नहीं समझा और चुपचाप अपने बर्थ पर चला गया. कुछ देर बाद हमदोनों निंद्रा निमग्न हो गए.

गाड़ी सुबह करीब सात बजे एक बड़े स्टेशन पर पहुंचती थी. चाय वगैरह भी वहीँ आता था. सुबह होते ही मैं  हड़बड़ा कर जल्दी से टॉयलेट में घुस गया, क्योंकि लगा कि गाड़ी को स्टेशन में पहुँचने में ज्यादा देर नहीं है. उस हड़बड़ी में भी मुझे दिख गया कि मेरा सहयात्री जगकर अपने नीचे वाले बर्थ पर बैठा है. जबतक मैं बाहर आया, तब तक गाड़ी स्टेशन के नजदीक पहुँचने ही वाली थी.अब जब मैं उन सज्जन की बगल में बैठा,तो उनकी तरफ ठीकसे ध्यान गया. पहली नजर में वे व्यक्तित्व के धनी लगे. उम्र चालीस पैंतालीस के बीच की लगी. मैं तो उनसे उम्र में बहुत छोटा था. उनकी भी निगाह मेरी तरफ उठी और मैंने उनको नमस्कार किया. उन्होंने धीरे से नमस्कार का उत्तर दिया, जब तक कुछ और बात होती, गाड़ी स्टेशन पर पहुँच चुकी थी.मैं तो इत्मीनान से बैठा हुआ था,जानता था कि बेयरा चाय लेकर आता हीं होगा.मुझे अपने सहयात्री से भी इसी इत्मीनान की उम्मीद थी, क्योंकि उन्होंने अपने आदमीको पांच मिनट बाद बुलाया था.

पर नहीं.गाड़ी रूकते हीं मैंने ऐसा दृश्य देखा,जिसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था.गाड़ी जब प्लेटफार्म के साथ चलने लगी थी,वे बाहर की तरफ देख रहे थे.मैं भी वैसा हीं कर रहा था,क्योंकि स्वाभाविक भी यही है.पर असली चकित करनेवाला दृश्य तो तब सामने आया,जब गाड़ी रूकते ही उन्होंने सामने चाय बेचते हुए लड़के को बुलाया.वह थोड़ा चकित भीहुआ,फिर भी अपनी केतली और कुल्हड़ संभाले उनके सामने आगया.उन्होंने उससे चाय ली और मेरी तरफ देखा.मैंने इशारे से ही इंकार कर दिया.मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा था.अगर मैंने रात को चाय का आर्डर नहीं दिया होता तो शायद उनका साथ दे देता.वे जब चाय ले रहे थे,तो मेरी निगाह उन्ही की ओर थी.पता नहीं क्यों मुझे उनकी आँखों में एक अजीब झलक दिखी.मेरी समझ में यह नहीं आया कि ऐसा क्यों?ऐसे भी उनका इस तरह से चाय लेना मुझे थोड़ा अजीब लगा था,फिर आँखों में इस तरह की एक झलक?मुझे बेचैनी तो अवश्य हो रही थी,पर पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी.हो सकता है कि उन्होंने भी इसे ताड लिया हो,पर बोले कुछ नहीं.मेरा चाय और नाश्ता तथा उनका आदमी करीब करीब एक ही साथ आये.बेयरा तो चाय और नाश्ता रख कर चला गया,पर उनका आदमी उनके लिए नाश्ता सजाने लगा,जो उसने बर्थ के नीचे रखे टिफ़िन बॉक्स से निकाला था.उन्होंने मुझे भी ऑफर किया.मैं नाश्ता कर रहा था,पर औपचारिकता बस नमकीन का एक टुकड़ा  उठा लिया.गाड़ी के चलने के पहले ही उन्होंने नाश्ता ख़त्म कर लिया.रेलवे का बेयरा आने पर मैंने और उन्होंने साथ  साथ ही दोपहर के भोजन का आर्डर दिया.ऐसे तो मैं मांसाहारी भोजन मंगाताहूँ, पर उनकी देखादेखी मैंने भी शाकाहारी भोजन ही मंगाया.ऐसे भी मेरा मन तो उनसे प्रश्न पूछने के लिए छटपटा रहा था,पर मैं समझ नहीं पा रहा था कि पूँछू तो कैसे?खैर जब उनका आदमी बर्तन समेट कर चला गया और गाड़ी ने भी रेंगना आरम्भ कर दिया तो मैंने साहस जुटा कर उनका ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया.

