लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

बाबा रामदेव फिनोमिना की मीमांसा करते हुए अनेक किस्म के पाठकों प्रतिक्रियाएं मिली हैं और उन प्रतिक्रियाओं से एक बात साफ है इन पाठकों में अनेक पाठक वे हैं जो बाबा के दीवाने हैं। ये दीवाने कहां से आए? उन्हें बाबा ने अपना दीवाना कैसे बनाया? वे बाबा के फैन क्लब का हिस्सा हैं। लेकिन वे फैन कैसे बने? यह बुनियादी प्रश्न है जिस पर विचार करना चाहिए। बाबा रामदेव और उनका समूचा तर्कशास्त्र सार्वजनिक तौर पर सामाजिक-सांस्कृतिक मीमांसा की मांग पैदा करता है और हम सबको इस फिनोमिना को गंभीरता के साथ समझना चाहिए।

बाबा रामदेव से हमारा कोई व्यक्तिगत पंगा नहीं है। हम तो सिर्फ इस फिनोमिना की तह में जाना चाहते हैं, उन पक्षों पर बात करना चाहते हैं जिन पर बाबा रामदेव अहर्निश टीवी शो करके प्रकाश डालते रहते हैं। हम उन सवालों से टकराना चाहते हैं जो सवाल बाबा रामदेव फिनोमिना ने खड़े किए हैं। हमारा व्यक्ति बाबा रामदेव से कोई पंगा नहीं है। यह मूलतःविचार-विमर्श है। इससे हमारे समाज को तर्कवादी पद्धति से सोचने में मदद मिलेगी। चीजों को अनालोचनात्मक ढ़ंग से सोचने और देखने से हम बचेंगे।

बाबा रामदेव ने योग को जनता तक पहुँचाने के चक्कर में उसे उद्योग बनाया है। संस्कृति उद्योग का हिस्सा बनाया है। कुछ लोग सोच रहे हैं कि बाबा ने यह काम अकेले किया है। यह बात सच है कि आज योग के वे बड़े ब्राँण्ड हैं। लेकिन उनसे भी बड़े ब्राँण्ड महर्षि महेश योगी थे और उन्होंने योग को अमीरों के यहां बंधक बनाकर रख दिया था। बाबा रामदेव को इस बात श्रेय जाता है कि उन्होंने योग को आम जनता में पहुँचाया है। वे योग के क्षेत्र में अन्यतम हैं।

बाबा रामदेव योग के व्यापारी हैं। उन्होंने योग को भारत के जिलों तक पहुँचाया है। राज्यों और जिलों के स्तर तक उसका नेटवर्क बनाया है और अब उनकी नजर विदेशों पर लगी है। वे जितने महान दिखते हैं उसका कारण है उनका मीडिया प्रचार अभियान। आज जितना बड़ा मीडिया प्रचार होगा, आम लोगों में व्यक्तित्व भी उतना ही महान दिखेगा। बाबा रामदेव की तथाकथित महानता का आधार उनका योगी होना नहीं है बल्कि उनका व्यापक मीडिया प्रचार है।

सवाल यह है इतना व्यापक मीडिया प्रचार उन्होंने क्यों किया? क्या इस प्रचार का सिर्फ योग ही उद्देश्य था या कुछ और मकसद था। इस योगी को अरबपति धनी ट्रस्टी बनने की बुद्धि किसने दी? क्या किसी संन्‍यासी की यह हैसियत है कि वह अचानक टीवी चैनलों से अंधाधुंध योग का प्रचार आरंभ कर दे? टीवी चैनलों से प्रचार में लगने वाला पैसा और बुद्धि किसकी है? आज बाबा के पास संपत्ति है लेकिन बाबा ने सार्वजनिक तौर पर मीडिया ब्रांण्ड के रूप में जब से बाजार में कदम रखा है उनके हित योग के कम और योग को उद्योग बनाने के ज्यादा रहे हैं।

बाबा रामदेव संत हैं। उनके पास कुछ नहीं है, उनका सब कुछ ट्रस्ट का है। अरे भाई भारत में दर्जनों कारपोरेट घराने हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है सब कुछ ट्रस्ट का है इस मामले में आदर्श उदाहरण है कारपोरेट सम्राट टाटा घराना। उनकी अधिकांश संपत्ति भी ट्रस्ट के नाम है। रतन टाटा के पास बहुत कम पैसा है। ट्रस्ट की ओट में इन दिनों पूंजीवाद की सेवा करने और टैक्सचोरी करने की परंपरा चल पड़ी है।

