लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

भारत का सर्वाधिक प्रचलित ग्रन्थ ‘महाभारत’ हमें अनायास ही युगों-युगों से चले आ रहे उस संघर्ष की याद दिलाता है जो मानव हृदय को आज भी उद्वेलित कर रहा है। द्वापर के अन्तिम चरण में, आर्यावर्त और विशेष रूप से हस्तिनापुर की गतिविधियों को कथानक के रूप में, क्रमबद्ध तथा नियोजित विधि से अपने में समेटे, यह अद्भुत ग्रन्थ मानवीय मूल्यों, आस्थाओं, आदर्शों, दर्शन और संवेदनाओं के उत्कर्ष तथा कल्पनातीत पतन – दोनों की चरम सीमा की झलक प्रस्तुत करता है। महाभारत की कथा मनुष्य के चरित्र की संभावनाओं और विसंगतियों के प्रकाशन का साक्षात उदाहरण है जो आज भी प्रासंगिक है। इसीलिए महर्षि वेदव्यास की इस कृति ने मुझे बार-बार आन्दोलित किया है और प्रेरित किया है, कुछ लिखने के लिए जिसकी परिणति है यह मेरी रचना – कहो कौन्तेय।

व्यक्ति का अन्तस्तल भी महाभारत-सा ही युद्ध लड़ता है कभी-कभी। वहां धर्म और अधर्म की लड़ाई थी – पाण्डवों को ज्ञात था कि कौरव उनके शत्रु हैं – उनके छल-कपट से त्रस्त होकर ही अन्तिम विकल्प के रूप में महासमर का निर्णय लिया उन्होंने और विजय भी प्राप्त की, आसुरी शक्तियों पर – विजित हो गईं, अनैतिक और अमर्यादित आचरण की संभावनाएं। लेकिन पीछे छोड़ गईं अनेकानेक विरोधाभासों की शृंखलाएं। पार्थ को मालूम था कि शरीर नश्वर है – आत्मा ही अमर है, फिर भी वह रोया – भीष्म के लिए, द्रोण के लिए, अभिमन्यु के लिए……। कर्ण को मालूम था कि जहां कृष्ण हैं, वहीं धर्म है, वहीं न्याय है और विजय भी वहीं है, फिर भी वह युद्धरत हुआ – अपने ही रक्तांशों से। भीष्म पितामह को पता था कि हस्तिनापुर के सिंहासन के वास्तविक उत्तराधिकारी पाण्डव हैं, फिर भी उन्होंने साथ दिया कौरवों का। धृतराष्ट्र को विदित था कि महासमर में सबकुछ स्वाहा हो जाएगा उसका, फिर भी प्रज्ज्वलित कर दी युद्ध की ज्वाला। अश्वत्थामा को ज्ञात था कि युद्ध समाप्त हो चुका है, फिर भी वध कर दिया रात्रि के अंधकार में द्रौपदी के सोए हुए पांच किशोर पुत्रों का। इतने सारे ज्ञात-अज्ञात प्रश्नों और उनमें निहित उत्तरों में मेरा मन भटकता ही रहा। महाभारत का पारायण बाल्यकाल से ही करता आया था। हमेशा जीवन की जटिल समस्याओं, मानवीय चरित्र के विरोधाभासों के उत्तर मुझे वहीं से मिले। कई बार प्रश्नाकुल भी हुआ मैं। जन्मना साहित्यकार नहीं हूं – इंजीनियर ने काव्य-रचना का अभ्यास करते-करते, महाभारत जैसी महत् कृति पर उपन्यास लिखने की ठान ली। आज सोचता हूं कि मुझ जैसे विद्युत अभियन्ता के लिए बिना किसी महत् अन्तःप्रेरणा के यह उपन्यास लिखना असंभव ही था। संभव है यह अन्तःप्रेरणा अच्युत, अनन्त, गोविन्द, हरि की ही हो।