मैं बोला,”बुरा न मानिए तो एक बातपूछूँ?”

वे मुस्कुराये,”मैं कुछ कुछ समझ रहा हूँ कि आप क्या पूछना चाहते हैं?फिर भी पूछिए.”

“यह रहस्य मेरी समझ में नहीं आया.आपके साथ आपका अर्दली है.रेलवे का बेयरा भी हमेशा सेवा में तत्पर है,फिर आप गाड़ी से उतरे और चाय बेचने वाले लड़के से कुल्हड़ वाली चाय लेकर पी.क्या आप हमेशा ऐसा करते हैं या इस स्टेशन से और यहाँ के कुल्हड़ वाली चाय से आपका कोई ख़ास लगाव है?”यह मेरा अगला प्रश्नथा.

“इस स्टेशन पर चाय बेचने वाले लड़कों में मुझे अपनी छवि दिखाई देती है.”

अब तो मेरा आश्चर्य पराकाष्ठा पर पहुँच गया,पर मुंह से केवल इतना हीनिकला,”मतलब?”

उन्होंने बेझिझक उत्तर दिया,”मैं बचपन में इसस्टेशन पर चाय बेचता था.”

मेरा आश्चर्य और बढ़ गया.कहाँ चाय बेचने वाला लड़का और कहाँ इतना बड़ा अफसर. उस पर भी यह बताने में जरा भी हिचकिचाह टनहीं.आखिर माजरा क्याहै?यह तो रोचक के साथ साथ एक बहुत ही संघर्ष पूर्ण कहानी होगी.एक चाय वाला तरक्की करके एक अच्छा व्यापारी तो बन सकता है.इस तरह के अनेकों उदाहरण भी हैं,पर एक उच्च अफसर बनना?

मुझे तो अभी भी नहीं लग रहा था कि यह संभव है,पर वे इतना बड़ा झूठ क्यों बोलेंगे? वे कोई नेता तो हैं नहीं कि  इस झूठ का लाभ उठाने की कोशिश करेंगे.मैं आगे कुछ प्रश्न करने के लिए साहस संजो रहा था.वे भी शायद मेरी परेशानी समझ रहे थे.एक तो उम्र में बड़े,दूसरे रुतवे में बड़े तो लग ही रहे थे.मैं सोच नहीं पा रहा था कि अगला प्रश्न कैसे करूँ.उन्होंने मेरी तरफ कुछ क्षण के लिए देखा.फिर मेरे बारे में पूछने लगे.मैंने अपना परिचय दिया. काम भी बताया कि मैं किस कार्य के लिए यह यात्रा कर रहा हूँ.इधर उधर की कुछ अन्य बातें भी हुई.फिर भी मैं उनसे कुछ भी पूछने का साहस नहीं जुटा पा रहा था.उनके पिछले जीवन के बारे में पूछना तो बड़े दूर की कौड़ी थी.मेरी यह कठिनाई आखिर उन्होंने ही दूरकी.

वे बोले,”युवा अफसर मैं आपका असमंजस समझ रहा हूँ.मैं समझ रहा हूँ कि यद्यपि आपकी जिज्ञासा पराकाष्ठा पर है,तथापि मैं जानता हूँ कि आप एक उच्च अधिकारी के जीवन के बारे में पूछ नहीं पाएंगे.ऐसे भी यह कोई ऐसा आदर्श जीवन नहीं है,जिसके बारे में जान कर आपकों प्रेरणा मिले.”

मैं तुरत बोल पड़ा,” सर आप क्या कह रहे हैं?एक चाय बेचने वाले लड़के से इस पद तक पहुँचने वाले इंसान की कहानी अगर प्रेरणा दायक नहीं होगीं,तो अन्य कौन सी कहानी प्रेरणा दायक होगी? ”

वे बोले,”ऐसा हमेशा होता नहीं.फिर भी आपको मैं अपनी कहानी सुनाऊंगा.”

