लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

संसद का शीत कालीन अधिवेशन तथाकथित -२ जी स्पेक्ट्रम काण्ड की भेंट चढ़ गया. विपक्ष अर्थात भाजपा और तीसरे मोर्चे (वामपंथ भी) का, सरकार पर और खास तौर से प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी पर आरोप है की वे इस दूरसंचार क्षेत्र के विराट भ्रष्टाचार की अनदेखी करने और भ्रष्ट तत्वों पर समय पर लगाम नहीं कस पाने के लिए सीधे गुनाहगार हैं. जब प्रधान मंत्री जी ने अपने एक अलायंस पार्टनर-द्रमुक के अलग हो जाने के जोखिम के वावजूद संचार मंत्री-ए राजा का त्याग पत्र ले लिया, जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने सी बी आई की जांच को स्वयम अपने अंडर में ले लिया और सी बी आई ने अपना काम ठीक ठाक शुरूं कर दिया तब विपक्ष द्वारा संसद ठप्प रखने का औचित्य क्या है?

सरकार और प्रधान मंत्री ने पार्लियामेंट्री एक्शन कमिटी को तवज्जो देकर आग में घी का काम किया. इसके अध्यक्ष श्री मुरलीमनोहर जोशी जी और भाजपा के अन्य दिग्गजों में अंदरूनी मतभेद जग जाहिर है. कांग्रेस ने इन मतभेदों को दूरगामी बनाने के लिए जो चाल चली उससे भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेता भड़क गए और उन्होंने भी जोशी जी को किनारे लगाते हुए समवेत स्वर में जे पी सी का राग अलापना जारी रखा। इधर प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी ,वृंदा कारात और वासुदेव आचार्य भी जे पी सी को भ्रष्टाचार उन्मूलन का एक अचूक शर संधान मानकर संसद से सड़कों पर निकल पड़े. सपा, बसपा जद इत्यादि विचारधारा विहीन पक्ष-विपक्ष ने भी वाम और दक्षिण के इस कांग्रेस मान मर्दन अभियान में सहयात्री वनकर संसद ठप्प करने में नकारात्मक योगदान दिया है.

वर्तमान संचार मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने जब २- स्पेक्ट्रम की जांच का दायरा २००१ तक बढ़ाये जाने की सिफारिश की और सुप्रीम कोर्ट ने इसे सी बी आई को निर्दिष्ट किया तो असहाय भाजपा और विपक्ष प्याज -प्याज चिल्लाने लगा. हाय प्याज, हाय सब्जी-बिलकुल सही स्टेप लिया विपक्ष ने किन्तु सड़कों पर, संसद में क्या तकलीफ थी? आपको जनता ने चुनकर संसद में भेजा की आप जनता के सरोकारों को देश के सरोकारों को उचित ढंग से साधने हेतु विधायिका का सही उपयोग और सम्मान करें. आप जो सड़कों पर ,प्रेस या मीडिया के सामने कर रहे हैं वो किसी से छिपा नहीं क्योंकि ये पब्लिक है सब जानती है. भाजपा को कोई हक़ नहीं की वो स्पेक्ट्रम या दूर संचार नीति पर यों गरजे. जब जांच २००१ से होने जा रही है तो एनडीए, यू पी ए सभी की पोल पट्टी खुलने वाली है. वामपंथ को १२३ एटमी करार पर यु पी ए प्रथम से समर्थन वापिस लेने की वनिस्‍पत मनमोहन सिंह की घटिया दूर संचार नीति–दयानिधि, कलानिधि मारन के मार्फ़त बीसियों कंपनियों को उनके न्यूनतम अहर्ताएं नहीं होने के वावजूद लाइसेंस या रेवेन्यु शेरिंग में शामिल किये जाने के विरोध में समर्थन वापिसी का कदम उठाना था. नीरा राडिया जैसे लाबिस्तों का कामकाज २००२ से ही जारी था. यह महिला उस वीभत्स दलाली रुपी हांड़ी के एक चावल की कनिका मात्र है. सर्व श्री सुखराम, राव धीरज सिंह, अनंतकुमार. प्रमोद महाजन, अरुण शौरी, दयानिधि, पासवान और ए राजा भी अंतिम सत्य नहीं हैं. अम्बानी टाटा, सुनील मित्तल भारती, वोडाफोन हचिसन एस्सार जैसे दबंग और विभिन्न कार्यकालों में बी एस एन एल, एमटीएनएल और डीओटी के सर्वेसर्वा श्री प्रदीप वैजल, सिद्धार्थ बेहुरा, खरे, कुलदीप गोयल, माथुर, भटनागर, अग्रवाल, सरन, पृथ्वीपाल सिंह की जांच की मांग भाजपा क्यों नहीं कर रही?. क्या सिर्फ वही मुद्दा लेकर संसद ब्रेक करोगे जो सुब्रमन्यम स्वामी या प्रशांत भूषण उठायेगे? हम जानते हैं की यदि इन सभी की जांच की जाएगी तो एक लाख ७६ हजार करोड़ का हिसाब भी मिल जायेगा. किन्तु यह जरुर होगा की काजल की कोठरी में कांग्रेस और भाजपा की बराबर के दागदार साबित होंगे.