बाबा रामदेव ने हाल के सालों में धार्मिक उद्योग की कमाई के नए कीर्तिमान बनाए हैं। उनके कीर्तिमान देखकर आम लोगों में खूब दौलत पैदा करने और खूब मौज मनाने की भावना बलबती हुई है। जो लोग यह कहते हैं कि बाबा रामदेव योग गुरू हैं, वे ठीक ही कहते हैं, बाबा रामदेव ने योग गुरू के अलावा एक और योग्यता हासिल की है वह है जीवनशैली गुरू की। योग को जीवनशैली के साथ जोड़ा है।

बाबा रामदेव ने अब तक अपने योगशिविरों के जरिए तकरीबन 3 करोड़ लोगों को योग शिक्षा दी है। साथ ही स्वास्थ्य के संबंध में अति प्राचीन किस्म की अवधारणाओं का जमकर प्रचार किया है। इनमें अधिकांश धारणाओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बाबा की अवैज्ञानिक धारणा है कि सारी बीमारियों की रामबाण दवा है प्राणायाम। बाबा के टीवी शो को प्रतिदिन सुबह दो करोड़ लोग देखते हैं। बाबा के 500 अस्पताल हैं जिनमें प्रतिदिन तीस हजार मरीज रजिस्टर्ड कराते हैं। इनमें आयुर्वेद के आधार पर चिकित्सा होती है।

मजेदार बात यह है कि बाबा आए दिन कैंसर और एड्स जैसी भयानक बीमारियों को भी प्राणायाम और आयुर्वेद से ठीक करने का दावा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। मैं सिर्फ एक ही खबर को यहां उद्धृत करना चाहूँगा। खबर पूरी पढ़ें और तय करें कि कितने करामाती हैं बाबा के इलाज। खबर इस प्रकार है-

Baba Ramdev’s guru leaves ashram due to ”unbearable pain”

Thursday, July 19, 2007,17:24 [IST]

Hardwar, July 19 (UNI) Yoga exponent Baba Ramdev’s guru Swami Shankar Dev maharaj had been suffering from unbearable pain due to chronic lung and spinal tuberculosis which made him leave Ramdev’s Patanjali ashram.

Police investigating a complaint about the swami who went missing from the ashram four days ago, said the swami had given a account of his poor health in a letter recovered by them from his room last evening.

In the letter, Swami Shankar Dev Maharaj said that he was leaving the Patanjali Yogpeeth in Kankhal here as the pain due to his ailments had become unbearable for him.

The report about the missing swami was lodged at Kankhal police station three days after he went missing under mysterious circumstances.

The city SP Ajay Joshi, heading the police team investigating the high profile case, today said, ”The missing Swami has also begged pardon from Yesh Dev Shastri, Bali Ram, Hari Dass, Chakor Dass, Nirwanji, all inmates of Patanjali Yogpeeth, for not refunding the money he had taken from them.” The persons mentioned in the letter were being asked about the circumstances under which the swami went missing and the letter had been sent to the handwriting experts to verify the writing.

On being contacted, the most trusted lieutenant of Swami Ram Dev and general secretary of Patanjali Yogpeeth, Acharya Bal Krishna confirmed that Swami Shankar Dev had been suffering from chronic lungs and spine problems. However, he expressed surprise that the Swami Shankar Dev, who was one of the signatories to the accounts of Patanjali Yogpeeth, could not refund the money he had taken from some of the inmates.

”We have intimated all the branches of the Patanjali Yogpeeth throughout the world about the missing of Swami Shankar Dev. Swami Ram Dev, who is on a trip to foreign countries to teach yoga and ayurveda, has expressed grave concern over the disappearance of his guru under mysterious circumstances,” said Acharaya Bal Krishna.