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महेश बचपन में इसी स्टेशन से थोड़ी दूर एक छोटे से मकान में अपने मातापिता और तीन छोटे भाई बहनों के साथ रहताथा.यह अस्थाई मकान एक झोपड़ी से थोड़ा ही अच्छा था.उस समय यह स्टेशन भी इतना बड़ा नहीं था और न सवारियों की यह रेल पेल थी.उसके पिता की एक चलती फिरती चाय की दूकान थी,जिसे वे ज्यादातर तो अपने मकान के पास ही रखते थे,पर गाड़ियों के आने जाने के समय वह दूकान स्टेशन पर आ जाती थी.कभी कभी उसकी माँ भी साथ में आ जाती थी,पर ज्यादातर उस चलती फिरती दूकान यानि ठेले को महेश और उसके पिताजी ही स्टेशन के पास लाते थे.ऐसे भी माँ के जिम्मे महेश के छोटे भाई बहन भी थे.

ऐसे तो वह भी छोटा हीं था,पर उसे तो अपनी जिम्मेवारी सँभालने में यह ख्याल भी नहीं आता था कि वह भी बच्चा है.चाय के उस ठेले पर चाय के अतिरिक्त खाने पीने की भी कुछ सामग्रियाँ हुआ करती थी ,जिसे उसकी माँ तल कर ठेले पर रख देती थी.एक अंगीठी अवश्य ठेले पर रहती थी,जिस पर केतली में चाय गरम होता रहता था.गाड़ियों के आने जाने का समय निश्चित था .बाप बेटे निश्चित समय पर स्टेशन पहुँच जाते थे.कुल्हड़ महेश के हाथों में होती थी,केतली और पकौड़े उसके पिताजी के हाथों में.उस छोटे स्टेशन पर उन दिनों न गाड़ियों का इतना आवागमन था और न यात्रियों का इतना ठेलम ठेला.गाड़ियों के आने जाने के बीच के समय में उसके पिताजी स्टेशन के बाहर घर के सामने ही ठेला लगा देते थे.खाने की   सामग्री भी बढ़ जाती थी.वहां माँ भी  पिताजी के साथ हो जाती थी और महेश स्कूल चला जाता था.यही दिनचर्या थी

महेश के शाम को फिर स्कूल से आने के बाद गाड़ियों का सिलसिला आरम्भ होता था और फिर वही सबेरे वाला कार्यक्रम.वहाँ से निबट कर फिर शाम को पढ़ने बैठ जाता था.छोटे भाई बहन या तो स्कूल जाते थे या फिर धम्माचौकड़ी करते थे.महेश के पिता उनको इस योग्य नहीं समझते थे कि वे उनका हाथ बटा सकें.

महेश में एक ख़ास बात अवश्य थी.इस  छोटी उम्र में भी इतना बोझ संभालने के बावजूद वह पढाई पर बहुत ध्यान देता था.

उसके जीवन में पहला मोड़ तब आया,जब वह  तीसरी कक्षा की वार्षिक परीक्षा में अपनी कक्षा में अव्वल आ गया.परीक्षा का परिणाम घोषित करने के बाद उस मिडल स्कूल के प्रधानाध्यापक ने उसे अपने कमरे में बुलाया.तीसरी कक्षा के छात्र महेश के लिए यह कठिन परीक्षाका समय  था.कहाँ तो वह परीक्षा परिणाम से इतना प्रफुल्लित था और जल्द से जल्द अपने मातापिता को यह समाचार सुनाना चाहता था और कहाँ प्रधानाध्यापक का यह बुलावा? वह धड़कते दिल से प्रधानाध्यापक के कमरे में दाखिल हुआ.वहाँ उसके कक्षा के शिक्षक भी मौजूद थे वह उन दोनों को प्रणाम कर वहीँ खड़ा हो गया.भय तो उसे बहुत लग रहा था,पर प्रधानाध्यापक की प्रिय छड़ी कहीं दिख नहीं रही थी,अतः वह थोड़ा आश्वस्त तो अवश्य था.प्रधानाध्यापक साहिब ने उसे अपने पास बुला कर उसकी पीठ ठोंकी और एक पत्र उसे पकड़ा. दिया,जिसे उसे अपने पिताजी को देना था.इसके बाद दोनों शिक्षकों ने उसे आशीर्वाद दिया और वह अपने घर की ओर चल पड़ा.