यह जांच क्या साबित करेगी? अपराधियों को सजा मिलेगी या नहीं कुछ भी कन्फर्म नहीं. किन्तु यह तय है की दूर संचार नीति पर गंभीरता से देश की जनता पुनह विचार करेगी. केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को कभी पंडित नेहरु ने और बाद में इंदिराजी ने आधुनिक भारत के नव रत्न -नए मंदिरों से पुकारा था. इतिहास साक्षी है की विगत २००७-०८ की वैश्विक आर्थिक महा मंदी के वावजूद भारत की अर्थ व्यवस्था कमोवेश स्थिर रही. इसका सबसे बड़ा करण था भारत का सार्वजनिक क्षेत्र. सरकारी बैंक, सरकारी बीमा. सरकारी दूर संचार कम्पनी बी एस एन एल, एम् टी एन एल ,एच सी एल. कोल इंडिया. भारत पेट्रोलियम, हिदुस्तान एरोनाटिक्स, स्टील अथारटी आफ इंडिया जैसे देश के लगभग २०० पी एस युस ने शानदार ढंग से वित्तीय जीवन्तता का रोल अदा किया और वैश्विक महामारी से भारत बचा रहा. नए इन्फ्रा स्ट्रक्चर या विकाश के नाम पर मनमोहन सिंह जी ने स्वर्गीय नरसिम्हाराव जी के प्रधान मंत्री काल में वित्त मंत्री रहते हुए -इन्ही सार्वजनिक उपक्रमों को बेचकर पूँजी जुटाने का आइडिया ईजाद किया था. इसी राह पर जब एन डी ए की अटल सरकार चल रही थी तो कांग्रेस ने चलताऊ विरोध किया था. वाम ने और उसकी ट्रेड union ने लगातार इस तथाकथित सुधारवादी {सार्वजनिक संपदा को बेचकर दलालों और कॉर्पोरेट का पेट भरने वाली} नीति का विरोध अवश्य किया किन्तु यूपीए-वन के दौरान भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की भारी कीमत भी चुकाई है. कांग्रेस और यू पी ए -२ ने वही विनाशकारी दूर संचार नीति जारी रखी हैं जो देश की सुरक्षा को और अस्मिता को ख़त्म कर रहीं हैं.

२-जी स्पेक्ट्रम कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. ३-जी से सरकार को जो एक लाख ८ हजार करोड़ मिले हैं वे और यदि २-जी से पुनह नीलामी से भी इतने ही मिल जाएँ तो भी उतने नहीं जो इस नई दूर संचार नीति के स्थापन उपरान्त देशी विदेशी दलालों -राजनीतिज्ञों ने देश के खजाने से लूटे.हैं इस पर मौन क्यों? स्विस बैंकों में जो रकम जमाँ है उस पर पक्ष-विपक्ष मौन क्यों? भारत संचार निगम के ३८ हजार करोड़ रूपये सरकारी कोष में गए या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े कौन जाँच करेगा? सार्वजनिक उपक्रमों को इतना कमजोर किया जा रहा है की वे स्वत ख़त्म हो जायेंगे. तब आसानी से उसके इन्फ्रास्त्रक्चार को निजी कम्पनियों के हाथों बेचा जा सकेगा. मेरे इस कथन पर किसी को अविश्वाश हो तो किसी लाबिस्त से पूंछे, कोई न मिले तो नीरा राडिया तो सबके लिए सुलभ है.

एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अब आर्थिक उदारीकरण को पूर्ण रूपेण तो नहीं रोका जा सकता किन्तु स्वच्छ ईमानदार प्रशाशन और आवाम के हित संवर्धन हेतु संसद को तो ठीक से चलाया जा सकता है. इसमें तो पाकिस्तान, अमेरिका या आतंकवाद का हाथ नहीं इसमें संघ का कितना हाथ है? ये मेरे जैसे अदने आदमी की बूझ से ऊपर की बात है. देश की जनता फैसला करेगी की पक्ष-विपक्ष दोनों ही जब स्पेक्ट्रम या दूर संचार नीति के निर्माण में बराबर के भागीदार हैं तो संसद ठप्प क्यों की गई? देश की जनता को जरुर जानना चाहिए.

चूँकि वामपंथ का कोई भी व्यक्ति कभी संचार मंत्री तो क्या संचार संतरी नहीं बना अतः निश्चय ही वे अभी तो इस सन्दर्भ में बेदाग हैं किन्तु जब प्रधान मंत्री और सरकार कह रही है की आओ जेपीसी के बारे में भी संसद में ही चर्चा करें तो वाम पंथ को क्या उज्र थी की नागनाथ -सापनाथ के चक्कर में अपने सांसदों को भी लोकतंत्र के मार्फ़त राष्ट्र सेवा और खास तौर से उन मुद्दों पर जो सर्वहारा के हित में इस सुअवसर पर साधे जा सकते थे उन महत्वपूर्ण योगदानों से वंचित किया?

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