UNI

यह एक खबर मात्र है ऐसी सैंकड़ों खबरें हैं जिनकी मीडिया में खबर नहीं होती क्योंकि बाबा एक ब्रांड हैं । वैसे ही जैसे शाहरूख खान, ऐश्वर्य राय, करिश्मा कपूर, अमिताभ बच्चन, अक्षय खन्ना, आईपीएल, ललित मोदी, कॉमन वेल्थ गेम आदि ब्राँण्ड हैं।

ब्रांड के निर्माण के सभी कौशल का बडे ही सुंदर ढ़ंग से बाबा रामदेव ने इस्तेमाल किया है यही वजह है कि आज देश में उनके चारों ओर चित्र हैं, विज्ञापन है, होर्डिंग हैं, लोगो हैं। मार्केटिंग करने वाली पूरी टीम है, मीडिया के चैनल हैं। एक बहुत बड़ा अमला है जिसे पगार दी जाती है जो बाबा के लिए काम करते हैं। बाबा के लिए विज्ञापन एजेंसियों से लेकर चैनलों कर काम करने वाले प्रोफेशनलों की एक पूरी जमात है।

बाबा रामदेव ब्रांड ने योग को आम जनता अभिरूचि, परंपरा, सांस्कृतिक स्टैंडर्ड से जोड़ा है। बाबा ने ब्रांड संस्कृति के नारे ‘जस्ट डू इट’ का बड़े कौशल के साथ इस्तेमाल किया है। वे कहते हैं योग करो और स्वस्थ बनो। अभी करो और जल्दी से जल्दी परिणाम हासिल करो। वे ब्रांड की तरह ही गुणवत्तापूर्ण माल की गारंटी भी देते हैं। वे वायदा करते हैं योग-प्राणायाम करोगे गारंटेड फायदा होगा।

बाबा ने योग को प्राणायाम से आगे ले जाकर सपनों में तब्दील किया है। अब हम योग नहीं खरीद रहे हैं बल्कि सपने खरीद रहे हैं। हिन्दुत्व का सपना, स्वस्थ आदमी का सपना, रोगमुक्त व्यक्ति का सपना आदि सपनों के जरिए बाबा की मीडिया के जरिए मार्केटिंग हो रही है। वे यह भी सपना बेच रहे हैं कि योग करोगे मस्त रहोगे।

बाबा रामदेव ब्रांड के बारे में हमें किसी भी किस्म का भ्रम नहीं होना चाहिए। यह महज योग नहीं है और योग का प्रचार नहीं है। बल्कि इसके निर्माण के पीछे विज्ञापन जगत के ब्रांड निर्माण की कला काम कर रही है।

ब्रांड किसी फैक्ट्री में तैयार नहीं होता। योग का ब्रांड भी किसी योगशिविर में या बाबा के उपदेशों और यौगिक क्रिया मात्र से तैयार नहीं हो रहा है। मीडिया प्रचार के जरिए ब्रांड को आम लोगों के मन में तैयार किया जाता है। माल फैक्ट्री में तैयार होता है लेकिन ब्रांड तो आम लोगों के मन में तैयार होता है। ब्रांड में विचार,जीवनशैली,एटीट्यूड आदि मूल्यों को शामिल किया जाता है।

बाबा रामदेव ने हिन्दू कला-कौशल के आधार पर अपनी ब्रांडिंग नहीं की है बल्कि विशुद्ध रूप से विज्ञापन कला की ब्रांड कला के आधार पर अपनी ब्रांडिंग की है। बाबा रामदेव योग नहीं बेचते वे जीवनशैली बेचते हैं। वे सिर्फ योग बेचते और ब्रांड नहीं होते तो अपने को मात्र योग तक सीमित रखते लेकिन उन्होंने अपनी समूची तैयारी ब्रांड के रूप में की है और उसमें बेहद कौशल और परिश्रम किया है पेशेवर लोगों की मदद ली है।