यह एक कोस का सफर महेश ने कैसे तय किया था,इसे वह जिंदगी भर नहीं भूला.घर पहुँच कर उसने अपने मातापिता को अपने परीक्षा का परिणाम बताया और खास कर बोला कि वह अपनी कक्षा में प्रथम आया है.माँ बाप के लिए इतना ही काफी था कि वह परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है.प्रथम आने की खबर सुनकर वे लोग भी बहुत प्रसन्न हुए,पर जब उसने अपने पिता को प्रधानाध्यापक का पत्र दिया,तो वे घबड़ाये.वे थोड़ा पढ़े लिखे अवश्य थे,पर उनको पता नहीं चल रहा था कि आखिर इस पत्र का मतलब क्या था.पत्र खोलकर जब उन्होंने पढ़ा तो उन्हें थोड़ी तसल्ली हुई.पत्र में प्रधानाध्यापक साहब ने महेश की तारीफ़ की थीऔर उन्हें दूसरे दिन मिलने के लिए बुलाया था.यह तो अच्छा था कि सुबह वाली दोनों ट्रेने स्कूल के समय से पहले आ जाती थी.इससे महेश भी समय पर स्कूल पहुँच जाता था और अब उनको भी स्टेशन का काम छोड़ कर नहीं जाना था.बाद का काम तो अकेले पत्नी भी संभाल सकती थी.सुबह का काम निबटा कर वे महेश के साथ ही उस पत्र के साथ स्कूल के लिए रवाना हो गए.बच्चों के दाखिले को छोड़ कर वे कभी स्कूल नहीं गए थे,अतः उनको थोड़ा अटपटा भी लग रहा था,उस पर भी प्रधानाध्यापक के साथ मिलने तो वे पहली बार जा रहे थे.जब वे स्कूल पहुंचे तो प्रधानाध्यापक आ चुके थे.चपरासी ने इनको प्रधानाध्यापक साहब के कमरे में पहुंचा दिया.महेश बाहर ही खड़ा रहा.प्रधानाध्यापक ने उनको अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा.वे बेचारे घबड़ाये हुए से कुर्सी पर बैठे.उनके लिए पहले पानी और फिर चाय मंगाई गयी.उनके लिए यह बहुत ही सुखद अनुभव था.उन्हें महेश के लिए गर्व हो रहा था,जिस के चलते आज वे प्रधानाध्यापक के सामने कुर्सी पर बैठे हुए थे.प्रधानाध्यापक साहब ने उसके कक्षा शिक्षक को भी बुला लिया.बच्चों के लिए परीक्षा के बाद की छुट्टी थी,पर सब अध्यापक तो आये ही हुए थे.

प्रधानाध्यापक साहब ने बातचीत शुरू की.वे बोले,”महेश बड़ा होनहार बालक है.उसमे शिक्षा के लिए गजब ललक है.उसका भविष्य बहुत उज्जवल है.अगर हमलोगों ने उसे मौका दिया,तो वह न केवल आपका बल्कि हमारे स्कूल का नाम भी रोशन करेगा.मैं जानता हूँ कि वह आपके कार्यों में हाथ बटाता है.उसे वहाँ से धीरे धीरे अलग कीजिये और पढ़ाई के लिए ज्यादा मौका दीजिये.मैं उसकी प्रतिभा को समझ गया हूँ,पर यह भी जानता हूँ कि आपकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि आप बहुत दूर तक उसकी पढ़ाई का बोझ उठासकने में समर्थहै.पर मैं नहीं समझता कि आपको इसके लिए अधिक चिंता करने की आवश्यकता है.जब तक वह यहां है,तब तक तो उसके लिए आपको आगे कुछ नहीं सोचना है.मैं इसकी पूरी फीस माफ़ कर रहा हूँ और उसके लिए पुस्तक वगैरह का प्रबंध भी स्कूल की तरफ से होगा.वह इतना मेधावी है कि मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह सातवीं के बाद वाली बोर्ड परीक्षा में राज्य में प्रथम होगा और उसको इतनी छात्रवृति मिल जायेगी कि उसकी मैट्रिक तक पढाई आराम से हो जाएगी.मैट्रिक की बोर्ड परीक्षा में अगर वह फिर अपना स्थान बनाये रखता है,तो उसकी कॉलेज की पूरी पढाई छात्रवृति के पैसे से ही पूरी हो जाएगी.हमलोगों का और  हमारे राज्य का नाम होगा वह अलगसे”.

