लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम का असली खेल सामने आ गया है। खासकर माओवादियों के संदर्भ में हम पहले भी कईबार लिख चुके हैं कि कांग्रेस का माओवादियों के प्रति याराना है। इसबार कुछ बात ही अलग है। असल में माओवादी हिंसाचार और आतंक देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व चुनावी गणित को ध्यान में रखकर माओवाद से लड़ना चाहता है। जैसा कि सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के लालगढ़ इलाके में केन्द्र और राज्य के सशस्त्रबलों का संयुक्त अभियान चल रहा है और उसमें अब तक काफी हद तक सफलता भी मिली है। अनेक नामी-गिरामी माओवादी नेता और हिंसाचार में शामिल अपराधियों को सशस्त्रबलों ने पकड़ा भी है। माओवादियों के जितने बड़े नेता पश्चिम बंगाल में पकड़े गए हैं उतने बड़े नेता अन्यत्र किसी राज्य में गिरफ्तार नहीं हुए हैं। लालगढ़ इलाके में अभी भी सैंकड़ों शरणार्थी अपने घरों से दूर पनाह लिए कष्ट में दिन काट रहे हैं। 30 हजार से ज्यादा सशस्त्रबलों के संयुक्त अभियान के बाबजूद माकपा के सदस्यों और हमदर्दों को उनके घर वापस नहीं पहुँचा पाए हैं। इन शरणार्थी शिविरों के रखरखाब,देखभाल और समस्त खर्चे को माकपा की स्थानीय इकाईयां उठा रही हैं। माओवाद के खिलाफ लालगढ़ में जो आपरेशन चल रहा है उसके बारे में दो सप्ताह पहले तक केन्द्र और राज्य सरकार के बीच में कोई मतभेद नहीं था।

दूसरी ओर ममता बनर्जी और उनके दल तृणमूल कांग्रेस का माओवादियों के साथ खुला गठबंधन है और वे चाहते हैं कि लालगढ़ इलाके से सशस्त्रबलों को हटा लिया जाए। इसके लिए वे लगातार प्रदर्शन,धरना,रैली आदि कर रही हैं। लेकिन 21 दिसम्बर 2010 को एक नया मोड़ आया है । केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने राज्य के मुख्यमंत्री को एकपत्र लिखकर कहा है कि लालगढ़ इलाके से ‘हरमदवाहिनी’ के लोगों को हथियार समर्पण के लिए राज्य सरकार प्रयास करे। इस प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि पश्चिम बंगाल में ‘हरमदवाहिनी’ नामक कोई संगठन नहीं है। माओवादी और तृणमूल कांग्रेस के लोग भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को कलंकित करने और उसका नाम विकृत करने के लिए ‘हरमदवाहिनी’ पदबंध का प्रयोग कर रहे हैं। ‘हरमद’ यानी ‘गुंडा’वाहिनी। आश्चर्य की बात यह है कि गृहमंत्री ने ‘हरमदवाहिनी’ पदबंध का अपने पत्र में इस्तेमाल किया है। सवाल उठता है क्या गृहमंत्री का किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल को उसके असली नाम से पुकारने की बजाय विकृत नाम से पुकारना सही है ? यह राजनीतिक शिष्टाचार और सरकारी मर्यादा का उल्लंघन है । केन्द्रीय गृहमंत्री को किसी भी दल को विकृत नाम से पुकारने का कोई हक नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब ऑपरेशन चल रहा हो और सशस्त्रबलों के जवान अपनी जान की बाजी लगाकर माओवादियों का मुकाबला कर रहे हों तो ऐसी स्थिति में चिदम्बरम् का पत्र उनके मनोबल को तोड़ने का काम करेगा। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून-व्यवस्था का मसला राज्य के अधीन आता है केन्द्रीय गृहमंत्री ने पत्र लिखकर अपनी मर्यादा का अतिक्रमण किया है। सब जानते हैं माओवादियों से कांग्रेसियों का आंतरिक याराना है और वे जहां पर भी गए हैं वहां उन्होंने क्रांति की सेवा कम की है असंवैधानिक सत्ताकेन्द्रों और स्थानीय बड़े बुर्जुआदल के दलालों का काम ज्यादा किया है। बिहार,छत्तीसगढ़,आंध्र,पश्चिम बंगाल आदि का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है।

कायदे से लालगढ़ ऑपरेशन को लेकर केन्द्र सरकार को अपने मंत्रियों की लगाम कसनी चाहिए। केन्द्र के मंत्री बेलगाम होकर माओवादियों के घर आ जा रहे हैं और उन्हें खुलेआम समर्थन दे रहे हैं। कम से चिदम्बरम बाबू ने एकबार ममता बनर्जी को भी पत्र लिखा होता कि आप और आपका दल माओवादियों और उनके डमी संगठन पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी से अपने को दूर रखे। चिदम्बरम बाबू का यह माओ-ममता अंधप्रेम किसी तर्क से समझ में नहीं आता। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि माओवादियों का समर्थन करने वाले कैबीनेट में कैसे रह सकते हैं। चिदम्बरम बाबू को पूरा हक है कि वे केन्द्रीयबलों को वापस बुला लें। लेकिन माकपा को अपना कार्यकर्ताओं और आदिवासियों के जानोमाल की माओवादियों से हिफाजत के लिए संघर्ष करने का लोकतांत्रिक हक है। ममता बनर्जी और माओवादी मिलकर माकपा और वाममोर्चे का विरोध करें यह बात समझ में आती है लेकिन वे माकपा सदस्यों का कत्लेआम कर रहे हैं। कम्युनिस्टों की खुलेआम हत्याएं कर रहे हैं और ममता एड कंपनी कम्युनिस्ट हत्यारों को राजनीतिक, कानूनी और आर्थिक मदद दे रहे हैं। इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि चिदम्बरम बाबू ने अपने पत्र में माओवादियों के आंकड़े इस्तेमाल किए हैं। राज्य सरकार ने जो आंकड़े दिए हैं और चिदम्बरम् ने जो आंकड़े दिए हैं उनमें अंतर है। कायदे से राज्य के आंकड़े प्रामाणिक हैं क्योंकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की है। कायदे से होना यह चाहिए कि केन्द्र सरकार माओवाद की समस्या को संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के नजरिए से न देखे। अभी आधिकारिक तौर पर माओवाद की समस्या तीन जिलों में हैं लेकिन राज्य ने इस समस्या से प्रभावित 3 और जिलों को इसमें शामिल करने का कुछ रोज पहले अनुरोध है किया था लेकिन केन्द्र ने उस पर अभी तक सकारात्मक कार्रवाई नहीं की। उलटे माओवादियों के प्रति नरम रूख को व्यक्त करते हुए माओवादियों की मांगों को ही अपने पत्र में लिख डाला। इससे कांग्रेस का माओवादियों के प्रति नरम रूख सामने आया है और यह देश के लिए घातक है।

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