आज बाबा सिर्फ योग-प्राणायाम तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि उनके द्वारा वस्तुओं की एक पूरी सीरीज बाजार में है । यह वैसे ही जैसे कोई जूता बनाने वाली कंपनी पहले जूते लाती है फिर उसी ब्रांड का टी-शर्ट, बाथिंग सूट, मोजा, ट्रैकसूट आदि लाती है। सफल ब्रांड की खूबी है कि वह सिनर्जी अथवा सहक्रिया पैदा करता है। वही उसके मुनाफे का स्रोत है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो बाबा रामदेव ने दसियों किस्म की वस्तुएं अपने ब्रांड के साथ बाजार में उतार दी हैं। वे योग से लेकर मनोरंजन तक, खेल-खिलाडि़यों से लेकर चौका-चूल्हे की उपभोक्ता औरतों तक, सेना, जज, वकील, डाक्टर, बुद्धिजीवी से लेकर राजनेताओं तक अपने ब्रांड का उपभोक्तावर्ग तैयार करने में वैसे ही सफल हो गए हैं जैसे कोई ब्रांड हो जाता है।

योग पहले भी था, आयुर्वेद पहले भी था लेकिन वह ब्रांड नहीं था बाबा की सफलता यह है कि उन्होंने योग को ब्रांड बनाया, आयुर्वेद को ब्रांड बनाया।

ब्रांड का लक्ष्य होता है उपभोक्ता की इच्छाओं के साथ एकीकृत करना। उपभोक्ता की इच्छाओं को ब्रांड में उतारना। जब ब्रांड में जीवनशैली को आरोपित कर दिया जाता है तो फिर वह ग्राहक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता है कि तुम सारी जिंदगी इसमें रह सकते हो। बाबा ने अपने भोक्ताओं को यही भरोसा दिलाया है। अब वे बाजार में ब्रांडों की जंग में शामिल हैं। अब जंग वस्तुओं में नहीं है बल्कि ब्रांडों में हो रही है। बाबा ने पश्चिमी जीवन शैली और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ जो जेहाद बोला हुआ है उसका कारण है अपने ब्रांड को बाजार में स्थापित करना। वे अपने योग के साथ प्रवचनों के जरिए हमेशा अपने आधार को विस्तार देने की कोशिश करते हैं।

बाबा के यहां आसन, योग, प्राणायाम पुराने हैं और तयशुदा है। लेकिन उनके साथ उनके प्रवचन और उनका लक्ष्य नया है। वे इनके जरिए जीवनशैली में अपने माल को समाहित करने की अपील करते रहते हैं। बाबा के बारबार आनेवाले लाइव टीवी प्रसारण कार्यक्रम मूलतः जीवनशैली को बेचने के लिए आयोजित किए जा रहे हैं।

बाबा ने पूंजीवादी जीवनशैली को निशाना बनाया है लेकिन जब वे स्वयं को ब्रांड बनाकर बेचते हैं तो अंततः पूंजीवाद की शरण में चले जाते हैं। ब्रांड स्वय में पूंजीवाद की गुलामी का आदर्श फिनोमिना है। बाबा ने अपने विचारधारात्मक तंत्र को बनाने के लिए हिन्दू परंपरा, हिन्दू गौरव, भारत की विविधता, समलैंगिकता का विरोध, बहुसांस्कृतिकवाद, राष्ट्रवाद, सत्ता के भ्रष्टाचार का प्रतिवाद, प्रतिष्ठानी भ्रष्टाचार, कालेधन आदि के विषयों पर निरंतर भाषण दिए हैं। योग की ब्रांडिंग में इन भाषणों का समावेश करने की कला को बाबा ने अमरेकी पंक संस्कृति, हिप-हाप संस्कृति के ब्रांडों से सीखा है। बाबा और पंक संस्कृति वालों में एक समानता है कि ये दोनों ही प्रतिष्ठान विरोधी हैं। सत्ता विरोधी हैं। प्रतिष्ठान विरोधी,सत्ता विरोधी होने के कारण ये बाजार में हिट हैं।

ब्रांड कभी ब्रांड का नशा पैदा किए बगैर बिकता नहीं है। अपनी इमेज नहीं बना पाता। ब्रांड का नशा पैदा करने के लिए जरूरी है कि उसकी उपयोगिता और प्रासंगिकता पर बार बार जोर दिया जाए। इसमें स्थानीयता और मानकीकरण के तत्व भी शामिल रहते हैं।

विज्ञापन गुरू क्लाउड हॉपकिंस का मानना था कि ‘जितना ज्यादा बोलोगे,उ तना ज्यादा बिकोगे।’ बाबा ने इस मंत्र को ऋषि पतंजलि से नहीं बल्कि विज्ञापन गुरूओं से सीखा है। इसलिए वे अहर्निश प्रचार करते हैं। प्रचार की कला विज्ञापन की कला है। यह हिन्दूकला या पतंजलि की योग कला का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से विज्ञापन की आधुनिक पूंजीवादी कला है। बाबा का विराट ब्रांड इसकी देन है। यह योग की देन नहीं है। योग तो इसमें निमित्तमात्र है। लक्ष्य है मुनाफा कमाना।

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11 Comments on "योग को ब्रांड कैसे बनाया बाबा रामदेव ने ?"