महेश के पिता को तो ऐसा  लगा कि वे कोई सपना देख रहे हैं.उनको तो लग ही नहीं रहा था कि ऐसा भी संभव है.वे यह समझ नहीं पा रहे थे कि उनके बेटे में ऐसा क्याहै कि प्रधानाध्यापक को उस पर इतना विश्वास है.उनको तो सपने में भी यह ख्याल नहीं आयाथा कि उनका पुत्र उनके जीवन में इस तरह की ख़ुशियाँ ला सकता है.उन्होंने उठकर प्रधानाध्यापक के पैर पकड़ लिए.प्रधानाध्यापक साहब ने तुरत उनको उठा लिया और बोले,”आप यह क्या कर रहे हैं?आप महेश जैसे होनहार बच्चे के पिता हैं.आपको यह शोभा नहीं देता.कुछ दिनों बाद तो लोग आपके पैर छूकर गौरवान्वित अनुभवकरेंगे.”

महेश के पिता जब कमरे से बाहर निकले तो उनका चेहरा दमक रहा था. महेश ने अपने पिता को इतना खुश कभी नहीं देखा था.वह कुछ पूछता इसके पहले ही उसके पिता ने उसको गले लगा लिया और भरे गले से बोले,”बेटा,तुम तो मेरे यहां महापुरुष जन्मे हो.मास्टरजी ने कहा है कि तुम हम सबका नाम रोशन करोगे.बेटा मैं ज्यादा तो कुछ नहीं कर सकता,पर वह सब सुविधा देने का प्रयत्न अवश्य करूंगा,जिससे तुम दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर सको.”

महेश का छोटा मस्तिष्क यह सब समझने में असमर्थ था.उसको पता नहीं चल रहा था कि सर उसकी इतनी बड़ाई क्यों कर रहे हैं.हर कक्षा में कोई न कोई प्रथम आता ही था,फिर उसमे ऐसा क्या है.उसने अपने पिता से भी पूछना ठीक नहीं समझा.कक्षा शिक्षक या प्रधानाध्यापक से तो पूछने का उसको साहस ही नहीं था.कुछ भी हो महेश का बचपन अब ज़रा ढर्रे पर आ गया था.चाय की बिक्री से भी करीब करीब छुटकारा मिल गया था.कभी कभी पिता की मदद करनी पड़ती थी,पर अब वह नियमित दिनचर्या का अंग नहीं रह गया था.अब वह अपनी पढ़ाई की तरफ और ज्यादा ध्यान देने लगा था.अव्वल तो वह आता रहा.फिर सातवीं के बाद बोर्ड परीक्षा हुई.उसमे वह अपने राज्य में तीसरे स्थान पर आया.उसके सर को तो विश्वास था कि वह प्रथम स्थान प्राप्त करेगा,पर दोलड़के बाजीमार हीगए.तीसरा  स्थान पाने पर भी बहुत फर्क नहीं पड़ा.इतनी छात्रवृति मिलने लगी कि उसको अपने हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए पैसों की चिंता नहीं इसी तरह दो वर्ष और निकल गए.

