लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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भूमिकाःआज जब कि हमारे देश की सरकार बेटी बचाओं आन्दोलन चलाने पर मजबूर है, कारण विकृत मानसिकता और सामाजिक परिस्थितियों के होते हुये माता के गर्भ में  पल  रही  बेटियों  को  जन्म  लेने  से  पूर्व ही  मार  दिया  जाता है, यही नहीं हमारे देश में लाखों बेटियों को उनके मातापिता अपने ऊपर एक बोझ समझते हैं, ऐसे में मैं अगर गर्व से कहता हूं कि मैं तीन पुत्रियों का पिता हूं जो कि मेरी मेरे लिए वरदान हैं सर्वोत्तम पूंजी हैं, तो इस का श्रेय महर्षि दयानन्द सरस्वती उनके द्वारा सन् 1875 में स्थापित आर्य समाज को है।

 

मैं महर्षि दयानन्द सरस्वती का ऋणी  हूं।

भारतेन्दु सूद

 

आज जब कि हमारे देश की सरकार बेटी बचाओं आन्दोलन चलाने पर मजबूर है, कारण विकृत मानसिकता और सामाजिक परिस्थितियों के होते हुये माता के गर्भ में  पल  रही  बेटियों  को  जन्म  लेने  से  पूर्व ही  मार  दिया  जाता है। यही नहीं हमारे देश में लाखों बेटियां को उनके माता-पिता अपने ऊपर एक बोझ समझते हैं, ऐसे में मैं अगर गर्व से कहता हूं कि मैं तीन पुत्रियों का पिता हूं जो कि मेरी मेरे लिए वरदान हैं व सर्वोत्तम पंूजी हैं, तो इस का श्रेय महर्षि दयानन्द सरस्वती व उनके द्वारा सन् 1875 में स्थापित आर्य समाज को है।

 

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने समय में कैंसर रोग के समान भयानक रूप से समाज को कमजोर करने वाली सभी सामाजिक बुराईयों के  विरूद्ध  युद्ध  छेड़ा था। महर्षि ने  उस समय  जब कि  भारत  में महिलाओं की सामाजिक स्थिति अत्यन्त दयनीय थी, स्त्री  पुरूषों  की समानता, स्त्रियों की शिक्षा व  उनके परिवार  के  संचालन में उनकी प्रमुख भूमिका को सही सन्दर्भ में प्रस्तुत कर  क्रान्ति  की थी । उन दिनों अधिकतर महिलायें अपने घरों में भी गुलामों की भांति रहा करती थी। महिलाओं और दलितों  को  वेदों और दूसरे शास्त्रों  के  अध्ययन  से  रोकने  वाली  अन्धविश्वासों  से  परिपूर्ण व्यवस्था को स्वामी जी ने अपने पैरों तले रौंद डाला और घोषणा की कि सभी स्त्रियों व दलितों को शि़क्षा व वेदों के पढ़ने-पढाने का ब्राह्मणों के समान ही अधिकार है।  उन्होंने कहा वेद सब के लिये हैं, सभी को वेदाध्ययन का अधिकार है जन्म-जाति, रंग भेद और भौगोलिक सीमाऐं इस में बाधा नहीं हो सकते।

 

उनका कहना था कि शिक्षा  स्त्रियों  की  सभी  समस्याओं  के  निवारण  के  लिए  रामबाण औषधि है। हमारा समाज इस अशिक्षा के कारण ही दुर्बल हुआ है। आज  महर्षि दयानन्द सरस्वती को स्वर्ग सीधारने के 132 वर्ष बाद यह सिद्ध हो चुका है कि उनके इस सम्बन्ध में कहे गये वचन सत्य थे। उनसे प्रेरणा लेकर, उनके भक्तों ने उनकी असामयिक मृत्यु के कुछ ही समय  बाद  पंजाब  में  प्रथम  महिला  विद्यालय  आर्य  कन्या  महाविद्यालय, जालन्धरकी सन् 1889 में स्थापना कर उसे पूरा किया। यही नहीं, उनके अनुयायियों द्वारा एक हजार से अधिक डी.ए.वी. संस्थायें एवं गुरूकुल देश के हर कोने में खोलें जो शिक्षा के प्रचार व प्रसार के कार्य में लगे हुये हैं और यही सभी शिक्षा संस्थायें उनके  सच्चे  स्मारक  हैं।