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डॉ. मधुसूदन
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==बंधुवर चतुर्वेदी जी, आप इश्वर इच्छा अधीन हिन्दू समाज को जगाने का उत्तम काम अनजाने में किये जा रहे हैं. इतना कोई भारतीयता का समर्थक कभी न कर पाता. आपका धन्यवाद व शुभकामनाएं ! इसी प्रकार डटे रहिये. आपका त्याग(?) व बलिदान(?) स्मरणीय है जो इतना अपमान, प्रताड़ना सह कर भी भारतीय संस्कृति के अनेक आयामों को अपमानित करने के काम में निरंतर डटे हुए हैं. ===कपूरजी से सहमत हूं। ** उन्हे क्लिक प्राप्त करनेका तरिका पता चल गया है। पहले से ज्यादा क्लिक मिल रहे हैं।** जैसे, कौरवों का विरोध ना होता, तो पांडवों को युद्ध ना करना पडता,… Read more »
Vishwash Ranjan
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आप लोगों को गर्व होना चाहिए की एक लंगोट धारी मल्टीनेशनल कंपनियों को टक्कर दे रहा है. ताज्जुब है आपको अफ़सोस हो रहा है …क्या राहुल गाँधी अपने आप को ब्रांड नहीं बना रहे…हर आदमी अपनी अच्छी छवि बनाना चाहता है तो इसमें गलत क्या है…

akash
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बिलकुल सही कहा आपने ऐसे होते हैं संत लोग इन्हें बोलते हैं संत लोग ऐसे होते हैं मर्द | मेरे मुताबक संत वह होता है जिस की समाज को कोई देन होती है और रामदेव बाबा के बारे में यह धारणा पूर्ण तोर पर सही है | बाबा ने यहाँ हमारे भारत की पुरातन संस्कृति को पुनार्जीवत कर दिया ,वोही हमारे समाज को साफ़ सुथरा बनाने के लिए आपना जीवन समर्पित कर दिया | |भारती सिस्टम …क…ो जो केंसर हो चूका है उसे अब बाबा रामदेव ही अछे से प्राणायाम करने के योग हैं |और हाँ मैं भारत सरकार को… Read more »
diksha kapoor
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इस बात के लिए डा. चतुर्वेदी जी का हम सब को आभारी होना चाहिए कि उनके अतिवादी योग, संस्कृति व भारतीयता के विरोध ने कई नए भारतीय संस्कृति के सशक्त टिपण्णीकार पैदा कर दिए. भविष्य में ये सब अछे लेखक और भारतीय संस्कृति के कलम के प्रभावी सिपाही बनेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं. – चतुर्वेदी जी के कारण अनेक प्रतिभावान, देशभक्त, सज्जन युवा व प्रौढ़ मित्र मुझे मिले हैं. इसके लिए भी मैं चतुर्वेदी जी का आभारी हूँ. – साम्यवाद का भारत विरोधी वास्तविक चेहरा उजागर करने में भी चतुर्वेदी जी का बहुत बड़ा योगदान है. हम अपने मुंह से… Read more »
ateet Gupta
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चतुर्वेदी एक कहावत सुनी होगी
कुत्ते भोंकते रहते है और हांथी अपने चल में मस्त रहता है,
कभी शर्म करो टीचर महोदय

आर. सिंह
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चतुर्वेदीजी आप चुप रहने के लिए क्या लेंगे?क्या अनर्गल बातों के सिवा आप कुछ कर ही नहीं सकते?galat तो shayad ham log hain jo आप जैसों को kewal padh ही नहीं lete balki us par tika tippani karke aapka TRP bhi badhaa dete hain.

akash
Guest

good

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