फिर आई परीक्षा की एक अहम घड़ी.उसके पिता के एक मित्र थे.उसके माता पिता उनकी लड़की को अपने घर की बहु बनाना चाहते थे.इसके लिए बातचीत तो उसी समय हो गयी थी और शायद एक तरह से रिश्ता भी पक्का हो गया था,जब वह दूसरी या तीसरी कक्षा का छात्र था.अब वह चौदह वर्ष का हो चूका था और लड़की भी बारह वर्ष पार कर गयी थी,अतः दोनों परिवारों ने उनको शादी के बंधन में बाँधने की तैयारी शुरू कर दी.महेश के माँ बाप ने उससे पूछना भी मुनासिब नहीं समझा.पूछने पर भी वह क्या कहता?इधर उसकी नौवीं की परीक्षा समाप्त हुई और उधर विवाह का कार्यक्रम भी बन गया.फिर तो जल्द ही विवाह संपन्न भी हो गया और महेश जब तक कुछ समझता,शीला उसकी पत्नी बन कर आ गयी.शादी के बाद वह केवल दो दिनों के लिए ससुराल आई.महेश ने उसे देखा भर.साधारण नाक नक्श वाली पत्नी के बारे में उसने न कुछ सोचा और न उसके लिए उसे कुछ खास मौका मिला.तय यह हुआ कि अभी वह पढ़ने में मन लगाये.गवना बाद में शुभ मुहूर्त देख कर किया जायेगा.उसके पहले वाले प्रधानाध्यापक को तो बहुत बुरा लगा,पर अब कर ही क्या सकते थे?उन्होंने महेश के पिता को बुला कर यह वादा अवश्य करा लिया कि गवना में हड़बड़ी न करें और महेश के कुछ बनने के बाद ही वह कार्य संपन्न हो.उसके माता पिता पर प्रधानाध्यापक के इतने अहसान थे कि उन्होंने पक्का वादा कर लिया.

शादी महेश के लिए कोई खास अड़चन नहीं बना.महेश के लिए पढ़ाई एक चुनौती बन गयी थी.अब तो हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक भी उसे प्रोत्साहन देने लगे थे.परिणाम यह हुआ कि सेकेंडरी स्कूल की परीक्षा में वह राज्य में अव्वल आ गया.उसने अपने प्रधानशिक्षक की लाज रख ली और उनके उस वचन को सत्य कर दिखाया कि वह न केवल अपने माता पिता,बल्कि अपने स्कूल और राज्य को भी गौरवान्वित करेगा.अब तो इतनी छात्रवृति का प्रावधान हो गया था कि वह हॉस्टल में रह कर कॉलेज कीपढ़ाई अच्छी तरह से कर सकता था.पहले तो उस के मिडिल स्कूल के प्रधानध्यापक प्रोत्साहित करतेथे.अब तो उसमे उसके हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक का नाम भी जुड़ गया था.

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मैं यह सब सुन रहा था और सोच रहा था कि आखिर मैं इनका नाम इतने दिनों तक क्यों नहीं जान सका.हो सकता है कि एक तो ये दूसरे राज्य के हैं और दूसरे इनकी और मेरी उम्र में जो अंतर है,उसके चलते भी उस समय का समाचार मेरी सज्ञानता तक धूमिल होगया हो.अब मुझे लग रहा था कि जिस एम.पी. सिन्हा के बारे में उसने सुना था कि अखिल भारतीय प्रतियोगता में बहुत नाम कमाया था,वे शायद यही हैं,पर अभी भी मैं प्रश्न पूछ कर उनके इस जीवन वार्तालाप में कोई व्यवधान नहीं उपस्थित करना चाहता था.उन्होंने ने भी थोड़ा रूक कर आगे की कहानी सुनाना आरंभ कर दिया था.