 

मैंने उनसे सीखा कि माता व पिता को अपनी पुत्रियों का ध्यान रखने  वाला सच्चा सहृदय मित्र व संरक्षक होना चाहिये और यह भी जाना कि हम अपनी पुत्रियों को सबसे बड़ा यदि कोई उपहार दे सकते हैं तो वह शिक्षा एवं अच्छे संस्कार ही हैं। इस कार्य के लिए माता-पिता से अच्छा कोई विद्यालय नहीं हो सकता। वह सन्तान अतीव भाग्यशाली होती है जिसके अभिभावक माता-पिता धार्मिक हों व शिक्षा एवं संस्कारों से अलंकृत व सुभूषित हों।

 

आज यदि मैं घर में बैठा हुआ या फिर यात्रा करता हुआ भी ईश्वर से जुड़ा हुआ रहता हूं तो यह भी स्वामी दयानन्द जी का ही प्रभाव है जिन्होंने बताया कि ईश्वर निराकार, अजन्मा सर्वव्यापक और सर्वान्तरयामी है। उसको कहीं बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है अपितु वह हमारे अन्दर ही है बात केवल अन्दर झांकने की है। हम उपासना द्वारा ईश्वर से जुड़ सकते हैं। चाहे मुझ पर कितनी वड़ी मुसीबत आन पड़े या बहुत बड़ा प्रलोभन हो, मैं किसी भी हालत में न किसी चमत्कारी बाबा के पास जाता हूं न जाऊंगा, यह महर्षि दयानन्द सरस्वती की शिक्षा का ही प्रभाव है।

 

एक अन्य लाभ जो मुझे उनकी शिक्षाओं से हुआ है, वह यह कि सत्य को सर्वोपरि स्वीकार करना और तर्क से सत्य की पहचान करना। इससे मैं सभी प्रकार के अन्ध विश्वासों से मुक्त हो गया। मुझे किसी धर्मगुरू या ज्योतिषी के पास किसी अच्छे दिन या  मुहुर्त पूछने जाने की आवश्यकता  नहीं है। मेरे  लिए  सभी दिन एक समान हैं व सभी दिन अच्छे दिन हैं और मेरे जीवन का वर्तमान समय मेरे लिए सबसे अच्छा समय है। जब कोई व्यक्ति सत्य को सर्वोपरि मान कर उसे अपने जीवन में धारण करता है तो वह स्वतः निर्भय व निडर हो जाता है। यह सत्य ही जीवन में प्रसन्नता, सुख व आनन्द का कारण है।

 

अन्त में मैंने उनसे यह जाना कि सभी मनुष्य जन्म से समान हैं। मनुष्य विद्या अध्ययन कर व शुभ गुणों को धारण कर ही ब्राह्मण बनता है जिसमें उसके जन्म व कुल आदि का महत्व नहीं होता।  इस ज्ञान ने मुझे सभी प्रकार के पक्षपात व अन्यायपूर्ण व्यवहारों से बचाया है व मुझे सबल व सक्षम भी बनाया है।

 

भारतेन्दु सूद

 सम्पादक

 वैदिक थाट्स

 चण्डीगढ़़।

 

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1 Comment on "मैं महर्षि दयानन्द सरस्वती का ऋणी हूं।"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
मनमोहनजी,आपने मेरा विश्वास और ढृढ़ किया है,दो बेटियों का बाप हुँ. वे दोनों बेटों की ही पूर्ति करते हैं. स्वामी दयानंद ने जो शंख फूंका है,स्वार्थी तत्वों ने उसकी आवाज मुखर नहीं होने दी. प्रवक्ता परिवार ने स्वामी जी से उत्प्रेरित विद्वानो के लेख नेट पर डालने का जो क्रम आरम्भ किया है वह पुंगा पंथियों पर नकेल कसेगा ऐसा लगता है. बहु देवता वाद,मूर्तिवाद,झूंठी जाती प्रथा ,रूढ़ियाँ ,ढकोसले आदि को धर्म की संज्ञा देने वाले और अपना पेट भरने वाले और विलासितापूर्ण जीवन जीने वाले बाबाओं ,तांत्रिकों ,की अब खैर नही. और वैदिक थॉट्स पर कोई समाचार छपता भी… Read more »
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