मेरे मन का महासमर तो उसी दिन आरंभ हुआ जिस दिन मेरी अर्द्धांगिनी गीता का निश्छल, उदात्त व्यक्तित्व कैन्सर जैसी व्याधि से ग्रस्त हो गया। उसकी व्याधि और चिकित्सा के अनन्तर मैं डटा रहा पाषाणवत। मुक्तिबोध ने कहा है – कोशिश करो, कोशिश करो – जीने की, जमीन में गड़कर भी – और मेरी मेरी सहयात्रिणी लौट ही तो आई अगम पथ से वापस, जिसकी पृष्ठभूमि में ईश्वर प्रदत्त साहस और उसकी अदम्य जिजीविषा ही तो थी। मुझे लगा था, एक युद्ध जीत पाया हूं मैं कि कैन्सर ने मुझे भी घेर लिया। अदृश्य विधाता से प्रश्नाकुल हो, मैं कह बैठा, “ऐसा मेरे साथ ही क्यों?” अनुत्तरित रहा मेरा प्रश्न! युद्ध तो करना ही था मुझे, लड़ना ही तो था महाभारत – लेकिन शत्रु तो मेरे ही उदर में छिपा बैठा था, आक्रमण कर छिप गया था। शल्यक्रिया, रेडियोथिरेपी, कीमोथिरेपी की दारुण यंत्रणा – नित्य लड़ा जाता युद्ध मेरे मन और तन, दोनों को आहत किए दे रहा था – मेरी लेखनी ही एकमात्र संबल बनी, व्याधिजनित अवसाद से उबरने के लिए। मेरी पत्नी, जिसने विस्मृत कर दिया निज की पीड़ा को – मेरी सेवा-सुश्रूषा कर, खींच ही तो ले आई मुझे इस जीवन में पुनः।

स्मृतियां धुंधली होती नहीं। तीव्र अवसाद के क्षणों में महाभारत की अमर गाथा लिखने की इच्छा जागृत हुई; पत्नी गीता, पुत्र अभिषेक और मित्रों ने सुझाव दिए, महाभारत पर आधारित अनेक ग्रन्थ पढ़ डाले मैंने, मई, २००३ से प्रारंभ कर। रामधारी सिंह दिनकर, शिवाजी सावन्त, दिनकर जोशी, मनु शर्मा, नरेन्द्र कोहली, राम कुमार भ्रमर, राजगोपालाचारी, चन्द्रबली सिंह, दुर्गा भागवत, प्रतिभा राय, प्रेमनाथ विशी, उमाशंकर जोशी, केदार नाथ मिश्र, मैथिली शरण गुप्त, धर्मवीर भारती, डा. ब्रजमोहन लाल शर्मा आदि अनेक साहित्यकारों का अध्ययन मैंने किया। उनकी रचनाओं की आधारभूमि महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत ही है, लेकिन मुझे इन दावों में सच्चाई बहुत दूर तक दिखाई नहीं पड़ी। औपन्यासिक कल्पना के मोहवश या कृति को रोचक बनाने के उद्देश्य से मूल कथा से विचलन हुआ है, अधिकांश लेखकों की रचनाओं में – किसी में कुछ कम, तो किसी में कुछ ज्यादा। मेरा उद्देश्य किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करना नहीं है, फिर भी इतना अवश्य कहूंगा कि मेरी दृष्टि से ऐसी कृतियां भी गुजरीं जिसमें लेखिका ने कर्ण और द्रौपदी के काल्पनिक प्रेम-प्रसंगों का इक्कीसवीं सदी की यथार्थवादी शैली में वर्णन किया है। कहीं पर लेखक ने कर्ण को अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर और कृष्ण से भी महान सिद्ध करने का प्रयास किया है। मूल कथा को ‘डिस्टौर्ट’ करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए, विशेषकर किसी पौराणिक ग्रन्थ को – क्योंकि ये ग्रन्थ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।