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महेश अब अपने इलाके का एक सम्मानित युवक था और एक आदर्श के रूप में लोगों के दिलों पर छाता जा रहा था.परीक्षा मेंज्यादा सेज्यादा अच्छा करने के साथ साथ उसकी महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ रही थी.कॉलेज के दिनों में उसके कुछ ऐसे मित्र भी बन गए थे,जो बड़े बड़े घरों से आये थे.उनमें किसी  का भी शादी व्याह नहीं हुआ था.महेश भी कभी भूल से भी अपने विवाहित होने का जिक्र नहीं करता था.वह धीरे धीरे उनके मित्रता के लायक बनने की कोशिश करने लगा.छात्रवृति के पैसे के चलते उसको कोई दिक्कत भी नहीं महसूस होती थी.पर एक बात की ओर से उसका ध्यान कभी विचलित नहीं हुआ.वह थी,उसकी पढाई,क्योंकि वह यह नहीं भूला था कि यहाँ तक वह अपनी पढ़ाई के बल पर ही पहुंचा था और उसका भविष्य या उसकी महत्वाकांक्षाएं इसी की कृपा पात्र हैं.अब तोमहेश को अपनी शादी भी गुड़ियों का खेल नजर आने लगा था.उसे कभी कभी पत्नी का खयाल अवश्य आता था,पर सोचता था कि क्या वह भी कोई शादीथी? फिर भी इस बात को ज्यादा महत्त्व न देकर वह बड़ा आदमी बनने की धुन में लगा रहा.माता पिता ने दबे स्वर में कुछ कहने की भी कोशिश की,तो वह टाल गया.माँ बाप भी अपनी मजबूरी समझते थे.आखिर वे महेश पर दबाव भी कैसे डाल सकते थे?क्या कर रहे थे वे उसके लिए?वक्त केइंतजार के अतिरिक्त क्या चारा था उन दोनों के पास?उसके एकलौती बहन की भी शादी एक साधारण परिवार में हो गयी थी और वह अपने ससुराल चली गयी थी.अब तो उसके माँ पर घर के काम का सारा बोझ आ गया था.वह माँ की हालत समझ रहा था.फिर भीवह अपना गवनाकराने को राजी नहीं था.पिता का कार्यभार उसके दोनों छोटे भाइयों ने सम्भाल लिया था और दूकान को भी बड़ा  कर लिया था.उसका रूख देख कर माँ बाप ने उससे छोटे भाई की शादी कर दी,जिससे माँ को घर गृहस्थी में एक सहारा मिल गया था.

पढ़ाई की समाप्ति तक तो महेश ने किसी को बोलने  हीं नहीं दिया,पर अब था कि जब तक वह अपने पैरों पर नहीं खड़ा हो जायेगा,तब तक पत्नी को घर नहीं लाएगा,पर उसने स्वीकार किया कि उसके मन में यह भावना भी जोर पकड़ रही थी कि माँ बाप ने व्यर्थ ही उसे बंधन में बाँध दिया.क्या वह गंवार लड़की उसका साथ दे पाएगी?माँ बाप से तो उसने केवल यह कहा कि जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जायेगा,तब तक गवना नहीं करायेगा,क्योंकि वह तब तक कोई जिम्मेवारी नहीं लेना चाहता उसके मन में उस समय शायद एक बार भी यह विचार नहीं उठा कि उस लड़की पर जो अब युवती बन चुकी थी,क्या गुजर रही होगी.एक बात अवश्य थी कि लड़की के माँ बाप की ओर से ज्यादा दबाव नहीं पड़ रहा था और बाद में तो महेश को पता लगा था कि उन लोगों का ज्यादा ध्यान इस ओर था कि अपनी बेटी को महेश के योग्य बनाने की कोशिश करें.इसके लिए उन लोगों ने अपने औकात के बाहर जाकर उसकी शिक्षा का प्रबंध किया था.