आगामी पीढ़ी महर्षि वेदव्यास पर आधारित ग्रन्थों को पढ़े और दुर्योधन को इसलिए क्षमा कर दे कि प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज है, कर्ण को इसलिए माफी दे दे कि वह प्रतिक्रिया में अन्याय के साथ जुड़ गया – विस्मृत कर दी जाएं कुरुसभा में उसकी नकारात्मक और षड्यंत्रकारी भूमिकाएं, तो फिर नैतिक मूल्य और मर्यादा का क्या अर्थ बचेगा? भविष्य की सन्तति किसे पाप और किसे पुण्य कहेगी? मैं इसका दावा बिल्कुल नहीं कर रहा कि पाप-पुण्य निर्णय करने का उत्तरदायित्व मेरा ही है। वह निर्णय तो काल स्वयमेव कर देता है, मेरा प्रयास तो बस इतना सा है कि महर्षि वेदव्यास के महाभारत की प्रामाणिकता को बचाए रखते हुए एक छोटी औपन्यासिक रचना प्रस्तुत कर सकूं, जिसमें मूल कथा से कहीं कोई विचलन न हो। रचना लिखता रहा शारदीय नवरात्र २००३ से आरंभ कर चैत्र नवरात्र २००४ तक। नित्य ही कुछ पृष्ठ काली स्याही से रंगता और रात को भोजनोपरान्त पत्नी गीता को सुनाता। अपार धैर्य और प्रेम से, वह दिन विशेष की कृति सुनती और अमूल्य सुझाव भी देती। साफ्ट्वेयर इंजीनियर, पुत्र अभिषेक किशोर दूरभाष के माध्यम से हैदराबाद और बंगलोर से जुड़ा रहा – सुनता रहा रचनांश और देता रहा सुझाव। पत्नी गीता के जीवन काल में, २००५ में ही रचना प्रकाशित हो गई थी। बारह वर्षों तक कैन्सर से संघर्ष करने उपरान्त मार्च २००७ में सदा के लिए उसने मेरा साथ छोड़ दिया। मृत्यु के समय मैंने देखा – उसके सिरहाने ‘कहो कौन्तेय’ की एक प्रति पड़ी हुई थी। ऐसी पत्नी और ऐसे पुत्र को पुनः प्राप्त करने के लिए ही मैं मोक्ष की कामना नहीं करता। मेरी जिजीविषा के प्रेरक यही दोनों रहे हैं। और इनसे ऊपर – सबके ऊपर हैं, सचराचर जगत में विचरने वाले यशोदानन्दन श्रीकृष्ण – जिन्होंने मुझे लेखनी पकड़ाकर कहा – जीवन समर में संघर्ष करो —

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं

जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।

॥इति॥

कहो कौन्तेय

प्रकाशक – संजय प्रकाशन,

४३७८/४ बी, २०९, जे. एम. डी. हाउस,

अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२

पुस्तक flipkart.com पर भी उपलब्ध है। 

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7 Comments on "क्यों और कैसे लिखा मैंने – कहो कौन्तेय"

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Jeet Bhargava
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साधुवाद.

kaushalendra
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पत्नी यदि सहधर्मिणी हो ….पुत्र यदि सहचर हो …तो फिर कोई क्यों कर मोक्ष की कामना करे ……

डॉ. मधुसूदन
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धन्य है आप और आपका जीवन दर्शन|
जिस दुर्दम्यता का जीवन परिचय आपने इस लेखमें दिया है, ह्रदय तलसे प्रेरक ही पाता हूँ|

आपका “कहो कौन्तेय” यदा कदाचित ही पढ़ा, पर आपका आजका यह लेख, मुझे और ही प्रेरणादायक प्रतीत हुआ|

कथानक के तत्त्व दर्शी अंशों से, से छेड़ छाड़ करने का अधिकार किसीको नहीं — बात विशेष ध्यान में रखने योग्य है|
ह्रदय तल से शुभेच्छाएं|

bhu
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आपकी रचना बहुत प्रमाणिक हे मेने भी आपके कथाना अनुसार बहुतेरे साहित्यों और लोगो से वर्तालाप में कर्ण को दुर्योधन को अन्य पत्रों को भी श्रेष्ठता देते हुए पाया हे आपका उपन्यास पड़ कर महाभारत के मूल रूप और प्रेरणा का गन हुआ हे नहीं तो में पहले कर्ण को भी अर्जुन के समान आदर्श पुरुष मानता था

विपिन किशोर सिन्हा
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सभी पाठकों को कोटिशः धन्यवाद और नव वर्ष की शुभकामनाएं!

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