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आखिर परीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई.महेश देश के सर्वोच्च प्रशासनिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ और उसे एक अच्छे प्रशासनिक पद पर बहाली मिल गयी.अब तक तो वह अपना गवना टालते रहा था.यहाँ तक.कि अब तो छोटे भाई का भी शादी और गवना हो चूका था.अब तो  उसके लिए कोई बहाना शेष नहीं बचा था.पर अब जो उसने किया,उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी.हांलाकि उसकी पत्नीकुछ पढ़लिख अवश्य गयी थी,पर नाक नक्श तो नहीं बदला जा सकता था.नौकरी मेंआते हींमहेश एक अलग महेश बन चूका था.उसकी दबी भावनाएँ अब खुल कर सामने आचुकी थी.अब वह किसी भी तरह उसका साथ नहीं चाहता था.सरकारी नौकरी में अपने को अविवाहित तो नहीं घोषित कर सकता था,पर पत्नी को अपने साथ रखना और न रखना उसकी मर्जी पर निर्भर करता था.उसके ससुराल वालोंको तो इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वे उसके विरुद्ध चूं भी क सके.महेश केपिता से लोग कुछ आशा लगाये बैठे थे,पर उनका भी अचानक देहांत हो गया.महेश अपने पिता के अंत्येष्टि के समय वहां मौजूद था,पर किसी ने भी खुल कर इसकी चर्चा नहीं की.श्राद्ध की औपचिरकता समाप्त होते ही अपने बोझका वर्णन कर वह लौट आया.माँ ने चलते समय अवश्य याद दिलाया,पर उसने अनसुनी कर दी.माँ की हालत भी कुछ ठीक नहीं थी,पर जब उसने उनको अपने यहां लाने का अनुरोध किया,तो वह तैयार नहीं हुई.माँ ने साफ़ कहला दिया कि बिना बहु के वह उसके घर में पाँव नहीं रखेगी.इसी तरह कुछ वर्ष बीत गए.न महेश ने अपना रवैया बदला और न उसकी माँ ने.एक पत्नी के रहते वह दूसरी शादी भी नहीं कर सकता था.पत्नी अलग घुट रही थी.उसने तो अपने पत्नी की सुध लेने की आवश्यकता भी नहीं समझी,पर माँ ने एक तरह से उससे किनारा ही कर लिया था.

इसी बीच अचानक एक ऐसी घटना घट गयी जिसने उसे अन्दर तक झकझोर दिया. उसकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली.वह तो भौंचक रह गया.पत्नी के बारे में उसने सोच रखा था कि देर या सबेर वह उसको तलाक के लिए राजी कर लेगा या कानूनी तौर पर अलगाव दिखा कर वह उससे तलाक ले लेगा,पर इसके लिए तो वह कतई तैयार नहीं था.अब तो वह आसमान से गिर पड़ा.आखिर वह भी इंसान था.इस पीड़ा को बर्दास्त करने में वह अपने को असमर्थ पा रहा था. कहाँ उसने इतने बड़े बड़े सपने देख रखे थे,कहाँ?अब उसने ठान ली कि अब वह दूसरी शादी नहीं करेगा.आत्महत्या का तो कोई खास मामला नहीं बना और सब कुछ रफा दफा होगया,पर महेश के शेष जीवन को उसकी पत्नी एक ऐसा बोझ बना गयी,जिसे ढोना भी उसे असह्य लगने लगा,पर आखिर वह बताता किसे?माँ ने तो कसम खाली कि वह उसका मुंह नहीं देखेगी.माँ के मृत्यु शय्या पर पड़े होने पर वह उनसे मिलने गया था,पर बेहोशी की हालत में भी उनके मुख में उसकी दिवंगत पत्नीका ही नाम था.बीच में थोड़ा होश आने पर उन्होंने उसकी ओर देखा अवश्य था,पर फिर मुंह फेर लिया था.

कहने को तो आज महेश श्रीएम.पी.सिन्हाहैं ,जो एक उच्च अधिकारी हैं,पर वह भीतर से कितना खोखला हो गया है,यह केवल वही जानता है. वह अपने को अपनी पत्नी का ऐसा गुनहगार मानता है ,जिसके लिए कोई भी सजा काफी नहीं है.

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“आज एक अरसे के बाद मैं अपने इस स्टेशन से गुजर रहा था.मुझे मेरा बचपन याद आ गया.बड़ी ही अभावपूर्ण थी वह जिंदगी,पर लगता है कि आज जो जिंदगी मैं जी रहा हूँ,उससे शायद वह जिंदगी ज्यादा अच्छीथी.”

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मैं निस्तब्ध था.मेरे मुंह से कोई आवाज नहीं निकली.लग रहाथा,क्या ऐसा भी कोई जीवन हो सकता है?जल्द ही मेरा स्टेशन आ गया.मैं उतरने की तैयारी करने लगा.

उनको अभी आगे जाना था.गाड़ी रूकते ही मैं उनको प्रणाम करके चुपचाप नीचे उतर गया.

 

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